Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / फरमाईशी संशोधन की खुली पेशकश

फरमाईशी संशोधन की खुली पेशकश

345677-modifrance

देश को बाजार बनाने की बेवकूफी भरी समझ से, केंद्र की सरकारें पिछले एक दशक से संचालित हो रही हैं। यही कारण है, कि पिछली सरकार की तरह ही मोदी सरकार जो भी कहती है, उसका अर्थ वह नहीं होता, जो होना चाहिये। नीतियां देश और देश की आम जनता के खिलाफ होती हैं, और आर्थिक विकास सामाजिक एवं आर्थिक असमानताओं को बढ़ा देती है। लोकतंत्र की सूरत रोज बिगड़ रही है, और आम जनता के संवैधानिक अधिकारों का दायरा घटता जा रहा है। जिसकी सबसे बड़ी वजह आर्थिक विकास के लिये तय की गयी नीतियां हैं। और उसके लिये अध्यादेशों से जारी राजनीतिक व्यवस्था है।

अर्थव्यवस्था का उदारीकरण अब अर्थव्यवस्था के निजीकरण की नीतियां बन गयी हैं। जिसके लिये मोदी सरकार भारत की अर्थव्यवस्था को अमेरिकी और यूरोपीय अर्थव्यवस्था से जोड़ रही है। विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयों के मापदण्डों के आधार पर देश की आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना को बदल रही है। प्रधानमंत्री वैश्विक स्तर पर खुले तौर पर यह कह रहे हैं, कि ‘‘भारत बदल गया है। आप अपनी शर्तें बतायें, हम अपने को और भी बदलने को तैयार हैं।‘

इस बीच उन्होंने तीन देशों की यात्रा की और महत्वपूर्ण आर्थिक एवं सामरिक समझौते किये, जिसकी राजनीतिक दिशा गैर लोकतांत्रिक है।

क्या किसी भी देश के राष्ट्र प्रमुख के पास यह अधिकार है, कि वह फरमाईशी वैधानिक संशोधन का प्रस्ताव दूसरे देश के निजी निवेशक और उस देश के राष्ट्र प्रमुखों के सामने रखे?

क्या भारत की जरूरतें दूसरी दुनिया के देशों की फरमाईशों से पूरी होती है?

क्या ऐसी फरमाईशें भारत के हित में हो सकती हैं? खास कर तब जब निवेशकों का हित ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है? और इसके लिये ही उन्हें देश में आमंत्रित किया जा रहा है।

किंतु, देश का तथाकथित प्रबुद्ध वर्ग, देश की मीडिया और देश हित से संचालित होने वाले राष्ट्रवादी और वो जो देश के सवा सौ करोड़ लोगों की फिक्र में दुबराने के बजाये चिकनाते जा रहे हैं, यह सवाल नहीं करते।

प्रबुद्ध वर्ग उदारीकरण में समृद्धि का नजारा देख रहा है, और आंकड़ों की जुबान में सोचने वाले अर्थशास्त्री अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के आंकड़ों की मदद से ‘विकास दर‘ का आंकलन कर रहे हैं। इन्हीं में रचने बसने वाले लोकतंत्र समर्थक यह देख नहीं पाते, कि ऐसा राष्ट्र प्रमुख जननायक नहीं तानाशाह होता है। जो संविधान, संवैधानिक इकाईयों को अपनी अंगुलियों पर नचाता है। मोदी जी अपनी ही पार्टी के ऊपर स्थापित हो चुके हैं, और उनकी दिशा खुद को सरकार बनाने की है। इतना कमजोर और बबुआ छाप मंत्री मण्डल देश में कभी नहीं रहा।

मीडिया के लिये सबसे अच्छी खबर है, कि मोदी जी मेडिसन स्क्वाॅयर के राॅक स्टार की तरह दुनिया पर छा रहे हैं। शेल्फी के दीवाने हो रहे हैं।

भाजपा अपने ही देश में मोदी ध्वज फहराने में लगी है और ‘भारत माता‘ के संघी सपूतों के प्रमुख यह मान कर चल रहे हैं, कि ‘‘दशकों बाद देश में उनके लिये काम करने का माहौल बना है।‘‘ इसलिये जो भी है, वह भला है। अमेरिका भला है, इस्त्राइल भला है, जापान भला है, आॅस्ट्रेलिया भला है, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा भले हैं। ऐसे ही भले लोग और देश, भारत का भला करेंगे। देश के दुश्मनों से लड़ने के लिये हथियार देंगे, और यह भी बतायेंगे कि घर में, और घर के बाहर दुश्मन कौन है?

भारतीय राजनीति में जिस एकाधिकारवाद का उदय हुआ और नरेंद्र मोदी जिस तरह से राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय निजी कम्पनियों के हित में काम कर रहे हैं, वह देश और देश की आम जनता के हितों के विरूद्ध है, इसलिये देश की आम जनता ही अंततः एकाधिकारवादी राजसत्ता और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय वित्तीय ताकतों के लिये दुश्मन होती है।

ऐसा नहीं है, कि इस बात को नरेंद्र मोदी नहीं जानते, या कसीदे पढ़ने वाली मीडिया नहीं जानती। जानते सब हैं। प्रबुद्ध वर्ग, सबसे ज्यादा जानता है, जो अपने निजी हितों से संचालित हो रहा है। वह आज के अमेरिका, इस्त्राइल, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस, जर्मनी और कनाडा को अच्छी तरह जानता है। वह यह भी जानता है, कि बाजारवादी अर्थव्यवस्था के इन देशों की अर्थव्यवस्था को निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों के जाल में इस तरह फंसा लिया है, कि अब सरकारे उनके कारोबार की दलाली कर के चल रही हैं। नरेंद्र मोदी के लिये इतने बड़े पैमाने पर यह नया धन्धा है, इसलिये उन्हें बड़ी हरियाली नजर आ रही है, उन्हें लग सकता है, कि फटे हुए झोले में तिजोरी रख कर वो चम्पत हो रहे हैं, मगर तिजोरी पहले से खाली है। बाजारवादी अर्थव्यवस्था समाज के 1 प्रतिशत लोगों की खुशहाली का धंधा है, और 99 प्रतिशत लोगों के लिये जो है, वह करारा चपत है। और सरकारों को चपत तब लगती है, जब उनकी अर्थव्यवस्था उनके हाथ से निकल चुकी होती है। जिस पर कर्ज का इतना बड़ा बोझ होता है, कि अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाती है।

ऐसे ही कर्ज और ऐसी ही कमर टूटी अर्थव्यवस्था का निर्माण मोदी जी कर रहे हैं। घूम-घूम कर भारत को वह करामाती जगह बता रहे हैं, जहां से भारी मुनाफा कमाया जा सकता है। जो काम उपनिवेशवादी ताकतें तीसरी दुनिया के देशों में जा कर अपनी सेना और मिशनरियों से करती थीं, और उपनिवेश बनाती थीं, मोदी जी अपने देश को उपनिवेश बनाने का मसौदा लिये फिर रहे हैं। उन साम्राज्यवादी वित्तीय ताकतों के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं जिनके लिये दुनिया एक बाजार है। और जो ऐसे मौके की ताक में ही नहीं रहते, ऐसे मौके बनाने में लगे रहते हैं, राजनीतिक अस्थिरता फैलाते हैं, तख्तापलट करते हैं, अपने से असहमत लोगों को मार डालते हैं। अब ऐसे में कोई अपने ही घर में लूट की दावत देता फिरे तो उसकी आवाभगत नहीं होगी तो क्या होगी?

PTI4_11_2015_000093Bजिसका बखान मुख्य धारा की मीडिया करती है मगर दुनिया की वैकल्पिक मीडिया इस विशाल और महत्वपूर्ण देश के प्रधानमंत्री की हरकतों के बारे में गंभीर विश्लेषण तक नहीं करती, खबरें खोजना मुश्किल होता है। जो ‘भले देश‘ और ‘भले लोग‘ घरेलू दुश्मनों की शिनाख्त करते हैं, वो ही बताते हैं, कि ‘‘भारत के सुरक्षा को खतरा चीन से है।‘‘ क्योंकि चीन उनके लिये ऐसी चुनौती है, जिससे पार पाने की उनकी योजनायें अब तक असफल ही रही हैं। जिसकी वजह से बाजारवादी देशों का खेमा विभाजित हो चुका है, जो रूस के साथ मिल कर मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना कर रहा है, और जिसके साथ तीसरी दुनिया के ज्यादातर देश हैं। उनकी विवशता यह भी है, कि वो वैश्विक मुद्रा के रूप में ‘युआन‘ के साथ होने और ‘एशियन-इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ -एआईआईबी- में शामिल होने के लिये विवश हैं, अमेरिकी विरोध के बाद भी। जिसका भारत, चीन के बाद, सबसे बड़ा साझेदार देश है। जिसके महत्व को नरेंद्र मोदी या तो समझ नहीं रहे हैं, या समझना नहीं चाहते हैं। वो ‘ब्रिक्स देश‘ और ‘शंघाई सहयोग संगठन‘ के महत्व को भी समझ नहीं पा रहे हैं। या भारत इस खेमें से बाहर रहे, इसलिये नरेंद्र मोदी हैं।

पूर्व सोवियत संघ और रूस की परखी हुई मित्रता को यदि अमेरिकी ठीहे पर रखा जायेगा, तो कस्साई का गंडासा भारत की सुरक्षा पर ही गिरेगा। पड़ोसी देशों में भारत की विश्वसनियता घटेगी। पाकिस्तान की दुर्दशा भारत के लिये सबक है। जिसका संकट अमेरिकी हितों के लिये काम करने से ही गहराया। निकट भविष्य में चीन से भारत को कोई खतरा नहीं है, और यह कड़वी सच्चाई है, कि चीन की वित्तीय शक्ति और सामरिक क्षमता के सामने भारत की स्थिति गौंण है। और अमेरिकी क्षमता भी इनती नहीं है, कि वह चीन पर हमला कर सके। उसे सामरिक रूप से घेरने और उसके समुद्री मार्ग को बाधित करने की अमेरिकी योजना अब तक सफल नहीं हुई, और अब इसकी उम्मीद भी नहीं है, क्योंकि विश्व का राजनीतिक संतुलन बदल चुका है।

अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय संघ के अनुपात में यह संतुलन रूस और चीन के पक्ष में बदला है, जिसमें लातिनी अमेरिका, कैरेबियन देश, यूरेशिया और एशिया की साझेदारी लगातार बढ़ती जा रही है। यूरो-अमेरिकी साम्राज्य के समकक्ष एक ऐसे विश्व का निर्माण हो रहा है, जिसमें अपने देश के लिये राजनीतिक प्रणाली को बनाने का अधिकार उस देश को, उस देश की आम जनता को है।

भारत एक वैकल्पिक विश्व का पक्षधर रहा है, जिसकी पक्षधरता अब बदली जा रही है।

आशंका इस बात की है, कि नरेंद्र मोदी ने यदि वैकल्पिक विश्व की पक्षधरता को अंतर्राष्ट्रीय नीतियों में निष्क्रिय कर दिया तब भारत जिस समिकरण का हिस्सा होगा, उसकी जटिलतायें भी उसी समिकरण का हिस्सा होंगी। भारत की गुटनिर्पेक्षताा की नीति के सामने गहरा प्रश्न चिन्ह है। वह चूके हुए हथियारों का जखीरा जमा कर रहा है। उन्हें अपना सबसे निकटतम सहयोगी देश बना रहा है, जो भारत की गुटनिर्पेक्षता की नीति के खिलाफ थे, और जो आज भी वैकल्पिक विश्व व्यवस्था के विरूद्ध है।

आईये, हम मोदी जी के मेडिसन स्क्वाॅयर वाली छवि की तह में चलें। जिसके बारे में भारतयी मीडिया यही दिखा रही है, कि ‘मोदी जी छा गये‘ और पश्चिमी मीडिया भारत के वैश्विक हिस्सेदारी को बढ़ा-चढ़ा कर दिखा रही हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने तो ‘टाइम‘ में मोदी जी के लिये यहां तक लिख मारा- ‘‘इण्डियाज़ रिफाॅर्मर इन चीफ‘‘। मोदी जी भारत के सबसे बड़े सुधारक हैं। दुनिया के सबसे मजबूत 100 लोगों में शामिल हैं। उसी सर्वे में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले नम्बर पर हैं, और ओबामा जी खिसकते-खिसकते पांचवें नम्बर से भी नीचे खिसक गये है। ब-हरहाल हटायें हम इस ‘मजबूती की वरियता‘ को, इसका कोई मतलब नहीं है। जब सरकारें ही बाजार के लिये अपना कद घटा ली हैं, तब उसके प्रमुखों के बारे में और उनकी वरियता के बारे में हम क्या कह सकते हैं? उन्हें भी आप बाजार में एक वस्तु की तरह ही समझिये। जिसे वित्तीय ताकतों ने अलग-अलग नाम, अलग-अलग चेहरा दे रखा है। जो दिखते तो हैं, अलग-अलग लेकिन काम एक ही तरीके से करते हैं। उन्हीं ताकतों के हितों में काम करते हैं, जो सरकारें बनाती और बिगाड़ती हैं।

भारत में केंद्र की मोदी सरकार ऐसी ही सरकार है, जिसे अभी सवालों के दायरे से बाहर रखा जा रहा है। लेकिन हमारे सामने सवाल है, और हम साफ देख रहे हैं, कि ‘मेक इन इण्डिया‘ देश को उपनिवेश बनाने का शानदार प्रोग्राम है। जिसके लिये वो विदेशों में स्टेज शो करते फिर रहे हैं। और इसी बीच ‘देश की सुरक्षा‘ के मुद्दे को उन्होंने महत्वपूर्ण बना दिया है। यह खबर फैला दिया है, कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये हंथियारों की बड़ी जरूरत है।

क्या अब भी यह बताने की जरूरत है, कि आर्थिक विकास के लिये देश में वैश्विक वित्तीय ताकतों की हिस्सेदारी और देश की सुरक्षा के लिये मोदी जी को हथियारों की क्यों जरूरत है?

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top