Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / राजसत्ता के लिये, राजनीतिक बाजी

राजसत्ता के लिये, राजनीतिक बाजी

s_i01_80621322हम यह मानते हैं कि मौजूदा आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का काम, देश की आम जनता कर सकती है। हमारी अपेक्षायें किसी भी राजनीतिक दल, संगठन या मुददों को खड़ा करके, उन्हें लावारिश छोड़ने वालों से नहीं बन पा रही है, इसलिये नहीं कि हममें राजनीतिक अनास्था है और हम लोगों के समूह से कतरा कर गुजरना चाहते हैं? ना ही इसलिये कि, जनआंदोलनों के प्रति हमारा विश्वास नहीं है? नहीं! हममें राजनीतिक आस्था, सामाजिक सम्बद्धता और जन आंदोलनों के प्रति गहरा विश्वास है, मगर हमारी आस्थाओं और विश्वासों के तराजू पर वो खरे नहीं उतरते। ‘जो है’, उसे ही बनाये रखने की ‘डंडीमारी’ करते रहते हैं। जनसंघर्ष की राहें बंद करना ही उनकी नीति है। उनकी शक्ल और शराफत बार-बार बदलती रहती है। वो जनता के मिजाज को थाम कर रखना चाहते हैं। जब तक लोकपाल से काम चला तब तक लोकपाल से काम चलाते रहे, फिर भ्रष्टाचार को, भण्डाफोड़ राजनीति का जरिया बना लिया गया, अब सुन रहे हैं कि व्यवस्था को बदलने का आंदोलन चलायेंगे। उपवास रखेंगे, अनशन करेंगे।

देश के मौजूदा राजनीतिक ढांचे का स्वरूप इतना बिगड़ गया है कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल एवं गठबंधन और विपक्ष के प्रमुख राजनीतिक दल और गठबंधन ने 2014 के होने वाले आम चुनाव को, राजसत्ता के लिये, राजनीतिक बाजी में बदलने का काम शुरू कर दिया है। कांग्रेस का जयपुर चिंतन शिविर हो या भाजपा के नये राष्ट्रीय अध्यक्ष का सर्वसम्मति से चुनाव हो, दोनों में कोर्इ खास फर्क नहीं है, उनकी नजरें 2014 के आम चुनाव पर हैं। कांग्रेस राहुल गांधी की चाल चल रही है, और चुनाव के बिसात पर भाजपा राजनाथ सिंह के नेतृत्व में अपने को खड़ा कर रही है। सम्भवत: नरेन्द्र मोदी उनकी चाल हैं। राजनीतिक दल ‘विवादों से प्रचार’ कर रहे हैं, अपना।

किसी भी राजनीतिक दल और राजनीतिक आंदोलन का अंतिम लक्ष्य राजसत्ता पर अधिकार जमाना होता है, जनतंत्र में अपनी सरकार बनाना होता है। और यह गलत नहीं है। गलत है, उसे ताश के पत्तों की तरह फेंट कर जुआरियों की तरह दांव लगाना। सटटेबाजों की तरह सटटा लगाना। चुनाव जीतने के लिये, उन ताकतों से समझौते करना, जो जन विरोधी हैं, जिनका राजनीतिक हित उनके आर्थिक साम्राज्य को बनाये रखना है।

कांग्रेस के ‘चिंतन शिविर’ का निचोड़ राहुल गांधी की ताजपोशी है। क्या हैं राहुल गांधी? क्या इन्हें हम देश की आम जनता की सूरत के रूप में देख सकते हैं? सुनते हैं युवा हैं! सोच भी जवान है। जिस घोड़े के जीन पर बैठे हैं, और जिसकी लगाम उनके हाथ में है, उस सिस्टम को आम जनता के लिये नाकाम करार भी दे लेते हैं। यकीन करते हैं कि उनका पंजा अश्वेध यज्ञ का घोड़ा प्रमाणित होगा। वो इस बात पर नजरें कम टिका रहे हैं कि घोड़े के जीन पर सवार अकेला होता है और जीन कसे घोड़े को रथ या बग्घी में जोता नहीं जाता। कि गठबंधन की सरकार भारतीय जनतंत्र का रजानीतिक संकट है। न चाहते हुए भी कांग्रेस को यह स्वीकार करना पड़ा है कि गठबंधन की सरकार ही अगले चुनव का राजनीतिक परिणाम होगी। मतदाताओं को आकर्षित करने में राहुल गांधी अब तक तो कददावर प्रमाणित नहीं हुए हैं, जिनके पीछे कांग्रेस को लामबंद किया जा रहा है। ना ही राजनाथ सिंह ने बड़ी बाजी मारी है।

भारतीय राजनीति में वंशवाद की जर्बदस्त पकड़ है। राहुल गांधी क्या हैं? का सटिक जवाब इसी वंशवाद में है। उन्होंने अपने को अलग से प्रमाणित नहीं किया है, और उनके पीछे की लौ, कमजोर पड़ गयी है। वो नेहरू-इंदिरा की तरह सम्मोहक छवि के धनी नहीं हैं, ना ही राजीव गांधी की तरह उनके लिये सहानुभूति का ज्वार है। वर्तमान में मनमोहन सिंह के मुक्त बाजारवादी उदारीकरण का काला धुंआ है, जिसमें आम आदमी का दम घुट रहा है। जिसे आग में बदलने की ख्वाहिश कांग्रेस की नीति है, और राहुल गांधी भी यही करेंगे। जिसमें आम जनता को जलना है। और सच तो यह है, कि विपक्ष के पास भी इसके अलावा और कोर्इ नीति नहीं है। यह कांग्रेस की भोली सोच है कि साठ को पार कर गये लगभग अस्सी साल के मनमोहन सिंह की सूरत के सामने बयालिस साल के राहुल गांधी की सूरत लगा देने से, कांग्रेस जवान नजर आयेगी। युवा मतदाता खिंचे चले आयेंगे। जबकि हम जानते हैं कि मौजूदा कांग्रेस की सूरत सोनिया गांधी हैं। नेहरू-गांधी परिवार की सूरत कांग्रेस की ऐसी सूरत है, जिसे बदलने का माददा कांग्रेस में नहीं है। राहुल गांधी की यही योग्यता और अयोग्यता भी है, कि उनकी राजनीतिक उपसिथति स्वाभाविक नहीं प्रायोजित ही रहेगी।

उदारीकरण का कोर्इ जोड़ और उदारीकरण का कोर्इ तोड़ भारत के राजनीतिक वातावरण में नहीं है। सत्ता के गलियारे में जितने भी राजनीतिक दल हैं, सभी की सूरत एक है। सत्ता में आने और सत्ता में बने रहने की जुगत ही उनकी नीतियां हैं। इसलिये, यह सोचना कि, सत्ता में भाजपा या एनडीए आ जायेगी तो बड़ा बदलाव आ जायेगा, या कि नीतिन गडकरी की विदार्इ और राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बन जाने से भाजपा पाक-साफ हो गयी, या कि नरेन्द्र मोदी का भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित करने से सभी प्रांत गुजरात बन जायेंगे, जहां उदारीकरण के जरिये विकास होगा और सम्प्रदायिक दंगे होंगे, गलत है। सच यह है, कि आम जनता सामाजिक सुरक्षा और अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है। जो बाजारवादी उदारीकरण और मौजूदा राजनीतिक संरचना में संभव नहीं है। विकल्पों का अभाव है।

भारतीय जनतंत्र का वह कालखण्ड बीत चुका है जब किसी एक राजनीतिक दल के पास स्पष्ट जनादेश होता था। जनअसंतोष और जनउभार ने इसे और भी मुशिकल बना दिया है। जनता इस बात को महसूस करने लगी है, कि जनतंत्र में आम चुनाव दोधारी तलवार है। वह सरकार को अपने प्रति जिम्मेदार चाहती है, मगर सरकारें इसे जानदेश में बदल कर, अपने लिये पांच साल का करार मान लेती हैं। जिसके तहत आम जनता के नाम से वह सबकुछ करने का अधिकार है, जिसके विरूद्ध आम जनता होती है। यही कारण है कि चुनाव से पहले जनतंत्र की सरकारें चुनाव का प्रचार करती रहती हैं। वह हर हाल में यह प्रमाणित करना चाहती हैं कि आज सरकारें जो कर रही हैं, उसे करने का अधिकार उन्हें जनता ने ही दिया है। वो वैधानिक है, पूरी तरह जायज है, और उनके निर्णयों पर आम जनता की मुहर है।

मगर, देश की आम जनता अब सरकार को इतना अनियंत्रित अधिकार नहीं देना चाहती। पांच साल में एक बार हाथ कटाने का राजनीतिक अधिकार गलत है। इसे गलत, इस देश की सरकारों ने ही किया है। उन्होंने आम जनता के विश्वासों की हत्या की है। आप गिन नहीं पायेंगे कि पिछले 9 सालों में केंद्र की मनमोहन सरकार ने भ्रष्टाचार की कितनी सीढि़यां चढ़ी हैं। सिलसिलेवार ढंग से आम आदमी आर्थिक एवं राजनीतिक घोटालों को गिन नहीं पायेगा। यह वही दौर है जिस दौर में उदारीकरण को पूरी ताकत से लागू किया गया और निजीकरण को खुली छूट दी गयी। बढ़ती हुर्इ महंगार्इ और गिरते हुए जीवन स्तर को संभालने की कोर्इ योजना कांग्रेस के पास नहीं है। यदि हम राहुल गांधी से पूछें कि जनाब आप क्या करेंगे? तो वो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की ओर देखने के लिये अभिशप्त हैं। यदि हम भाजपा के नवनियुक्त अध्यक्ष राजनाथ सिंह से यही सवाल करें तो उनके पास कांगे्रस और यूपीए सरकार की आलोचना करने के अलावा कोर्इ खास जवाब नहीं होगा। यदि प्रधानमंत्री पद की दावेदारी के विवादों से उबर कर नरेन्द्र मोदी सामने आ जाते हंै और उनसे यह सवाल हो तो वो गुजरात में पूंजीनिवेश का हवाला देंगे। जहां पूंजी का निजी क्षेत्रों में केंद्रीयकरण तेजी से हो रहा है, और राज्य सरकार के हाथों से वित्त व्यवस्था खिसकती जा रही है। जो देश के औधोगिक घरानों की मनमोहन सिंह के बाद, दूसरी पसंद हैं, और जिन्हें अमेरिकी सरकार अब सम्मान देने लगी है। मतलब, बिल्कुल साफ है, कि वो राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों को ही तरजीह देंगे।

मगर, राजनीतिक पार्टियां, पार्टियों के खेमे, 2013 से ही आम जनता की फिक्र करने लगी हैं। सभी राजनीतिक दलों और उनके खेमों में आम जनता के लिये कारोबारी चमक आती जा रही है। उनकी परेशानी दो है- एक कि, एक ही माल को अलग-अलग लेबल लगा कर बेचना है, और दूसरा कि, बाजार में जिसकी शाख लगातार घट रही है, उसके लिये अच्छी बोली लगवानी है। सरकार बनाने वालाें की परेशानियां बढ़ी हुर्इ हैं, मगर जो सरकार बनवाते हैं, वो आश्वस्त हैं कि दोनों ही दुकानों में उनका ही सामान है। उन्हें इस बात से कोर्इ फर्क नहीं पड़ता कि मतदान 35 प्रतिशत होता है या 45 प्रतिशत। राज्य और कारोबारियों की जमात ने भारतीय जनतंत्र को उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां परिवर्तन के लिये तय किये गये संवैधानिक प्रावधानों के तहत, परिवर्तन की संभावनायें खत्म हो गयी हैं। यहां आम चुनाव हो या सरकारी नीतियां आम जनता के हितों के लिये नहीं, बलिक समाज के प्रशासक वर्ग और राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय शकितयों के हितों में होती है।

अब सवाल यह है कि आम जनता मौजूदा आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक परिदृश्य को बदलने का काम कैसे कर सकती है? आम जनता के लिये कांग्रेस के चिंतन शिविर का दावा है कि अब मध्यम वर्ग भी आम आदमी हो गया है, और आम आदमी पर कांग्रेस का कापीरार्इट है। ‘आम आदमी’ केजरीवाल की राजनीतिक पार्टी भी बन चुका है। भाजपा भी आम आदमी की पार्टी है। क्षेत्रीय दलों ने भी आम आदमी को ही अपना निशाना बनाया है। आम आदमी के लिये वाम मोर्चा भी लड़ रही है और माओवादी भी। और सबसे बड़ी बात, कि जो भी सड़कों पर है, वह आम आदमी है। जिसने राजधानी के रायसीना हिल्स से लेकर इणिडयागेट तक और रामलीला मैदान से जंतरमंतर तक यह जता दिया है कि देश के राजनीतिक दलों से वह तंग आ चुकी है। हमारी उम्मीदें देशभर में फैले उसी आदमी से है, जो अपनी समस्याओं को हल करने के लिये, उसे अपने हाथों में लेने की पहल कर चुका है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top