Home / विश्व परिदृश्य / अफ्रीका / मिस्त्र – पूर्व राष्ट्रपति मुर्सी को आजीवन कारावास

मिस्त्र – पूर्व राष्ट्रपति मुर्सी को आजीवन कारावास

f1f0283e69175adebb98e73df6103412_XL

जुलाई 2013 में, मिस्त्र के ट्रायल के बाद 20 साल की सजा दे दी गयी। मुर्सी पर दिसम्बर 2012 में राष्ट्रपति भवन के बाहर प्रदर्शनकारियों का दमन करने, उन्हें हिरासत में लेने और उन्हें यातना देने का आदेश देने का अभियोग लगाया गया था। मोहम्मद मुर्सी और उनके सहयोगी-सहअभियुक्तों को हत्या और हथियार रखने के आरोपों से मुक्त कर दिया गया।

सत्ता से बेदखल किये गये राष्ट्रपति मुर्सी के साथ 12 अन्य लोगों को भी 20 साल के कारावास की सजा सुनाई गयी। दो लोगों को दस-दस साल की सजा सुनाई गयी।

मोहम्मद मुर्सी की तरह ही शेष अभियुक्त भी मुस्लिम ब्रदरहुड और उसकी राजनीतिक इकाई ‘द फ्रिडम एण्ड जस्टिस पार्टी‘ से जुड़े हुए हैं। जिसे मिस्त्र की वर्तमान सैनिक सरकार ने आतंकी संगठन घोषित कर प्रतिबंधित कर दिया है। मुर्सी समर्थक मुस्लिम ब्रदरहुड के लोगों और मानवाधिकार संगठन से जुड़े लोगों को पहले से ही यह अनुमान था, कि सैनिक सरकार अपने विरोध को कुचलने के लिये या तो फांसी की सजा सुनायेगी, या आजीवन कारावास की सजा दी जायेगी। न्यायिकक प्रक्रिया की शुरूआत से पहले ही सजा का तय होना, अपने आप में मिस्त्र के सैन्य सरकार की न्याय प्रणाली का खुला माखौल है।

11 अप्रैल को अदालत ने मुस्लिम ब्रदरहुड के नेता मोहम्मद बदिया और 13 अन्य वरिष्ठ सदस्यों को मृत्युदण्ड दिया। इन पर मिस्त्र की सरकार के खिलाफ हमले की योजना बनाने का आरोप है। मुस्लिम ब्रदरहुड के वरिष्ठ प्रवक्ता मोहम्मद सउदान ने ट्रायल की निंदा करते हुए पूर्व अपदस्थ राष्ट्रपति मुर्सी और अन्य लोगों को अपराधी करार दे उन्हें सजा देने को ‘राजनीतिक स्वांग‘ करार दिया।

मोहम्मद सउदान ने कहा- ‘‘यह फैसला सौ प्रतिशत राजनीतिक फैसला है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘मोहम्मद मुर्सी, उनके सलाहकार और समर्थक जिन्हें दोषी ठहराया गया है, वो इस प्रकरण के आरोपी नहीं, बल्कि हो रहे प्रदर्शनों के शिकार थे। जिस समय यह वारदात हुई -जिसके लिये उन्हें दोषी करार दिया गया है, उस समय विपक्ष के प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन पर हमले कर रहे थे, और मिस्त्र की पुलिस और सैन्य अधिकारी इस हमले को देख रहे थे।‘‘

घटना दिसम्बर 2012 की है।

अमेरिकी समर्थन से सत्ता संभाले मोहम्मद मुर्सी के खिलाफ मिस्त्र भर में विरोध प्रदर्शनों का तांता लग गया था। प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति मुर्सी को सत्ता से बेदखल करने की लड़ाईयां लड़ रहे थे। जिसके खिलाफ मुर्सी समर्थक मुस्लिम ब्रदरहुड के तेवर भी सख्त थे। उन्होंने वास्तविक लोकतंत्र की मांग और राष्ट्रपति को सत्ता छोड़ने के लिये चलाये जा रहे प्रदर्शनों में लोगों पर हमले किये। मुर्सी विरोधी और मुर्सी समर्थकों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इस बीच मिस्त्र की अमेरिका समर्थित सेना चश्मद्दीद गवाह बनी रही। उसने राजनीतिक अस्थिरता और अराजकता को बढ़ने दिया, ताकि वह सत्ता संभाल सके। वैसे भी अमेरिका मिस्त्र में लोकतंत्र के नाम पर सैनिक तानाशाही का पक्षधर रहा है।

जिन घटना को आधार बना कर अपदस्थ राष्ट्रपति मुर्सी और मुस्लिम ब्रदरहुड के लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी, वह ऐसे ही हिंसक प्रदर्शनों की दास्तां है। मुर्सी विरोधियों ने इत्तहादिया राष्ट्रपति भवन तक एक मार्च किया -जो कि मिस्त्र की राजधानी काहिरा के बाहरी छोर पर स्थित है, मुर्सी समर्थकों ने इस विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमले कर दिये। उस हमले में दोनों ही तरफ से जम कर पत्थरबाजी हुई। पेट्रोल बम और हथियारों का उपयोग किया गया। 11 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए। मरने वालों में 8 मुस्लिम ब्रदरहुड के समर्थक थे। जिसमें पुलिस और सेना ने कोई हंस्तक्षेप नहीं किया था।

यह ट्रायल एक रिपोर्टर होस्नी अबु दईफ और दो मुर्सी विरोधी प्रदर्शनकारियों की मौत पर कार्यवाही है। इस ट्रायल में मारे गये मुस्लिम ब्रदरहुड के 8 लोगों के लिये गहरी चुप्पी है। यही कारण है, कि इस पूरी कार्यवाही पर मुस्लिम ब्रदरहुड के प्रवक्ता ने कहा, कि ‘‘यह चुने हुए लोगों पर एक राजनीतिक कार्यवाही है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है, कि मुस्लिम ब्रदरहुड समर्थकों के मारे जाने के लिये किसी पर कोई आरोप नहीं लगाया गया। यह इस बात को हमारे सामने रखती है, कि तीन लोगों की मौत के लिये इतनी कठोर सजा दी जा रही है, वह भी तब, जब ऐसा एक भी प्रमाण नहीं है, जो राष्ट्रपति (अपदस्थ) और उनके सहयोगियों की सम्बद्धता मारे गये लोगों से सीधे तौर पर जोड़ सके। जबकि पूर्व तानाशाह होस्नी मुबारक को मुक्त कर दिया गया जिन्होंने फरवरी 2011 में हुए क्रांति के दौरान 900 से अधिक लोगों को मारने का आदेश दिया था।‘‘

वर्तमान सैनिक सरकार के प्रमुख अल्-सिसि इस रक्तपात के आंकड़ों को, अब तक पार कर चुके हैं। जिन्होंने कम से कम 1000 प्रदर्शनकारियों को -जो राष्ट्रपति मुर्सी के तख्तापलट का विरोध कर रहे थे- काहिरा के रबा चैराहे पर और कई सौ लोगों को अन्य जगहों पर मौत के घाट उतार चुके हैं। वर्तमान में मिस्त्र की सैनिक सरकार न सिर्फ मुस्लिम ब्रदरहुड के लोगों को, बल्कि वहां के वामपंथी और लोकतंत्र समर्थकों की सुनियोजित हत्यायें करा रही है। उसका मकसद सरकार के विरोध को कुचलना है।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इण्टरनेशनल ने आरोप लगाया है कि ‘‘मोहम्मद मुर्सी के खिलाफ दी गयी सजा मिस्त्र की न्याय प्रणाली पर एक कलंक की तरह है।‘‘

एमनेस्टी इण्टरनेशनल  ने कहा कि ‘‘मोहम्मद मुर्सी पर उनके तख्तापलट के बाद जुलाई 2013 से ही अवैध तरीके से न्यायिक प्रक्रिया की शुरूआत हो गयी थी। उन्हें ऐसी परिस्थितियों में हिरासत में रखा गया था, कि इस पूरे कार्यवाही में उनकी उपस्थिति न के बराबर रही है। उनके इस अधिकार को कि गिरफ्तारी के 24 घण्टे के अन्दर आरोप लगाया जाये और वो इन आरोपों को चुनौती दे सकें, तक से वंचित रखा गया। उनसे उनके अधिवक्ता की मौजूदगी के बिना सवाल किये गये, और अपने पक्ष में अपने अधिवक्ता से कानूनी सलाह लेने के अधिकार से भी वंचित रखा गया, जब तक कि, उनका ट्रायल शुरू नहीं हो गया। ये सारी प्रक्रिया गुप्त रूप से हुई। ये सारी परिस्थितियां मिस्त्र के संविधान और उसके द्वारा दिये गये मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

मुर्सी पर अभी भी लेबनान के हिजबुल्लाह और फिलिस्तीन के इस्लामिस्ट आॅफ हमास के साथ मिल कर काम करने के आरोप हैं, और वो टेरेरिस्ट एक्ट के तहत चलाये जा रहे ट्रायल का सामना कर रहे हैं। उन पर कतर को मिस्त्र की गुप्त जानकारी देने के लिये जासूसी का आरोप भी है।

मिस्त्र के पत्रकार येहिया घानेम के हवाले से अलजजीरा ने जानकारी दी है, कि ‘‘उन्होंने कहा- मिस्त्र की अल्-सिसि सरकार मुर्सी के मुकद्दमें का उपयोग सरकार विरोधियों को यह चेतावनी देने के लिये कर रही है, कि सरकार किसी भी राजनीतिक विरोध को बर्दाश्त नहीं करेगी।‘‘ घानेम ने कहा- ‘‘यह पूरी तरह से राजनीतिक है, सुनियोजित है। यह मिस्त्र की आवाम और पूरी दुनिया को इस बात की खबर देने के लिये है, कि अब मिस्त्र में ‘सिविल रूल‘ का कोई भविष्य नहीं है।‘‘ मिस्त्र पर सैनिक तानाशाही पूरी तरह से स्थापित हो गयी है।

होस्नी मुबारक को सत्ता से बेदखल करने और लोकतंत्र की बहाली के जन संघर्षों को एक बार फिर धोखा दिया जा चुका है। जिसमें अमेरिकी सरकार की सम्बद्धता विवादहीन है। जिसने आम जनता को धोखे में डालने के लिये पहले राष्ट्रपति मुर्सी का समर्थन किया और मुस्लिम ब्रदरहुड को आतंकी संगठनों की सूची से हटा दिया। अब उसने मुर्सी के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों का लाभ उठा कर फिर से सैनिक तानाशाही को अपना समर्थन दे मुस्लिम ब्रदरहुड को प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया। लोकतंत्र की बहाली के आन्दोलन को कुचला जा रहा है।

21 अप्रैल को ओबामा सरकार ने मिस्त्र में हो रहे परिवर्तन और मुर्सी को दी गयी सजा के मुद्दे को टालने के अंदाज में घोषणा की कि ‘‘वह मोहम्मद मुर्सी और 14 अन्य लोगों को दी गयी सजा के प्रति चिंतित हैं।‘‘ स्टेट डिपार्टमेंट की प्रवक्ता मारिया हर्फ ने कहा- ‘‘वाशिंगटन कोर्ट के निर्णय के आधार का पुर्ननिरिक्षण करेगा। वह इस सजा से चिंतित है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘सभी मिस्त्र के कानून के तहत समान न्याय पाने के अधिकारी हैं।‘‘

साल 2014 की शुरूआत से अब तक -जब से सेना ने मिस्त्र की सत्ता संभाली है- ‘मास ट्रायल‘ में 1,212 लोगों को मौत की सजा दी जा चुकी है। दसों हजार लोगों को मिस्त्र के जेलों में बंद रखा गया है। जिन्हें न तो न्यायिक सुविधा हासिल है, ना ही ट्रायल की शुरूआत हुई है। जिनमें ज्यादातर लोकतंत्र समर्थक, वामपंथी सोच रखने वाले राजनीतिक दलों एवं संगठनों के सदस्य और मुस्लिम ब्रदरहुड जैसे संगठनों के लोग हैं। सैनिक सरकार मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम पर अपने सभी विरोधियों को खत्म करने में लगी है।

पिछले महीने के अंत में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मिस्त्र की सैनिक सरकार के राष्ट्रपति अल्-सिसि को निजी तौर पर फोन करके इस बात की जानकारी दी, कि ‘‘व्हाईट हाउस के द्वारा साल 2013 के तख्तापलट के बाद, मिस्त्र की सेना को दी जाने वाली धनराशि पर, जो आंशिक प्रतिबंध लगाया गया था, उसे समाप्त किया जाता है।‘‘

इस प्रतिबंध के हटने से मिस्त्र की सुरक्षा सेना को उन्नत और नये अमेरिकी हथियारों की आपूर्ति की स्वीकृति मिल गयी। अब 600 मिलियन डाॅलर तक के हेलफायर 2 मिसाईल्स, 20 हारपून मिसाईल्स, 12 एफ-16 युद्धक विमान, और 125 एम-1 ए-1 अब्राम्स टैंक और अन्य युद्धक सामानों को मिस्त्र की सेना को देना आसान हो गया।

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अल्-सिसि को आश्वस्त किया, कि ‘‘वाशिंगटन के द्वारा 1.3 बिलियन डाॅलर की वार्षिक सहायता मिस्त्र की सेना को मिलती रहेगी।‘‘ यह खुले रूप में मिस्त्र की सैनिक सरकार को और उसके द्वारा जारी दमन की कार्यवाही को वाशिंगटन की मंजूरी है। हम कह सकते हैं, कि मिस्त्र की क्रांति का हासिल पूर्व तानाशाह होस्नी मुबारक की पुर्नवापसी हो गयी है। जिसके खिलाफ जनतंत्र के बहाली के आन्दोलन की शुरूआत हुई थी।

पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक के 30 सालों के शासन के दौरान अमेरिका ने मिस्त्र को 40 बिलियन डाॅलर का सैन्य सहयोग दिया। पिछले 40 सालों से मिस्त्र अमेरिका का सैन्य साझेदार है, जिसे इस्त्राइल के बाद सबसे बड़ा सैन्य सहयोग मिलता है। जो अफ्रीका और अरब देशों में अमेरिकी हितों के लिये काम करता है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top