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दिलीप कुमार शर्मा ‘अज्ञात’ की पांच कविताएँ

दिलीप कुमार शर्मा बहुत कम लिखने वाले कवियों में हैं ! अच्छे कवि होने के साथ ही वे एक अच्छे अनुवादक (बांग्ला से हिंदी में अनेक कहानियों और कविताओं का बेहतरीन अनुवाद किया है ) और छायाकार भी हैं ! एक अरसे तक दिलीप जी ‘हंस’ और सर्वनाम पत्रिका के लगभग नियमित आवरणकार रहें हैं ! 

दिलीप जी का जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा है और उनकी कविताओं में उस संघर्ष को हम महसूस कर पाते हैं ! भात पर लिखी ये कविताएँ बहुत गहन अनुभव की उत्पत्ति है !

-नित्यानन्द गायेन

भात : पाँच कविताएंDilip Kumar Sharma Agyat (Photo)

1. भात के लिए

यह वही भात है
जिसे पेट में रखने के लिए
मैंने तुम्हारा हाथ थामा है।

इसे तुम पकाती हो
अपने उबलते पानी में
जिसे खा कर मैं जीता हूँ।

 

2. अकेला एक चावल

एक दिन
भात पक जाने के बाद
बाहर पड़ा चावल का एक दाना
कहने लगता है –
‘क्यों मुझको अकेला छोड़ दिया
क्या मैं तुम्हारा पेट नहीं भर सकता था!’

 

3. बासमती चावल

कल मैंने बाज़ार में
बासमती चावल देखा
और उसकी खुशबू
मेरे अंदर भर गई,

शायद तुम कहीं
उबल रही हो मेरे लिए।

 

4. बासी भात

कल का बासी भात
आज मैं खा कर जान गया हूँ
उसका स्वाद,

तुम को भी ऐसा ही
लगता होगा इसका स्वाद।

 

5. सूना हाथ

भोजन कर लेने के बाद
अपने थाली को इतना साफ़ करता हूँ कि
उसमें तुम्हारा चेहरा देख सकूँ
अब कहीं से चूड़ी और पायल की आवाज़ नहीं आती,

जब मैं रोटी सेंकता और उबालता हूँ चावल
बहुत उबल जाता हूँ तब और जल जाती है रोटी!

चलो अच्छा ही है कि
इस बहाने तुम मुझको बहुत याद आती हो !

 

संप्रति : हैजलवुड स्कूल, छपरा सारण में अध्यापक।
(कविता, कहानी, अनुवाद, चित्रकारी, फोटोग्राफी में सक्रिय)

 

संपर्क :

हैजलवुड स्कूल, साँढ़ा नेवजी टोला, पोस्ट : तेलपा, छपरा सारण-841302 (बिहार)
मो. 9471678183
ईमेल : agyatdilip@gmail.com

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2 comments

  1. बहुत सुन्दर कविताएं! छोटी और सुघड़।

  2. RAMESH KUMAR GOHE

    भात पर लिखी सभी कवितायेँ बहुत अच्छी लगी |लगता है कि सभी कवितायेँ किसी की याद में लिखीं हैं…!

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