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गदहा हाईजैक हो गया

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खुदा मेहरबान, तो गदहा पहलवान।

गदहों में इस बात की खबर बांटी गयी और वो खुदा की मेहरबानी पाने के लिये निकल पड़े।

मशक्कत की,

पसीना बहाया

मलबे ढोये

जान जोखिम में डाला

गदहों की सोच, आनेवाले अच्छे दिनों की गलियों में भटकने लगी और उन्होंने खुदा की मेहरबानी पाने के लिये इबादत खाना भी बना लिया।

इबादतें होने लगीं,

मुरादें मांगी जाने लगीं,

जलसे और जुलूसों का तांता लग गया।

खुदा टस से मस नही हुआ, या होने को सोच ही रहा था, कि गदहों की लगन देख कर, चलता पुर्जा सा एक गदहा, गदहों का खुदा बन गया।

गदहे सन्न!

खुदा सन्न!

और अब, कुछ गदहें कसीदे पढ़ रहे हैं।

-‘‘यह खुदा की मेहरबानी है, कि हमारा खुदा, अब खुदागंज में रहता है।‘‘

गदहे परेशान हैं, कि ‘‘निकले थे, खुदा की मेहरबानी के लिये, मगर न खुदा मिला, न गदहा ही अपना रहा।‘‘

खबरें बह रही हैं- ‘‘खुदा गदहे पर मेहरबान हो गया।‘‘

फिर, आप तो जानते हैं, कि बनायी गयी खबरों के न सिर होते हैं, न पांव।

और यदि होते भी हैं, तो ठिकाने पर नहीं होते सभी की जगहें बदल गयी हैं। किसी की सूरत सिर्फ कान है, तो किसी के चेहरे पर सिर्फ आंख है। पेट के पीछे-पीछे नहीं पीठ के पीछे पेट है। दिल और दिमाग का माहौल बदल गया है। कुछ और भी हुआ है- जहां सिर होना चाहिये वहां टोपी है। जहां हाथ होना चाहिये, वहां डंडा है। जहां पांव होना चाहिये, वहां जूता है।

एक बात और है।

खुदागंज से फरमान पहले आता है, उस पर बहंस बाद में होती है। उससे भी पहले गदहों के दिमाग में, उनका खुदा, गदहा पच्चीसी भर देता है।

पड़ रही मार से बेखबर गदहे अ़च्छी-अच्छी खबरें पढ़ रहे हैं, कि ‘‘खुदा मेहरबान हो गया है।‘‘

‘‘कोयला, लोहा, पानी, माटी के बदले में सोना चांदी लुटा रहा है।‘‘

जिन गदहों को कोई नहीं पूछता था, उन गदहों की मेहनत खरीद रहा है।

जिस बाजार में गहरी उदासी थी, उस बाजार को चमका रहा है।

और धीरे-धीरे, गदहे के हाईजैक होने की, खबर बन रही है।

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