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अनुराधा त्रिवेदी सिंह की पांच कविताएँ

1॰ विकल्पanuradha-trivedi

सुख चुन सकती थी
जब उसने सच चुना
पहरुआ नहीं चाहिए थे
सो विरोधी चुन लिए

गणित की वस्तुनिष्ठता नहीं रुचती थी
सो कविता चुन ली
क्योंकि इसके सही गलत वह तय कर सकती थी
हर प्रश्न के कई कई उत्तर होते थे
सभी सही अक्सर
गलत बस कभी कभी ही
और
जब कविता में वही
हिसाब और गुणा भाग आ गए
तो वह डर गयी
और डरी दामी पेन, डायरियों और की बोर्ड से

सो वह धरती पर लिखती है
दीवारों पर
आसमानी थिंगलों पर
जाम हुए दरवाज़ों पर
मिर्च मसाले के डिब्बों की गर्द
और रोटी के परथन पर
आँधी के बाद खिड़कियों पर
कभी कभी
सूखे पत्तों के दरकने से ठीक पहले उन पर लिख देती है
और आसमान के सियाह होने से पहले भी

फिर बिना किसी क्रम या पृष्ठ संख्या के सहेजती जाती है उन्हें

जब पूछ कर कविता लिखनी थी
तो उसने सब पूछना बंद कर दिया
और जब एक साँस भर चाहिए थी
तो घुटने टेकने से ठीक पहले लगा
कि जीना अपरिहार्य भी नहीं

 

2. जनाना वार्ड

बटलोई की पूरी दाल
और कढ़ाही का पूरा साग
पति और पूत की थाली में
ढुरका देने वाले सूखे हाथों से
कम्पाउंडर और खून खींच लेता है
खून की कमी आधिकारिक रूप से
प्रमाणित करने के लिए

जनाना वार्ड की लम्बी पंक्ति में
जवान फूले पेटों
या झुकी बुढ़ायी कमर वाले हाड़
प्रतीक्षा में हैं
अपने खोखले होने के प्रमाणपत्र की

डॉक्टर
जो औरत भी है
रिपोर्टों से भी पहले
पढ़ती है
पीले , दुहे चेहरे
और
पर्चे में सबसे ऊपर ‘पूरी ख़ुराक और आराम’ ताक़ीद करती है
गोलियों और इंजेक्शन से भी पहले

घर की ड्योढ़ी लांघने के तुरंत बाद
स्थानीय प्रशासन
आनन-फानन में रद्द करता है
इन पढ़े लिखे चोंचलों को।

 

3॰ मरा हुआ चेहरा 

सुना है तुम आज मर गए
मुझे क्यों दशकों से तुम्हारा मरा हुआ चेहरा याद आता है
डरे हुए चेहरे से
मरा हुआ चेहरा कितना बेहतर होता है
स्मृतियाँ , विषाद , हताशा,
पिछले सूखों की जूठन
अधूरी तृष्णाएँ
बोधिसत्व सा मौन और निर्वाण
ठंडी झुर्रियों के ग्लेशियर में
जमा हुआ पूरा जीवन
सब,
डरा हुआ चेहरा सिर्फ मरा हुआ होता है
डर के सब पर्यायवाची ओढ़े हुए
अपनी ही कालिमा में आधा छिपा
अभिशप्त
और कुछ नहीं
मैं तुम्हारा मरा हुआ चेहरा देखना चाहती हूँ फिर।

 

4. मैं चाँद पर कविता नहीं गाऊँगी 

तुम जब आखिरी सांस और संध भी मूँद दोगे
तो मैं दीवार के उस पार से एक कविता गाऊँगी

खेत और खलिहान के बीच गिरी हुई बालियों की
काँसे के कम होते बर्तनों और खाली होते कुठलों की
खबरों से छूट गयी नींद की
मैं गोल रोटी की कविता नहीं गाऊँगी
कि सुक्खी को भूख लग आएगी

लंबे दिनों और गुनगुनी रातों पर
पुरानी किताबों और उनमें दबे गुलाबों पर
तुम्हारी उँगलियों से मेरे पोरुओं के फासले पर
मैं तुम्हारे जाने वाले दिन पर कविता नहीं करूँगी
कि मुझे तुम्हारे न लौटने का दुख साल जाएगा

कविता करूँगी
शेर से दौड़ कर जीत लिए हिरण की
बहेलिये के जाल से छूट निकले कबूतरों की
अस्त व्यस्त जंगलों और दंभी पहाड़ों की
मैं सूखी हुई नदी की कविता नहीं करूँगी
कि दोनों किनारे मिलने की हठ पे आ जायेंगे

और मैं करती ही जाऊँगी कविता
बरसात में धुले सफ़ेद मढ़ो पर
स्कूल जाते हुए गुलाबी रिबन पर
साँवली लड़कियों और उनकी उपेक्षित इच्छाओं पर
मैं चाँद पर कविता नहीं गाऊँगी
कि सुक्खी को फिर रोटी की याद आ जाएगी

 

5. दीदा दिलेरी 

फरेब काली बिल्ली सा दाखिल होता है
दिल के दरवाजे से
जाते समय दरवाजे पर ज़रा ठहर
पलट कर
आँख मिलाता है
दिल बेजान हो जाता है
उस एक लम्हे की
दीदा दिलेरी से,
अब फरेब आँख नहीं चुराता ।

 

परिचय :-

नाम – अनुराधा त्रिवेदी सिंह
जन्मस्थान – ओबरा ताप विद्युत संस्थान, उत्तर प्रदेश
शिक्षा – एम॰ ए॰ (मनोविज्ञान, अंग्रेज़ी)
व्यवसाय – संस्थापक एवं प्रमुख सलाहकर, क्वांटम कोन्सेप्ट्स एंड सोल्युशंस, बेंगलुरु
‘शऊर आये नहीं अब तक’ नाम से एक कविता संग्रह प्रकाशित
अंतर्जाल पर कुछ प्रकाशन
वर्तमान में एक काव्य संग्रह (अनाम ) व एक संस्मरण संग्रह ‘बुर्ज पर उगी वह फुनगी’ पर लेखन
निवास स्थान – संप्रति: मुंबई; पहले: लखनऊ, आगरा, भोपाल, गुना, दलखोला पश्चिम बंगाल, बेंगलुरु
ईमेल: anuradhadei@yahoo.co.in

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. अनुराधा त्रिवेदी सिंह जी की पांचों कवितायेँ सीधे दिल को गहरे तक छू जाती है।
    सुन्दर प्रस्तुति हेतु आभार!

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