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क्या हम, तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़े हैं? – 4

iraq-war-picसीरिया और र्इरान के मुददे ने दुनिया को तात्कालिक रूप से विभाजित ही नहीं कर दिया है, बलिक यह भी प्रमाणित कर दिया है कि ”अब अमेरिकी साम्राज्यवाद को दी जाने वाली छूट का अंत भी जरूरी है।” रूस के विदेश मंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने 9 दिसम्बर 2012 को कहा कि ”मास्को सीरिया के साथ लीबिया वाली घटना को दोहराने नहीं देगा।” उन्होंने खुले तौर पर इस बात की घोषणां की कि ”हम सीरिया में लीबिया के अनुभव को लागू करने की इजाजत नहीं देंगे।” मतलब बिल्कुल साफ है कि साम्राज्यवादी यूरोपीय एवं अमेरिकी ताकतों के खिलाफ अब रूस की स्पष्ट चुनौती है। 18 दिसम्बर को रूस के रक्षामंत्रालय ने जानकारी दी कि ”रूस के युद्धपोत का एक नया बेड़ा भूमध्य सागर से सीरिया की समुद्री सीमा के करीब पहुंच रहा है।” अमेरिका का यूएसएस आइजन हावर युद्धपोत पहले से ही सीरिया की समुद्री सीमा के निकट पहुंच चुका है।

भले ही, रूस ने इसे सीरिया में अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिये उठाया गया कदम बताया है, किंतु माना यही जा रहा है कि तुर्की-सीरिया सीमा पर नाटो सैन्य संगठन द्वारा पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती और इस क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य सक्रियता को देखते हुए, रूस के द्वारा यह कदम उठाया गया है। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी तुर्की यात्रा के दौरान इस मुददे पर अपनी सख्त नाराजगी जाहीर की और तुर्की के आश्वासनों को अपर्याप्त माना। सीरिया से रूस के नजदीकी सम्बंध ही नहीं हैं, बलिक वहां रूस का नौसैनिक बेस भी है। इसलिये, सीरिया पर यदि तुर्की और जार्डन की ओर से अमेरिकी हमले होते हैं, तो रूस इसे अपने लिये खतरे के रूप में ही देखेगा। उसकी सम्बद्धता बिल्कुल तय है।

र्इरान ने अपनी सम्बद्धता की घोषणां पहले ही कर दी है कि ”यदि सीरिया में पशिचमी देशाें के द्वारा सैन्य हस्तक्षेप किया जाता है, तो र्इरान की सेना सीरिया के साथ होगी।” वैसे भी, अमेरिकी नौसैनिक बेड़े की मौजूदगी र्इरान पर अमेरिकी दबाव बढ़ाने और उसे अपने दबाव में लेने की है। इस्त्राइल र्इरान के परमाणु ठिकानों पर हवार्इ हमले के लिये तैयार बैठा है। आशंका इस बात की है कि पेंटागन और नाटो संगठन सीरिया पर हमले के साथ ही, इस्त्राइल को र्इरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिये, हरी झण्डी दिखा सकते हैं।

यूएसएस आइजन हावर के अलावा वर्तमान में मध्य-पूर्व सागर में अमेरिका का यूएसएस आर्इ वो जिमा, यूएसएस न्यूयार्क और यूएसएस गनस्टन हाल युद्धपोत तैनात है। जिनमें 2500 अमेरिकी मैरिन मौजूद हैं। सीरियार्इ सीमा के करीब अमेरिका के 17 युद्धपोत, 70 बमवर्षक विमान और 10,000 सैनिक मौजूद हैं। इसके अलावा अमेरिकी एयरफोर्स का 39वां एयर बेस विंग तुर्की के इन्सरलार्इक बेस में तथा हजारों की संख्या में अमेरिकी सैन्य टुकडि़यां कुवैत, कतर, संयुक्त अरब अमिरात और बहरीन में तैनात हैं। जार्डन-सीरिया की सीमा पर इराक से वापस हुए अमेरिकी सैनिकों को रोक कर रखा गया है। 2012 की शुरूआत में ही दक्षिणी तुर्की में सीआर्इए ने एक कमाण्ड एण्ड कण्ट्रोल हेडक्वाटर बना कर रखा है, जिसका उददेश्य सीरियार्इ विद्रोहियों को सहायता पहुंचाने के साथ उन्हें हथियाराें की सप्लार्इ करना है। तुर्की की सीमा से हजारों टीएनसी-लीबियार्इ विद्रोही एवं आतंकवादियों को सीरिया में घुसपैठ कराया जा चुका है। सीरियार्इ सेना की हर एक गतिविधियों की गुप्त जानकारियां बि्रटिश युद्धपोत, तुर्की और जार्डन के जरिये, सीरियार्इ विद्रोहियों को पहुंचाता रहा है। सीरिया के रसायनिक हथियारों की निगरानी अमेरिकी सेटेलार्इट कर रहे हैं।

सीरिया पर नाटो देशों के द्वारा हवार्इ हमला इस वजह से भी रूका हुआ है कि उसके पास इन हमलों को नाकाम करने की प्रतिरोधक क्षमता है, और अब तक की तमाम कोशिशों के बाद भी विद्रोही जमीनी लड़ार्इ में उतने सफल नहीं हुए हैं, कि वो हवार्इ हमलों का लाभ उठा सकें। एलेप्पो शहर भी उनके हाथ से निकल चुका है। दमिश्क में विद्रोही, सीरियायी सेना के खिलाफ रसायनिक हथियारों का उपयोग कर रहे हैं, राष्ट्रसंघ में सीरिया के राजदूत बशर जाफरी ने सुरक्षा परिषद और राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून को भेजे खत में, प्रमाण के साथ दिया है। जबकि अमेरिका इस बात की धमकी देता रहा है कि ”यदि सीरिया की बशर सरकार विद्रोही एवं आम सीरियार्इ के खिलाफ रसायनिक हथियारों का उपयोग करती है तो वाशिंगटन चुप नहीं बैठेगा।”

वैसे भी, वाशिंगटन चुप नहीं बैठा है। आज सीरियार्इ विद्रोहियों के पास जो हथियार हैं, वह पशिचमी देश और अमेरिका के द्वारा उन्हें दिया गया है। जार्डन और तुर्की के पास अमेरिकी हथियार हैं। इस बात के प्रमाण अब तक नहीं हैं कि विद्रोहियों के द्वारा जिन रसायनिक हथियारों का उपयोग दमिश्क में किया गया, वह उन्हें कैसे मिला? मगर, अमेरिका, पशिचमी देशों की चुप्पी और राष्ट्रसंघ, सुरक्षा परिषद की खामोशी, कुछ कहती सी लग रही है।

पूर्वी यूरोप में ऐन्टी मिसाइल सिस्टम और तुर्की में नाटो के द्वारा पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती पर रूस की अपनी चिंता है, मगर चीन की प्रतिक्रिया का भी अपना महत्व है। बिजिंग ने कहा है कि ”वह सीरिया की समस्या का शांतिपूर्ण समाधान चाहता है। वार्ता और कूटनीतिक पहल ही एकमात्र रास्ता है।” मगर, उसने यह भी कहा है कि ”बिजिंग वहां घट रही घटनाओं पर गहरी नजर रख रहा है।” सीरिया की समस्या के शांतिपूर्ण समाधान के प्रति आज भी रूस प्रयत्नशील है, किंतु दोहा सम्मेलन और अमेरिका तथा उसके मित्र देशों की सैन्य सक्रियता, इस प्रक्रिया में बड़ी बाधा है। बशर-अल-असद ने भी विपक्ष और विद्रोहियों से वार्ता की पेशकश की है।

सीरिया की समस्या का शांतिपूर्ण समाधान अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों का मकसद नहीं है। इसलिये एक बड़े युद्ध की आशंकायें रोज बढ़ती जा रही हैं। जनवरी 2013 के अंत में इस्त्राइल के द्वारा सीरिया की राजधानी दमिश्क में हवार्इ हमले हुए हैं। जहां सीरियायी विद्रोहियां को सीरिया की सेना बाहर खदेड़ती जा रही है, और राजधानी से उनके पांव उखड़ गये हैं। मगर यह युद्ध की शुरूआत नहीं, थकी हुर्इ परिसिथतियों की टोह है।

साम्राज्यवादी ताकतों ने सीरिया के अलावा, एशिया में विवाद के कर्इ और मुददों को खड़ा कर रखा है। र्इरान और फिलिस्तीन का मुददा भी धीरे-धीरे सीरिया से जुड़ गया है। फिलिस्तीनी ही नहीं अरब जगत के कर्इ देश सीरिया में विदेशी हस्तक्षेप के विरूद्ध हैं। सच तो यह है, कि शीतयुद्ध की सिथतियां अपने बदतर सिथतियों के साथ लौट आयी हैं। और विश्व का शकित संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है।

शीतयुद्ध तीसरे विश्वयुद्ध में सिर्फ इसलिये नहीं बदला कि सोवियत संघ और समाजवादी विश्व के सामने साम्यवादी प्रतिबद्धता थी। सोवियत संघ सारी दुनिया पर अपना साम्राज्य कायम नहीं करना चाहता था, उसका लक्ष्य किसी भी सदी को अपनी सदी में बदलने का नहीं था, किंतु आज दुनिया का स्वरूप बदल गया है। अमेरिकी साम्राज्यवाद 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में और दुनिया का अमेरिकीकरण करना चाहता है। जिसके खिलफ एकजुट होती शकितयां, हम कह सकते हैं कि सोवियत संघ की कमी को वैचारिक आधार पर पूरा करने की सिथति में नहीं हैं। उनके लिये शांति और सिथरता का आधार समाजवाद नहीं है। एक सीमा तक उनकी अपनी प्रभुत्व विस्तार की आकांक्षायें हैं। वे यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद के पक्ष में यदि नहीं हैं, तो सिर्फ इसलिये, कि अमेरिका एकाधिकार चाहता है। वह सारी दुनिया पर अपना वर्चस्व चाहता है।

रूस की मौजूदा व्यवस्था पूर्व सोवियत संघ की ओर लौटना नहीं है, वह सोवियत संघ के सभी क्षेत्रों एवं पूर्वि यूरोप के पूर्व समाजवादी देशों से अपने सम्बंधों को बढ़ा कर एक ‘मुक्त बाजारवादी क्षेत्र’ बनाना चाहता है। रूस की आम जनता, जहां आज भी 56 प्रतिशत से अधिक लोग, पूर्व सोवियत संघ के समर्थक समाजवादी सोच को वरियता देने वाले लोग हैं, अपनी गौरव और गरिमा की ओर लौटने के नाम पर समाजवादी सोच के विरूद्ध होने के बाद भी पुतिन के झांसे में आ सकते हैं। ऐसा न होने पर भी पुतिन के राष्ट्रवादी-पूंजीवादी सोच को रोक पाना, अभी उनकी पकड़ से बाहर है। रूस की मौजूदा व्यवस्था विसंगतियों से भरी व्यवस्था है। इसलिये, उसके साथ कूटनीतिक रूप से तो खड़ा हुआ जा सकता है, लेकिन सोच के स्तर पर नहीं।

चीन भी मुक्त बाजारवादी सोच का शिकार है। वह समाजवादी ढांचे में पूंजीवादी बाजार की रचना कर रहा है। उसकी आकांक्षायें एशिया प्रशांत क्षेत्र और चीनी सागर में अपने प्रभुत्व विस्तार एवं वैशिवक मंदी से चरमरा रही अमेरिकी वैशिवक वित्त व्यवस्था पर अपना वर्चस्व कायम करना है। आज वह दुनिया के बाजार में सबसे बड़ा निवेशक देश बन गया है, और विश्व व्यापार के लिये अमेरिकी डालर के विरूद्ध चीनी मुद्रा युआन की वैकलिपक व्यवस्था बना चुका है। वह समानांतर वैशिवक वित्त व्यवस्था के प्रति प्रतिबद्ध है, और उसकी सामरिक क्षमता एशिया में सबसे बड़ी है। उसका दखल यूरोप और अमेरिकी वित्त व्यवस्था में है। जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता, मगर उसकी सिथति भी रूस की तरह ही है। वह समाजवादी एकजुटता का चेहरा नहीं है, ना ही बनना चाहता है।

रूस यदि पूर्व सोवियत संघ की सिथतियों को पाना चाहता है, तो चीन की साम्राज्यवादी आकांक्षायें एशिया प्रशांत क्षेत्र और वैशिवक वित्त व्यवस्था पर वर्चस्व की हैं। दोनों अमेरिकी साम्राज्य के विघटन से खाली होती जगह को भरने की आकांक्षा से जुड़े हैं।

शांति, सिथरता, सहअसितत्व और समाजवाद लातिनी अमेरिकी देशाें में ही नजर आ रहा है। यूरोप, अमेरिका और तीसरी दुनिया के लोग जिनके प्रति आश्वस्त हो सकते हैं, जहां विकास के जरिये समाजवाद का निर्माण हो रहा है। सहयोग और समर्थन, की बोलिवेरियन क्रांति और समाजवादी सोच ने, पूरे महाद्वीप को एक शिविर में बदल दिया है। निजीकरण के विरूद्ध राष्ट्रीयकरण की नीति ने, बाजारवादी सोच को आधारहीन बना दिया, जिसकी वजह से आज हम वैशिवक तनाव से घिरे हैं।

आज लातिनी अमेरिकी महाद्वीप ही वह जगह है, जहां आम जनता के हितों में, सकारात्मक घटनायें घट रही हैं। जहां शांति और सिथरता की संभावनायें बनती हैं, किंतु विश्व राजनीति में इस महाद्वीप की निर्णायक दखल नहीं है। वह सैन्य अभियान और हथियारों की होड़ से बाहर है, जहां अमेरिकी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप भी है। जहां अमेरिकी एकाधिकार के विरूद्ध बहुधु्रवी विश्व की अवधारणा का विकास हुआ, जिसके विरूद्ध साम्राज्यवादी ताकतें हैं। अमेरिकी सरकार ने घोषणां की है कि ”वह बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां के विरूद्ध है।”

जिसके बारे में हम यकीन के साथ कह सकते हैं कि सामरिक दृषिटकोण से वह मजबूत है, मगर गलत है।

हम यकीन के साथ कह सकते हैं, कि अमेरिकी साम्राज्य के इमारत की बुनियाद हिल गयी है, उसकी दीवारों में दरारें पड़ गयी हैं, वह अपने ही बोझ से दबता जा रहा है और उसका मलबों में बदलना तय है। मगर, अभी वह मलबा नहीं हुआ है।

हम उस दौर से गुजर रहे हैं, जिस दौर में सोच, समझ और समाज की व्यवस्थायें टूट रही हैं, और नयी व्यवस्था के जन्म लेने का कठिन दौर भी है। यूरोपीय-अमेरिकी साम्राज्यवाद अपनी गिरती दीवारों को बचाने के लिये, तीसरी दुनिया के देशों को अपना निवाला बनाना चाहती हैं, जहां समाज व्यवस्था की बनती हुर्इ नयी संभावनायें हैं। तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा इन्हीं के बीच है। यह तय होना सचमुच अभी बाकी है कि हम बहुध्रुवी विश्व और जनवादी एकजुटता के कितने करीब हैं? तीसरे विश्वयुद्ध का वास्तविक खतरा अमेरिकी साम्राज्य के पतन और उसकी जगह लेनेवाली उसी तरह की शकितयों से है।

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