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विश्व का बदलता वित्तीय संतुलन

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‘‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेण्ट बैंक -एआईआईबी- की वजह से विश्व के वित्तीय संतुलन में परिवर्तन की नयी संभावनायें बन गयी हैं। यूरोप और अमेरिका के इर्द-गिर्द घूमती वैश्विक अर्थव्यवस्था अब चीन सहित एशिया में केंद्रित होती जा रही है। जिसका नेतृत्व चीन के हाथों में है। वैसे भी चीन समानांतर वैश्विक अर्थव्यवस्था और वैकल्पिक मुद्रा व्यवस्था की मांग करता रहा है। जिसकी अनदेखी अब नहीं की जा सकती।

गये साल ही चीन ने अपनी मुद्रा युआन के वैश्विक मुद्रा होने की घोषणां की, और गये साल अक्टूबर में एआईआईबी की स्थापना की गयी। जिसके घोषणांपत्र पर उस समय 21 देशों ने हंस्ताक्षर किये। भारत भी जिसका संस्थापक देश है, और चीन के बाद बैक का सबसे बड़ा साझेदार हैं 50 अरब डाॅलर की पूंजी से निर्मित इस बैंक में चीन की साझेदारी सबसे बड़ी और निर्णायक है। जिसका मुख्यालय भी बिजिंग में है।

एशिया में चीन के बढ़ते वर्चस्व को ‘पिवोट टू एशिया‘ और सामरिक नाकेबंदी की नीतियों से संचालित अमेरिकी सरकार के लिये चीन के नेतृत्व में बने एआईआईबी समानांतर वैश्विक वित्त व्यवस्था की पहल है, जो अमेरिकी वर्चस्व वाली वैश्विक वित्तीय इकाई -विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष- के विरूद्ध है। यही कारण है, कि उसने अपने सहयोगी देशों से ‘‘इससे दूर रहने का दबाव‘‘ बनाया। किंतु स्थितियां बदल गयीं। चीन ने इस बात की घोषणां की कि ‘‘एआईआईबी विश्व बैंक और एशियायी विकास बैंक का पूरक होगा।‘‘ और अमेरिकी सरकार अपने खेमे में अकेली खड़ी रह गयी, यह सोचते हुए कि उसे भी नये बैंक में शामिल होने का आवेदन करना चाहिये। 31 मार्च जिसकी आखिरी तिथि है। उसके सहयोगी देशों ने उसका साथ छोड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने राष्ट्रीय हितों को वरियता दी।

अब तक अमेरिकी हितों से संचालित ब्रिटेन की कैमरन सरकार ने 12 मार्च को एआईआईबी के -पहले पश्चिमी देश के रूप में- संस्थापक सदस्य देश बनने केे लिये आवेदन किया। और ब्रिटिश राजकोष के प्रमुख जाॅर्ज आसबर्न ने कहा- ‘‘बैंक की नीतियां पूरी तरह से पारदर्शी हैं, और एशिया के विकास के लिये वित्तीय सहयोग देने में उसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘एआईआईबी को संस्थापक सदस्य के रूप में ब्रिटेन का शामिल होना, हमारे लिये एक-दूसरे के यहां निवेश करने और एक साथ विकास करने की नयी संभावनाओं के द्वार को खोलने में सहायक होंगी।‘‘ उन्होंने इस बात का खण्डन किया कि ‘‘ब्रिटेन का यह निर्णय जल्दबाजी में लिया गया निर्णय है। उन्होंने जानकारी दी कि इस बारे में जी-7 के स्तर पर कम से कम 1 महीने वार्ताओं का दौर चला, जिसमें अमेरिकी राजकोष सचिव जैक ल्यू ने भी भाग लिया था।‘‘

ब्रिटेन के इस निर्णय पर अमेरिका ने अपने तत्काल दिये गये प्रतिक्रिया में अपनी असहमति व्यक्त की। 12 मार्च को ‘फाईनेन्सियल टाईम्स‘ पर एक अमेरिकी उच्च-अधिकारी ने ब्रिटेन के निर्णय पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, कि इस बारे में अमेरिका से ना के बराबर सलाह-मशविरा किया गया।‘‘ पिछले कई दशकों से अमेरिका और ब्रिटेन के बीच रिश्तों की जो गरमाहट रही है, वह अमेरिका के पश्चिमी देशों के सम्बंधों का निर्णायक रहा है, किंतु हाल के दिनों में ब्रिटेन के द्वारा अपने रक्षा बजट में की गयी कटौती की वजह से आपसी तनाव आ गया है। ब्रिटेन अपने राष्ट्रीय हितों को वरियता देने के लिये विवश हैं। अक्टूबर 2014 में ब्रिटिश सरकार ने चीनी मुद्रा युआन में बाॅण्ड जारी किया। ऐसा करने वाला वह पहला पश्चिमी देश था। ब्रिटेन चीन के साथ मजबूत व्यावसायिक सम्बंधो को बढ़ाने का इच्छुक है। जिसका स्वाभाविक परिणाम अमेरिका से उसके रिश्तों पर पड़ने लगा है, क्योंकि वाशिंगटन चीन के आर्थिक विस्तार को अमेरिका की वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये चुनौती मानता है।

13 मार्च को ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के प्रवक्ता ने राॅयटर से कहा- ‘‘आगे भी ऐसा समय आ सकता है, जब हमारी नीतियां अमेरिकी नीतियों से अलग हो सकती हैं।‘‘ उन्होंने स्पष्ट किया कि ‘‘हमारा निर्णय ब्रिटेन के राष्ट्रीय हित में है।‘‘ ब्रिटेन के इस निर्णय ने यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के लिये एआईआईबी से जुड़ने की राह को खोलने का काम किया। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी, फ्रांस और इटली ने भी अपने शामिल होने की घोषणां की। एक लम्बे समय के बाद ऐसा हुआ, कि अमेरिका और यूरोपीय संघ की नीतियों में बड़ा परिवर्तन आया। और अमेरिका के सामने नयी विवशतायें पैदा हो गयीं। एआईआईबी से जुड़ना खुले तौर पर यह स्वीकार करना होगा, कि अब अमेरिका वैश्विक वित्त व्यवस्था का ऐसा साझेदार है, जहां उसकी सर्वोच्चता नहीं है। वह विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की तरह एआईआईबी को नियंत्रित नहीं कर सकता।

एशिया के आर्थिक विकास और विकास के लिये आधारभूत ढांचे का निर्माण अमेरिकी नियंत्रण से बाहर हो गया। जिसके माध्यम से वह एशिया की अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करता था। उसके प्रतिबंधों की राजनीति पर भी लगाम लगेगी। चीन की जो नीतियां लातिनी अमेरिकी देशों और अफ्रीकी देशों के प्रति है, यदि उन्हीं नीतियों को एशिया के आर्थिक विकास के लिये लागू किया गया, तो एशिया में जनविरोधी सरकारों की संख्या भी घटेगी। राजनीतिक रूप से गैर अमेरिकी लोकतंत्र की राहें भी खुलेंगी।

एआईआईबी की घोषित नीति एशिया के पिछड़े और गरीब देशों में सड़क, यातायात, बिजली, टेलीकम्युनिकेशन और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण की परियोजनाओं के लिये आर्थिक सहयोग उपलब्ध कराना है। जिसका अघोषित लक्ष्य एशिया में चीन के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार भी है। जोकि स्वाभाविक हैं चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग ने इन्हीं नीतियों के तहत इस क्षेत्र में चीन के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने का काम किया। ‘एशियन डव्लपमेंट बैक‘ इस क्षेत्र मे पहले से काम कर रहा है, और वह प्रमुख कर्ज देनेवाली वित्तीय इकाई है, जिसमें अमेरिका के साथ जापान इसके सबसे बड़े शेयर होल्डर हैं। एआईआईबी इस रूप में पश्चिमी देशों की वित्तीय इकाईयों का विकल्प है। बैंक के माध्यम से भी चीन अपने इसी लक्ष्य को पाने के लिये प्रयत्नशील है। मध्य एशिया के साथ अपने सम्बंधों को विस्तार देते हुए उस क्षेत्र में वित्तीय एकीकरण को बढ़ावा देने के लिये चीन ने 40 बिलियन डाॅलर के सहयोग से ‘सिल्क रोड फण्ड‘ की स्थापना भी की है।

चीन की नीतियों का विरोध करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सभी सहयोगी देशों से कहा था, कि ‘‘वो एआईआईबी से दूर रहे।‘‘ आॅस्ट्रेलियन मीडिया रिपोर्ट के अनुसार- ‘‘वाशिंगटन ने एआईआईबी में साझेदारी नहीं करने के लिये कैनबा पर दबाव बनाया था।‘‘ किंतु आॅस्ट्रेलिया ने अमेरिकी दबाव के विरूद्ध निर्णय लिया।

दक्षिण कोरिया के उपवित्त मंत्री गो-उयूंग ने 12 मार्च को रिपोर्टर्स को बताया था, कि ‘‘उनका देश चीन और अन्य देशों के साथ सदस्यता की संभावना पर चर्चायें कर रहा है।‘‘ किंतु उसने आवेदन पत्र देने का निर्णय लिया।

ब्रिटेन की तरह ही फ्रांस, जर्मनी और इटली ने इस बात की घोषणां की है, कि ‘‘वो चीन के एआईआईबी के साझेदार बनेंगे।‘‘ एएफपी के अनुसार- ‘‘17 मार्च को तीनों यूरोपीय देशों ने इस बात की घोषणां की, कि वो एआईआईबी के सदस्य देश बनेंगे।‘‘

जर्मनी के विदेश मंत्री वोल्फगैंग शाॅयुब्ल ने कहा- ‘‘हम अपन लम्बे अनुभवों का लाभ बैंक की शाख को मजबूत करने के लिये देंगे।‘‘ उन्होंने यह बात चीन के उप प्रधानमंत्री मा-काई के साथ संयुक्त प्रेस वक्तव्य में कही। उन्होंने यह बात फ्रांस और इटली की ओर से भी कहा। उन्होंने कहा कि ‘‘तीनों देश एशिया के आर्थिक विकास में अपना सकारात्मक सहयोग देना चाहते हैं। जिसमें जर्मनी की कम्पनियां सक्रीय रूप से भाग ले रही हैं।‘‘

चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता हाॅग-लि ने निर्णय का स्वागत करते हुए कहा, कि ‘‘एआईआईबी एक खुला और बहुपक्षीय निवेशक वित्तीय इकाई है।‘‘ उन्होंने आग कहा कि ‘‘इस क्षेत्र के बाहर के देशों के द्वारा हिस्सा लेने से एआईआईब में व्यापक क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व मिलने को गति मिलेगी।‘‘

एशिया में अमेरिका के सबसे अभिन्न और निकटत देश जापान ने भी लम्बी चर्चा के बाद एआईआईबी में सदस्यता साझेदारी का निर्णय लिया है।

इस तरह 30 देशों की हिस्सेदारी तय हो गयी है। अधिकृत रूप से चीन 27 देशों की सदस्यता (आवेदन पत्र) की घोषणां की है।

अक्टूबर 2014 में एआईआईबी की स्थापना के समय 21 देशों ने उसके घोषणां पत्र पर हस्ताक्षर किया था, 9 फरवरी 2015 को 6 अन्य देश, जिसमें इण्डोनेसिया और सउदी अरब भी शामिल है, ने बैंक की सदस्यता के लिये आवेदन दिया। 25 मार्च 2015 को 9 देशों ने सदस्यता ग्रहण किया जो -ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, लक्जमबर्ग, स्वीटजरलैण्ड, तुर्की, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया है। 28 मार्च को डेनमार्क और निदरलैण्ड ने आवेदन दिया और 28 मार्च को ही रूस ने बैंक में शामिल होने के निर्णय की घोषणां की। 29 मार्च को आॅस्ट्रेलिया ने सदस्यता के लिये आवेदन दिया।

चीन के वित्तमंत्री लू-जेवाई ने चीन के सरकारी मीडिया से कहा, कि 31 मार्च सदस्यता के लिये आवेदन देने की अंतिम तिथि है। चीन की योजना 2015 के अंत के पहले ही बैंक के परिचालन की है।‘‘ उन्होंने जानकारी दी कि अन्य देश 31 मार्च के बाद भी एआईआईबी की सदस्यता हासिल कर सकते हैं, लेकिन यह सदस्यता सामान्य होगी। उन्हें संस्थापक सदस्यों का दर्जा हासिल नहीं होगा।

आॅर्गनाइजेशन फाॅर इकोनाॅमिक को-आॅपरेशन एण्ड डव्लपमेंट की प्रमुख एंजल गाॅरिया ने यूरोपीय देशों के द्वारा बैंक में सहयोग देने के निर्णय की सराहन की। उन्होंने कहा- ‘‘सच यह है, कि कुछ यूरोपीय देश इस समय उस प्रोजेक्ट से जुड़ रहे हैं, जो पूरी विश्वसनियता तथा पारदर्शिता से काम करने जा रहा है।‘‘

अमेरिका के राजकोष सचिव जैक ल्यू ने कहा कि ‘‘वाशिंगटन को इस बात की आशंका है, कि चीन के नेतृत्व में बन रहा बैंक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय मापदण्डों पर दृढ़ रह पायेगा।‘‘ उन्होंने कई सवाल खड़े किये कि क्या वह कामगरों के अधिकारों की रक्षा कर पायेगा? क्या वह पर्यावरण को संरक्षण दे पायेगा? क्या वह करप्शन जैसे मुद्दों को सही तरीके से हल करने की स्थिति में होगा?

मगर चीन के वित्तमंत्री ने आश्वासन दिया कि एआईआईबी मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से प्रतिस्पद्र्धा नहीं करेगा। उन्होंने कहा- ‘‘इतिहास दोहराया जा रहा है। जिस तरह एशियन डव्लपमेंट बैंक और यूरोपीयन बैंक की स्थापना से पहले से कार्य कर रही वित्तीय इकाईयों को कमजोर नहीं किया, इसके विपरीत उन्हें बढ़ाने का काम किया, उसी तरह एआईआईबी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को आगे बढाने का काम करेगा।‘‘

उन्होंने इस बात का आश्वासन भी दिया कि चीन विश्व बैंक और एशियन डव्लपमेंट बैंक का महत्वपूर्ण सदस्य देश बना रहेगा।

22 मार्च को बिजिंग में एक सम्मेलन में भाग लेते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टीना लोगार्ड ने कहा कि ‘‘हम चीन के द्वारा बनाये जा रहे एआईआईबी का स्वागत करते हैं। हमारा मानना है, कि चीन के पास पर्याप्त कारण है, कि वह इस तरह के बहुआयामी वित्तीय इकाई का निर्माण करें।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘यदि अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष एशिया में आधारभूत ढांचा के निर्माण के लिये आर्थिक सहयोग दे पाता, तो मुझे खुशी होती। लेकिन हम पर अन्य वित्तीय जिम्मेदारियां है। इसलिये हम एआईआईबी के साथ सहयोग करना चाहते हैं।‘‘ उन्होंने ‘चाईना डव्लपमेंट फोरम‘ में हिस्सा लिया।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के अलावा विश्व बैंक और एशियन डव्लपमेंट बैंक ने एआईआईब के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया हैं।

विश्व बैंक के मैनेजिंग डाॅयरेक्टर श्री मल्यानी इंदिरावती ने शिन्हुआ को दिये साक्षात्कार में कहा, कि ‘‘कोई भी कदम, जो आधारभूत ढांचा के निर्माण की कमियों को पूरा करने के लिये उठाया जायेगा, उसका निश्चित रूप से स्वागत है।‘‘ उन्होंने एआईआईबी के द्वारा प्रतिस्पद्र्धा करने की चिंता और आशंकाओं को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा- ‘‘वैश्विक स्तर पर आधारभूत ढांचे के निर्माण की जरूरतें बहुत बड़ी हैं, और बाजार इतना बड़ा है, कि उसमें नयी इकाईयां अपने लिये काम करने की जगह बना सकती हैं।‘‘

यूरोपीय संघ के महत्वपूर्ण सदस्य देशों, आॅस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे प्रमुख सहयोगियों, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, और विश्व बैंक के द्वारा एआईआईबी को समर्थन एवं सहयोग देने की घोषणां के बाद ‘वाॅल स्ट्रीट जरनल‘ के अनुसार- ‘‘अमेरिका ने एआईआईबी के साथ साझेदारी में काम करने का प्रस्ताव रखा है।‘‘

यह अमेरिकी सरकार और राष्ट्रपति बराक ओबामा के लिये गहरा आघात है। उनकी आर्थिक नीति एवं कूटनीतिक समझ की बड़ी असफलता। जो इस बात का खुला प्रमाण है, कि अमेरिकी वर्चस्व का अंत हो रहा है। और विश्व का वित्तीय संतुलन तेजी से बदल रहा है।

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