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मोदिस्तान या मुरीदिस्तान, तय आप करें

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पहले मुरीदों के बीच छनती थी, आज-कल बनती है। यदि कोई एक पत्थर उछालता है, तो दूसरी ओर से चार पत्थर उछल आते हैं

‘‘कौन किसका मुरीद है?‘‘ अब यह सवाल नहीं रह गया है।

अब सवाल यह हो गया है, कि ‘‘आप मोदी जी के कितने बड़े मुरीद हैं?‘‘

देश की मीडिया यह मान ली है, कि ‘‘भारत मुरीदों का देश है, और दुनिया भी अब मोदी जी की, मुरीद हो रही है।‘‘

किसी के आला दिमाग में यह खयाल नहीं आया, कि देश का नाम बदल देना चाहिये, दुनिया अपने आप बदल जायेगी।‘‘

कि ‘‘हम मातृभूमि नहीं, पितृभूमि की सेवा करेंगे।‘‘

‘भारत‘ के तर्ज पर ‘नारद‘ बनता है। लेकिन नादर मुनि हैं, और ‘नमो-नमो‘ नही, ‘नारायण-नारायण‘ कहते हैं।

कह सकते हैं, कि आदत पुरानी है। नारायण की वजह से नारद बदनाम हैं।

इसलिये, ‘भारत‘ की तर्ज पर ‘नारद‘ को सर्वसम्मति से खारिज कर दें। हम राष्ट्रहित में अपने प्रस्ताव के विरूद्ध हैं। विकल्प के रूप में खयालों की दुनिया ‘भारत‘ के नाम पर सपाट है।

हां, खयाल आया मोदी जी सोचते हिंदी में हैं, मगर योजना का नाम अंग्रेजी में रखते हैं, और नकल भी जम कर करते हैं। जैसे- ‘मेक इन चाइना‘ की तरत ‘मेक इन इण्डिया‘ और चीन के ‘सिल्क रोड‘ की जगह ‘काॅटन रूट‘ की योजना अभी-अभी उछल कर सामने आयी है। उनका भारत प्रेम भी ‘इण्डिया फस्र्ट‘ हैं

इसलिये ‘इण्डिया‘ की तर्ज पर सोचने की जरूरत है।

कृपया, यह दायित्व आप उठायें।

आप बस पहल करे, मोदी जी की ‘वाॅलस्ट्रीट टीम‘ उसे अंजाम तक वैसे ही पहुंचा देगी, जैसे उसने मोदी जी को दिल्ली तक पहुंचाया।

वैसे, एक खयाल और भी है, ‘मोदी‘ और ‘मुरीद‘ के लिये।

हिन्दुस्तान की तर्ज पर ‘मोदिस्तान‘ या ‘मुरीदिस्तान‘ चल सकता है।

सोचें, शायद बात बन जाये। और आप ‘भारत रत्न‘ की तरह ‘मोदी रत्न‘ या ‘मुरीद रत्न‘ का सम्मान पा जायें।

मरणोपरान्त भी सम्मान मिलता है।

यह अच्छी बात है। मरते हुए खोने नहीं, पाने की उम्मीदें होंगी। और मरना आसान हो जायेगा। वैसे, जीते जी पाने की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। बकौल मीडिया, मोदी जी के बड़े-बड़े मुरीद हैं।

कल तक अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुरीद थे, अब उनके विरोधी रिपब्लिकन सीनेटर और राष्ट्रपति पद के पूर्व उम्मीदवार जाॅन मैक्कन भी मोदी जी के मुरीद हो गये हैं। बिल गेट का दिल पहले ही मोदी जी पर आ चुका है, अब सुनते है, कि ‘फेसबुक‘ के मार्क जुकरबर्ग का दिल भी मोदी जी पर आ गया है।

हमारे मोदी जी इतने लोगों का दिल जीत रहे हैं, और लोगों को अपना मुरीद बना रहे हैं, कि यदि अमेरिका में होते तो ‘मुरीद‘ का पेटेंट करा लेते। दिल उनकी मिल्कियत होती, जो धड़कता तो हमारे सीने में मगर, किसी पर आने से पहले मोदी और अमेरिका से पूछता- ‘‘किसी कानून का उल्लंघन तो नही हो रहा है?‘‘

हमारे लिये, आसान हो जाता, देश मोदिस्तान या मुरीदिस्तान बन जाता और हम मोदिस्तानी या मुरीदिस्तानी।

यह पूछने और बताने का झंझट ही नहीं रहता, कि ‘‘आप किसके मुरीद हैं?‘‘ या ‘‘मोदी जी के कितने बड़े मुरीद हैं?‘‘

यह निर्णय सर्वसम्मति से सर्वमान्य होता, कि जो भी मोदिस्तान या मुरीदिस्तान में है, वह मोदी जी का मुरीद है। उसका दिल मोदी जी की मिल्कियत है। मुरीदों के बीच मुक्त प्रतिद्वन्दिता होती, मुक्त व्यापार होता, जो भी उभर कर सामने आता उसे ‘महा मुरीद‘ का सम्मान मिलता। मोदी जी भी अपनी सरकार के साथ, उसमें शामिल होते।

परेशान न हों, पांच साल के लिये यह सम्मान नरेंद्र दामोदर दास मोदी के नाम बुक है। छठे साल या तो इसकी जरूरत नहीं होगी, या आपकी बारी आ जायेगी। वैसे, मोदी जी दस साल टिके रहना चाहते हैं। अमित शाह जी की योजना 20 साल की है। उन्होंने गांधी जी को हाईजैक करने के बाद कहा- ‘‘मोदी सरकार आ गयी है, और यह 10-20 साल तक सत्ता में रहेगी।‘‘ उन्होंने भारत की तस्वीर बदलने की बातें भी की। हम तो कहेंगे, आप महानुभव, भारत को ही बदल दें। 9 करोड़ लोगों को कोई आपत्ति नहीं होगी।

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