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मुरली मनोहर सिंह की दो कविताएं

murali-manohar-singh1. हम तुम्हें आईना दिखाते हैं

ये अलग बात है कि,
हम कितने कामयाब हुए हैं
या कितने नाकामयाब

हमारा मकसद केवल
तुम्हें सूली पर टांगना नहीं
हमारी खुबसूरत दुनिया में हैं
गदराई गेहूं की बालियाँ
घनी अमराइयों में कूकती कोयल
हँसते फूलों पर इठलाती तितलियाँ
अल्हड़ प्रेमियों का बेफिक्र जोड़ा
पूरी दुनियां में

नेह के कच्चे धागों में बुनी
मीठे रिश्तों की मजबूत बुनियाद
कदम-कदम पर बिखरी
तमाम छोटी–छोटी खुशियों को
बचाए रखना हमारी अंतिम सोच
तुम्हारी सब कुछ हथियाने की बेचैनी के बीच
खड़ी सबसे बड़ी बाधा

हमारा प्रयास –
धरती पर बनी रहे मासूमियत
एक दूसरे पर विश्वास
इसके लिए हमने
इधर
मिलाये हाथ से हाथ
कसी मुट्ठियां
हुई आँखों ही आँखों में बात
फैले होंठ,खिल उठे गाल
दांतों ने बिखेरी चमक
संकेत……
इरादों को मिला बल
मजबूत हुए हम

सुनाई दी
उधर से गोलियों की तड़तड़ाहट
हमारे विस्तार को रोकने का (जार) शाही फरमान
हवाओं पर बेजा-कब्जा जमाती बारूदी गंध
हम यह तो नहीं चाहते थे

हमारे साथ होने से
अब तो हो चुका है जाहिर
तुम्हारे हौसले हुए हैं पस्त
तुम्हारी दीवारें कहीं तो दरकी हैं
चूलें तुम्हारी हिलीं तो हैं
वरना –
नहीं करते
तुम इतना शोर
तेज गश्त
नहीं बजाते चेतावनी का सायरन
बौड़ीयाते हुए नहीं लगाते फेरा
नहीं करते फटाफट कदमताल
नहीं पीटते ढोल
तुम्हारी नसें ढीली तो हुई हैं
ऐंठन छूटी तो हैं
हालाँकि तुम नहीं देख सकते अपना चेहरा
लेकिन हमें दिख रहा है साफ़
तुम्हारी मूँछ लटक गई है
रोम थरथरा रहें हैं
बिफरे पड़े तुम्हारे चेहरे पर पपड़ी पड़ी है
अगर तुममे हिम्मत है तो आओ देखो
हम तुम्हें आईना दिखाते हैं |

2. हमें चलने होंगे नए पैंतरे

दुनियां को
चंद ठेकेदारों की
अमानत बनाने के
उनके मंसूबों की राह में
सबसे बड़ा रोड़ा हमारी एकजुटता
( जो कि अभी तक एकजुट नहीं )
जिसे कि उन्होंने बेहतर
तरीके से भांप लिया है
अब वे निरंतर लगे हैं हमें न होने देने को एकजुट

हमारी संभावित एकजुटता से परेशान
करने को धराशायी
वे जुटा रहे हैं हथियारों के जखीरे
अंतिम सांस ले रही जड़ताओं को दे रहे हैं हवा
हमारी असीम चेतना को हमसे छिपाने के लिए

सजा रहे हैं दुकानें
धर्म की
बाज़ार की,
अपने फायदे के रोजगार की
बाँट रहे हैं अपनी नज़र के चश्में
चकाचौंध भरी मुनाफे की

रखने को नज़र हमारी हर हरकत पर
कर रहे पुख्ता नाकेबंदी
जहाँ-
आसमान परिंदों की उड़ान नहीं
टोही विमानों की चौकियां
सड़कें प्रगति की सूचक नहीं
शासन की सूत्रधार
तेजी से कसते
इनके खूनी शिकंजों में
छूट आदमी को सिर्फ कसमसाने की
ढील मौत के पहले की छटपटाहट तक
आम आदमी पर भारी अहसान
तैयार सारे उपक्रम
तोड़ने को हमारा मनोबल

ऐसे में तय है अब
हमें चलने होंगे नए पैंतरे
करनी होगी तैयारी नये सिरे से
तलाशनी पड़ेंगी नयी पगडंडियाँ
रोपने होंगे पीपल और बरगद ,
छाया में जिसकी जुट सके पूरा गाँव
करने को सचेत
सुना सकें हम
आने वाली पीढ़ियों को
अपने पूर्वजों के श्रम के किस्से
हाड़तोड़ मेहनत के दम पर जिनके
सुघरी हुई आज की यह दुनिया
कर सकें
उनके श्रेय के साथ हुए छलावों का भंडाफोड़
गा सकें –
बारिश ,धूप ,जाड़ा से
टक्कर लेते ,जिन्दा रखते सरस गीत
महसूस कर सकें उनकी छत्र – छाया

दुनियां को तेजी से अपने पंजों में जकड़ने के उनके षड़यंत्र के खिलाफ
हमें खोदने होंगे नये कुएं और तालाब
देनी होगी हंसिया पर नयी धार
पुराने पड़ चुके हथौड़े का हत्था भी बदलना होगा
बनानी पड़ेगी रणनीति
खींच लाने को उन्हें खेतों में
अबकी फैसला
उनकी अदालत में नहीं
होगा न्याय
फसल कटाई के साथ खलिहान में उन्हें हम देंगे पटखनी

-मुरली मनोहर सिंह

असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
गुरू घासीदास विश्वविद्यालय
बिलासपुर, छत्तीसगढ़

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2 comments

  1. आशीष मिश्र

    दोनों कविताएं अच्छी हैं, सार्थक कविताएं हैं। हार्दिक बधाई मुरली भाई!

  2. RAMESH KUMAR GOHE

    मुरली सर दोनों कवितायें बहुत ही अच्छी हैं |मुझे कविता में जो हिस्सा बहुत ही खास लगा
    दुनियां को तेजी से अपने पंजों में जकड़ने के उनके षड़यंत्र के खिलाफ
    हमें खोदने होंगे नये कुएं और तालाब
    देनी होगी हंसिया पर नयी धार
    पुराने पड़ चुके हथौड़े का हत्था भी बदलना होगा
    बनानी पड़ेगी रणनीति
    खींच लाने को उन्हें खेतों में
    अबकी फैसला
    उनकी अदालत में नहीं
    होगा न्याय
    फसल कटाई के साथ खलिहान में उन्हें हम देंगे पटखनी
    आपको बहुत बहुत बधाई ……………..

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