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संदीप तिवारी की तीन कविताएँ

1. ‘रोटी ‘संदीप तिवारी

जहाँ आज भी सिलेंडर नहीं पहुंचा
वहां चूल्हे की आग बाद में जलती है,
पहले घर जलता है
घर के लोग जलते हैं
फ़िर कहीं चलते-चलते……
आग चूल्हे तक पहुँचती है
लेकिन आग से भी पहले,
भयंकर धुँवा होता है
और सच बात तो ये है कि
यही धुँवा,
हमारे लिए मौत का कुँवा होता है
जिसमें, हम ताउम्र चक्कर लगाते-लगाते
ना ही जलते हैं, ना ही मरते हैं,
सिर्फ़ सड़ते हैं
क्योंकि,
इस आग और धुंए के बीच से
पैदा हुई रोटी के लिए,
खोजनी पड़ती हैं लकड़ियाँ,
झाल झंखाड़ के बीच से गुज़रने में
और लकड़ी के ही जुगाड़ में
जब दिन बीत जाता है…
साहब! तब…
लकड़ी,रोटी और मुंह के बीच,
कितनी दूरियां.. होती होंगी
जरा सोचिये ….?

 

2. ‘लहूलुहान सपने ‘

हम सपने के अंदर सपने देखते हैं
एक नहीं, दो नहीं, हज़ार देखते हैं
बार-बार देखते हैं
जब भी देखते हैं आर-पार देखते हैं
पर अमीरों के बाग़ में
सपनों की खेती होती है
जहाँ दिन दूना, रात चौगुना की दर से
लहलहाती हैं उनकी फसलें
बढ़ती जाती हैं उनकी नस्लें…
और जब इस महमहाती हवा में
हम देखना शुरू करते हैं,
सपना………!
उस समय,
आधे चम्मच असलियत और एक घूंट भ्रम के बीच,
हमे पूरा आसमान लगता है अपना
हम उड़ते चले जाते हैं….
चले जाते हैं……….
आकाश की अनंत उंचाई में
तभी क़तर दिए जाते हैं,
हमारे पंख !
फ़िर हमारे ज़ख्मी सपने,
छटपटा कर शांत पड़े होते हैं
किसी भयावह खाईं में!!!
और उस समय
हमारे शरीर के खून का एक भी कतरा,
ज़मीन तक नहीं पहुँच पाता है
असल में हवा इतनी तेज औ गर्म होती है कि
सब बीच में ही सूख जाता है
फ़िर सूखने के बाद
हमारे सारे सपने…
कचड़े के ढेर में दबे प्लास्टिक से,
कई गुना ज़्यादा बदबूदार होते हैं
और उससे भी भयानक ट्रेजडी यह कि
उस समय हमारे पास
रुमाल के लिए
एक चिथड़ा तक नहीं होता
कि ढक ली जाय नाक
या फ़िर आँख !!

 

3. ‘सब बिक जाए रे…..’

देखो दुनिया के फ़ितूर,
फिर रो-रो के चिल्लाओ
कुत्तों जैसी हंसी हंसो,
और मुर्गे जैसा गाओ
बन्दर जैसा नाचो प्यारे
या कूदो डाल से डाल,
जीना है ग़र धराधाम पर
बेचो अपनी खाल
डरो नहीं तुम! इस बाज़ार में सब बिक जाए
खाल कौन सी बड़ी चीज़ है,
पैसा फेको….
इस बाज़ार में दिल मिल जाए
प्यार मिले, भगवान मिले
बड़े- बड़े शैतान मिले,
इस बाज़ार में तेरे सब अरमान मिलें
बस पैसा फेंको
मुर्दे में भी जान मिले
इस बाज़ार में….!

-संदीप तिवारी

 

सम्पर्क-

कक्ष संख्या- १२७, अमरनाथ झा छात्रावास
इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद- २११००२
मो.न. 9026107672

प्रस्तुति :- नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. आशीष मिश्र

    दिशा पाती कविताएं !

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