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एशिया में चीन का बढ़ता वर्चस्व

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एशिया में चीन के बढ़ते वर्चस्व से ओबामा सरकार की तरह ही भारत की मोदी सरकार भी चिंतित और परेशान है। उसकी परेशानी अतीत के अनुभवों और सीमा विवादों से ज्यादा अमेरिकी खेमें की चिन्ता और ‘चीन को भारत के विरूद्ध’ होने का प्रचार है, जिसके माध्यम से अमेरिकी सरकार भारत का उपयोग चीन के विरूद्ध करना चाहती है। और मोदी सरकार को इससे कोई परहेज नहीं है। पश्चिम एशिया में चीन की मौजूदा नीति पड़ोसी देशों से चीन के आपसी विवादों को हल करने और आर्थिक सहयोग एवं समझौतों से अपने हितों को सुरक्षित करने की है। वह क्षेत्र के देशों से अपने सम्बंधों को नया रूप दे रहा है, ताकि अमेरिकी सरकार के द्वारा एशिया में चीन के आर्थिक विस्तार को रोकने के लिये की जा रही आर्थिक एवं सामरिक घेराबंदी को तोड़ा जा सके।

चीन एशिया और अफ्रीकी देशों से अपने कारोबार और समुद्री मार्ग को सुरक्षित करने और अमेरिकी हस्तक्षेप को अप्रभावी बनाने में लगा है। वह यूरोप तक पहुंचने के लिये जल मार्ग के विकल्प के रूप में रूस के साथ मिल कर दुनिया के सबसे बड़े रेल मार्ग का निर्माण कर रहा है, वहीं अरब की खाड़ी और हरमूज की खाड़ी तक पहुंचने के लिये रेल एवं सड़कों का जाल बिछा रहा है। पाकिस्तान के साथ ‘आर्थिक गलियारे’ के निर्माण पर समझौते कर रहा है। जिससे ईरान तक उसकी सीधी पहुंच होगी। खाड़ी के देशों से जुड़े उसके आर्थिक हितों को नया आधार मिलेगा। 20 अप्रैल को पाकिस्तान की, चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग की, यात्रा का मूल मकसद भी यही है।

चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग की दो दिवसीय राजकीय यात्रा राजनीतिक से ज्यादा आर्थिक एवं सामरिक है, जिसका राजनीतिक अर्थ भी बनता है। जो सिर्फ भारत से जुड़ा हुआ नहीं है। भारतीय राजनीतिज्ञ और मीडिया को यह जान लेना चाहिए कि जिस तरह एशिया का मतलब भारत के लिये चीन नहीं है, उससे कहीं बड़े रूप में चीन के लिये एशिया का मतलब भारत नहीं है। विश्व समुदाय में भारत की विश्वसनियता आज भी पाकिस्तान से बड़ी है और यह चीन के लिये भी सच है। सरसरी तौर पर देख कर यह कहा जा सकता है, कि पाकिस्तान को चीन से निवेश की सुविधा भारत से ज्यादा मिली है, लेकिन सच इस सच से जुड़ा हुआ है, कि इसकी सबसे बड़ी वजह पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति और चीन की वैश्विक योजना में उन क्षेत्रों का विशेष महत्व है।

46 अरब डाॅलर की जिस परियोजना की शुरूआत की गयी, वह चीन के शिनजियांग को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने के लिये, जिसका महत्व चीन के लिये सबसे ज्यादा है। जिसके जरिये चीन अरब की खाड़ी और हरमूज तक पहुंच जायेगा। जहां से खाड़ी के देशों का तेल व्यापार परिवहन होता है, और ईरान है। ईरान तेल के मामले में इस क्षेत्र का सबसे बड़ा चीनी साझेदार है। जिसके खिलाफ अमेरिकी एवं यूरोपीय देशों का प्रतिबंध आज भी है, भले ही अब समझौतों की स्थितियां और शर्तें भी हैं। जिससे दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार और समझौतों में कोई फर्क नहीं पड़ता।

भारत का तेल आयात भी इसी रास्ते से होता है, और आज भी चीन के बाद भारत ईरान से तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। जिसकी नीतियां अमेरिकी दबाव में न सिर्फ ईरान से तेल के आयात में कमी के रूप में प्रभावित हुईं, बल्कि ईरान, पाकिस्तान और भारत तक तेल एवं गैस पाईपलाईन बिछाने की योजना से भारत ने अपने हाथ भी खींचने की गलती की। चीन के अनुपात में भारत ईरान के लिये कम विश्वसनिय देश ही प्रमाणित हुआ। और आज भी नरेन्द्र मोदी अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की ओर ही दौड़ रहे हैं। उनकी यह दौड़ भारत के हित में कितनी है? यह तो आने वाला कल ही बतायेगा, मगर यह तय है, कि भारत को आने वाले कल में चीन के बारे में अपनी नीतियों में परिवर्तन करना ही होगा। चीन का मौजूदा नेतृत्व भारत के बारे में आज भी ज्यादा सकारात्मक है, लेकिन नरेन्द्र मोदी से इस समझ की अपेक्षा कम ही बनती है, कि वो इसका लाभ उठा पायेंगे? क्योंकि जिन्होंने मैकमोहन लाईन की पतली लकीर खींच कर विवादों को जन्म दिया है, अब जिसका नेतृत्व अमेरिका कर रहा है, वो दोनों देशों के विवादों को हल होने के पक्ष में नहीं है। जिसे भारत की सुरक्षा के लिये खतरा बताया जा रहा है।

भारत की सुरक्षा के लिये या भारत की सुरक्षा को रूस और चीन की संयुक्त साझेदारी से ही सुनिश्चित किया जा सकता है। पाकिस्तान में चीन के निवेश से ही पाकिस्तान की दिशा बदली जा सकती है, जो कि चीन के भी हित में है, क्योंकि चीन के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में आतंकी गतिविधियां बढ़ाई जा रही हैं, और यह कड़वी सच्चाई है कि पाकिस्तान का आतंकी देश या आतंकवादियों का पनागाह होना, अमेरिकी नीतियों का परिणाम है।

अमेरिकी सहयोग या अमेरिकी हस्तक्षेप से आज तक तीसरी दुनिया के देशों की, किसी भी समस्या का समाधान नहीं हुआ है। तीसरी दुनिया के देशों के लिये ‘राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप’ अमेरिकी नीति है। जिसके खिलाफ वैश्विक स्तर पर रूस और चीन के नेतृत्व में महत्वपूर्ण पहल हुई है। जिसमें लातिनी अमेरिकी देशों की महत्वपूर्ण साझेदारी है। इसलिये अमेरिकी हितों से संचालित होते हुए ‘भारत के राष्ट्रीय हितों’ और ‘भारत की सुरक्षा के लिये खतरा’ की बकवास ही गलत है। जिनकी अपनी अर्थव्यवस्था खतरे के निशान को पार कर चुकी है, और जिनकी समाज व्यवस्था का दीवाला निकल चुका है, उनसे अपने देश की अर्थव्यवस्था को जोड़ने और अपने प्राकृतिक एवं श्रम सम्पदा तथा बाजार को उन्हें सौंपने का खेल भारत में खेला जा रहा है, उसका खामियाजा आने वाले दशकों को चुकाना पड़ेगा।

Pak-China-APहम आज के चीन को समाजवादी देश या कम्युनिस्ट देश का दर्जा नहीं दे सकते। इसके बाद भी यह सच है कि जिस समय अमेरिकी साम्राज्य, यूरोपीय देश और नाटो संगठन के देशों के द्वारा अपने से असहमत समाजवादी देशों और गैरपूंजीवादी देशों पर आर्थिक एवं सैनिक हमले कर रहा है रूस उन देशों की सामरिक सुरक्षा और कूटनीतिक समर्थन दे रहा है, और चीन के द्वारा उन देशों को अमेरिकी आर्थिक हमलों के खिलाफ योजनागत आधार पर आर्थिक सहायता दी जा रही है। चीन के आर्थिक सहयोग में, राजनीतिक संरचना और अपने देश की अर्थव्यवस्था को बदलने की शर्तें नहीं होती।

किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तोड़ने और राजनीतिक अस्थिरता फैला कर उस देश में सैन्य हस्तक्षेप करने का जो कारनामा अमेरिकी साम्राज्य, यूरोपीय देश और उनके सहयोगी देश करते रहे हैं, या आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतिबंधों का जो खेल खेला जाता है, चीन की नीतियां उनसे काफी दूर हैं। वह लोकतांत्रिक और समाजवादी देशों से अपने सम्बंधों को मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है।

यदि भारत की बात करें तो, भारत में राजनीतिक अस्थिरता फैलाने, उसकी अर्थव्यवस्था को तोड़ने या पृथकतावादी आन्दोलनों को समर्थन देने और ऐसे आतंकी गुटों को आर्थिक सहयोग एवं हंथियारों की आपूर्ति करने -जो देश की अखण्डता के लिये घातक है- या देश पर आतंकी हमले कराने के कोई भी आरोप भारत सरकार चीन पर रखने की स्थिति में नहीं है। यहां तक कि इस बात के भी कोई प्रमाण नहीं हैं, कि भारत के माओवादियों को चीन से सहयोग मिलता है। जबकि पाकिस्तान से हुए आतंकी हमलों में अमेरिकी सम्बद्धता के सूत्रों की कमी नहीं है। भारत के विरूद्ध अमेरिका ही पाकिस्तान के पक्ष में रहा है। पाक को दिये गये हथियारों का उपयोग भारत के खिलाफ पाकिस्तानी सेना और पाक आतंकी गुट लगातार करते रहे हैं। और आज भी अमेरिकी सरकार ही पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति करता रहा है।

वाॅल स्ट्रीट जर्नल में अमेरिका में पाकिस्तान के पूर्व राजनायिक हुसैन हक्कानी ने लिखा है, कि ‘‘अमेरिका से मिले हंथियारों का उपयोग पाकिस्तान भारत के खिलाफ कर सकता है।‘‘ उन्होंने जिहादियों के खिलाफ लगभग एक अरब डाॅलर के जंगी हेलिकाॅप्टर, मिसाइल और अन्य रक्षा उपकरण अमेरिका के द्वारा पाकिस्तान को देने के निर्णय पर सवाल खड़ा किया है।

अमेरिकी सरकार भारत के खिलाफ -आतंकवादियों से लड़ने के नाम पर- पाक सरकार को हंथियारों की आपूर्ति करती रही है। पाक सेना को प्रशिक्षित करने और पाक सेना के साथ आतंकवादियों को अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के प्रशिक्षण देने के सैकड़ों प्रमाण हैं। इसके बाद भी सरकार समर्थित भारतीय मीडिया चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग के पाकिस्तान में होने पर ऐसी खबरें बांट रही है, जैसे वहां उनका होना भारत के खिलाफ षड़यंत्र है। जबकि पाकिस्तान में यदि चीन को बढ़त मिलती है, तो वह अमेरिकी वर्चस्व से बाहर निकल सकता है, और भारत के खिलाफ जारी सैन्य एवं आतंकी अभियानों की दिशा आर्थिक पुर्ननिर्माण की ओर मुड़ सकती है।

भारत के वर्तमान सरकार की नीतियां चीन की वैश्विक नीति से पटरी बैठा कर चलने की नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी उन्हीं देशों से अपने सम्बंधों को बढ़ाने में लगे हैं जिनके लिये चीन वैश्विक स्तर पर वित्तीय चुनौती है। वो उन्हीं देशों में ‘मेक इन इण्डिया‘ की संभावनायें तलाश रहे हैं, जिनकी अर्थव्यवस्था को ‘कोरामिन‘ की जरूरत है। कह सकते हैं, कि चीन और भारत की अनिवार्यतायें और वरियता अलग है। पाकिस्तान एक ऐसी अर्थव्यवस्था है, जिसके सामने अपने एक क्षेत्र एक बंदरगाह को सौंपने की शर्तें रखी जा सकती हैं, लेकिन भारत के सामने निवेश के लिये ऐसी पेशकश नहीं की जा सकती। हालांकि नरेन्द्र मोदी देश को उस ओर ही ले जा रहे हैं, जो आने वाले कल के लिये बड़ी मुश्किलें होंगी। जिस समय चीन रूस के साथ मिल कर भू-राजनीतिक संतुलन को प्रभावित कर रहा है, ठीक उसी समय भारत पश्चिम एशिया में ‘मेक इन इण्डिया’ के जरिये साम्राज्यवादी देशों का नया ठिकाना बनने की नीति पर अमल कर रहा है। और भारतीय मीडिया इन सवालों से जुड़ने के बजाये पश्चिमी मीडिया के पीछे-पीछे चलती हुई नरेन्द्र मोदी को शाब्बाशियां दे रही है। अमेरिका और पश्चिमी देशों को भारत का सहयोगी देश बताने में व्यस्त हैं।

यदि पाकिस्तान को दी गई अमेरिकी मदद का अध्ययन करें तो अमेरिका ने फौजी तानाशाही वाले पाकिस्तान को लोकतांत्रिक पाकिस्तान की तुलना में ज्यादा मदद दी है। 1958 में अमेरिका ने पाकिस्तान को लगभग 5 करोड़ डाॅलर की मदद दी थी परन्तु जनरल अयूब के कार्यकाल में लगभग 9 करोड़ 40 लाख डाॅलर याहया खान के कार्यकाल में 10 करोड़ डाॅलर की मदद दी, यानी सैन्य तानाशाही पाकिस्तान को लोकतांत्रिक पाकिस्तान से दो गुना ज्यादा मदद की। नवाज शरीफ के पिछले कार्यकाल में साढ़े सात करोड़ डाॅलर की मदद की परन्तु जनरल मुशर्रफ के कार्यकाल में लगभग 5 गुना यानी 34 करोड़ डाॅलर की मदद की।

और यह किसी परियोजना के तहत उसकी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये दी गयी मदद नहीं है, बल्कि सेना की मजबूती, सैन्य साज-ओ-सामान की आपूर्ति और आतंकवाद के खिलाफ (आतंकवाद को बढ़ाने के लिये) मुहीमों के लिये दी गयी मदद है।

क्या चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग के द्वारा पाकिस्तान को दिये गये परियोजनागत आर्थिक सहयोग का स्वरूप यही है? जिसे लेकर भारत के माथे पर सिकन पड़ रही है?

पाक सरकार और भारतीय मीडिया शि-जिनपिंग की पाकिस्तान की यात्रा को बढ़ा-चढ़ा कर इस तरह से दिखा रही है, जैसे पाकिस्तान ने चीन की दोस्ती फतह कर ली और भारत के लिये खतरा बढ़ गया है। जबकि चीन और भारत वैश्विक स्तर पर एक दूसरे से सम्बद्ध सहयोगी देश हैं, जिसमें रूस की महत्पूर्ण उपस्थिति भी है। ‘ब्रिक्स‘ देशों के संगठन, शंघाई सहयोग संगठन और एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक, जैसे संगठनों एवं वित्तीय इकाईयों में दोनों की उपस्थिति महत्वपूर्ण है, जबकि पाकिस्तान के साथ चीन की ऐसी सम्बद्धता नहीं है। अपनी भारत यात्रा के दौरान चीन के राष्ट्रपति शि-जिनपिंग ने भारत के साथ चीन की वैश्विक साझेदारी को रणनीतिक रूप देने की बातें की थी, और यह सच भी है कि रूस, चीन और भारत की सक्रिय साझेदारी से ही एशिया की शांति एवं स्थिरता को मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने पाकिस्तान की संसद को सम्बोधित करते हुए भी चीन और भारत के सम्बंधों का जिक्र किया। उन्होंने पाकिस्तान से दोस्ती की बातें जरूर की, किन्तु उन्होंने भारत की कीमत पर ऐसी कोई भी बात नहीं की। ना ही दोनों देशों के रिश्तों को वैश्विक करार दिया।

भारत और चीन के सम्बंधों को पाकिस्तान की तराजू पर रख कर तौलने का कोई आधार नहीं है। चीन के लिये दोनों देशों की अनिवार्यता अलग-अलग है। जिसका आर्थिक, कूटनीतिक और सामरिक महत्व भी अलग-अलग है, और इस बात को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं है, कि चीन अपने राष्ट्रीय एवं वैश्विक हितों से संचालित होने वाला देश है। इसलिये, चीन के सम्बंधों और चीन की नीतियों को, भारत या पाकिस्तान के नजरिये से देखना, उसके वैश्विक महत्व की अनदेखी करना है।

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