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मायामृग की चार कविताएँ

mayamrig1. क.ख.ग.

मैंने सिर्फ ‘क’ से कस्‍सी जाना
और ‘ख’ से जाना खेत में खटना
गांव के चौधरी ने मुझे खुरपी से ज्‍यादा कुछ नहीं जाना
कुछ नहीं माना।
खुरपी..कि जिससे वह खोदता है मेरी जड़ें
खुरपी…कि जिससे मेरी मेहनत की हरियाली खोदकर
ले जाता है अपने खलिहान तक…।
मुझे नहीं पता पर गांव के लोग
मुझे ‘ग’ से गुलाम कहते हैं….।
‘घ’ से घर तो चौध्ररी का घर था
मेरी झोंपड़ी तो ‘झ’ से शुरु होती है और
उस वर्ण पर खत्‍म…जिससे कुछ शुरु नहीं हो सकता…।
यूं कि मैं क.ख.ग. भी ना सीखा और सब वर्ण खत्‍म हो गए
तुम्‍हारी व्‍याकरण ने मुझे घोषित किया अवर्ण…।
मैं आखिरी हूं, मुझ तक आकर ठहर जाती है तुम्‍हारी वर्णमाला
तुम्‍हारी घृणा पर टिकूंगा पर थामे रहूंगा
तुम्‍हारी भाषा का पतन
जब कविता गिरने लगे तो
तो फिर से सीखना चाहिए क. ख. ग…!!

 

2. दुख कहने का सुख

भर गई हैं सड़कें
गूंजती हैं सांय सांय, भांय भांय
खाली होते घरों में बस रहा है शहर…
जहां कहीं खाली दिखता है, उग आता है
कि जैसे पहले हर खाली मैदान मे उग आते थे कीकर
भूल गया हूं पर पगडंडियां बनाकर निकलना
सड़क पर भर गया हूं भरी भरी भीड़ के बीच….
घर धकेल देता है रोज एक जरुरी चीख कंठ से
सड़क समा लेती है चुपचाप अपनी चिल्‍लपौं में
भीड़ की आवाजों में एक खामोश दिन
तलाशता है एक शाम….
बचे हैं अब भी ठीहे
बीच दुपहर एक पेड़ के नीचे जमी थड़ी
लकड़ी की बेंच, छोटे छोटे मुड्डे
और बड़े बड़े मुददे….
घटनाओं की व्‍याख्‍या करते
अर्थ और परिभाषाएं गढ़ते
जारी है बहस….लीलने से पहले कितना छीलता है शहर
सब खो चुकने के बाद भी शहर के बीचों बीच
इस थड़ी पर, चाय के उबलने का इंतजार करते लोगों में
बचा हुआ है…दुखों पर बतियाने का सुख….
एक गहरी सांस लेकर जो छोड़ता है वह मुंह से
वह सिर्फ बीड़ी का धुआं नहीं है !!

 

3. छिपकली होने का अर्थ

छिपकलियों के बीच रहते
तो जान सकते
उनका चलन और तरीका
धीरे धीरे खुलते हैं उनके रहस्‍य
कि भींत पर अंधेरे में भी क्‍यों चिपकी रहती है छिपकलियां….।
दीवारों से उनका लगाव
उनके भय से आता है कि मन से
छतों पर उलटा चिपके हुए
दिखती रहती हैं गहरी खाइयां
तल पर मुंह फाड़े बैठे दैत्‍य….।
ज़मीन पर नहीं दौड़ सकती छिपकलियां
रौंदे जाने का भय
तोड़ देता है गति के सारे नियम….।
चुप हैं दीवार पर चिपकी छिपकलियां
तुम उनकी उदासी को
खुशी की अनुपस्थिति की तरह मत आंको
डर में जीते हुए
ख़ुशी में खुश हो जाने से भी भय लगता है
किसी ने आंख भर देखा तो
आंख में भर ले जाएगा सारी खुशी…..।
छिप कर जीने की कला जानती
खुशियों को छिपाती हैं छिपकलियां…।
तुम हंस सकते हो उनकी जड़मति पर
तुम रहना जानते हो छत के नीचे
और सपाट रखते हो रंगीन दीवारें
रपटन छिपकलियों का दुर्भाग्‍य है….।
रहने दो
तुम नहीं जान पाओगे एक छिपकली होने का अर्थ…!!

 

4. अफसोस और मैले कपड़े

कल की बकाया शिकायतों से धुली हुई सुबह
उलाहनों और तानों के साथ दुपहर तक पहुंची
इसी तरह हो जाएगी सांझ
ढूंढते हुए कमियां, गलतियां और
भरती जाएगी घुटन—खाली पड़े कोनों में—।
अभी अभी उठाया गया है
मैले कपड़ों का ढेर— मैल चिपचिपाहट और तेज गंध से भरा
कब तक रहा जा सकता है खाली
कोने में जम ही जाएगा कुछ ना कुछ—।
चौखाने वाली कमीज की जेब में
कोई कागज़ छूट गया है
अब ये तय है कि
धुल जाएगा साबुन-पानी से–लिखा हुआ सब—।
रोज धोना—रोज मैला हो जाना
बाहर बाहर से ही होता है क्‍या इतना सब
कोई गंध कहीं से आती है वह कोना कौनसा है
जबकि जिन्‍दगी तो गोल गोल घूम रही है—।
चौखाने खींचें फर्श पर
एक में रखें शिकायतें, अफसोस और मैले कपड़े
दूसरे को खाली रखें उलाहनों के लिए—।
और दो खानों के बीच से मिटा दें खड़ी रेखा
देखना खुली हवा आएगी
घर बड़ा हो जाएगा—-।

-मायामृग

(छोटेपन से आजादी का जश्‍न मनाने को जरा खुली जगह की दरकार है—-।)
मायामृग जितने एक प्रकाशक के तौर पर जाने जाते हैं उतने ही एक कवि के तौर पर भी पहचाने जाते हैं ! इनकी कविताओं को पढ़ते हुए पाठक गहरी संवेदनाओं से गुजरते हैं यही इनकी कविताओं की ताकत है और पहचान भी !

प्रस्तुति : -नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. आशीष मिश्र

    सुंदर कविताएं! मैं आपकी कविताओं का अभी नया पाठक हूँ । एक दिन सवाई सिंह शेखावत जी ने आपकी कविताएं पढ़वाईं, आज फिर नित्यानन्द जी के सौजन्य से। कविताओं ने अब अपना बराबर का पाठक बना लिया !

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