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आलेख – मीडिया की भूमिका और वर्तमान संदर्भ

ज्ञानेंद्र-पाण्डेय-जीवर्तमान संदर्भ में जब हम मीडिया की भूमिका को खोजने निकलते हैं, तो किसी तरह के नकारात्मक या सकारात्मक निष्कर्ष तक पहुंचने में खासी मेहनत करनी पड़ती है, न तो मीडिया की तारीफ करते बनता है और न ही बेवजह मीडिया की आलोचना ही की जा सकती है। यह बहुत ही दुविधा वाली परिस्थिति है। मीडिया की भूमिका बहुत बेहतर चाहे न हो, पर एकदम नकारा भी नहीं है।

आज की तारीख में मीडिया पर कुछ भी लिखने से पहले बहुत सोच-विचार करना पड़ता है। मामला बहुत नाजुक भी है और संवेदनशील भी। इस विकट परिस्थिति के बाद भी जब मीडिया पर कुछ लिखना ही पड़े तो निश्चित तौर पर अतीत और वर्तमान के मीडिया का निष्पक्ष तुलनात्मक अध्ययन जरूरी हो जाता है, यही वह बिंदु है जहां से मौजूदा मीडिया को और उसके कार्य व्यवहार को आलोचना के दायरे में रखा जा सकता है। इस निगाह से देखें तो आज की मीडिया चाहे वो प्रिंट हो, टेलीविजन हो या रेडियो, पत्रकारिता के मानदंडों पर उतने खरे नहीं दिखाई देते जितना उनको होना चाहिये। इस मामले में सोशल मीडिया ने माहौल को गर्माने में बड़ी भूमिका निभाई है।

मीडिया और उसके मौजूदा संदर्भ में चर्चा करने से पहले यह जानना सबसे ज्यादा जरूरी है, कि देश की आजादी से लेकर बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद आज तक राष्ट्रीय परिवेश में मीडिया की कैसी भूमिका रही है? अब तक करीब 7 दशकों में मीडिया के मिजाज, स्वरूप, काम करने के तौर तरीकों और काम करने की शैली के साथ ही पत्रकारों के रहन-सहन में किस किस्म का बदलाव आया है। बदलाव तो एक शाश्वत प्रक्रिया है और बदलाव जरूरी भी है लेकिन बदलाव की इस यात्रा में नैतिक मूल्यों, सामाजिक चेतना, संबंधों की पवित्रता, राष्ट्र के प्रति सम्मान और संवेदनशीलता की समझ में जबरदस्त गिरावट देखने को मिलती है। समय के साथ इन प्रतिमानों को केवल इसलिये स्वीकार नहीं किया जा सकता कि ये तो होना ही था इसमें हम कुछ नहीं कर सकते।

इसी तथाकथित बदलाव का ही नतीजा है, कि आज की युवा पीढ़ी के कुछ पत्रकार मीडिया को एक ऐसे तड़क-भड़क वाले पेशे के रूप मे लेते हैं जिसका उद्देश्य केवल और केवल पैसा कमाना रह गया है, चाहे इसके लिये कितने ही समझौते क्यांे न करने पडें़। इन समझौतों से पत्रकारिता के मिशनरी होने की परिभाषा तार-तार हो जाती है। मीडिया का स्वरूप आज पूरी तरह बदल गया है। पत्रकारिता की भौतिक लालसा और इस लालसा की पूर्ति के लिये कुछ भी करने से संकोच नहीं होता चाहे राष्ट्र द्रोह ही क्यों न हो। ऐसे कई उदाहरण देखने को मिले हैं, जब इसी बिरादरी के कुछ लोग देश के खिलाफ जासूसी करते हुए रंगे हाथ पकड़े भी गये। एक जमाना वह भी था जब इसी देश में पत्रकारों ने देश की आजादी के लिये अपनी जान न्योछावर करने से संकोच नहीं किया था, आज उसी देश में कुछ लोग मीडिया में रह कर राष्ट्र के हितों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं।

देश की आजादी के लिये हो रहे आंदोलन के दौरान पत्रकारिता एक मिशन के रूप में काम कर रही थी। गणेश शंकर विद्यार्थी, पराड़कर और खुद महात्मा गांधी तक असंख्य पत्रकार केवल इसलिये इस पेशे में थे या इस पेशे से उन्हें प्यार था, क्योंकि उनको लगता था, कि स्वाधीनता संग्राम की अलख जगाने और उसे जन-जन तक पहुंचाने का काम पत्रकारिता के माध्यम से ही हो सकता है। यही वजह है कि प्रत्येक आंदोलनकारी कहीं न कहीं एक पत्रकार भी था। शहीद भगत सिंह से लेकर पंडित जवाहरलाल नेहरू तक तमाम क्रांतिकारियों ने किसी न किसी रूप में पत्रकारिता को स्वाधीनता आंदोलन का हथियार जरूर बनाया था। ‘हरिजन‘ समेत ऐसे हजारों पत्रों का उल्लेख मिलता है, जो हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ राष्ट्रव्यापी माहौल बना रहे थे।

पत्रकारिता का यह मिशन आजादी के बाद के तीन दशकों तक भी इसी जुझारू प्रण से चलता रहा 1947 से लेकर 1977 तक के इस दौर में पत्रकारों की पैनी कल ने जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे ताकतवर प्रधानमंत्रियों को भी नहीं बख्शा। मामला चाहे रक्षा मंत्रालय में जीप घोटाले का हो या फिर चीन के साथ युद्ध में भारत की पराजय का, बंगाल का दुर्भिक्ष हो या फिर देश में आपात काल लगाने का या फिर पूर्वोत्तर समेत अशांत हिमालयी राज्यों में विदेशी घुसपैठ का, हर मोर्चे पर मीडिया ने सरकार को चैन से नहीं बैठने दिया था। आपात काल की घोषणा के विरोध में तो देश के कई अखबारों ने कई दिन तक संपादकीय ही नहीं लिखे, सम्पादकीय का नियत स्थान काले बाॅर्डर के साथ खाली छोड़ दिया गया था। आज उस दृश्य की केवल परिकल्पना ही की जा सकती है, आज की पीढ़ी तो इसे कपोल कल्पना ही समझती है।

इसी दौर में लोक नायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन, राष्ट्रभाषा आंदोलन और हरित क्रांति जैसे अनेक राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में भी तत्कालीन मीडिया ने नये सार्थक भूमिका का निर्वाह किया था। असम में तो ऐसे ही एक छात्र आंदोलन में आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन, जिसे संक्षेप मंे ‘आसू‘ भी कहा जाता है, जैसे मजबूत छात्र संगठन का प्रादुर्भाव भी किया। ‘आसू‘ राजनीतिक रूप से कितना प्रभावशाली संगठन था इसका अंदाजा इसी तथ्य से लग जाता है, कि इसी छात्र संगठन ने पहली बार इंदिरा गांधी जैसी प्रभावशाली नेता के खिलाफ न केवल सफल आंदोलन चलाया बल्कि असम गण परिषद के नाम से एक ताकतवर राजनीतिक शक्ति के रूप में संसदीय राजनीति में भी हिस्सा लिया। यह सब संभव नहीं होता अगर इन ताकतों को मीडिया का समर्थन नहीं होता।

आपात काल की समाप्ति के बाद देश में पहली गैर-कांग्रेस सरकार के गठन में भी मीडिया की बहुत सार्थक भूमिका रही है। कांग्रेस के विकल्प के रूप में जनता पार्टी के गठन मंे भी मीडिया का अहम् रोल था। मीडिया ने ही केले के छिलके की तरह ढ़ाई साल में ही कांग्रेस का विकल्प बनने में असफल रही जनता सरकार को बेनकाब करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। इसके चलते ही 1980 में कांग्रेस की सरकार मे जबरदस्त वापसी हुई थी। कहने का मतलब यह की आजादी से पहले आौर आजादी के बाद के लगभग 4 दशकों तक भारत में पत्रकारिता और पत्रकारों ने लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ की भूमिका बहुत ही निष्पक्ष तरीके से निभाई लेकिन बाद के दौर में खासकर 1991-92 में सोवितय संघ के विघटन और नयी वैश्विक उदार आर्थिक नीति के लागू होने के बाद के दौर में पत्रकारिता भी प्रभावित हुई है।

हमारे देश की पत्रकारिता के इतिहास, स्वरूप में आये बदलाव और मूल्यों के सत्यानाश होने की परिस्थितियों को देख कर ऐसा लगता है कि यहां की पत्रकारिता में राजनीति का असर हमेशा ही ज्यादा रहा है। जैसे-जैसे राजनीति बदली वैसे-वैसे ही मीडिया का स्वाभाव और स्वरूप भी बदलता गया। 1989 से भारतीय राजनीति में मंदिर बनाम मस्जिद के विवाद का सिलसिला शुरू हुआ, तो मंदी भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी। इसी दौर में विश्वनाथ प्रताप सिंह के प्रधानमंत्री काल में मंडल के नाम पर चलायी गयी राजनीति ने पत्रकार जगत को मंदिर बनाम मस्जिद के साथ ही आरक्षण बनाम गैर-आारक्षण के खेमों में बांट दिया तभी से यह विभाजन रेखा चली ही आ रही है। इसी को मंडल बनाम कमंडल की राजनीति भी कहा जाता है।

आज की पत्रकारिता का खोखलापन इस रूप में भी देखा जा सकता है कि हम खबरों की खरीदारी भी बड़ी आसानी से करने लगे हैं, और इस मामले में पिं्रट से लेकर इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तक सभी के बारे में इसी जुमले का इस्तेमाल किया जा सकता है कि हमाम में सारे ही नंगे हैं, कुछ अपवादों को छोड़ कर। इन हालातों में सामाजिक सरोकार की अनदेखी होना स्वाभाविक ही है। उस पर संपादक विहीन सोशल मीडिया ने हालत और खराब कर दी है। कुल मिला कर परिस्थिति इतनी नाजुक हो गयी है, कि न कुछ निगलते बनता है न थूकते। बहरहाल नाउम्मीदी के इस आलम में भी एक कोने से उम्मीद की एक किरण तब नजर आने लगती है, जब कुछ अखबार भट्ठा पारसौल के किसानों के साथ ही भूमि अधिग्रहण जैस जन विरोधी सरकारी कार्यों के खिलाफ खबरें प्रकाशित करते हैं और इस जैसी दूसरी मुहीम में कुछ टेलीविजन चैनल भी उनका सहयोग करते दिखाई देते हैं। फेसबुक और उसके साथ ही ट्विटर जैसे सोशल मीडिया के कुछ स्तंभकार भी इस दिशा में रचनात्मक सहयोग तो अवश्य कर रहे हैं लेकिन इंडिया बनाम भारत जैसे देश की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं के विशाल स्वरूप को देखते हुए ये सब नाकाफी लगता है।

-ज्ञानेंद्र पाण्डेय

561 सेक्टर 3 – आर.के. पुरम, नई दिल्ली – 110022

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One comment

  1. सर आपका बहुत बहुत धन्यवाद आप जिस तरह से जन चेतना व संवेदना का विकास कर रहे है वह आज के दाैर मे प्रशंसनीय है

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