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संतोष अलेक्स की चार कविताएं

1. परिवारसंतोष अलेक्स

यह आकर्षक
एवं भारी शीशा है
सावधानी से साफ न करने परे
टूटने का डर है

बरसों बीत गए
कहीं कहीं दरारें दिखती है
कहीं पहले जैसा चमक नहीं रहा
तो कहीं धब्‍बे हैं
खुशी इस बात की है
कि शीशा अब भी भारी है
टूटा नहीं

 

2. माँ

अपने व परायों की
गालियों ने उसे
गूंगी बना दी !!

 

3. दाम्‍पत्‍य

करोड़ों देवी देवताओं
के समक्ष हमने सौगंध खाई थी
कि साथ न छोड़ेंगे जन्‍मभर

अब अलग हुए अरसे हो गए
क्‍या आपने उन देवी देवताओं को
कहीं देखा है जो
पाणिग्रहण में साथ थे हमारे !!

 

4. बेलैंस शीट

उबड खाबड खेतों में
खेती करनेवाले उसका पांव
आज लड़खड़ा गया है
साहूकार का कर्ज
दस हजार रूपए
बिजली का बिल बारह हजार रूपए
सहकारी समिति का कर्ज
तीस हजार रूपए ब्‍याज सहित
जेठ में बेटी की शादी
कटाई से छनाई तक
फिर बेचने की गहमागहमी
का उत्‍साह और उल्‍लास
आज केवल सपने रह गए

इस बार भी
फसाल खराब हो गई

सारे तंत्रों से
लड़ने के बाद
वह बिन बैलों के, ट्रैक्‍टर के
बिना गैंती, फावड़ा, कुदाल के
खेत को समतल बना रहा है

लोग उसे पागल व मूर्ख
करारते हैं
वही, वही जानता है कि
इस बार उसे पत्‍थरों से
पानी निकालना है
गले तक डूबे कर्ज चुकाने !!

 

परिचय :

द्विभाषी कवि एवं प्रख्‍यात बहुभाषी अनुवादक. मलयालम में दो और हिंदी में एक कविता संग्रह पांव तले की मिटटी प्रकाशित. अनुवाद की 10 किताबें प्रकाशित. पंडित नारायण देव पुरस्‍कार, दिवागीश पुरस्‍कार राष्‍ट्रीय अनुवाद एवं तलशेरी राघवन स्‍मृति मलयालम कविता पुरस्‍कार एवं सृजनलोक युवा कवि सम्‍मान से सम्‍मानित.

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. आशीष मिश्र

    सहज सुंदर!

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