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राजनीतिक हिंसा की दो वारदातें

11TH_LATEHAR_1327055fसामाजिक हिंसा के बाद, राजनीतिक हिंसा की दो घिनौनी तस्वीरें हमारे सामने आयी हैं।

8 जनवरी 2013 को जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले में, मेंढर सेक्टर के मनकोट इलाके में, पाकिस्तानी सैनिकों ने भारतीय सेना के दो जवानों का सिर धड़ से अलग कर दिया। घायल सैनिकों के साथ छत-विछत लाशें और एक कटे हुए सिर को वो अपने साथ ले गये।

11 जनवरी 2013 के अखबारों में छपी खबरों से जानकारी मिली की कि तीन दिन पहले झारखण्ड के लातेहार जिले में सीआरपीएफ और नक्सलियों के बीच हुए मुठभेड़ में शहीद हुए, दो जवानों के पेट में, नक्सलवादियों ने उन्हें फाड़ कर, बम लगाये। एक बम में विस्फोट हुआ, और दूसरा बम शव के पेट से बरामद हुआ। यह जानकारी डीजीपी जी0एस0 रथ ने दी। मुठभेड़ स्थल के करीब दोनों शव बरामद किये गये थे। पोस्टमार्टम से पहले शक के आधार पर पे्रशर बम बरामद हुआ। इस मुठभेड़ की घटना में अब तक 14 लोगों के मारे जाने की खबर है, जिनमें 9 सीआरपीएफ के जवान, 1 नक्सल विरोधी झारखण्ड जगुआर्स का सदस्य और 4 आम नागरिक हैं। लातेहार एस पी क्रांति कुमार के अनुसार 9 नक्सली मारे गये हैं और कर्इ घायल हुए हैंं। उन्होंने यह भी कहा कि नक्सली मारे गये और घायल, अपने साथियों को, अपने साथ घसीट कर ले गये।

‘लातेहार मुठभेड़’ की यह वारदात 7 जनवरी की है।

इस घिनौने वारदात की तस्वीर कुछ अजीब है। क्या नक्सलवादियों ने वारदात के दौरान शल्य क्रिया कर जवानों के पेट में बम रखे? या उन्हें अपने साथ घसीट कर ले गये, और बम फिट करने के बाद घटना स्थल पर फेंक गये? मानव शरीर को हथियार बनाने की साजिशों को इतनी बार अंजाम दिया गया है, कि अब किसी बात से हैरत नहीं होती। इस मामले में अमेरिका सबसे आगे है। वह ऐसे सैनिकों को बनाने की कोशिशें कर रहा है, जो आदमी की शक्ल में हत्या करने की मशीनें हों। उनकी अनगिनत फिल्में उनके इस सोच को जुबान देती रही हैं। शल्य क्रिया और शल्य चिकित्सा के जरिये ऐसे अनगिनत प्रयोग चल रहे हैं।

रांची इन्स्टीटयूट आफ मेडिकल सांर्इसेज के डाक्टरों के अनुसार- ”नक्सलियों ने शहीद जवानों की आंतों और तिल्ली निकाल कर उनके शवों में खाली जगह बनार्इ। और डेढ़ किलोग्राम के बम लगाये। उन्होंने एक प्लासिटक कनटेनर में जिलेटिन छड़ों, एक डेटोनेटर और एक बैटरी की मदद से तैयार बम शहीदों के शव के भीतर रखे।” डाक्टरों के अनुसार- ”नक्सलियों ने बड़ी सफार्इ से टांके लगा कर काटी गयी जगहों को सिलने की कोशिश की।” मतलब, यह पूर्व नियोजित था।

भाजपा प्रवक्ता ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। उसके प्रवक्ता सीतारमन ने मानवाधिकार संगठनों से कर्इ सवाल किये हैं कि ”सेना, सुरक्षा बलों और पुलिस के जवानों के खिलाफ आये दिन मानवाधिकार के मामले उठाने वाले संगठन और कार्यकर्ता अब खामोश क्यों हैं? मानवाधिकार सिर्फ नक्सलियों के लिये ही नहीं, बलिक जवानों के लिये भी होते हैं।”

गृहमंत्री ने जवाबी कार्यवाही पर विचार-विमर्श की बात कही है। सुशील कुमार शिंदे ने कहा- ”नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात अर्धसैनिक बल, इसकी काट जल्द ही निकाल लेंगे।” झारखण्ड के खनिज सम्पदा के दोहन में नक्सली संगठन और भाकपा-माओवादी सबसे बड़ी बाधा हैं। झारखण्ड सरकार के द्वारा किये गये खनिज उत्खनन के, कर्इ राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से हुए समझौतों को कार्यरूप में बदला नहीं जा सका है। सरकार का कहना है, कि ”झारखण्ड के विकास में नक्सलवादी संगठन और माओवादी सबसे बड़ी बाधा हैं।” जबकि जल, जंगल और जमीन की लड़ार्इ आदिवासी भी लड़ रहे हैं। इस बात की जानकारी भी हमें है कि आदिवासियों को माओवादी बता कर उनका दमन किया जा रहा है। यह सवाल झारखण्ड विधानसभा में भी खड़ा किया गया था। यह मुददा भी सामने आया था कि जांच के लिये आदिवासियों से उनके पहचानपत्र, मतदाता पहचानपत्र, राशन कार्ड या ऐसे ही दस्तावेजों के साथ, वन विभाग के द्वारा दिये गये जमीन के कागजात एवं अन्य जमीन सम्बंधी दस्तावेजों को सुरक्षा बल एवं पुलिस वाले उनसे जप्त कर उन्हें पहचानहीन ही नहीं बना रहे हैं, उन्हें अपनी जमीन से बेदखल भी कर रहे हैं, ताकि राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ खनिज उत्खनन के समझौतों को अंजाम दिया जा सके। झारखण्ड, उड़ीसा, प0 बंगाल और छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ जारी अभियान वहां के स्थायी निवासी और आदिवासियों के खिलाफ सख्त कार्यवाहियों में बदल जाती है। जिसमें केंद्र सरकार की सहमति है, क्योंकि मुक्त बाजारवादी उदारीकरण को ही सरकार विकास की, औधोगिक एवं वित्तीय विकास की अनिवार्यता के रूप में देख रही है।

राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सम्बद्धता से राजनीतिक हिंसा की तस्वीर बदल जाती है, क्योंकि तीसरी दुनिया की प्राकृतिक सम्पदा पर अधिकार जमाने की साजिशों के तहत ही इराक का पतन हुआ और लीबिया को नाटो सेना ने ध्वस्त कर त्रिपोली और उसके प्राकृतिक गैस एवं खनिज तेल भण्डार पर कब्जा कर लिया। इराक के अबुगरेब में अमेरिकी और बि्रटिश सैन्य अधिकारियों ने इराकियों के साथ जैसे अमानवीय कृत किये हैं, उसकी पुर्नावतित उन्होंने अफगानिस्तान में भी की और लीबिया में भी वही हो रहा है। मानव अंगों को काट कर उनके साथ फोटो सेशन कराने का कारनामा भी अमेरिकी सैनिकों ने किया है। उनके विकृत और पागल होने की रिपोर्ट भी सामने आयी है। किंतु अमेरिकी नीतियों में, कोर्इ बदलाव नहीं आया है। सारी दुनिया पर युद्ध थोपने की, और बाजार पर अपना वर्चस्व बनाने की कोशिशें जारी हैं।

भारत के अंदरूनी मामले में अमेरिकी सहयोग और हस्तक्षेप की शुरूआत हो चुकी है। आंतरिक हिंसा और उग्रवादी आंदोलनों के विरूद्ध की गयी सख्त कार्यवाहियों का परिणाम अब तक हमारे सामने वह नहीं आया है, जिसकी अपेक्षा थी। नक्सलवादियों के द्वारा किये गये ऐसे किसी भी कार्यवाही का समर्थन नहीं किया जा सकता। यह घृणित, बर्बर और अमानवीय है। राजनीतिक हिंसा साम्राज्यवादी देशों का चरित्र है। यदि माओवादी जनयुद्ध के नाम पर ऐसी हरकतें करेंगे, तो यह शोषण के खिलाफ संघर्ष नहीं बलिक शोषकों की तरह ही राजनीतिक हिंसा होगी। यह समझना बहुत ही आसान है कि जन समर्थन के बिना जनसंघर्ष संभव नहीं है। यह जनभावनाआें के विरूद्ध जनविरोधी कार्यवाही है।

हम इस बात पर यकीन रखते हैं कि ”हर वर्दी के नीचे किसान है।” चाहे वह भारतीय सेना के लांस नायक हेमराज और सुधाकर सिंह हों, या सीआपीएफ के बैधनाथ किस्कू या बाबूलाल पटेल हों। आपरेशन ग्रीनहंट के खिलाफ नक्सलवादी-माओवादियों को जो राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय समर्थन मिला, वह इस बात का प्रमाण है कि आम जनता और विश्वजनमत न तो सरकारी हिंसा के पक्ष में है, ना ही माओवादी हिंसा के पक्ष में है। जनसंघर्षों की दिशा हथियारों से नहीं, जनसर्थन से तय की जाती है।

मौजूदा दौर में, पाकिस्तान में जैसी घटनायें घट रही हैं और भारत के विरूद्ध जैसी कार्यवाहियों को बढ़ावा दिया जा रहा है, वह इस बात के संकेत हैं कि वहां आवाम की सरकार खतरे में है और पाक सेना का राजनीतिक हस्तक्षेप खुल कर सामने आने को है। यदि भारत-पाक के बीच युद्ध की घोषणा हो जाती है, या अघोषित युद्ध की शुरूआत हो जाती है, तो पाकिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप का होना बिल्कुल तय है। चीन से पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकी और अमेरिका से दूरी बनाने की जो छटपटाहट पाकिस्तान में है, उससे अमेरिकी हिता प्रभावित हो रहे हैं। पाक-अफगान सीमा पर जारी ड्रोन हमले और र्इरान से युद्ध की सिथति में अपनी जमीन का उपयोग न करने देने की पाक घोषणा का सीधा सा मतलब निकलता है कि पाकिस्तान अब अमेरिकी हितों से संचालित होना नहीं चाहता। अमेरिकी विरोध को कुचलने का एकमात्र तरीका भारत के प्रति विरोध को बढ़ाना है, जिसके पक्ष में पाक सेना ही नहीं, बलिक तालिबानी और इस्लामी आतंकी संगठन भी हैं। जो पाकिस्तान की राजनीतिक असिथरता और उसे अमेरिकी राह पर लाने के लिये जिम्मेदार हैं। पाकिस्तान में आवाम की सरकार जरूरत से ज्यादा कमजोर है। और अब उस कमजोर सरकार की अमेरिका विरोधी उड़ान के पर कतरने के लिये मौजूदा विरोध को बढ़ाया जा रहा है।

भारत की सख्त आपतितयों के प्रति पाक सरकार की प्रतिक्रिया उसके वक्तव्य और सीमा पर उसकी हरकतों से मेल नहीं खाती। विदेशमंत्री हीना रब्बानी खार किसी घरेलू महिला सी कहती है- ”हम पर विश्वास न हो तो भारत संयुक्त राष्ट्रसंघ से जांच करा ले।” पाकिस्तान हर हाल में भारत से अपने विवाद का अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहता है, जबकि भारत द्विपक्षीय वार्ता का पक्षधर रहा है। दोनों देशों के बीच कश्मीर मुददे को लेकर सीमा विवाद के बाद भी, लगभग एक दशक तक, आपसी सम्बंधों को बढ़ाने और व्यापारिक रिश्तों को मजबूत करने की सिथतियां बनी रहीं। सहसा ही तनाव का आना, स्वाभाविक नहीं है। लश्कर-ए-तैयबा और हाफिज सर्इद का मसला भी सामने आ गया है। भारत में इस वारदात को ले कर गहरा तनाव है। दोनों ओर से ‘सबक सिखा देंगे’ जैसी बयानबाजी भी हो रही है। अमेरिका चालाक बिल्ली की तरह सम्बंधों को सामान्य बनाने और विवादों को वार्ताओं की मेज पर हल करने की सलाह भी दे रहा है।

यदि युद्ध की सिथतियां बनती हैं, या दोनों देशों के बीच का तनाव युद्ध में बदल जाता है, तो उसका लाभ पाकिस्तान की सेना, आतंकी संगठन और अमेरिका के अलावा किसी और को नहीं होगा। वैसे भी ये तीनों शकितयां- पाकिस्तान की सेना, आतंकवादी संगठन और अमेरिकी हित आपस में जुड़े हुए हैं। अमेरिका को ‘आतंकवाद के विरूद्ध लड़ार्इ’ के नाम से चलाये जा रहे सैनिक अभियानों के लिये पाकिस्तान में, सेना के इशारे पर चलने वाली आवाम की सरकार चाहिये। जो अमेरिकी हितों के लिये काम कर सके। पाक सेना ने अमेरिकी सैन्य अधिकारियों और सीआर्इए के सहयोग से ही इस्लामी आतंकवादियों को पैदा किया है। इस बात के सैंकडो प्रमाण हैं कि अलकायदा से लेकर कर्इ आतंकी संगठन अमेरिकी हितों के लिये अरब जगत और पशिचमी एशिया में काम कर रहे हैं। लीबिया में उन्होंने गददाफी का तख्तापलटा और अब वो सीरिया में बशर अल असद की सरकार के खिलाफ विद्रोहियों के साथ हैं। जिन्हें अमेरिकी सहयोग एवं समर्थन हासिल है। वो अमेरिकी सैन्य अधिकारियों एवं सीआर्इए के निर्देशों का पालन करते हंंै, अमेरिकी एवं पशिचमी देशों के हथियारों से लड़ते हैं, और विश्व मंच पर अमेरिका ही उनके पक्ष में कूटनीतिक वातावरण बनाता है।

भारत में हुए आतंकी हमलों में पाकिस्तान की सम्बद्धता को भारत सरकार के द्वारा बार-बार उजागर किया गया है, मगर अमेरिका या राष्ट्रसंघ के द्वारा, आज तक उसे आतंकी देश घोषित नहीं किया गया। भारत का आरोप आज भी है कि दोनों देशों के बीच हो रही सीमा पर गोलीबारी की वजह, ढ़ार्इ हजार से ज्यादा प्रशिक्षित आतंकवादियों को भारत में घुसपैठ कराने के लिये है। संयुक्त राष्ट्रसंघ के सैन्य पर्यवेक्षक समूह- यू0एन0एम0ओ0जी0आर्इ0पी0 ने दोनों देशों से तनाव कम करने का आग्रह किया है।

indian_army--621x414भारत-पाक सीमा पर घट रही घटनायें, आतंकवादी सक्रियता और देश के नक्सलवादी, माओवादियों की हिंसा को आपस में जोड़ा जा रहा है। यह प्रमाणित किया जा रहा है कि भारतीय माओवादियों के सम्बंध सीमा पार के आतंकी संगठन, नेपाल के माओवादी और चीन से हैं। एक दैनिक समाचार पत्र के संपादकीय में (12 जनवरी) कहा गया है कि ”पहले भी माओवादियों के पाक परस्त संगठनों, पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठनों और नेपाल के माओवादियों के साथ रिश्ते की बात उजागर हो चुकी है।” क्या वास्तव में ऐसा है? भारत सरकार के किसी भी रिपोर्ट में इसका उल्लेख वास्तव में हुआ है? हम हमेशा से यह मानते हैं कि माओवाद के होने की वजह वर्तमान व्यवस्था के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचे में है। उन्होंने सामाजिक समस्या को अपना हथियार बनाया है, और हथियारों से विभाजन की रेखायें खींच दी है।

भारत के कर्इ पूर्व सैन्य अधिकारियों ने पाकिस्तान के खिलाफ अमेरिका की तरह मुंह तोड़ जवाब देने की मांग भी की है। जिससे पाकिस्तान के विरूद्ध अमेरिकी समर्थन का वातावरण भी बनाया जा रहा है। जबकि एफडीआर्इ और नवउदारवादी मुक्त बाजारवाद के विरूद्ध देश में अमेरिका विरोधी वातावरण बना हुआ है। सीमा पर विवाद और आंतरिक सुरक्षा को लेकर अमेरिकी समर्थक माहौल बनाया जा रहा है। सीमा पर पाकिस्तान को और घरेलू राजनीति में उग्रवादी आंदोलनों को -नक्सलवाद, माओवादी- समान खतरे के रूप में एक कतार में खड़ा किया जा रहा है। और दोनों ही खतरों से निपटने के लिये अमेरिकी कार्यवाहियों को जायज ठहराया जा रहा है।

अमेरिकी नीतियां क्या वास्तव में इतनी जायज और कारगर हैं कि हम अपनी सीमा और घरेलू राजनीतिक हिंसा का समाधान कर सकते हैं? यदि ऐसा है तो 911 की घटना के बाद इराक और अफगानिस्तान ही नहीं, तीसरी दुनिया के देशों में भी, अमेरिकी हमलों का विरोध क्यों हो रहा है? क्यों सीरिया के खिलाफ उसके समर्थक देशों में भी अमेरिका विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं? क्या काराण है कि अमेरिकी नीति का विरोध अमेरिका में हो रहा है, और उसके 7 राज्य अब संयुक्त राज्य अमेरिका के संघ से अलग होना चाहते हैं? क्यों अमेरिका में गृहयुद्ध की सिथतियां बनती जा रही हैं? क्यों भारत और पाकिस्तान की आम जनता अमेरिका विरोधी है? क्याें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ सारी दुनिया में व्यापक जनअसंतोष है?

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