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संजय कुमार शांडिल्य की दो कविताएं

संजय कुमार शांडिल्य की कविताएं हमारे चेतन-अवचेतन के अनुकूलन और एकायामिता को ढीला करती हुई उसे एक सार्थक दिशा देती हैं। आप देखेंगे कि वे अपनी कविताओं में रूप, रस, गंध, स्पर्श को बहुत टटके ढंग से रचते हुए उसे अमानवीयता के प्रतिरोध में बदलते हैं। दरअसल हम जिस समय में जी रहे हैं, उसमें अमानवीय जीवन-मूल्य और सौंदर्य-बोध हमारे अंदर ख़ून की तरह भरता जा रहा है। हमें इसका आभास तक नहीं है! हम जनमाध्यमों द्वारा फैलाये जा रहे मनोवैज्ञानिक अशिक्षा और मुहावरों की गिरफ़्त में हैं। हमारे समय के अधिकांश कवियों के पास झटपटिया नुसख़े हैं, कुछ उत्तेजक मुद्राएँ हैं। पर संजय कुमार शांडिल्य अपने गहरे अनुभवों के विश्वासी हैं, उससे सीखने और उसे सार्वजनिक बोध के दायरे में उतारने का साहस और फ़ितरत भी रखते हैं, यह कविता के सुंदर भविष्य के प्रति एक आशा की तरह हैं। आप स्वयं इन कविताओं को पढिए और राय दीजिए-

 

1. हम जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है431112_209618115812321_1649334252_n

कोई दूर जाता हुआ कहे जा रहा था कि हम
जहाँ तक पहुँचते हैं वहाँ तक हमारी दुनिया है

इस तरह वह रोटी तक समेट रहा था हमें
और नमक तक
ताकि वह समुद्र तक हमारी पहुँच काट दे
वह नदियों के रेशे-रेशे को लिबास की तरह बाँट रहा था
उड़ता हुआ कपास हमारी पहुंच से दूर चला गया

हम पाँव भर जमीन सिर भर आसमान और कंठ भर शब्द हो गए
उसने कहा पृथ्वी और मंगल के बीच क्या है
शब्दों के सिवा

धीरे-धीरे हमारी मातृभाषा में खाली जगहें थीं ध्वनियों की
हमारी पुकार सिर्फ सन्नाटे तक पहुँचती थी और अँधेरे में खो जाती थी

हम कहीं नहीं पहुँचने के लिए अपने पाँवों के खिलाफ चल रहे हैं
सारे रास्तों में यात्रा सिर्फ उसकी है
उसे जहाँ भी पहुँचना है सिर्फ वही पहुँच रहा है

ये मेरे हाथ उसके हाथ हैं ,मेरी आँखें उसकी आँखें हैं
यह मेरा रक्त है जो उसके जिस्म में दौड़ रहा है
वही है जो करोड़ों मुँह से बोल रहा है खूब गाढ़े पर्दे के उस पार

मैं उस तक पहुँचने से पहले कोयला हो जाउंगा
वह अपनी कोटि-कोटि जिह्वाओं से मुझपर अपना विष बरसा रहा है
शब्दों के बीच की जगहों में थोड़ा अर्थ रखे जाता हूँ
समझ पाओ तो कहने का संघर्ष सफल न समझो तो
यह कि अर्थवान ध्वनियाँ समय के अजदहे खा गए ।

 

2. मैं इस नीम रात यह जानता हूँ

कोई भी सङक बादलों की नहीं होती है
धरती से उठती हुई
स्वर्ग तक जाती हुई
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मैं पृथ्वी का पहला स्वप्नजीवी नहीं हूँ

स्वप्न एक कवच है
पहाड़ से फेंको
या आग में जलाओ
यह बचा रहता है
नींद कछुए की तरह
एक मुलायम सा जीव है
स्वप्न के बाहर
कभी -कभी ही झाँकता है
जब तक स्वप्न बचा रहता है
नींद बची रहती है
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मैं पृथ्वी का पहला दरवेश नहीं हूँ ।

ऋषियों ने मुझे बाघम्बर फेंककर मारा
देवता मुझसे कुपित रहे
मैंने उस शाप में पत्थर होने से
इन्कार कर दिया
जिसमें मुझे सच बोलने से
चुप रहना था
मैं अब बोलता जाता हूँ और बदलता जाता हूँ
एक नहीं बहने वाली नदी में
मेरे भीतर अब भी इन्कार की रेत उङती है
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ
मेरे सच बोलने से युद्ध का नियम नहीं
बदलने वाला
मैं पृथ्वी का पहला धर्मराज नहीं हूँ ।

यह नीम रात भी तो पहली नीम रात नहीं है
ऋषियों के बाघम्बर
देवताओं के क्रोध
और सहस्र वर्षों का शाप
स्वप्नों से बाहर मेरी नींद

पृथ्वी पर होने में पहला कुछ नहीं होता है
और आखिरी भी नहीं
मैं इस नीम रात यह जानता हूँ ।

-संजय कुमार शांडिल्य

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