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इक्कीसवीं सदी के दावेदार (अमेरिकी सदी की दावेदारी) – 1

A U.S. soldier walks during a during a combined patrol with the Iraqi army at Zafraniya neighborhood, southeast of Baghdad September 6, 2007. REUTERS/Carlos Barria  (IRAQ)

21वीं सदी का पहला दशक बीत चुका है, और आधा दशक भी बीतने को है। यह सदी मानव सभ्यता के लिये निर्णायक सिर्फ इसलिये है, कि हम घातक संघर्षों के बीच है। संक्रमण की विपरीत परिस्थितिया ही एक दूसरे के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि मुक्त बाजारवादी ताकतों के बीच का संघर्ष भी है। हम ऐतिहासिक संक्रमण के उस दौर में हैं, जिसकी स्पष्ट परिभाषा किसी के पास नहीं है। पूंजीवाद पूरी तरह से पूंजीवाद नहीं है, और मार्क्सवाद की संभावनाओं की सूरत भी बदली हुई है।

‘इक्कीसवीं सदी का समाजवाद‘ के रूप में लातिनी अमेरिकी देशों का जो समाजवाद हमारे सामने है, उसमें राज्य के सरकार की भूमिका बड़ी है, जो विकास योजनाओं के माध्यम से पूंजीवाद से समाजवाद की ओर कदम बढ़ाता है। वह आर्थिक एवं सामाजिक विकास योजनाओं के जरिये जनसमर्थक सरकारों की रचना करता है। राजनीतिक रूप से एक शोषक इकाई समाजवादी समाज निर्माण के दायित्वों को उठा रही है। मार्क्सवादी सर्वहारा क्रांति एक ऐसी समाजवादी क्रांति के रूप में बदल रही है, जिसका स्वरूप पूंजीवादी लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया है।

यह चुनावी प्रक्रिया वामपंथी राजनीतिक दलों के लिये, यदि समाजवादी समाज निर्माण और जनसमर्थक सरकार निर्माण की लोकतांत्रिक प्रक्रिया है, जिसमें आम जनता की हिस्सेदारी है। तो यही चुनावी प्रक्रिया दक्षिण पंथी राजनीतिक दलों के लिये, दिखावटी लोकतंत्र का ऐसा धोखा है, जिसमें चुनी हुई सरकारें जनविरोधी सरकारों की तरह काम करती हैं। जिसका वर्गहित समाज के बहुसंख्यक वर्गहित के विरूद्ध उन राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के हितों से संचालित होती है, जिसके लिये राजसत्ता -सरकार- आर्थिक लाभ के लिये राजनीतिक जरिया है। जो सरकार और बाजार की साझेदारी में बदल गयी है। जिसका राजनीतिक ढांचा लोकतांत्रिक है।

दुनिया भर के ज्यादातर पूंजीवादी सरकारों के लिये यही वास्तविक लोकतंत्र है। जिसका नेतृत्व अमेरिकी लोकतंत्र के हाथों में है। जिसके सहयोगी ज्यादातर यूरोपीय संघ के सदस्य देश और दुनिया की दक्षिण पंथी प्रतिक्रियावादी ताकतें हैं। जिन्होंने आतंकवाद को अपना सहयोगी बना लिया है। जो राजनीतिक अस्थिरता के महत्वपूर्ण कारक हैं।

यह चुनावी प्रक्रिया दुनिया की आम जनता के खिलाफ, अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक षडयंत्र है। जिसका शिकार दुनिया के सभी देशों की आम जनता है। वह सदियों इस धोखे में रही है, कि ‘‘अपने देश की सरकार उस देश की आम जनता बनाती है।‘‘ और यह धोखा आज भी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के लिये कारगर है, जिन्होंने पूंजीवादी विश्व की सरकारों पर अपना कब्जा जमा लिया है। जो 21वीं सदी के सबसे बड़े दावेदार है। जिसके मुंह में अब किसी की लगाम नहीं। जिनके वित्तीय इकाईयो के जाल में वैश्विक वित्त व्यवस्था है। फेडरल, रिजर्व और सेण्ट्रल बैंक हैं। विश्व व्यापार और मुद्रा व्यवस्था है। सरकारों के प्रशासनिक इकाईयां और सेना है। जो दुनिया के प्राकृतिक सम्पदा, उत्पादन के साधन, मानव श्रमशक्ति, बौद्धिक क्षमता और बाजार के दावेदार हैं। जिनके लिये दुनिया अकूत सम्पदा है। इसी सम्पदा पर वो निजी आधिपत्य और एकाधिकार चाहते है।

20वीं सदी के अंतिम दशक में जब सोवितय संघ का पतन हुआ, तब 21वीं सदी के कई दावेदार पैदा हो गये। उन ताकतों ने भी अपनी दावेदारी पेश की, जिनकी जुबानें बंद थीं। जिनकी सोच मार्क्सवाद से टकरा कर चकनाचूर हो जाती थी। उन्हें इस बात का गहरा एहसास था, कि उपनिवेशवाद के विरूद्ध राष्ट्रीय आंदोलनों और पूंजीवादी-साम्राज्यवाद के खिलाफ जनसंघर्षों की दिशा या तो गैर-पूंजीवादी है, या समाजवादी है। लोग यह मान कर चल रहे थे, कि समाजवाद से पूंजीवाद की ओर लौटने की कोई राह नहीं है। इस तरह दो खेमों में बंटी दुनिया समाजवाद की ओर झुकी हुई थी। पूंजीवाद आम संकट से घिर हुआ था। उसके साम्राज्यवादी मुंह में समाजवाद की लगाम थी।

किंतु, सोवितय संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के पतन के साथ ही, पूंजीवादी-साम्राज्यवादी विश्व ने समाजवादी लगाम को उगल दिया और मार्क्सवाद को असंदर्भित करार दे, पूंजवादी वित्तीय ताकतों ने मान लिया, कि ‘इक्कीसवीं सदी के वे अकेले दावेदार‘ हैं। और उन्होंने दुनिया को अपने सांचे में ढ़ालने की नयी पहल की।

‘मुक्त बाजारवाद‘ और ‘नव उदारवाद‘ को ‘अमेरिकी वैश्वीकरण‘ के रूप में पेश किया। जिसका मकसद अपने से असहमत और गैर पूंजीवादी देशों की अर्थव्यवस्था को तोड़ना, उनकी राजनीतिक संरचना को मटियामेट करना और उनकी सरकारों का अपहरण करना था। जिसकी शुरूआत 1973 में चिली की सल्वाडोर अलेंदे सरकार का तख्तापलट करके की गयी। उसे शिकागो स्कूल के छात्रों का प्रयोगशाला बनाया गया। पूंजीवादी लोकतंत्र की चुनावी प्रक्रिया से चुने गये दुनिया के पहले कम्युनिस्ट राष्ट्रपति की सरकार को, मार डाला गया और सैनिक तानाशाही की स्थापना की गयी। एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण किया गया जो समाज के 99 प्रतिशत लोगों के विरूद्ध समाज के 1 प्रतिशत लोगों के लाभ की अर्थव्यवस्था थी। जिसे आज दुनिया पर थोपा जा रहा है।

वित्तीय ताकतों की वरियता के लिये सरकारों के अपहरण और किसी भी विरोधी देश को ध्वस्त करने की नीतियां बनायी गयीं। अफगानिस्तान के समाजवादी क्रांति की गर्दन सोवितय सेनाओं की वापसी के साथ ही, तोड़ी गयी और सोवियत संघ के पतन के बाद इराक और लीबिया की सरकार का अपहरण किया गया। अपने देश की समाज व्यवस्था के लिये वामपंथी सोच रखने वाले इराक के सद्दाम हुसैन और लीबिया के कर्नल गद्दाफी की हत्या कर दी गयी। पेशेवर विद्रोही और आतंकवादियों के लिये इराक में बहुराष्ट्रीय सेना और लीबिया में नाटो की सेनाओं ने हमला किया। जाॅर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा की सूरें एक हो गयी हैं। सीरिया, यूक्रेन और वेनेजुएला हमारे सामने हैं, जहां अलग-अलग किस्म के साम्राज्यवादी हमले हो रहे हैं।

इस बीच, यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद और उनके सहयोगी देशों ने आतंकवाद को राजनीतिक दर्जा दिया। आतंकी संगठनों को आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक सहयोग एवं समर्थन दिया। अमेरिकी वैश्वीकरण के साथ आतंकवाद का भी वैश्वीकरण हुआ। जबर्दस्त विकास हुआ।

आतंकवाद पेशेवर विद्रोही, आतंकी संगठन, हंथियारबद्ध मिलिशियायी गुटों के आतंक के साथ साम्राज्यवादी युद्ध के आतंक में बदल गया।

मुक्त बाजारवाद -नवउदारवादी अमेरिकी वैश्वीकरण- और उनके सहयोगी आतंकी संगठन, पूंजीवादी 21वीं सदी के दावेदार हैं। जिसके मूल में वैश्विक वित्तीय ताकतों का हित है।

जिनके लिये सरकार या तो वित्तीय एवं कारोबारी इकाई है, या साझेदार। जो अपने देश की प्राकृतिक सम्पदा, मानव श्रमशक्ति, बौद्धिक क्षमता आौर उत्पादन के साधन पर वैश्विक वित्तीय ताकतों के निजी स्वामित्व को वैधानिक करार देने का काम करती है। आर्थिक विकास के नाम पर आधारभूत ढांचे का निर्माण सरकार के पास जमा आम नागरिक की पूंजी और आम लोगों के कंधे पर सरकारी कर्ज लाद कर करती है, और सरकारी करों से छूट, नयी सहुलियतों के तहत वैधानिक अड़चनों को हटाने का काम करती है। श्रम कानूनों में संशोधन और भू-अधिग्रहण जैसे कानून बनाती है। उत्पादन का जोखिम अपने जरिये, आम लोगों पर लाद कर, मुनाफा ‘निजी वित्तीय पूंजी‘ के खाते में दर्ज करने का विधान बनाती है।

भारत जैसे देशों की ज्यादातर सरकारें यही करती हैं। हालांकि इसमें नया कुछ भी नहीं है। साम्राज्यवादी देशों के द्वारा बनायी गयी नवउदारवाद की नीति, तीसरी दुनिया के लिये यही है, ताकि उनके प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और समाज के बहुसंख्यक वर्ग के शोषण को वैधानिक होने का दर्जा मिला रहे। शोषण, दोहन और दमन को सरकारें ही वैधानिक बनाती हैं।

शोषण को स्वाभाविक,

दोहन को अनिवार्य, और

दमन को सरकार की नीतियों को लागू करने के लिये आवश्यक मान लिया गया है।

यह मान लिया गया है, कि आर्थिक विकास और समृद्धि के लिये यही विकल्पहीन व्यवस्था है।

जिसने सामाजिक एवं आर्थिक असमानता को विस्फोटक बना दिया है।

‘‘इक्कीसवीं सदी के

साम्राज्यवादी दावेदारों ने

बंद कमरे में, अपनी नीतियां तय की

और अपने लाव-लश्कर के साथ

वो तीसरी दुनिया के देशों पर टूट पड़े।

लाशें बिछा दी उन्होंने

मुल्कों को तबाह किया,

ध्वस्त किये शहरों को,

हंथकड़़ी-बेडि़यों को खुली छूट दी

चाबुकों ने की गुलामों के पीठ पर कशीदेकारी

गोलियों ने जिस्म को छेद कर निकलने का कारनामा किया।

लूट की आजादी को मुक्त व्यापार कहा

और यह भी कहा, दिन अच्छे आ रहे हैं।‘‘

मगर उनके अच्छे दिनों पर विश्वव्यापी मंदी की गहरी मार पड़ी। अमेरिकी अर्थव्यवस्था अपने ही बोझ से चरमराने लगी, यूरोपीय देशों पर कर्ज का भारी बोझ बन गया। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उसके सकल घरेलू उत्पाद से कहीं बड़े कर्ज की ऐसी देनदारी है, जिसका भुगतान चाह कर भी करने की स्थिति में नहीं है। उनके लिये तीसरी दुनिया के देशों का शोषण और दोहन ही एकमात्र जरिया है, जहां उनके विरूद्ध बढ़ता असंतोष है। 21वीं सदी के पहले दावेदार की हालत पहले से कहीं ज्यादा खराब है। न दुनिया की आम जनता उनके पक्ष में है, न सरकारें उनकी हैं, ना ही अपने देश की अर्थव्यवस्था पर उनकी अपनी पकड़ है। बाजार से उनकी साझेदारी मालिक और गुलाम की साझेदारी में बदल गयी है। सरकारें पेशेवर हत्यारे और निजी सेनाओं की तरह निजी वित्तीय पूंजी के इशारे पर लड़ रही हैं। चारो ओर युद्ध और युद्ध की गहरी आशंकायें हैं। सामाजिक संक्रमण की ऐसी स्थितियां हैं, जिसमें उनकी अपनी वैश्विक संरचना टूट रही है। ‘अमेरिकी सदी‘ का सपना दुर्घटना ग्रस्त हो गया है।

उनकी अपनी उपलब्धियां गिरती हुई दीवारों में बदल गयी हैं, और उसकी अपनी व्यवस्था अब अपना बोझ नहीं उठा पा रही है। इसके बाद भी अमेरिकी दावेदारी का अभी अंत नहीं हुआ है। और यह सदी वास्तव में खतरे में है।

(तीन किश्तों में)

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