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फ्रांस की निजी कम्पनियों को मोदी का ‘बेलआउट’

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देश की सुरक्षा के मसले पर नरेन्द्र मोदी से सवाल होना चाहिए। किन्तु राष्ट्रीय स्तर पर लापरवाह खामोशी है, और संसद में सरकार और विपक्ष उन मुद्दों पर बहंस कर रही हैं, जिसे सरकार पहले ही तय कर चुकी है, जैसे- भूमि अधिग्रहण विधेयक। और इस बात की खबर विपक्ष को भी है।

किसानों की बद्हाली

और मौसम की मार से घायल फसलों की खबरें भी बांटी जा रही हैं। ऐसी खबरें जिससे किसानों की हताशा और आत्महत्या का चाहे जो हो, मगर लोगों को यह महसूस हो, कि उन्हें राहत मिल रही है।

आत्महत्या की सुर्खियां अच्छी बनती हैं

रोमांच भी है

खाद्य पदार्थों की कमी से लाभ कमाने का जरिया भी है

बाजार होशियार है

साजिशें बरकरार हैं

और देश की सुरक्षा का मसला भी सरकार और बाजार की समझदारी है। खरीदना और बेचना धंधा है। धंधे का वसूल मुनाफा है। सरकारें अब मुनाफा कराती हैं। मोदी जी इस मामले में देश की पिछली सरकार से पीछे नहीं हैं। मनमोहन सिंह के ऐसे चेले हैं, कि गुरू गूड़ रह गया, चेना चीनी बन कर चकाचैंध कर रहा है।

पिछले एक दशक में, भारत के सैन्य बजट में लगभग 10 गुणा वृद्धि हुई है। पहले यह 16 हजार करोड़ रूपये वार्षिक था, जो बढ़ कर 2 लाख करोड़ रूपये से अधिक हो गया है। कह सकते हैं, कि भारत के कुल बजट का यह लगभग 20 प्रतिशत है। ऐसी वृद्धि पाकिस्तान के बजट में भी हुई है। चीन के बजट में भी भारी इजाफा हुआ है, और वह हथियार उत्पादक देश भी बन गया है।

मोदी सरकार अपने रक्षा एवं सैन्य बजट में लगातार इजाफा करेगी यह तय है। भारत को हथियार उत्पादक देश बनाना भी उसका लक्ष्य है। इसे वह राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता मानती है। जबकि देश की अर्थव्यवस्था और आम आदमी के सामने गहरा संकट है।
भारत में सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 40 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनकी दैनिक क्रय क्षमता मात्र 10 रूपये के आस-पास है, और योजना आयोग द्वारा गठित सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 80 करोड़ लोगों की दैनिक क्रय शक्ति 20 रूपये के आस-पास है। इस तरह भारत में 40 करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं, वह भी तब जब ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की सीमा रेखा का मतलब 22 रूपये रोज, तथा शहरी क्षेत्रों में 28 रूपये रोज निर्धारित है।

यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, कि 22 और 28 रूपये में एक दिन जीने वाला आदमी कैसे जी सकता है? और वास्तविक गरीबी की दर कितनी हो सकती है? 60 से 70 करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा के नीचे पहुंच जायेंगे, और लगभग 80 से 90 करोड़ लोगों की हालत हमेशा ही खराब रहेगी।

जिस देश में 1 हजार लोग टीबी -क्षय रोग- जैसी बीमारी से मरते हैं, उस देश में स्वास्थ्य सेवा पर बजट का मात्र 4 से 5 प्रतिशत खर्च होता है, और शिक्षा पर 4 प्रतिशत तथा सिंचाई पर उससे भी कम बजट का प्रावधान है, मगर हंथियारों के लिये 20 प्रतिशत से ऊपर बढ़ता हुआ खर्च है। जो खर्च स्वास्थ्य-चिकित्सा, शिक्षा एवं सिंचाई पर होना चाहिए, उससे हम हंथियार खरीद रहे हैं।

मोदी जी तो हंथियारों के नाम पर कबाड़ खरीदने और डुबकी लगा चुकी निजी कम्पनियों को बचाने का काम कर रहे हैं। मुख्य धारा की भारतीय मीडिया उनका साथ दे रही है। जिनके लिये भारत की सुरक्षा के लिये खतरा चीन है, पाकिस्तान है। फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की यात्रा मंगलमय है।

क्या वास्तव में ऐसा है?

‘द सिटिजन डाॅट इन‘ वेबसाइट लिखता है- ‘‘फ्रांस को पीएम नरेन्द्र मोदी के रूप में एक सांता क्लाॅज मिल गया, जिसने एक ही यात्रा में वहां की बड़े घाटे में चल रही दो उत्पादक कम्पनियों को बेल आउट दे दिया। ये दो कम्पनियां हैं ‘डसाॅल्ट एविएशन‘ और ‘अरेवा‘। उन्होंने अपने ‘मेक इन इण्डिया‘ प्रोग्राम को दरकिनार कर इन कम्पनियों से समझौते किये।‘‘ मोदी ने न तो अपने राजनीतिक सहयोगियों की बात मानी, न कम्पनियों की गिरी हुई शाख का खयाल रखा, और ना ही विशेषज्ञों की राय सुनी। उन्होंने चेतावनियों की भी अनदेखाी की जो उन कम्पनियों के लिये दी गयी थीं। जिसके तहत उन्होंने न तो समय पर कभी काम पूरा किया, ना निर्धारित मूल्यों की कद्र की, ना ही उत्पादन की गुणवत्ता को समझौते के तहत पूरा किया। इसके बाद भी मोदी जी ने करार कर लिया।

ऐसा उन्होंने क्यों किया यह सवाल तो होना ही चाहिए।

‘बेल आउट‘ आम जनता के पैसे से निजी कम्पनियों को संभालने की अमेरिकी नीति है। बराक ओबामा ने अमेरिकी मंदी के शुरूआती दौर में अपने देश के निजी कम्पनियों को ‘बेल आउट‘ दिया था। भारत के पीएम नरेन्द्र मोदी ने फ्रांस की निजी कम्पनियों से ऐसे करार और समझौते किये, जिसे बेल आउट का दर्जा मिल रहा है। 36 अतिरिक्त राफेल जेट विमान -लड़ाकू बमवर्षक- की खरीदी ‘डसाॅल्ट एविएशन‘ से, और महाराष्ट्र के जैतापुर के परमाणु सयंत्र के लिये ‘अरेवा‘ से, किये गये समझौतों के आगे कई सवाल हैं। जिसके बारे में बताया जा रहा है, कि इन विमानों से भारत की सुरक्षा सुनिश्चित होगी और फ्रांसीसी परमाणु सयंत्र से 10 हजार मेगावाॅट बिजली का उत्पादन होगा। खबर यह भी है, कि फ्रांस भारत में 2 अरब यूरो, लगभग 62 अरब रूपये, का निवेश भी करेगा।

फ्रांसीसी न्यूक्लियर कम्पनी अरेवा के खिलाफ फ्लैमनविले -फ्रांस- में यूरोपीयन प्रेशराइज्ड रिएक्टर के निर्माण में सब स्टेण्डर्ड मटेरियल -घटिया किस्म के सामान- का उपयोग करने की जांच चल रही है। कम्पनी की आर्थिक स्थिति भी डावांडोल है। मोदी ने इस मामले के विशेषज्ञों और भारत के अन्य लोगों की चेतावनी की अनदेखी कर ‘अरेवा‘ के साथ 6 ईपीआर न्यूक्लियर रियेक्टर के निर्माण के समझौते को अन्तिम रूप दे दिया। पीएम मोदी का यह कदम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तरह ही है, जिन्होंने अरेवा और न्यूक्लियर पाॅवर काॅरपोरेशन आॅफ इण्डिया लिमिटेड के बीच समझौते की पहल की थी। दिसम्बर 2010 में 2 न्यूक्लियर रियेक्टर के निर्माण पर हस्ताक्षर किया गया था। उस समय भी भारत के परमाणु विशेषज्ञों ने कहा था- ‘‘इस फ्रेंच कम्पनी का रिकार्ड काफी खराब है।‘‘ उन्होंने इस समझौते का विरोध भी किया था।

अरेवा ने अपने वेबसाइट पर घोषणां की कि ‘‘पीएम मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रैंको होलांदे की मौजूदगी में ‘न्यूक्लियर पाॅवर काॅरपोरेशन आॅफ इण्डिया लिमिटेड‘ के साथ एक प्री-इंजीनियरिंग एग्रिमेण्ट पर हस्ताक्षर किया गया।‘‘ जिसके तहत जैतापुर परमाणु संयत्र के लिये 6 ईपीआर रिएक्टर का निर्माण किया जायेगा।

इसके अलावा अरेवा और लाार्सन एण्ड टोब्रो, जो कि भारत की सबसे बड़ी ऐसी इंजीनियरिंग एण्ड कन्स्ट्रक्शन कम्पनी है, जिसके अन्तर्गत कई कम्पनियां एक ही संगठन के नाम से उसके अन्तर्गत काम करती हैं, ने भी भविष्य में जैतापुर प्रोजेक्ट के लिये, संयुक्त रूप से काम करने -कोलाॅबोरेशन- के लिये नये स्थानों की खोज करने के समझौते पर हस्ताक्षर किये।

16913255110_998cdfa0c7_zये सभी समझौते और मेमोरेण्डम भारत के परमाणु विशेषज्ञों और अन्य लोगों के द्वारा पीएम मोदी को पत्र लिखने और वाद दायर करने की बात के बाद भी किये गये। भारत सरकार के पूर्व सचिव इ.ए.एस. शर्मा ने प्रधानमंत्री के प्रिसिपल सेक्रेटरी नृपेन्द्र मिश्रा को अरेवा पर तीन रिपोर्ट को साथ में रखते हुए लिखा- ‘‘अरेवा को साल 2014 के दौरान 5-6 बिलियन डाॅलर के आॅर्डर का नुक्सान हुआ। वह फिनलैण्ड के ओल्किटुओटो के 3 न्यूक्लियर रिएक्टर्स पर काम कर रहा है। जिसे न तो निर्धारित समय पर पूरा किया गया, ना ही निर्धारित मूल्य पर। परियोजना को पूरा करने के लिये निर्धारित समय में कई बार परिवर्तन किया जा चुका है, वर्तमान में 2018 में पूरा करने का समय तय है। यदि 2018 में इस परियोजना को पूरा किया गया तो 13 साल में यह पूरा होगा। फिनलैण्ड के रियेक्टर का मूल्य भी काफी बढ़ गया है, इसके बाद भी यह तय नही है कि यह समय और कीमत आगे भी नहीं बढ़ेगा।

फ्लैमनविले उत्तरी फ्रांस में अरेवा द्वारा बनाये जा रहे रियेक्टर के प्रकरण के अनुसार- ‘‘कम्पनी ने रियेक्टर के अत्यन्त महत्वपूर्ण हिस्से में दोषपूर्ण स्टील का उपयोग किया है। जिसकी वजह से सुरक्षा के लिये गंभीर चिन्ता पैदा हो गयी है।‘‘ यह खबर राॅयटर ने सप्ताह भर पहले दी है। रियेक्टर निर्माता कम्पनी अरेवा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देने से इन्कार कर दिया, कि ‘‘जांच की वजह से फ्लैमनविले के काम में देरी होगी, और इस जांच का प्रभाव फिनलैण्ड और चीन-ताईशान के दो अन्य निर्माणाधीन ‘ईपीआर‘ पर पड़ेगा।‘‘

फ्रांस की ऊर्जा मंत्री सेगोलेन रोयाल ने कहा कि ‘‘हो रहे जांच की रिपोर्ट अक्टूबर तक आ सकती है।‘‘

फ्रांस की रियेक्टर निर्माता कम्पनी अपने ही बनाये ‘रियेक्टर के सुरक्षित होने‘ या ‘सुरक्षा से जुड़े मुद्दे‘ के प्रति आश्वस्त नहीं है। इसलिये अगर रियेक्टर के डिजाईन की गड़बड़ी की वजह से कोई दुर्घटना होती है, तो वह उसकी जिम्मेदारी और क्षतिपूर्ति के दायित्वों से कतरा रही है। संभव है, कि फ्रांस की सरकार इसके लिये भारत की सरकार पर दबाव बनाये कि वह सारी जिम्मेदारी और क्षतिपूर्ति का दायित्व उठाये। या यह भी हो सकता है, कि पीएसयू इन्श्योरेंस कम्पनी इसकी जिम्मेदारी ले।

यदि ऐसा किया गया तो यह फ्रांस की कम्पनी अरेवा को सुरक्षा की अनदेखी करने के लिये बढ़ावा देने जैसा ही होगा। श्री शर्मा ने इसी तरह की चिन्ता पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के विशेषज्ञों के सामने भी रखा था। उन्होंने उस जगह के आस-पास रहने वाले लोगों पर आ सकते वाले खतरों से भी अवगत कराया था, लेकिन विशेषज्ञों की राय और उस क्षेत्र के ग्रामीण प्रदर्शनकारियों के विरोध प्रदर्शनों की अनदेखी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने की। पीएम मोदी भी मनमोहन सिंह के नक्श-ए-कदम पर चल रहे हैं।

यह उल्लेखनिय है, कि -फ्रेंच न्यूक्लियर सेफ्टी रेग्यूलेटर- एएनएस ने इस मुद्दे को प्रमुखता से लिया और यूरोपियन प्रेशराईज्ड रिएक्टर, जो कि अरेवा के द्वारा फ्लैमनविले -फ्रांस में- बनाया जा रहा है, में गंभीर कमियों की रिपोर्ट दी। उसने स्पष्ट चेतावनी भी दिये।

‘द कोआलिशन फाॅर न्यूक्लियर डिसआर्ममेण्ट एण्ड पीस‘ ने भी भारत की मोदी सरकार से यह दरख्वास्त की कि वह फ्रांस की न्यूक्लियर कम्पनी अरेवा के साथ अपने परमाणु कार्यक्रम पर आगे ना बढ़े। कहा गया है कि ‘‘ ‘खोज की जा रही कमियों में क्रूशियल कम्पोनेन्ट्स, बाॅटम और लिड ईपीआर प्रेशर वेसल में खराब और निचले दर्जे के मटेरियल का उपयोग किया गया है, और ये सभी स्थान ‘रियेक्टर‘ के काफी महत्वपूर्ण हिस्से हैं, अगर एक बार ‘रियेक्टर‘ में गड़बड़ी आ जाये तो फिर उन हिस्सों की मरम्मत नहीं की जा सकती है।‘‘ ईपीआर के डिजाइन और निर्माण फ्रांस और फिनलैण्ड -दोनों ही जगह- खत्म न होने की समस्या से भी जूझ रहा है, जहां पहला रियेक्टर 2005 से ही बन रहा है। उसके पूरा होने की तारीख 2009 से बढ़ा कर 2018 किया गया और न्यूक्लियर रियेक्टर की कीमत अब तक तीन गुणा किया जा चुका है।

फ्रांस की निजी कम्पनी -अरेवा- का इतिहास उसकी अब तक की उतार-चढ़ाव की असफलता का है, जिसे भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। 2001 में उसकी स्थापना हुई, किन्तु उसके खाते में अब तक एक भी सफलता दर्ज नहीं है। वह भारी घाटे में चल रहा है। 2014 में रेटिंग एजेन्सी ‘स्टेण्र्डड एण्ड पुअर‘ ने उसकी रेटिंग घटा दी, जिसकी वजह से वित्त बाजार से अपने लिये पूंजी की व्यवस्था करना कम्पनी के लिये काफी कठिन हो गया है।

4 मार्च 2015 को ‘अरेवा‘ ने 2014 के फिस्कल इयर में 4.8 बिलियन यूरो के घाटे और अपने टर्नओवर में 8 प्रतिशत के गिरावट की घोषणां की है।

सवाल यह है, कि जिस समय फ्रांस की यह निजी कम्पनी भारी घाटे में चल रही है, पूंजी के बाजार में जिसकी शाख गिर गयी है, जिसके खाते में एक भी सफलता या सफलता की संभावना नहीं है, और जिसकी विश्वसनियता का कोई आधार नहीं है, उस समय नरेन्द्र मोदी ने अपने सलाहकारों, विशेषज्ञों और जांच के नकारात्मक रिपोर्ट के बाद भी यह समझौता क्यों किया?

यह प्रचार क्यों किया जा रहा है, कि फ्रांस की निजी कम्पनी के सहयोग से 6 परमाणु संयत्रों की शुरूआत की जायेगी। 10 हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन होगा।

क्यों ऐसे समझौते किये जा रहे हैं, जिसमें सुरक्षा और दुर्घटना की स्थिति में क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी ऐसी कम्पनियों पर नहीं हो सकती?

क्यों आम जनता का जीवन और उसकी सरकार के पास जमा पूंजी या कर्ज की पूंजी को जोखिमों में डाला जा रहा है?

क्यों ऐसे समझौतों के लिये मोदी जी ने, अपने ही ‘मेक इन इण्डिया‘ कार्यक्रम को -जिसका वो प्रचार फ्रांस, जर्मनी और कनाडा की यात्रा में भी करते हैं- खुद ही धकिया कर किनारे कर देते हैं?

देश की सुरक्षा और राफेल लड़ाकू विमानों की खरीदी के मामले में तो और भी गभीर सवाल है।

फ्रांस की निजी कम्पनी ‘डसाॅल्ट एविएशन‘ से 36 राफेल लड़ाकू बमवर्षक विमानों की खरीदी का सौदा मोदी जी कर चुके हैं।

सरकार और सरकार समर्थित मीडिया प्रचार कर रही है, कि ‘‘प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की फ्रांस यात्रा भारत के रक्षा तंत्र की मजबूती के लिये बेहद अहम है, क्योंकि उन्होंने उड़ान के लिये तैयार 36 राफेल बमवर्षक विमानों का सौदा कर लिया। फ्रांस के रक्षा सूत्रों के अनुसार- ‘‘36 राफेल विमानों का सौदा तीन साल से लम्बित 126 राफेल विमानों के सौदे से अलग है। जिसकी कीमत 12 अरब डाॅलर है।‘‘

तीन साल से अंटके इस अहम सौदे में मोदी जी ने नई जान डाल दी है। अब भारतीय वायुसेना के पुराने पड़ते विमानों के बेड़े को नयी ताकत मिलेगी।

हथियारों की खरीदी और किसी भी सैन्य समझौते के लिये सेना और विशेषज्ञों की राय ली जाती है। जिसकी परवाह नरेन्द्र मोदी नहीं करते, क्योंकि सेना और विशेषज्ञों की राय से वो इत्तफाक नहीं रखते। इसलिये, उन्होंने मान लिया है कि जैसे वो सरकार है।, वैसे ही अब सेना भी हैं। कारोबार से बढ़ कर, और राजनीति से बाहर कुछ भी नहीं।

क्या यह मानना और ऐसी अनदेखी, कहीं से जायज है?

जिन साम्राज्यवादी ताकतों ने भारत की सुरक्षा के लिये चीन और पाकिस्तान को खतरा बताया है, और शायद मोदी जी भी उन्हें खतरा मानते हैं, वो ही ताकतें सारी दुनिया और एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये सबसे बड़ा खतरा हैं। और रूस और चीन उनके लिये सबसे बड़ा खतरा हैं, और पाकिस्तान अमेरिकी कारनामों का भारत के खिलाफ साझेदार है।

अब आप ही तय कर लें, कि खतरा किससे है?

जहां तक चीन की बात रही, तो चीन के पास रूस का एस-400 डिफेन्स सिस्टम होगा, जिसके सुरक्षा दायरे में अमेरिका भी सफल हमला करने की स्थिति में नहीं है, जिसके लिये फ्रांस का राफेल लड़ाकू बमवर्षक चीन की देहरी पर दम तोड़ने वाला लड़ाकू बमवर्षक के अलावा और कुछ नहीं। और सबसे बड़ी बात, किसी भी देश की सुरक्षा हंथियारों से नहीं होती, सुरक्षा सन्धियों से तय की जा सकती है, जिसका भारत के लिये बांगलादेश प्रकरण में अमेरिका के सातवां बेड़ा का, भारत के खिलाफ हिन्द महासागर तक आना और भारत के मित्र देश होने की सोवियत संघ की घोषणां के साथ उसका वापस होना है। जिसकी अनदेखी मोदी जी कर रहे हैं।

अपने देश की सैन्य क्षमता का विस्तार, आज दुनिया के देशों की नीति है। भारत की नीति उससे अलग नहीं, किंतु फ्रांस का राफेल लड़ाकू बमवर्षक थर्ड जनरेशन का पिछड़ा हुआ महंगा बमवर्षक है, और बाजार में उससे सस्ते में फोर्थ जेनरेशन के विमान हैं, और रूस जैसे देशों के पास फिफ्थ जनरेशन के विमान हैं, चीन पीछे नहीं। फिर मोदी जी थर्ड जेनरेशन का राफेल महंगे में क्यों खरीद रहे?

मनमोहन और मोदी में क्या फर्क है?

आप ही तय करें, क्या यह फ्रांस के निजी कम्पनियों के लिये मोदी जी का बेलआउट पैकेज नहीं है? इससे मोदी सरकार को क्या फायदा है?

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