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वालमार्ट- जो जायज है, वही नाजायज है

0620_walmart-stock-small-with-manmohanभारतीय संसद में कर्इ सवाल खड़े हैं।

सवालों की बड़ी भीड़ है। एक दूसरे को धकिया कर आगे निकलने की कोशिश करते हुए सवाल हैं। सवालों की भी अपनी परेशानियां हैं। एक सवाल दूसरे से पिछड़ जाता है, दूसरा सवाल तीसरे से पिछड़ जाता है। बड़ा ही अजीब नजारा है, सवालों की कतार लगी है, और उनके चेहरे पर परेशानियां हैं कि जिन्हें उनकी खोज-खबर लेनी चाहिये, वो आपसी खींचतान में लगे हैं। सवालों में धक्का-मुक्की होने लगती है। कुछ सवाल संसद की धक्का-मुक्की से घबरा कर बाहर निकल जाते हैं, तो कुछ का वहीं दम निकल जाता है। आम जनता समझ नहीं पाती कि जिन सवालों के जवाब उसे मालूम हैं, वह उन सवालों का क्या करे? उसकी समझ में तो यह भी नहीं आता है कि वह किसे याद रखे और किसे भूल जाये?

यदि हम मौजूदा संसद के गुजरते महीनों पर नजर डालें तो यह सोचने की विवशता होगी, कि आखिर उसने अपने ही देश के आम नागरिकों के लिये, क्या किया है? लोगों को क्या दिया है?

न चाहते हुए भी रददी हुए अखबारों पर नजरें टिक जाती हैं, जिनमें बासी खबरों की सडांध है।

कुछ लोग इन रददी अखबारों और बासी खबरों को संभाल कर रखते हैं। मगर, ज्यादातर लोग उन्हें फेंक देते हैं।

कभी किसी से पूछा नहीं कि ‘आप ऐसा क्यों करते हैं?’

इन अखबारों में देश की संसद, संसद की बड़ी हसितयां, होती हैं। सरकार और सरकार की गतिविधियां होती हैं। इस दौर के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रूप से ख्यातीप्राप्त महानुभवों की उपलबिधयां और कारनामें होते हैं। मौजूदा दौर में सवाल और सवालों की भीड़ होती है। फिर भी आप इन्हें यूं क्यों फेंक देते हंै?

कोर्इ कुछ कहता तो नहीं, मगर हमें लगता है जिन सवालों के जवाब नहीं मिलते, उन सवालों के भी जवाब होते हैं।

मौजूदा संसद के सामने बहुराष्ट्रीय कम्पनी वालमार्ट का मुददा है। सवाल है कि उसने भारत के खुदरा बाजार में घुसने के लिये 125 करोड़ रूपये कहां खर्च किये?

अमेरिका में जो जायज है, भारत में नाजायज है। मनमोहन सिंह भारत में अमेरिका को लाने में लगे हैं, उसे अमेरिका बनाने में लगे हैं। क्या यह अजीब नहीं है कि भारत में जो नाजायज है, अमेरिका बनते ही वह जायज बन जायेगा? जायज को नाजायज समझने का वैधानिक लफड़ा सुलझ जायेगा?

मुददा रिटेल -एफडीआर्इ का है। खुदरा बाजार में विदेशी पूंजी निवेश का है। वालमार्ट भी इसी का हिस्सा है। बेचारे ने कुछ नहीं किया। उसने अपने देश के कानूनों का पालन किया। अमेरिकी सीनेट से लेकर डिपार्टमेण्ट आफ स्टेटस को अंगुलियों पर नचाया, उन्हें साथ लेकर दबाव बनाया। सोर्स-सिफारिशें करार्इ।

यह तो हम और आप जानते ही हैं कि अमेरिकी सरकार की सिफारिशें अमेरिकी फरमान होती हैं। फिर अमेरिकी मित्रों का फारमान तो मनमोहन जी के लिये दावतनामें से तो कम होता नहीं हैं, जिसे कुबूल करना पड़ता है। मुसीबत यही है कि दावतनामें के फरमान में, दावत बनने की हिदायतें हैं।

भारत की कंेंद्रीय सरकार कह रही है- यह दावतनामें का फरमान है।

संसदीय विपक्ष के सिरफिरे कह रहे हैं- यह दावत बनने का फरमान है।

जिसे कुबूल करने और कराने के लिये ‘वालमार्ट’ ने लाबिंग की कि ‘सबका भला हो।’

अब आपको सोचना है कि ”मुनाफा कमाने के भलमनसाहत जायज है कि नाजायज है?”

धक्का-मुक्की मचाते संसद में यह सवाल खड़ा हैंं। सांसद बहंस कर रहे हैं। सरकार जांच कराने का आश्वासन दे रही है।

किस चीज की जांच करेंगे आप?

भारत में रिटेल एफडीआर्इ का रास्ता साफ करने के लिये 125 करोड़ लाबिंग में खर्च करने की रिपोर्ट वालमार्ट ने जारी की है।

यह रिपोर्ट वालमार्ट के द्वारा अमेरिकी सीनेट में पेश की गयी है। जहां इसका वैधानिक प्रावधान है।

इस लाबिंग में वालमार्ट, अमेरिका की सीनेट, हाउस आफ रिप्रजेन्टेटीव, यूएस डिपार्टमेण्ट आफ स्टेट और यूएस ट्रेड रिप्रजेन्टेटीव शामिल हैं।

लाबिंग भारत में रिटेल एफडीआर्इ का रास्ता साफ करने के लिये, भारत में भी हुर्इ है। मानी हुर्इ बात है कि मौजूदा सरकार, सरकारी विभाग, मंत्रालय और सरकार से जुड़े लोगों के जरिये, उन्हीं के लिये की गयी है। मामला साफ है, फिर भी आप जांच करेंगे। किसे दोषी करार देंगे? क्या गलत तरीके से हासिल की गयी उपलबिध और संसद के जोड़-तोड़ से लिये गये निर्णय को खारिज करेंगे? इतना दम तो नहीं है, बंधु! फिर आप क्या करेंगे?

फिर यह मामला न तो नया है, ना ही इकलौता है।

मुक्त बाजारवादी उदारीकरण में यह सब जायज है।

लाभ पर आधारित व्यवस्था है, मुनाफा कमार्इये और मजा पार्इये। अपने करमों की सजा आम जनता को भोगने दीजिये।

अमेरिकी सदन की निचली सदन- हाउस आफ रिप्रजेन्टेटीवस के दस्तावेजों में दर्ज है कि अमेरिका में 27 भारतीय कम्पनियों के द्वारा लाबिंग करने के लिये मोटी रकम खर्च की गयी है। इन कम्पनियों में रिलायंस, टाटा, रेनबैक्सी और विप्रो जैसी कम्पनियों के अलावा कम्प्यूटर उधोग से जुडे़ संगठन -नैस काम और जेम्स एवं ज्वेलरीज एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल भी है। 2009 के दस्तावेजों के आधार पर यह प्रमाणित सत्य है कि टाटा संस ने लाबिंग के लिये कोहेन गु्रप की और रिलायंस ने बारबार मि्रफिफ्थ एवं रोजर्स की सेवायें ली थी।

अब आप क्या करेंगे?

आपकी राष्ट्रीय निजी कम्पनियों की लाबिंग यदि अमेरिका में जायज है, तो क्या आप उन्हें भारत में नाजायज करार देंगे? और यदि वालमार्ट की लाबिंग अमेरिका में जायज है तो आप इसे भारत में कैसे नाजायज करार देंगे?

आप संसद को, जांच को और आम जनता को दी जाने वाली जानकारियों को ‘उचित’ और ‘अनुचित’ के जाल में फंसा देंगे।

बंधु! मामला पेचीदा है, आप जो चाहते हैं, या यूं कहें कि देश की मनमोहन सिंह सरकार जो चाहती है, निजी राष्ट्रीय कम्पनियां और वालमार्ट वही कर रहे हैं। निजीपूंजी और निजी क्षेत्रों का विस्तार और उनकी मजबूती ही तो मनमोहन सिंह का उदारीकरण है, मुक्त बाजार की प्रतिस्पद्र्धा और जनविरोधी वित्तव्यवस्था है, फिर गूड़ खाते हुए गुलगुला से परहेज के दिखावे की क्या जरूरत है? घुंघटा उठाने और मुखड़ दिखाने का दौर बीत चुका है, यह दौर तो पूत के पांव पालने में देखने का है। यह जानने का है कि जो वर्जिश प्रधानमंत्री जी अमेरिकी जिमखान में कर रहे हैं, उससे देश की सेहत कितनी बिगडेगी? सूरत तो बिगड़ ही चुकी है। और आम आदमी की सेहत का और बिगड़ना भी तय है। जो आने वाले कल में, यह कह सकता है कि ”इससे अच्छा तो फिरंगियों का राज था”, यह जाने बिना कि फिरंगी पहले इस्ट इणिडया कम्पनी ही लेकर आये थे। यहां तो कम्पनियां हैं। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं।

भारत के लिये 2012 मनमोहन सरकार कि विशेषताओं के उजागर का काल खण्ड है। इसे आप उदारीकरण के घपलों और घोटालों के पर्दाफाश का काल भी कह सकते हैं। यह लाबिंग के विस्तार का काल भी है।

काफी शाप ‘स्टारबक्स’ को जनवरी 2012 में भारत में कारोबार करने की अनुमति मिली। अमेरिकी सीनेट के सामने पेश रिपोर्ट में इस कम्पनी ने भारत में अपने बाजार की शुरूआत करने के लिये वर्ष 2011 में 1 करोड़ रूपये लाबिंग में खर्च किये। भारत में लाबिंग की गतिविधियों में शामिल कम्पनियों की तादाद कम नहीं है। फार्इनेंशियल सर्विसेज मेजर मार्गन स्टेनले, न्यूयार्क लार्इफ इन्स्योरेंश, प्रुडेंशियल फाइनेंशियल के अलावा इंटेल, डाऊ केमिकल्स जैसी कम्पनियां भी शामिल हैं। डाऊ केमिकल्स और यूनियन कार्बाइट के रिश्तों को हम जानते हैं, जिसके नाम से भारत में भोपाल गैस काण्ड का कारनामा जुड़ा है। जिसने 2011 में थार्इलैण्ड, भारत और चीन के बाजारों तक पहुंच बनाने के लिये 50 करोड़ रूपये लाबिंग में लगाये हैं। जिस पर 2007 में, 3 लाख 25 हजार डालर का जुर्माना, प्रतिबंधित केमिकल्स पेसिटसाइडस बेचने की अनुमति दिलाने के लिये, भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने के आरोप में, भुगतान करना पड़ा था। भारत में जिसके खिलाफ सीबीआर्इ जांच भी हुर्इ, मगर प्रभावशाली बड़े औधोगिक घरानों की गिरेबां पकड़ पाना, भारत के किसी भी जांच कमीशन की रिपोर्ट के बस में नहीं है। सत्ता के गलियारे में थैलीशाहों की पहुंच सीधे है।

वालमार्ट द्वारा लाबिंग में खर्च किये गये 125 करोड़ रूपये के जिस मामले को लेकर संसदीय सियासत गरमार्इ हुर्इ है, उसके किरदार पूंजीवादी विश्व के कर्इ राष्ट्राध्यक्ष हैं, मनमोहन सिंह से लेकर बराक ओबामा तक हैं। जिनके दबाव में भारत की केंदि्रय सरकार है। वर्ष 2009 के बाद से भारत की राजकीय यात्रा पर आये पूंजीवादी विश्व की आर्थिक शकितयों ने इस दबाव को बनाने का काम किया है। चाहे वो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा हों, बि्रटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन हों, फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी हों, या जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल हों। रेटिंग एजेन्सी से लेकर देशी, विदेशी मीडिया हो। लाबिंग के इस खेल में दुनिया की वो सरकारें शमिल हैं, जो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिमी कार्टर की तरह मानती हैं कि ”लाबिंग संवैधानिक रूप से संरक्षित गतिविधि है, जो सरकारी कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।”

अब आप ही सोचिये कि जांच का ऊंट किस करवट बैठेगा?

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