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कुमार कृष्ण शर्मा की तीन कविताएँ

कुमार कृष्ण शर्मा1. इस खतरनाक दौर में

मुन्नी बदनाम हुई
डार्लिंग तेरे लिये
मैं झंडू बाम हुई
डार्लिंग तेरे लिए

आप सोच रहे हैं
यह कैसी कविता…
यह तो गाना है।

इसे छोड़ो
दूसरी कविता सुनाता हूँ

माय नेम इज शीला
शीला की जवानी
आय ऍम सो सेक्सी बट तेरे हाथ न आनी।

मुझे पता है
आप फिर सोच रहे है
यह कैसी कविता?
मुझे क्या हो गया है
मैं अपनी कविता क्यों नहीं सुना रहा।

मैं आप से ही पूछता हूँ
अभियाक्तियो के दमन के
इस खतरनाक दौर में
मैं आप को ओर क्या सुना सकता हूँ

मैं यह पूछ बैठूं
धरती के स्वर्ग पर
तीन महीनो में
सौ से ज्यादा जवान क्यों मार दिए गए?

यह पूछ लूँ
वह जिन लोगोें ने
अंग्रेजो के साथ मिल
हमारी पीठ पर कोड़े बरसाए
आज वह देशप्रेम को परिभाषित क्यों कर रहे हैं ?

मैं दलितों, आदिवासियों, पिछडो की समर्थन में
कुछ शब्द बोल दू
तो इस बात की गारंटी कौन देगा
की मुझको भी जवानी के बीस साल
सलाखों के पीछे न गुज़ारने पडें
मुझ पर भी देशद्रोह का मुकदमा न चले
किसी झूठे केस में न फंसाया जाए

अभिव्यक्तियों के दमन के
इस खतरनाक दौर में
जब विश्व भर की सत्ताएं
हर खुलने वाले मुंह में पिघला हुआ सीसा
उड़ेलने को तैयार बैठी है
ऐसे में
मैं आप को
और क्या सुना सकता हू।

ये वह दौर है
जब हमारा खाना, पीना
चलना, उठना, बैठना, पहनना सब खतरे में है।

पता नहीं कब मेरी जवान बेटी
जींस पहन ले
अपने किसी दोस्त के साथ
बाज़ार में काफी पीने चले जाये
और किसी जमायत या सेना का कार्यकर्ता
उस पर लात गूँसे न जड़ दे।
ये वह दौर है
जब आप अपने बेडरूम में
पूरे परिवार के साथ
बिकिनी पहने अभिनेत्री को
चार मुशटंडो के साथ
अपनी मांसल जवानी बेचते
या बदनाम होते देखे
और कुछ नहीं बोलें

हालाँकि
आप के पास इक विकल्प और भी है
यह फैसला आप को ही करना है
आप को क्या चाहिए
शीला की जवानी
बदनाम मुन्नी
या मेरी कविता……..!!

 

2. 1 फरवरी 2005, 3:16 पीएम

कल रात चांद
नंगे पांव
मेरे बेडरूम तक चला आया

मेरे सिरहाने लगी
आराम कुर्सी पर बैठ
बोला…

मैं लौटाने आया हूं
तुम्हारा समय
जो तुमने
पूरे 3650 दिन
3650 रातें
पहले
रोक कर
मेरे पास
गिरवी रखा था
हां…
इसमें मैंने
वह उदास शामें
नहीं मिलाई
जो तुमने
चिनाब के ठिठुरते बदन के साथ
डल के नीले आंचल की
छांव में बिताई हैं।

चांद ने
अपने बाएं हाथ से
घड़ी उतारी
साथ रखे टेबुल पर रख दी
घड़ी
1 फरवरी 2005, 3:16 पीएम
पर रूकी हुई थी (यह वही समय था जब में अंतिम बार तुम से मिला था)

अब मुझसे
इस समय का भार
और नहीं उठाया जाता

गले का रुदन
सांसों का शोक
समय की धूल
कितना कुछ
सुईयां, रेडियम, कलपुर्जे बन
घड़ी में घुल गए हैं

देखों…
इसका डायल
जैसे
विलाप करता वितस्ता का पानी
तवी के सूखे किनारे हों

यह तो समय का गिरवी रखने का असल है…

एक सांस ले
चांद आराम कुर्सी से उठा
कुछ चहलकदमी कर
व्हिस्की का पैग बना
दोबारा बैठ गया

दांए हाथ से
कोट की बाई तरफ
बाहर की जेब में रखा
केलकुलेटर निकाल
हिसाब करने लगा
बोला….

ब्याज तो अभी बाकी है
खैर
सुबह होने वाली है
मुझे जाना होगा
मैं
दोबारा आउंगा
हिसाब करने, ब्याज मांगने।

चांद व्हिस्की का अंतिम घूंट भर
खिड़की से छलांग लगाता हुआ
बाहर निकल गया।

मैंने देखा
आराम कुर्सी….
अभी भी झूल रही थी
गिलास में बची व्हिस्की के साथ….
बर्फ कतरा कतरा घुल रही थी

घड़ी……

घड़ी
अब भी वहीं पर टिकी थी
1 फरवरी 2005, 3:16 पीएम।

 

3. सामना

मैं एक नहीं सहस्रों डंक सह लेता
अगर तुम परशुराम होते,
मैं अंगुलियां काटना छोड़ भिक्षु बन जाता
अगर तुम तथागत होते,
तुम बनते विष्णु गुप्त
मैं तुम्हारा दास होता,
मैं दुनिया वार देता
अगर तुम अरस्तु होते।

तुमने तो ऐसा कुछ भी नहीं किया।
तुमने सिखाया द्रौपदी चीरहरण में नपुंसक बनना
चौसर के खेल में पांसों की धोखाधड़ी
जरूरत आन पड़े तो अंगूठे जमा करना
ऐसे चक्रव्यूह रचना ताकि निहत्था अभिमन्यु फांसा जा सके
अब क्यों हो परेशान
जब जीवन के कुरुक्षेत्र में
मैं खड़ा हूँ
तुम्हारे सामने
गांडीव लिए…
आखिर द्रौण का सामना
अर्जुन को ही तो करना है.

 -कुमार कृष्ण शर्मा

 

परिचय :

बीएससी आनर्स एग्रीकल्चर करने के बाद पत्रकारिता को अपनाया. पत्रकारिता में कॅरियर के आरंभ 2003 से लेकर 2014 तक अमर उजाला के साथ काम किया. अब जम्मू कश्मीर की अंग्रेजी अखबार द हिमालय मेल के ब्यूरो चीफ.

लोक मंच जम्मू कश्मीर के संयोजक और संस्थापक सदस्य.
जम्मू कश्मीर के पहले हिंदी ब्लॉग खुलते किवाड़ (साहित्य, कला, संस्कृति, मानवाधिकार आदि को मंच देने के लिए) को शुरू करने का श्रेय !

प्रस्तुति:- नित्यानंद गायेन

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3 comments

  1. aap ki kavitaen padte rehtee hoon….is baar doodri kavita bhut shandar rhi….shubhkamnayen

  2. Kamal Jeet Choudhary

    Kumar jee Hindi kavita mein aisee avaaz ab durlbh ho gai hai…Haardik Shubhkaamna Mitra!!

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