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मुद्दों को बरगलाने की रणनीति

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मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने, देश में जिस खतरे को बोया था, नरेंद्र मोदी मुक्त बाजार के उसी खतरे को सींच रहे हैं। जिसके साथ निजी वित्तीय पूंजी का विस्तार और सत्ता का केंद्रियकरण होता है। एकाधिकारवाद को खुली छूट मिल जाती है।

आर्थिक मुद्दों की बात हम बाद में कर लेंगे।

राजनीतिक मुद्दों की बात जरूरी है।

बेंगलुरू में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में यह बात बिल्कुल साफ हो गयी है, कि

सरकार नरेंद्र मोदी की है, और

भाजपा अमित शाह की है। और

दोनों ही काॅरपोरेट जगत के विश्वसनीय राजनीतिक साझेदार हैं। जिसे बनाये रखना ही उनकी नीति है।

अर्थव्यवस्था के निजीकरण को राष्ट्रीय नीति बनाने के बाद, अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह राजनीति को सामाजिक भागीदारी के खाके में ढ़ालने की पहल कर रहे हैं। निर्णय हो चुका है। गांधी जी को खींच कर भाजपा की पाली में शामिल कर लिया गया है। सरकारें उनके नाम से पहले से ही चल रही हैं। बेचारे राजघाट में ‘हे राम‘ के नीचे दबे पड़े हैं। जिन पर फूल-माला का बोझ भी पड़ता ही रहता है।

सम्मेलन में जो भी तय हुआ, उसमें सभी की हिस्सेदारी रही होगी, लेकिन एक दल और एक नेता की सोच को लेकर बढ़ने वालों ने कहा, कि ‘‘राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भाजपा ने सधी राजनीति के साथ कदम बढ़ाने की मंसा जताई, जिसका आधार गुरूवार की बैठक में मोदी ने तय किया।‘‘ नरेंद्र मोदी ने गांधी जी की सफलता का जिक्र करते हुए कहा, कि ‘‘गांधी सामाजिक सरोकार के साथ जनता से जुड़े और उसी जनता ने उनके अभियान को आसमान तक पहुंचा दिया।‘‘

गांधी जी के सामने ब्रिटिश सरकार की सहमति से देश की आजादी का मुद्दा था। नरेंद्र मोदी के सामने क्या है, यह बताने की जरूरत नहीं, कि वो भारत को एक ब्राण्ड और ऐसा निर्यातक देश बनाना चाहते हैं, जिस पर निजी कम्पनियों और विश्व काॅरपोरेशनों का अधिकार हो। जिसके लिये सरकार छूट और आधारभूत सुविधायें उपलब्ध कराये, सस्ता श्रम, अकूत प्राकृतिक सम्पदा और देश का बाजार उपलब्ध कराये। जिसमें बाजार और सरकार की साझेदारी हो और आम जनता की भागीदारी दोनों की शर्तों पर अपने श्रम और सुविधा और अपने आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकारों को बेचने की हो। श्रम कानून और भूमि अधिग्रहण का आधार भी यही है।

मोदी जी ने इसी क्रम में कहा- ‘‘गंगा के आस-पास बसे दो-ढाई हजार गांवों में यदि भाजपा कार्यकर्ता सामाजिक सरोकार के साथ घरों में पैठ बना लें, तो फिर राजनीतिक मुद्दों की जरूरत नहीं होगी।‘‘

मोदी जी ने कहा और अमित शाह ने लपक लिया। और समाज के हर वर्ग और तबके से जुड़ने की योजना पर उन्होंने काम शुरू कर दिया। भाजपा और सरकार की सामाजिक योजना में स्वाभाविक रूप से निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों की भागीदारी होगी, जिसका प्रचार इन कम्पनियों और काॅरपोरेशनों के लिये जनसमर्थन जुटाने में किया जायेगा। विरोध के उस धार को कुन्द करने के लिये किया जायेगा, जो सामाजिक जनचेतना और वर्गगत राजनीतिक चेतना को जन्म देती है। जो आर्थिक एवं राजनीतिक एकाधिकार के विरूद्ध जनसमर्थक सरकारों की मांग करती है।

सरकार की ओट ले, भाजपा ने अपने सदस्यता अभियान के जरिये 9 करोड़ से अधिक लोगों को सदस्य बनाया है। अब उनकी योजना 15 लाख से ज्यादा सदस्यों को प्रशिक्षित कार्यकर्ता बनाने की है। जिनका मकसद भाजपा और सरकार की नीतियों के लिये जनसमर्थन को बनाना और बढ़ाना है। मोदी और शाह की नीतियां संगठित रूप से विपक्ष को कमजोर बनाना ही नहीं है, बल्कि विवाद होने की स्थिति में राष्ट्रीय स्वय सेवक संघ पर भी अपनी पकड़ बढ़ाना है, ताकि वह काॅरपोरेट समर्थक नीतियों के विरूद्ध खड़ी न हो सके। संघ को सरकार समर्थक बनाये रखने की भी यह नीति है। जिसमें संघ की भूमिका भी छोटी नहीं होगी।

वैसे, संघ के समर्थन पर टिकी भाजपा अपनी वरियता के लिये राजनीतिक पहल कर चुकी है। उसकी नीतियां संघ के विरूद्ध नही होंगी, किंतु उसकी नीतियों का आधार विवादहीन रूप से निजी कम्पनियों और काॅरपोरेशनों का हित है। जिनके सहयोग और समर्थन के बिना अब न तो मोदी सरकार चलने की स्थिति में है, ना ही भाजपा की भावी योजनाओं के लिये आर्थिक सहयोग मिल सकेगा। 15 लाख लोगों को प्रशिक्षित करना, और देश भर में राजनीतिक मुद्दों को खारिज करने के लिये सामाजिक अभियान चलाना, कम खर्चीला कार्यक्रम नहीं है।

जिस तरह एक व्यक्ति और एक राजनीतिक दल के पीछे देश को खड़ा किया जा रहा है, और जिस तरह अध्यादेशों से देश की सरकार चलायी जा रही है, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि आर्थिक एवं राजनीतिक एकाधिकार के लिये मोदी सरकार देश की लोकतांत्रिक संवैधानिक इकाईयां और जन प्रतिरोध का लिहाज भी नहीं करेंगी। वह जनहित से जुड़े आर्थिक एवं राजनीतिक मुद्दों को सामाजिक मुद्दों से बरगलाने में लग गयी है।

किसी भी देश में समुचित विकास के लिये, जिस सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जनचेतना की जरूरत होती है, केंद्र की मोदी सरकार उसे गलत दिशा दे रही है। और यह ऐतिहासिक सत्य है, कि आर्थिक एवं राजनीतिक एकाधिकारवाद न अपने देश की आम जनता को मुसीबत में डाल कर खतरों को बढ़ाने का ही काम किया है।

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