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‘चीन से सतर्क रहने की जरूरत है’ आप कहते हैं!

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‘चीन से सतर्क रहने की जरूरत है’, आप कहते हैं!

चलिये मान लेते हैं, कि आप ठीक कहते हैं।

हमें सिर्फ चीन से क्या, सभी से सतर्क रहना चाहिए। आज एक-दूसरे पर नजर रखना, उसकी आर्थिक स्थिति, कूटनीतिक परिवर्तन और सामरिक हलचल को लगातार समझते रहने की जरूरत है, क्योंकि विश्व का आर्थिक एवं भू-राजनीतिक संतुलन बदल रहा है, इसलिये अपनी सुरक्षा के लिये सतर्कता जरूरी है। लापरवाही बड़ी मुसीबत है।

लेकिन, चीन से सतर्क रहने के लिये अमेरिका और उसके मित्र देशों से, या अमेरिका के लिये, लापरवाही क्यों जरूरी है?

यह तो आपको बताना चाहिए।

और यह भी आपको बताना चाहिए, कि भारत की सुरक्षा के लिये क्या जरूरी है?

क्या चीन से अपने सम्बंधों को सुधारने और विवादों को हल करने की जरूरत है?

क्या अमेरिकी खेमे में खड़े हो कर चीन से सतर्कता का प्रदर्शन जरूरी है?

या अपनी लकीर अलग से खींच कर बदलते ध्रुवीकरण के बीच अपने लिये नये समिकरण की जरूरत है?

या आप समझते हैं, कि नरेन्द्र मोदी बिस्मार्क हैं?

समझिये आप, और हमें भी समझाईये कि सतर्क रहने का मतलब क्या है?

आज की तारीख में दुनिया का कोई भी देश सुरक्षित नहीं है। कोई भी देश आत्मनिर्भर नहीं है। बाजारवादी वैश्वीकरण ने विश्व को एक ही जैसे दो खेमों में बांट दिया है।

अमेरिकी वैश्वीकरण एक ध्रुवी विश्व की अवधारणाओं से संचालित हो रही है। दूसरी ओर बहुध्रुवी विश्व की अवधारणाएं हैं। जिसमें समाजवादी एवं गैरपूंजीवादी सोच रखने वाले, लातिनी अमेरिकी देश हैं, जिन पर साम्राज्यवादी हमले हो रहे हैं। और मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले तथा विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था की अवधारणां से संचालित होने वाले चीन और रूस हैं। जो अमेरिकी साम्राज्यवादी हमलों के खिलाफ तीसरी दुनिया के देशों की सुरक्षा की अनिवार्यता बनते जा रहे हैं। क्योंकि अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये तीसरी दुनिया के देशों पर आधिपत्य अमेरिकी सरकार की ऐसी जरूरतें बन गयी है जिसकी अनदेखी वह करने की स्थिति में नहीं है। युद्ध और आतंक के जरिये राजनीतिक अस्थिरता उसकी नीति और नियति बन गयी है। जिस पर चलने से रोज नयी चुनौतियों के साथ अमेरिकी साम्राज्य की विश्वसनियता घटती और वैश्विक असुरक्षा बढ़ती जा रही है, और न चलने पर, अमेरिकी साम्राज्य के वैश्विक आधिपत्य का अंत तय है।

यह अंत वैसे भी तय है। अमेरिकी साम्राज्य की नीतियां लगातार, बिना रूके, असफलता की ओर बढ़ रही हैं। बदलता हुआ भू-राजनीतिक संतुलन अमेरिका के पक्ष में नहीं है। विश्व जनमत अमेरिका के विरूद्ध है और विश्व समुदाय अमेरिकी एकाधिकार के प्रति आश्वस्त नहीं है।

इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया और एशियायी, अफ्रीकी देशों में की गयी सैन्य कार्यवाही और आर्थिक हमलों ने अमेरिकी नीतियों को खुलेआम कर दिया है। लातिनी अमेरिकी देशों में तख्तापलट तथा तख्तापलट की नाकामियों के साथ वेनेजुएला पर हो रहे आर्थिक एवं कूटनीतिक हमलों ने विश्व समुदाय -खास कर तीसरी दुनिया के देशों- में, आम जनता के साथ अब सरकारें भी आशंकित हो गयी हैं। ‘अमेरिका के बिना दुनिया‘ की सोच तेजी से बढ़ी है।

जिसे रोकने और अमेरिकी वर्चस्व को बनाये रखने के लिये अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, अमेरिकी कांग्रेस के सामने सारी दुनिया में, किसी भी देश के खिलाफ सैन्य कार्यवाही करने के असीमित अधिकारों की पेशकश कर चुके हैं। जिसके तहत आर्थिक एवं सामरिक सन्धि एवं समझौतों का अधिकार भी है। जो वास्तव में मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने वाले रूस और चीन के विरूद्ध है। जिनकी वैकल्पिक व्यवस्था अब कारगर हो चुकी है, और अमेरिका समर्थित यूरोपीय देश भी इसमें शामिल हो रहे हैं। वैश्विक मुद्रा बाजार में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चीनी मुद्रा युआन और ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ के सिलसिले में, हम उल्लेख पहले ही कर चुके हैं। और इस बात का आंकलन भी कर चुके हैं। यह सच हमारे सामने है, कि अमेरिकी मुखियागिरी के विरूद्ध वैश्विक एकजुटता बढ़ी है।

भारत की जो सम्बद्धता ‘गुटनिर्पेक्ष देशों‘ और ‘बहुध्रुवी विश्व‘ तथा ‘विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था‘ के लिये थी, उसे ‘मनमोहन सिंह की सरकार‘ और अब ‘मोदी की काॅरपोरेट सरकार‘ अपने ‘मेक इन इण्डिया‘ के जरिये बदल रही है। और यही उसके विदेश नीति का आधार है।

मोदी जी देश को निजी निवेशकों का चरागाह और बाजारवादी निर्यातक अर्थव्यवस्था की बुनियाद पर खड़ा करना चाहते हैं। वो चाहते हैं, कि भारत एक ब्राण्ड हो। जिसकी शाख निवेशकों की शाख से बने। उनकी नीतियां अमेरिकी ब्राण्ड है। उन्हें यह नजर नहीं आ रहा है, कि अमेरिकी ब्राण्ड की वैश्विक शाख उसकी अर्थव्यवस्था पर लदे ऐसे कर्ज में बदल गयी है, जिसे अमेरिकी सरकार चाह कर भी बचा नहीं पा रही है। डेट्राॅयट का दीवालियापन निजी कम्पनियों का अमेरिका से पलायन है और कैलिफोर्निया का बढ़ता संकट सिर्फ प्राकृतिक नहीं, निजी कम्पनियों का दोहन है। वो भारत की प्राकृतिक संपदा की नीलामी से देश को चमकाना चाहते हैं। वे अपने लिये राजनीतिक एकाधिकार और निजी कम्पनियों के लिये आर्थिक वर्चस्व चाहते हैं।

उनकी चाहत देश की आम जनता के लिये आश्वासनों का झूठ है। एक वित्तीय शिकंजा है। जिसमें उनका ही नहीं आने वाली सरकारों का सत्त भी निचुर जायेगा। सरकार बौनी और वित्तीय पूंजी की तानाशाही होगी।

मोदी जी का झंझट ‘मेक इन इण्डिया‘ है। जिसके लिये वो साझेदार ढ़ूंढ़ते फिर रहे हैं। बाजारवाद मोदी जी की विदेश नीतियों का ऐसा आधार है, जो अलग-अलग ध्रुवों में बंट गया है।

देश की मोदी समर्थक मीडिया अमेरिकी समर्थक और चीन विरोधी है। कह सकते हैं कि वह मोदी जी से ज्यादा साम्राज्यवादी वित्तीय ताकतों की पक्षधर है। जो विश्व के बदलते समिकरण की अनदेखी अमेरिकी पक्ष में कर रही है। वह देश में बन रहे घातक संघर्षों की पृष्टभूमि और वैश्विक स्तर पर -खास कर एशिया में- भारत के मोहरा बनने को आर्थिक महाशक्ति और सुरक्षा के नये उपाय की तरह देख और दिखा रही है। वह उन मुद्दों को अमेरिकी नजरिये से उभारती है, जो भारत की ‘तटस्थता‘ और ‘वैकल्पिक विश्व‘ की उपक्षधरता के विरूद्ध है।

मोदी जी की मुशिकल यह है, कि उन्हें ‘मेक इन इण्डिया‘ के लिये निवेशकों की जरूरत है, और चीन दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक देश है।

मोदी जी को निवेशकों की जरूरत है, और इस हवा को बनाये रखने की भी जरूरत है, कि भारत चीन को मात दे सकता है।

नेपाल में आये भूकम्प में भारत के द्वारा सहयोग एवं सहायता की तत्परता का प्रचार भी मीडिया इसी रूप में कर रही है। वो ऐसे दिखा रहे हैं, जैसे भारत ने चीन को मात दी है और भारत के सहयोग से चीन नाखुश है। जो कि अमेरिकी सरकार का अमानवीय नजरिया है। वह प्राकृतिक आपदा का उपयोग अपने हित के लिये करती रही है।

भारतीय मीडिया खा कर बिना पचाए उगलने की आदी हो गयी है। वह यह समझ नहीं पा रही है, कि आपात सहायता और निर्माण के लिये सहयोग दो अलग चीज है। और चीन की स्थिति भारत से कहीं ज्यादा मजबूत है। मोदी की नीतियों में भारत को अपने आर्थिक विकास के लिये सहयोग की जरूरत है। अब तक ‘मेक इन इण्डिया‘ का हासिल देश में काॅरपोरेट समर्थक नीतिगत परिवर्तन और जन विरोधी वैधानिक संशोधनों का अध्यादेश है, और विदेश में वह निवेश के लिये आश्वासनों का प्रचार है। कुल मिला कर वह जो भी है, वह गरम हवा है। यह हवा बाॅयलर से निकलेगी, आर्थिक मलबों की सड़ांध से निकलेगी, सामाजिक असमानता के असंतोष से निकलेगी और राजनीति के हर गलियारे और मंत्रालयों में औद्योगिक घरानों की मौजूदगी से निकलेगी। यह हवा लोकतंत्र के उन मुर्दा अंगों से निकलेगी, जिसे बेकार बनाया जा रहा है, जिससे जुड़ने की बेकरारी है। और छुटकारा न पाने की नीति।

इसी महीने होने वाले नरेन्द्र मोदी की चीन यात्रा से पहले ही भारत और चीन के बीच की असहमति को विवादों का जोड़ा पहनाया जा रहा है, ताकि स्थितियां ऐसी बने कि दीर्घकालिक समाधान की खुली राहों पर बेरियरों और चेकपोस्ट पर चर्चायें होती रहें। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के अलावा जिन मुद्दों का प्रचार हो रहा है, वो चीन की एशिया में वैश्विक हिस्सेदारी को न समझने और पश्चिमी देशों का प्रचारित सच है। जिसके जाल में भारतीय मीडिया लोगों को फंसा रही है।

चीन से सतर्कता जरूरी है, लेकिन अपने हितों को सुरक्षित करने और समाधान की खोज के लिये। और यह खोज मिल कर ही की जा सकती है। अमेरिकी खेमे में रह कर तो, हर्गिज नहीं। क्योंकि चीन के लिये अमेरिका की नीति आर्थिक एवं सामरिक नाकेबंदी की है। वह भारत का उपयोग इसी रूप में करना चाहता है। मोदी के ‘मेक इन इण्डिया‘ के लिये निवेश के जितने भी आश्वासन मिले हैं, वह अमेरिकी खेमे के देशों के हैं। और यह भी प्रमाणित सत्य है, कि जहां भी अमेरिकी एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां हैं, वहां वित्तीय दासता, राजनीतिक नियंत्रण और आम जनता की बद्हाली है। राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक दीवालियापन है।

जबकि चीन एशिया की शांति और स्थिरता के साथ भारत के सामने वैश्विक साझेदारी की पेशकश कर चुका है। वह आर्थिक एवं रणनीतिक सम्बंधों को विस्तार दे आपसी विवादों को वार्ता की मेज पर सुलझाने के पक्ष में हैं। शि-जिनपिंग के लिये भारत उतना ही बड़ा साझेदार बन सकता है, जितना रूस के लिये चीन, और चीन के लिये रूस वास्तविक साझेदार हैं।

हम चीन से रिश्तों के पक्ष में उस सीमा तक हैं, जिस सीमा तक अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था के निर्माण और आपसी विवादों का शांतिपूर्ण समाधान है। जिससे देश की सुरक्षा और विकास की दिशा तय हो सकती है, लेकिन हम यह भी जानते हैं, कि मोदी सरकार के विकास की दिशा और देश की सुरक्षा की अवधारणां क्या है?

आप सोच सकते हैं, कि ‘हम चीन के पक्षधर और अमेरिका विरोधी हैं।‘ तो हम आपसे इतना ही कहेंगे, कि ‘हां, हम अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी हैं और चीन के नहीं, बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां के पक्षधर हैं। हम उन ताकतों के पक्ष में हैं, जो जनसमर्थक सरकार के पक्ष में हैं, और अमेरिकी साम्राज्य जिनके खिलाफ हमलावर है। हम अपने देश और अपनी उस दुनिया के पक्ष में हैं, जहां अपने देश की सरकार बनाने का अधिकार, वास्तव में आम जनता के हाथों में हो है।

और रही बिस्मार्क की बात, तो बिस्मार्क जर्मन राष्ट्रवाद और जर्मन साम्राज्य के पक्षधर कूटनीतिक थे, राॅकस्टार नहीं! और हमारे मोदी जी को अपने लिये पीएम सुनने और राॅकस्टार की छवि से बंधने का शौक है।

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