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पुष्पेन्द्र फाल्गुन की तीन कविताएँ

1. मरने से पहले एक कवि का सपनापुष्पेन्द्र जी

सामने
भयावह चुनौतियाँ हैं
और
कई यक्ष प्रश्न
एक साथ खड़े हैं !

चारों ओर से उठे
अंधड़ों ने
मुझ तक आती
सूर्य-किरणों का रास्ता
रोक लिया है

पार्श्व से
सपनों के बिलखने के स्वर
तेज़ होते जा रहे हैं
अभी – अभी
मेरे कहने पर
बेटियों ने इन सपनों को
अपनी आँखों से नोच
धूल भरी सड़क पर पटक दिया है

पत्नी की उदासी भी
नया ठिकाना नहीं ढूँढ पाने के
अफ़सोस के साथ लौट आयी है

समय ने
मेरे लिये
कड़ी सज़ा मुक़र्रर की है

समय ने
मेरे बेबाक
मेरे दृढ़-निश्चय
मेरे जन-निष्ठ
होने को
अक्षम्य अपराध माना है

समय ने
मेरी इंसाफ़-पसंदगी को
घोषित किया है मानव-द्रोह
मेरी मुस्कराहट को
धर्म – विरोधी करार दिया है
मेरी जीजिविषा को
चरम अनैतिक कृत्य माना है
मेरे प्रयोगों को
असामाजिक और विद्वेष-पूर्ण
कार्रवाई की संज्ञा दी है

आसमान के सारे देवता
समय के
समस्त फैसलों से
सहमत हैं
मेरे सभी मित्र और शत्रु
देवताओं की कतार में खड़े हो
एक – सी – एक फब्तियाँ
मेरी ओर उछाल रहे हैं
लगता है देवताओं ने उन्हें भी
आखिर मेरे खिलाफ़ बरगला ही लिया है

जीवन की
समर-भूमि में मैं
अकेला और निहत्था
मित्रों और शत्रुओं से असंग
बेटियों और पत्नी की
नाउम्मीदी से लथपथ
सिर्फ इसी भरोसे खड़ा हूँ
कि एक दिन
मैं भी
छल और सपने के अंतर को समझूँगा

और
इन्सान की ज़िन्दगी को
बेबस, मजलूम, लाचार
जरूरतों की पनाहगार
बनाने वालों की ताबूत में
आखिरी कील बनकर चमकेंगे
मेरे सपने

 
2. अंतस-पतंगें

परत-दर-परत
उघारता हूँ अंतस
उधेड़बुन के हर अंतराल पर
फुर्र से उड़ पड़ती है एक पतंग
अवकाश के बेरंग आकाश में.

पतंगों के
धाराप्रवाह उड़ानों से उत्साहित
टटोलता हूँ अपना मर्म मानस
पाता हूँ वहाँ अटकी पड़ी असंख्य पतंगें
कहीं गुच्छ-गुच्छ
कहीं इक्का-दुक्का.

अंतस की काई में
उँगलियाँ उजास का जरिया बनती हैं
अंगुल भर उजास
भड़भड़ा देता है अस्तित्व
पतंगें
घोषित कर देती हैं बगावत
स्पर्श ने
पिघला दी समय की बर्फ
जगा दी मुक्ति की अपरिहार्य आकांक्षा.

पतंगों की समवेत अभिलाषा
अंतस में पैदा करती है प्रसव-वेदना
एक-एक कर
कोख से उन्मुक्त हो पतंगें
नापने लगती हैं आसमान
लाख प्रयास भी
नहीं काट पाती है
किसी भी पतंग की गर्भनाल.

गर्भनाल ही बनती जाती है डोर
अंतस रूपांतरित होने लगता है
एक महाकाय चकरी में
जिसमे लिपटी डोर
साहूकारी ब्याज सी अनंतता का अभिशाप लिए
गूंथती रहती है
देह-संस्कार.

हवाबद्ध हर पतंग के
निजी इतिहास और संस्कृति की पनाहगाह
अंतस
सौन्दर्यबोध की उत्कंठा में उदास
तलाश रही है वह कैनवास
कि जिसके आगोश में
पतंगे
तय कर सकें अपनी मंजिल
उन्मुक्त और निर्भय

 
3. ईश्वर

दौड़ते हुए लोगों की आकांक्षा
दौड़ने के ख्वाहिशमंदों के लिए एक आकर्षण
दौड़कर थके और पस्त हुए लोगों के लिए
होमियोपैथिक दवा

जो दौड़ न सके
उनके लिए तर्क
दौड़ते-दौड़ते गिर गए जो
उनके लिए प्यास

जिसने अभी चलना नहीं सीखा
उसके लिए जरूरी पाठ्यक्रम

असल में ईश्वर
उपन्यास का एक ऐसा पात्र
जिसके चरित्र पर है
लेखक का सर्वाधिकार

 

कवि परिचय :-

नाम : पुष्पेन्द्र फाल्गुन
पूर्णकालिक मसिजीवी, कवि-लेखक, पत्रकार, अनुवादक।
जन्म तारीख : 13 अप्रैल 1974
जन्म स्थान : कामठी, जिला – नागपुर
ज्ञात भाषाएँ : हिंदी, इंग्लिश, मराठी

पिछले 20 वर्षों में नागपुर, दिल्ली, इलाहबाद, आदि शहरों के प्रमुख हिंदी दैनिक अख़बारों एवं साप्ताहिक समाचार-पत्रों के लिए विविध स्वरूपों में कार्य।

2009 में ‘फाल्गुन विश्व’ नामक साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रिका का प्रकाशन संपादन। 2012 में पत्रिका का प्रकाशन स्थगित। पुनश्च पत्रिका ‘फाल्गुन विश्व’ शुरू करने की तैयारी।

2007 में पहला कविता संग्रह ‘सो जाओ रात’ प्रकाशित।

‘कंडोम में मछलियाँ’ तथा ‘मरने से पहले का कवि’ नामक दो कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य।
निबंध संग्रह – उबली हुई पकौड़ियां भी प्रकाश्य।

इसके साथ ही ‘उपनिषद और तत्त्व’ तथा ‘रावण का अर्थशास्त्र’ नामक शोध-परक पुस्तकें भी प्रकाशन को तैयार।

मराठी कवि प्रफुल्ल शिलेदार, प्रसेनजीत गायकवाड़, सुनीता झाड़े  तथा केतन पिम्पलपुरे के कविताओं का हिंदी और अंग्रेजी में अनुवाद।

-नित्यानंद गायेन

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