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अमेरिकी वर्चस्व का संकट

Obama

ओबामा सरकार की गल्तियों का जिक्र होने लगा है। जो वास्तव में अमेरिकी सरकार की नाकामियां हैं, जिनकी सूरत बराक ओबामा बन गये हैं। ओबामा की जगह कोई डेमोक्रेट या रिपब्लिकन राष्ट्रपति होता, तब भी नाकामियों की सूरत कुछ ऐसी ही होती। इसे बदलना अमेरिकी सरकार के हाथों में नहीं है, और जिन वित्तीय ताकतों के पास इसे बदलने की ताकत है, वो अमेरिकी सरकार की जैसी सूरत बन गयी हैं, उसे बदलना नहीं चाहते, क्योंकि यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है। यह सफलता उनके सिर पर चढ़ गयी है, कि ‘‘हम इतने बड़े हैं कि कोई हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता!‘‘

बराक ओबामा ऐसी ही एक सूरत हैं, जिनके नाम अब नाकामियां दर्ज हो रही हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है, कि ओबामा की सबसे बड़ी गल्ती वेनेजुएला को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा घोषित करने की उनकी नीति है‘, जिसकी वजह से वेनेजुएला के अमेरिकी समर्थक विपक्ष का बचा-खुचा जनाधार भी खिसक गया, लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की एकजुटता बढ़ गयी, और विकास के जरिये समाजवाद के प्रति वैश्विक समर्थन में इजाफा हुआ। विश्व समुदाय के अधिकांश देशों में वेनेजुएला के पक्ष में और ओबामा के विरूद्ध जन प्रदर्शन हुए। लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों में रूस और चीन की स्थिति काफी मजबूत हो गयी।

वैसे ओबामा के गल्तियों की सूची बहुत लम्बी है। जिसकी खुलेआम शुरूआत लीबिया से होती है।

लीबिया में कर्नल गद्दाफी को सत्ता से बेदखल करने के लिये उन्होंने जिन आतंकी संगठनों, मिलिशियायी गुटों, पेशेवर विद्रोहियों और अंत में नाटो सेना का उपयोग किया, और इसके बाद जैसी सरकार का गठन वहां हुआ, वह अमेरिकी साम्राज्य और अमेरिकी लोकतंत्र के ताबूत में सबसे बड़ा कील है। जिसने अमेरिका के लिये तीसरी दुनिया के देशों में युद्ध का आतंक और असुरक्षा की भावना भर दी। राजनीतिक असुरक्षा से उबरने के लिये नये विकल्पों की खोज शुरू हो गयी। रूस का पुनरूत्थान और चीन के वित्तीय वर्चस्व का विस्तार हुआ। अमेरिकी एकाधिकार के विरूद्ध बहुध्रुवी विश्व की अनिवार्यता पक्की हो गयी। अमेरिकी नीतियों ने दूसरे खेमे की जरूरतें बढ़ा दी।

सीरिया के संकट ने इसी सोच को विकसित किया। लीबिया को तबाह करने की सफलता, सीरिया में विश्व के लिये निर्णायक सबक बन गया। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने रूस की विश्वसनियता को बढ़ा दिया। महत्वपूर्ण एशिया का समिकरण बदलता चला गया। ओबामा सरकार सीरिया में युद्ध का आतंक और आतंकवादियों के साथ खड़ी लबारियों की जमात में बदल गयी, जिसके पास अपने पक्ष में वैश्विक स्तर पर कोई तर्क नहीं है। इराक इस भूल का विस्तार है। जहां अपने ही समर्थित सरकार के खिलाफ अमेरिकी सरकार ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के आतंकवादियों का हाथ -उनके खिलाफ सैन्य हस्तक्षेप की नीति से- बंटा रही है। जिसने बराक ओबामा को जाॅर्ज डब्ल्यू बुश बना दिया। सद्दाम हुसैन के टूटे हुए बुतों को इराकी भले न जोड़ सकें, लेकिन इराक के टूटने का दर्द अमेरिकी विरोध है। आम इराकी अमेरिका के खिलाफ है।

अहमदीनेजाद के ईरान के खिलाफ लगाये गये अमेरिकी प्रतिबंधों का दम निकल रहा है। ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को विवादास्पद बनाने की उसकी नीतियां नाकाम रही हैं। समझौते की तात्कालिक सफलता के बाद भी सच यह है, कि ईरान अमेरिका के लिये वैश्विक चुनौती बने चीन और रूस के पक्ष में है। प्रतिबंधों का खेल वहां भी खत्म हो रहा है। जो वास्तव में अमेरिकी फतवा है।

यूक्रेन में नाटो सैन्य हस्तक्षेप, क्रीमिया का रूसी संघ में विलय में बदल गया है। पूर्व सोवियत संघ के देशों की एकजुटता रूस के नेतृत्व में आकार पा चुकी है। क्रीमिया को अमेरिकी कब्जे में लेकर विश्व के सामरिक नाकेबंदी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप में रूस की बढ़त में बदल गयी, जिसे अमेरिका अपनी सुरक्षा के लिये खतरा करार दे रहा है। जिसे रोक पाना ओबामा के बस में नहीं है।

क्रीमिया के मुद्दे को लेकर रूस के खिलाफ लगाये गये अमेरिकी प्रतिबंधों के खिलाफ उसकी नीतियों के पीछे-पीछे चलने वाले यूरोपीय संघ पर इतना भारी पड़ा है, कि वो रूस के जवाबी प्रतिबंधों की कार्यवाही के खिलाफ अमेरिका के साथ चलने की स्थिति में नहीं है। ग्रीस में वामपंथी सरकार सत्तारूढ़ हो चुकी है, जो रूस से अपने सम्बंधों को सामान्य करने की नीति पर चल रही है और स्पेन में नये बदलाव का होना तय होता जा रहा है। यूरोपीय संघ अब पूरी तरह अमेरिका समर्थक नहीं है। ओबामा अपने स्थायी मित्र देशों को खोते जा रहा है।

‘पिवोट टू एशिया‘ और ‘ट्रांसपैसेफिक पार्टनरशिप‘ हाईजैक हो गया है। जिस वैश्वीकरण की नीति को उन्होंने अमेरिकीकरण का आधार बनाया, वह वैश्वीकरण अब मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना में बदल गया है। जिसका नेतृत्व रूस और चीन के हाथों में है, जिसके प्रमुख साझेदार लातिनी अमेरिकी और कैरेबियन देश हैं, जहां कभी अमेरिकी वर्चस्व था। चीन की आर्थिक घेराबंदी और सामरिक नाकेबंदी की नीतियां भी अब असफल होती जा रही हैं। वैश्विक स्तर पर चीन अमेरिकी डाॅलर के विरूद्ध चीनी मुद्रा युआन को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये, पूरी व्यवस्था के साथ, मुद्रा बाजार में उतार चुका है, जिसकी विश्वसनियता लगातार बढ़ती जा रही है, और गये महीने उसने ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ -एआईआईबी- की घोषणां कर दी है। जिसमें शामिल होने की अनिवार्यता अमेरिकी सरकार के सामने भी है, और जिसमें ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे यूरोपीय देश शामिल हो चुके हैं। जिसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक जैसी वैश्विक वित्तीय इकाईयों के समकक्ष लाया जा रहा है। जिसका विरोध ओबामा सरकार करती रही है।

डाॅलर पर टिकी अमेरिकी साम्राज्य का वर्चस्व टूटता जा रहा है। अब वह यह कहने की स्थिति में भी नहीं है, कि आर्थिक वर्चस्व उसके पास है। राजनीतिक सम्बंधों के ऊपर सामरिक एवं आर्थिक सम्बंधों की वरियता अमेरिकी सरकार की दशकों पुरानी नीति है, जिसने अब उसकी राजनीतिक संरचना और उसके वैश्विक बुनावट को तोड़ना शुरू कर दिया है।

Summit_of_the_Americas_3-end1आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतिबंधों का दशकों पुराना अमेरिकी खेल वैसे तो आज भी जारी है, लेकिन उसका असर घट गया है। बराक ओबामा यदि रूस और वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था को तोड़ने के लिये आर्थिक प्रतिबंध लगाते हैं और प्रतिबंधों का राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं, तो क्यूबा पर लगाये गये दशकों पुराने प्रतिबंधों को हटाने की घोषणां भी करते हैं, जिसका असर अमेरिका के हित में नहीं होता। वो अपनी शर्मिन्दगी भी ठीक से छुपा नहीं पाते। न तो रूस अकेला पड़ता है, ना ही वेनेजुएला को अकेला बनाने की उनकी नीतियां सफल होती हैं। बल्कि रूस और चीन के सम्बंधों का आधार और मजबूत हो जाता है, और वेनेजुएला लातिनी अमेरिकी देशों की एकजुटता का प्रतीक बन जाता है।

लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों की यात्रा के दौरान और ‘आॅर्गनाइजेशन आॅफ अमेरिकन स्टेट्स’ की बैठक से ठीक पहले, बराक ओबामा को इस बात की घोषणां करनी पड़ती है, कि ‘वेनेजुएला अमेरिका की सुरक्षा के लिये खतरा नहीं है‘। जबकि मार्च में उन्होंने अपने विशेषाधिकार का उपयोग कर वेनेजुएला को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिये खतरा घोषित कर, नये प्रतिबंधों की घोषणां की थी।

वेनेजुएला के खिलाफ अमेरिकी नीतियां, ओबामा की ऐसी असफलता हैं, जो खुले रूप में नजर आने लगी हैं। 12 फरवरी के असफल तख्तापलट के खुलासे में अमेरिकी सम्बद्धता के सैकड़ों प्रमाण हैं। जिसे अमेरिकी सरकार भले ही अस्वीकार करती है, और जोर दे कर जिसे मानने के लिये विवश भी नहीं किया जा सकता, किन्तु महाद्वीपीय और वैश्विक स्तर पर इसे सच माना जाता है। माना जाता है कि अमेरिकी सरकार आज भी औपनिवेशिक काल की उन नीतियों पर चल रही है, जिसे अस्वीकार दिया गया है। समय से पीछे चलती उसकी नीतियां उसे एक ऐसी प्रतिक्रियावादी ताकतों का मुखिया बना दी है, जिसके पक्ष में साम्राज्यवादी देश की सरकारों के अलावा और कोई नहीं है, जहां उन्हें जन प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। शायद दुनिया में एक भी ऐसा देश नहीं है, जहां की आम जनता अमेरिकी सरकार और उसकी नीतियों के पक्ष में हो।

ओबामा ने अमेरिकी साम्राज्य के लिये, उन स्थितियों की रचना की है, जहां अमेरिकी विरोध स्वाभाविक है। आज मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले रूस और चीन के पक्ष में विश्व समुदाय का जो मुकाम नजर आ रहा है, वह अमेरिकी नीतियों का परिणाम है। आतंकवाद और युद्ध तथा युद्ध की आशंकाओं को इतना बढ़ा दिया गया है, कि अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ सामूहिक सुरक्षा की नयी सोच विकसित हो गयी है।

बराक ओबामा अमेरिकी वर्चस्व और अमेरिकी एकाधिकार के क्रमिक पतन का काल है। आर्थिक एवं भू-राजनीतिक संतुलन बदल गया है। जिसे अपने पक्ष में बनाये रख पाना न तो वैश्विक वित्तीय ताकतों के हाथ में है, ना ही बराक ओबामा या अमेरिका के आने वाले किसी राष्ट्रपति के हाथ में है।

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