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संस्कृति का स्वरूप, महाद्वीपीय हो रहा है

384057_379990355405084_1898703729_nसंस्कृति की चर्चा हम चाहे जिस रूप में करें, वह विभाजित ही रहेगी, क्योंकि समाज विभाजित है, परिवेश विभाजित है, भौगोलिक परिसिथतियां विभाजित हैं और इन सबसे निर्मित सोच विभाजित है। संस्कृति के कैनवास को लोग हमेशा बड़ा कर देते हैं, और उसे छोटे-छोटे टुकड़ों से भर देते हैं। लोगों के रहन-सहन, खान-पान, तीज-त्यौहारों से लेकर, सामाजिक संरचना, आर्थिक व्यवस्था और राजनीतिक ढांचे से भर देते हैं। धार्मिक और भौतिक अवधारणाओं से भर देते हैं। और उस कैनवास पर जब ढेरों रंगों और लकीरों की भरमार हो जाती है, उसे संस्कृति कह देते हैं। और यह भी कह देते हैं कि रंगों और लकीरों की तरह संस्कृतियां आपस में जुड़ी हैं। और हम मान भी लेते हैं। यह सोचते ही नहीं कि एक समाज, एक व्यवस्था में अलग-अलग संस्कृतियां होती हैं। यही कारण है कि संस्कृति की अपनी कोर्इ स्पष्ट परिभाषा नहीं है। हम जिस व्यवस्था में -समाज व्यवस्था में- जीते हैं -मानसिक और भौतिक रूप में- उस व्यवस्था के पक्ष या विपक्ष की संस्कृति में जीते हैं। यही कारण है, कि संस्कृति सामूहिक तो है, मगर सार्वभौम नहीं। उनके बीच अपनी पहचान और अपनी श्रेष्ठता का संघर्ष भी है। और एक सच यह भी है कि संस्कृति समन्वय भी है।

आर्इये, संस्कृति को ही किसी जमीन, किसी धरातल पर खड़ा करके उसे समझने की कोशिश करें। बिना किसी जमीन, किसी सोच से जुड़े, संस्कृति की सही समझ संभव नहीं है।

भारत में रहते हैं, इसलिये, भारत को ही ले लें।

भारत में श्रेष्ठता और दासता की संस्कृति है। आतिमक और भौतिक संस्कृति है।

यदि धर्म, मान्यता और विश्वासों के आधार पर सोचें, तो हिंदू (वैदिक-सनातन) संस्कृति है, इस्लामी और इसार्इयत की संस्कृति है। आर्य और अनार्यों की संस्कृति है। आदिवासी और गैर-आदिवासी की संस्कृति है। अनगिनत समूह और सम्प्रदायों की संस्कति है। नस्ल, धर्म और जाति की संस्कृति है।

भारतीय संस्कृति के साथ पाश्चात्य और अब अमेरिकी संस्कृति भी है। जिसने संस्कृति को आक्रामक बना दिया है।

संस्कृति सोच, समझ, विचार और समाज व्यवस्था के आधार पर भी बनती और बदलती है, इन्हें कालगत आधार पर भी हम विभाजित कर सकते हैं। सामंतवादी संस्कृति, पूंजीवादी संस्कृति और सर्वहारा संस्कृति।

सामंतवाद को हम उसकी सांस्कृतिक श्रेष्ठता के रूप में ही जानते हैं। उसके साथ उसकी भव्यता के अनगिनत किस्से और कारनामे हैं। जिसे पूंजीवाद आज भी ढो कर चल रहा है। देखा जाये तो सामंती काल में सांस्कृतिक अभियान और हमलों की शुरूआत हुर्इ। यहीं से प्रशासक वर्ग की संस्कृति का विकास हुआ। धर्म और संस्कृति, राजसत्ता और सांस्कृतिक श्रेष्ठता के नये सिद्धांत का विकास हुआ। संस्कृति के हाथों में हथियार थमाया गया है। अभिमानों को हमलावर बनाया गया, इस देश में अनार्यों पर आक्रमण हुए, शैव और बौद्ध मतावलमिबयों पर हमले हुए हैं। धर्म के साथ सांस्कृतिक विस्तारवाद की सोच पुरानी है। जिसे राजाश्रय मिला, वह धर्म और उसकी संस्कृति आक्रामक हुर्इ है। बौद्धों के विस्तार और पतन के मूल में भी यही है। इस्लाम घोड़े पर सवार हथियारों के साथ आया, उससे पहले यूनानी संस्कृति का रूप भी यही था, और सबसे पहले आर्य भी यहां हथियारों के साथ घोड़े पर सवार हो कर ही आये थे।

हमारी विवशता है कि हमें इन कालों को दौड़ते हुए ही पार करना होगा, क्योंकि पानी जहाजों पर चढ़ कर आये औपनिवेशिक संस्कृति और हथियारों का जखीरा और अपनी भौतिक श्रेष्ठता के गुरूर में चूर साम्राज्यवादी अमेरिकी संस्कृति हमारे सामने है, जो कान पकड़ कर यह समझाने की कोशिश कर रही है कि ”जाहिलों, हमसे बड़ा कोर्इ नहीं है।” यह भौतिक समृद्धि और मारक क्षमता की अजीब सी संस्कृति है। जो बि्रटिश उपनिवेशवादियों की तरह षड़यंत्रकारी भी है।

पाश्चात्य और अमेरिकी संस्कृति अपनी श्रेष्ठता पर नहीं, बलिक श्रेष्ठता के बजते हुए संगीत पर टिकी है, जिसके पास आयातित समृद्धि, भौतिक संसाधन, विकसित संचार माध्यम और हमलावर सैन्य क्षमता है। अनोखी सोच है कि ”हमारी सर्वोच्चता को मानो, नहीं तो अपनी गर्दन तोड़वाओ।” यह बात सुनने में शायद थोड़ी सी अजीब लगे, आपतित जनक भी लग सकती है, मगर ऐतिहासिक सच है कि- सांस्कृतिक दृषिट से असभ्य लोग ही भारत पर हमलावर रहे हैं। आर्य हमलावर थे, अनार्यों की संस्कृति उनसे ज्यादा विकसति थी। यही सच, इस देश पर हुए हर एक हमले के साथ हमलावर का पीछा करती रही है। चाहे वो तुर्क हों, मुगल हों, बि्रटिश हों या आज तक के सबसे बड़े हमलावर अमेरिकी हों। जो दुनिया का अमेरिकीकरण करना चाहते हैं। पहले वह अपने वित्तीय फायदे और राजनीतिक वर्चस्व को बनाये रखने और चरमराती वैशिवक व्यवस्था को बचाने के लिये, लोगों की गर्दन तोड़ने में लगा है। उसकी वैशिवक संस्कृति ‘डालर की संस्कृति’ है। वैश्वीकरण अमेरिकीकरण की सोच है। वह सिर्फ यह नहीं चाहता कि उसके साम्राज्य में सूरज अस्त न हो, जैसा कि बि्रटिश उपनिवेशवादी सोचते थे, बलिक वह यह चाहता है, कि उसके साम्राज्य का सूरज ही दुनिया भर में चमके। उसके लिये संस्कृति प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार और लोगों को अपने कब्जे में लेने की सोच है। और उस सोच में बाजार की चालबाजी भी है। वह श्रेष्ठता का मिथक है।

बि्रटिश साम्राज्य के साथ, जब तक यह मिथक जुड़ा रहा, जिसे उसने स्वयं ही गढ़ा था, तब तक उसके उपनिवेशों से उसे कोर्इ गंभीर चुनौतियां नहीं मिलीं, किंतु, इस मिथक के टूटते ही, वह टूट कर बिखरता चला गया। आज टूटता हुआ यह मिथक, अमेरिकी साम्राज्यावाद के साथ जुड़ा हुआ है। वह सिर्फ संयुक्त राज्य अमेरिका में ही नहीं टूट रहा है, बलिक यूरोप में भी टूट रहा है। तीसरी दुनिया के देशों में भी टूट रहा है। उसके टूटने की प्रक्रिया ”इतिहास के नियम नियंत्रित सिद्धांत’ से जुड़ गयी है। पूंजी के वर्चस्व, मुद्रा के चलन, कारोबारी गतिविधियां, सैनिक हमले और वैशिवक संगठनों से जुड़ गयी है। संचार माध्यमों और साम्राज्यवाद की संस्कृति से जुड़ गयी है। अमेरिकी श्रेष्ठता का भरम जड़बुद्धि लोगों में ही बचा है, जिनकी तादाद कम नहीं है। जो देख नहीं पाते कि हथियारों से लैस संस्कृति के हाथों में सिर्फ दिखावे का झाडू है, कि समृद्धि सफार्इ के बाद आती है। कि हम अंधेरा मिटा रहे हैं, ज्ञान-विज्ञान के लिये जगह बना रहे हैं। वह देख नहीं पाते कि औपनिवेशिक और साम्राज्यवादी संस्कृतियां जहां भी गयी हैं, अपने साथ अपनी श्रेष्ठता की सोच और कारोबारी तहजीब ले कर गयी हैं। यह ऐतिहासिक सच है कि उनके पास तीसरी दुनिया की सभ्यता और संस्कृति नहीं है। उनके पास न तो दक्षिणी अमेरिका की माया सभ्यता है, ना अफ्रीकी महाद्वीप की मिस्त्र की सभ्यता है, ना ही एशिया की सिंधुघाटी की सभ्यता है। यूरोप और अमेरिकी धरती लम्बे अर्से तक बंजर रही है। यूनान की सभ्यता और रोमन साम्राज्य का उदय बाद की घटना है। जिनके बारे में जिक्र करना हमारा मकसद नहीं है, ना ही हम तीसरी दुनिया की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति के बारे में जिक्र करने जा रहे हैं। औपनिवेशिक संस्कृति का जिक्र भी संदर्भवश ही करना है, हमारे सामने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद है। जो अपनी आर्थिक, राजनीतिक श्रेष्ठता के साथ सांस्कृतिक श्रेष्ठता का दावा पेश कर चुका है, और उसे सारी दुनिया पर थोपने का निर्णय भी ले चुका है।

उसने पहले बड़ी शराफत से हाथ मिला कर, टोप उतार कर अपनी श्रेष्ठता का जिक्र किया, ‘पावेल इनीशिएटिव’ योजना बनार्इ, जिसके अंतर्गत शिक्षा, समाज, आर्थिक सुधार निजी क्षेत्रों के विकास, सित्रयों का सशकितकरण, जैसे क्षेत्रों में विकास के जरिये अमेरिकी समझ और उसकी संस्कृति को बढ़ाना था। वैसे एक बात हम बता दें कि उसने अपने डण्डे को कभी नहीं छोड़ा। ”जहां तक साथ हैं, वहीं तक आप हैं, नहीं तो हम छुटटा सांड़ हैं” की सोच साथ लिये रहा। यही कारण है, कि उसकी शराफत तीसरी दुनिया के देशों के लिये घुसपैठिया से भला कभी नहीं बन सकी। गौहररजा कहते हैं- ”सांस्कृतिक साम्राज्यवाद का मतलब है एक संस्कृति का दूसरी संस्कृति में घुस कर उसका शोषण करना।” अपने आर्थिक एवं राजनीतिक हितों के लिये ही संस्कृति को हथियार बनाया गया। यही करण है, कि अमेरिका के सांस्कृतिक संदेशवाहक हों, या राजनीतिक दूत, उनके पीछे अमेरिकी सेना होती है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने भारत में सांस्कृतिक स्तर पर औपनिवेशिक काल की वे ही चुनौतियां हैं, जो कभी बि्रटिश साम्राज्य के सामने थीं। उन्हें खुद को समझने में वक्त लग गया कि वो भारत की संस्कृति को कैसे गुलामों की संस्कृति में बदल सकते हैं। उन्होंने पूर्व की संस्कृति को आध्यात्मवादी और पशिचम की संस्कृति को भौतिकवादी होने का प्रचार किया। अपने समर्थक वर्ग को खड़ा किया और समाज को सांस्कृतिक रूप से दो हिस्सों में बांट दिया। अमेरिका भारत में यही कर रहा है। वह अपनी भौतिक समृद्धि से, सांस्कृतिक समृद्धि को काट रहा है। वह अपने आर्थिक, औधोगिक एवं सैनिक श्रेष्ठता को इस देश के दिल-ओ-दिमाग में टांक रहा है। बजरबटटुओं की फसल उगा रहा है। जो सामाजिक विकृतियों में बदलते जा रहे हैं। आम आदमी और प्रशासक वर्ग के बीच के तौर-तरीके बदल गये हैं। सामाजिक विसंगतियों की सूरतें साफ हो गयी हैं।

अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता का भरम सारी दुनिया में फैलाते-फैलाते, वह अपने ही द्वारा फैलाये गये भरम का शिकार खुद हो गया है।

उसकी वैशिवक वित्तव्यवस्था टूट रही है, मगर वह समझता है कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी वैशिवक शकित है। जबकि वह निजी पूंजी का शिकार हो चुका है।

उसकी राजनीतिक संरचना आज की जरूरतो को पूरा करने के लायक नहीं बची है, मगर वह पूंजीवादी लोकतंत्र के फटे झण्डे को उठाये हुए फिर रहा है।

उसकी सामाजिक बुनावट सामाजिक हिंसा की गिरफ्त में है। हत्या, हताशा, ड्रग और पोर्न वेबसार्इटों से उसका पीछा छूटने के बजाये उनसे गहरी छनने लगी है। समाज का अपराधीकरण हो गया है। अमेरिका के विभिन्न राज्यों में 33 हजार अपराधी संगठन हैं और लाखों अमेरिकी उसके सक्रिय अपराधी हैं। यदि दुनिया भर में फैली अमेरिकी सेना के सैनिक, अमेरिका में वापस आ जायें, तो वहां हर दूसरा आदमी अपराधी बन जायेगा।

जिस सैन्य क्षमता के भरोसे अमेरिकी साम्राज्य अपनी श्रेष्ठता के सपने बुन चुका है, उसके सैन्य अधिकारियों और सैनिकों के जेहन में मृत्यु की परछार्इयां डोलती रहती हैं। वो विकृत हो गये हैं। हत्या, बलात्कार, सामूहिक नरसंहार और यातनाओं में अमेरिकी गरिमा को दिखाने की नीति तार-तार हो गयी है। सैनिकों में आत्महत्या करने की प्रवृतितयां बढ़ गयी हैं। इराक और अफगानिस्तान से वापस आये सैन्य अधिकारियों ने अपने वीरता के पदक को पिछले साल नाटो संगठन के अमेरिकी बैठक में, यह कहते हुए सड़कों पर फेंक दिया कि ”इसमें वीरत और गरिमा कहीं नहीं है।”

इसके बाद भी हमारे सामने ऐसे जड़ बुद्धि हैं, जो मानते हैं कि इराक में जो किया गया, वह गलत है। अफगानिस्तान में जो हुआ, वह भी गलत है। लीबिया में जो हुआ और सीरिया में जो हो रहा है, वह भी गलत है। वे क्यूबा से लेकर वियतनाम तक में हुयी हरकतों को गलत मानते हैं, मगर वो वैशिवकमंदी और दिवालिया होती पूंंजीवादी व्यवस्था को भी मानते हैं और मानते हैं कि अमेरिकी साम्राज्य के पास वैशिवक शकितयां हैं। उसके पास ताकत है। अमेरिका की सांस्कृतिक श्रेष्ठता का आधार, उसकी सैन्य शकित है।

क्या शकितयां ही संस्कृति को विस्तार देती हैं?

क्या ताकत ही सांस्कृतिक समृद्धि का आधार है?

जबकि, हम जानते हैं कि अमेरिका की वास्तविक शकित उसकी वित्तव्यवस्था है, और वह उसकी पकड़ से अब बाहर हो गयी है। वह युद्ध और बारूद की रेत पर अपनी फसल उगाने की पिटी-पिटार्इ नीतियों पर चल रहा है। वह दुनिया के लिये ऐसा संकट है, जिस पर एक नया सिर हर महीने उग आता है।

भारत में अमेरिका को सफलता सिर्फ राजनीतिक रूप से मिली है। वह भी इसलिये, कि बाजारवादी बजरबटटूआें के हाथ में सियाशत है। और वो हर एक शाख पर निजी कम्पनियों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बैठाने में लगे हैं। शाख पर बैठे हुए उल्लुओं को ही अमेरिकी साम्राज्य और अमेरिकी संस्कृति में महानता नजर आती है। इन्होंने ही सांस्कृतिक रूप से जुड़े परम्परागत मित्र देशों से उस समय किनारा कर लिया, जब अमेरिकी साम्राज्य अपनी सेना के साथ उन्हें जनतंत्र का पाठ पढ़ाने पहुंचा, यह भूल कर कि किसी भी देश की आम जनता को ही अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार है। अमेरिका की आक्रामक संस्कृति ने जापान पर परमाणु बम गिराने के बाद ही उसे अपनी अधनंगी संस्कृति, नार्इट क्लबों, कैशिनों और सटटेबाज अर्थव्यवस्था का चस्का लगवाया, जो सांस्कृतिक रूप से तो पूरी तरह नहीं बदला, मगर उसकी वित्तव्यवस्था उस पटरी पर दौड़ते-दौड़ते अब दूर्घटनाग्रस्त होने के करीब है। सांस्कृतिक महानता की दावेदारी, हास्यास्पद लगती है।

16 लाख, 90 हजार, 903 लोगों की हत्या करने के बाद भी, इराक की संस्कृति से टकरा कर अमेरिकी संस्कृति चूर है। 1 लाख से अधिक अफगानों को मारने के बाद भी, वह अपने लिये वहां भी जगह नहीं बना सकी, जो अमेरिकी इशारे पर नाच रहे हैं। लीबिया हो या सीरिया जो तबाह हो रहे हैं, या तुर्की और जार्डन जैसे अरब जगत के अमेरिकी समर्थक देश हों, सांस्कृतिक रूप से अमेरिका वहां भी चकनाचूर है। तीसरी दुनिया के देशों के लिये अमेरिका छुटटा सांड़ है। आज भारत में भले ही निजी पूंजी और राजसत्तावादियों ने अपने परम्परागत सांस्कृतिक रूप से जुड़े-मिले देशों नेपाल, श्रीलंका, इराक, र्इरान, अफगानिस्तान, वियतनाम, कम्बोडिया, म्यांमार, जापान, सिंगापुर, तिब्बत, चीन, कोरिया, मारिसश और रूस जैसे देशों से ज्यादा अमेरिकी पूछ बढ़ा दी है, मगर, सांस्कृतिक समन्वय का आधार, आज भी नहीं है। जो भी है, वह ऊपरी है, और ऊपरी वर्ग में है। इसके बाद भी, यह सच है, कि हमारी संस्कृति उन प्रभावों से अछूती नहीं है। इसके बाद भी यह सच है, कि संचार, समाचार और मनोरंजन के माध्यम किसी हमले से कम नहीं हैं। लोगों की सोच बदली है और बदली जा रही है, निजीकरण ने जिन सामाजिक विकृतितयों और विसंगतियों को जन्म दिया है, अब वह हिंसक हो रही हैं। सोच, मूल्य और मान्यतायें बदल रही हैं।

भारतीय संस्कृति बुरार्इयों पर अच्छार्इयों के मूल्य बोध से संचालित होती है, मगर आज बुरार्इयां भारी हैं। पहले आदर्शों को नैतिक आधार मिलता था आज समृद्धि से सोच बदल जाती है। अच्छा वही है जो पैसे वाला है। समृद्धि की जुबान कंगालों को जाहिल प्रमाणित करती रही है। यह प्रमाणित किया जा रहा है कि हम तीसरी दुनिया के लोग पिछड़े हुए हैं। ज्ञान में, विज्ञान में, निर्माण में, और भौतिक समृद्धि में पिछड़े हुए हैं।

यह सोचने नहीं दिया जाता कि यह समृद्धि उनके पास कहां से अयी? और हम क्यों पिछड़ गये?

बि्रटेन की समृद्धि उसके उपनिवेशों से थी। उपनिवेशों का अंत हुआ, और बि्रटिश साम्राज्य का भी अंत हो गया।

अमेरिका की समृद्धि तीसरी दुनिया के देशों से है, उनके शोषण और दमन से है। वह वास्तव में कर्जखोर और परजीवी हैं।

इसके बाद भी, हमसे कहा जा रहा है, कि एक परजीवी देश महान साम्राज्य है, और उसकी संस्कृति महान है। हमें यह समझाया भी जा रहा है, कि महान लोगों की सोहतब, उनके चाल-चलन और उनकी तरह जीना जरूरी है। हमें यह सोचने नहीं दिया जाता, कि यह महान साम्राज्य कर क्या रहा है?

क्या किसी देश को रौंद देना, उसकी संस्कृति का नाश कर देना उसकी समृद्धि को अपने नाम दर्ज कर लेना, किसी महान देश की ‘सभ्य कारतूतें’ हो सकती हैं?

क्या हमलावर और षडयंत्रकारी महान होते हैं?

हो सकता है, कि महान साम्राज्य के लोग, अपने देश को महान समझते हों, जिनके दिमाग में उसकी महानता बैठा दी गयी है, किंतु एक देश के द्वारा, दूसरे देशों का शोषण, अंतत: शोषक देश के लिये दुर्भाग्य ही प्रमाणित होती है। कल तक बि्रटेन का जो ऐतिहासिक गौरब था, आज शर्मिन्दगी में बदल गया है। उसे अपने देश का इतिहास अपनी आज की और आनेवाली पीढ़ी से छुपाना पड़ रहा है। इस मामले में अमेरिकी साम्राज्य की महानता बि्रटिश साम्राज्य से ज्यादा महान है। इसलिये, दुनिया को अमेरिकी टोप पहनाने की सोच भले ही बचकानी है, मगर साम्राज्यवादी शकितयां बाज नहीं आ रही हैं और वैश्वीकरण के नाम से हमलावर आतातार्इयों की तरह, अपना अभियान चला रही हैं।

सोचिये! अमेरिका में तो हर आदमी अमेरिकी नहीं है, फिर दुनिया भर के लोगों का अमेरिकीकरण कैसे होगा? मगर जिददी बूढे के हाथों में हथियार है, आधुनिकतम हथियारों से लैस फौज है। प्रचारतंत्र और संचार माध्यम है। निजीपूंजी और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं, फायदे का सौदा है। और सबसे बड़ी बात वो संकटग्रस्त हंै, इसलिये, बउराये हुए है। सोचिये, क्या इससे बड़ी जहालत कोर्इ हो सकती है, कि इसके बाद भी वो सोचते हैं ”जाहिलों! हमसे बड़ा कोर्इ नहीं है।” भारत के बारे में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है, कि वह वैचारिक विपन्नता का शिकार हो रहा है। जबकि सरी दुनिया अमेरिकी सेना और अमेरिकी संस्कृति के खिलाफ एकजुट हो रही है। और संस्कृति का स्वरूप महाद्वीपीय हो रहा है। जिसकी शुरूआत लातिनी अमेरिकी देशों से हुर्इ, जिसका आधार सहयोग एवं समर्थन से विकसित होता हुआ समाजवादी समन्वय है।

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