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ओबामा की नयी सूझ – विश्व व्यापार के नियमों को तय करने का अधिकार

2015 Obama SOTU photo

अमेरिका अपने वैश्विक वर्चस्व को बनाये रखने की ऐसी लड़ाई लड़ रहा है, जिसके कई मोर्चे पर वह पहले ही हार चुका है। उसकी सबसे बड़ी आर्थिक एवं कूटनीतिक पराजय चीन का उदय और रूस का पुनरूत्थान है। जो आर्थिक विकास और नये कूटनीतिक ध्रुवीकरण की रचना कर चुके हैं। जिसमें कई एशियायी और अफ्रीकी देशों के अलावा पूर्व सोवियत संघ के सदस्य देश और लातिनी अमेरिकी देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है। बहुध्रुवी विश्व और समाजवादी वैश्वीकरण की अवधारणायें विकसित हो चुकी हैं। विश्व का भू-राजनीतिक संतुलन तेजी से बदल रहा है। जिसे अमेरिकी सरकार और अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा चाह कर भी नियंत्रित करने की स्थिति में नहीं है। उनकी बौखलाहट लगातार बढ़ रही है।

डाॅलर पर टिका अमेरिकी साम्राज्य वैसे तो हिचकोले खा रहा है, लेकिन बराक ओबामा अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार नियमों को तय करने का अधिकार अपने हाथों में रखना चाहते हैं। वो किसी भी कीमत पर इसे अमेरिका के कब्जे में रखना चाहते हैं। अमेरिकी कांग्रेस ‘ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप‘ पर हस्ताक्षर करने के लिये व्हाईट हाउस को अधिकार देने के मुद्दे पर विचार कर रही है। कांग्रेस के नाम एक विशेष संदेश में बराक ओबामा ने घोषणा की, कि ‘‘अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों को चीन जैसे देश नहीं, बल्कि अमेरिका को ही तय करना चाहिए।‘‘ माना यही जा रहा है, कि वह भारत और एशिया में अपने सबसे निकटतम सहयोगी देश जापान और दक्षिण कोरिया को भी विश्व व्यापार के नियमों को तय करने का साझेदार बनाने का पक्षधर नहीं है।

21 अप्रैल 2015 को अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा, कि ‘‘दुनिया की अर्थव्यवस्था कैसे काम करेगी, इससे जुड़े सभी नियम और सिद्धांतों को तय करने का अधिकार सिर्फ अमेरिका को है।‘‘

यह अधिकार अमेरिका को किसने दिया? शायद बराक ओबामा को भी नहीं मालूम है। वो अमेरिकी कांग्रेस से दुनिया के किसी भी देश में हस्तक्षेप करने का अधिकार मांग रहे हैं।

उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के नाम अपने संदेश में कहा, कि ‘‘हमें इस बात का विश्वास होना चाहिए कि हम पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिये नियम बना रहे हैं, न कि चीन जैसे देशों की अर्थव्यवस्था को चलने के लिये।‘‘ उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति के लिये ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरों के साथ खुद व्यापार समझौता करने के अधिकार की मांग की है।

जिनका सीधा सा मतलब होगा कि इन व्यापारिक समझौतों को करने के लिये राष्ट्रपति को अमेरिकी कांग्रेस से अनुमति लेने या उसे दोनों सदनों से पारित कराने की अनिवार्यता नहीं होगी।

हो सकता है कि बराक ओबामा की यह पेशकश व्हाईट हाउस और कांग्रेस के बीच का मामला हो, लेकिन बराक ओबामा ‘चीन जैसे देशों‘ की, अर्थव्यवस्था को और वैश्विक अर्थव्यवस्था को चलाने के ख्वाहिशमंद भी हैं। वो किसी दूसरे देश के किसी भी अधिकार के ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति को स्थापित करना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि अमेरिका वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्णायक हो।

पहले अमेरिकी सरकार कहती थी, कि ‘‘दूसरे देश यदि आर्थिक क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने देश में अमेरिकी पद्धति लागू करना चाहिए।‘‘

उसकी मान्यता यह भी थी कि ‘‘अमेरिका को दूसरे देशों में अमेरिकी लोकतंत्र के निर्माण में सहयोग-सहायता करनी चाहिए।‘‘ और अमेरिकी सरकार यह मानने लगी, कि ‘‘लोकतंत्र की स्थापना के लिये उसे दूसरे देशों में हस्तक्षेप करने का अधिकार है।‘‘ और इस ‘इस्तक्षेप के अधिकार‘ ने लोकतंत्र के नाम पर जितने तख्तापलट, और सैनिक तानाशाही की स्थापना तीसरी दुनिया के देशों में की है, जिस आतंक के साम्राज्य को स्थापित किया है, फासिस्ट ताकतों ने भी नहीं की। बराक ओबामा यह मानते हैं, कि ‘‘अमेरिका को दुनिया के किसी भी देश के विरूद्ध सैन्य अभियान चलाने का अधिकार है।‘‘ दुनिया के सभी देशों की सरकारें अमेरिकी साम्राज्य के अधीन हैं।

घोड़े की पीठ पर बैठ कर सिकन्दर को जो सूझी थी, बराक ओबामा को व्हाईट हाउस में रहते हुए सूझी है। हालांकि, यह सूझ-बूझ दशकों से अमेरिका की नीति रही है। वित्तीय पूंजी की तानाशाही उनके सिर पर सवार है। उनके दिमाग पर फाॅसिस्टवाद ने कब्जा कर लिया है। कह सकते हैं, कि इस मर्तबा हिटलर के भाई की मूंछ गायब है। वह शक्ति के आधार पर दुनिया के बंटवारे का समझौता नहीं चाहता, वह दुनिया पर अमेरिकी एकाधिकार चाहता है। उन्हें इस बात की तमीज नहीं, कि विश्व का आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक संतुलन बदल गया है।

पिछले एक दशक से विश्व के सकल उत्पादन में अमेरिका की हिस्सेदारी लगातार घटी है, उसी अनुपात में चीन की हिस्सेदारी में लगातार वृद्धि हुई है। आज विश्व के कुल उत्पादन में दोनों देशों की हिस्सेदारी लगभग बराबर है। कुछ मामलों में चीन अमेरिका से आगे बढ़ गया है। आज भी चीन की अर्थव्यवस्था में संभावनायें बनी हुई हैं, किंतु अमेरिकी अर्थव्यवस्था की संभावनाएं लगातार मर रही हैं। उसकी अर्थव्यवस्था पर 20 ट्रिलियन डाॅलर का कर्ज है।

जिस डाॅलर और सामरिक क्षमता के दम पर अमेरिकी साम्राज्य विश्व पर अपना वर्चस्व कायम की थी, वह वर्चस्व वित्तीय रूप से समाप्त सा हो चुका है। लेकिन बराक ओबामा अमेरिकी वर्चस्व को बनाये रखने के लिये ‘ट्रांस-अटलांटिक‘ और ‘ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप‘ नामक समझौतों को अंजाम तक पहुंचाने में लगे हैं, जिसमें अमेरिका और यूरोपीय संघ के देशों की हिस्सेदारी है। अमेरिका की यह योजना मूल रूप से चीन की बढ़त को रोकने की कोशिश है, लेकिन वह भारत जैसे उभरते देशों की अर्थव्यवस्था के खिलाफ है। हम कह सकते हैं, कि वह एशिया की उभरती किसी भी अर्थव्यवस्था को अमेरिका के लिये चुनौती मानता है। सामूहिक विकास और सामूहिक निर्माण की अवधारणाओं को अमेरिकी सरकार खारिज कर चुकी है। अंजाने ही उसकी एकाधिकारवादी नीतियां अमेरिका को अकेला बना रही हैं। जबकि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की बातें कर रहा है। यही कारण है, कि विश्व समुदाय अमेरिकी आधिपत्य के विरूद्ध होता जा रहा है।

अमेरिकी वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार के जिन सिद्धांतों के तहत ओबामा सरकार आर्थिक एवं व्यापारिक वर्चस्व को कायम रखना चाहती है, वो नीतिगत आधार पर ही एक-दूसरे के विरूद्ध हो गयी हैं। जो कि स्वाभाविक है। और यही व्यवस्थागत विसंगतियां लगातार उभर कर सामने आ रही हैं। जो अमेरिका ही नहीं, उसकी वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिये भी घातक है।

आपसी सहभागिता और संगठनात्मक आधार पर सहयोग की अनिवार्यता पर जोर देते हुए वियतनाम के अर्थव्यवस्था संचालन संस्थान के उपनिदेशक वो ति थान ने कहा, कि ‘‘अमेरिका और पश्चिमी देश विश्व अर्थव्यवस्था के विकास में बड़ी भूमिका निभाते हैं, लेकिन ब्रिक्स देशों के सदस्य देशों की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था की भूमिका को कम कर के आंकना ठीक नहीं है।‘‘

उन्होंने कहा- ‘‘अब वैश्विक आर्थिक प्रणाली और विश्व मुद्राकोष, विश्व बैंक तथा विश्व व्यापार संगठन जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में बदलाव का समय आ गया है और यह बदलाव अमेरिका, यूरोपीय संघ और ब्रिक्स संगठन के सदस्य देशों की सहभागिता के बिना संभव नहीं है। यही नहीं, अब वैश्विक स्तर पर व्यापार और निवेशीकरण का स्तर इतना ज्यादा बढ़ गया है, कि इन देशों के सहयोग के बिना बहुत सी समस्याओं का समाधान नहीं निकाला जा सकता।‘‘ वो ति थान ने स्पष्ट रूप से कहा, कि ‘‘वैश्विक अर्थव्यवस्था के सफल संचालन के लिये दुनिया के सभी देशों का सहयोग जरूरी है।‘‘ उन्होंने सभी देशों के विचारों एवं संभावनाओं पर जोर दिया। जो कि अमेरिकी सोच से मेल नहीं खाता। जबकि ‘ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप‘ के प्रस्तावित समझौते का वियतनाम सदस्य देश है।

यह उल्लेखनिय है, कि जिस ब्रिक्स देशों को अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश बिखरे हुए ईटों का ढ़ूह समझ रहे थे, आज वही ब्रिक्स देशों का संगठन वैश्विक वित्त व्यवस्था में निर्णायक महत्व रखने लगा है, जिसके सदस्य देश- ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका है। इन देशों ने ब्रिक्स बैंक के स्थापना की घोषणां कर दी है, और आपसी व्यापार में आपसी मुद्रा को मान्यता दी है। ब्राजील सम्मेलन में लातिनी अमेरिकी देशों के संगठन से भी बैंकगत सहयोग के समझौते हो चुके हैं। इसी बीच चीन ने अमेरिकी डाॅलर के विरूद्ध अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिये चीनी मुद्रा युआन को पेश कर दिया है, और उसकी विश्वसनियता डाॅलर के अनुपात में लगातार बढ़ रही है। और उसने दुनिया के लगभग 40 प्रतिशत अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को प्रभावित किया है।

चीन के द्वारा इसी बीच ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ -एआईआईबी- के स्थापना की घोषणां की गयी। जिसमें यूरोपीय संघ के कई सदस्य देश भी -अमेरिकी विरोध की अनदेखी कर- शामिल हो चुके हैं। जो विश्व के वित्तीय संतुलन के बदलने का प्रमाण है। और चीन तथा अमेरिका के बीच तनाव के बढ़ने का। इसलिये ‘चीन जैसे देशों‘ का उल्लेख ओबामा की ऐसी विवशता और बेचैनी है, जिसे पचा पाना उनके बस में नहीं है। बराक ओबामा जताना चाहते हैं, कि संयुक्त राज्य अमेरिका ‘चीन जैसे देशों‘ की नहीं, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था को नियंत्रित रखने का अधिकार रखता है।

अमेरिकी कांग्रेस को भेजे गये बराक ओबामा के इस संदेश के जारी होने से कुछ घंटा पहले ही रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने टीवी पर अपने कांफ्रेंस में कहा था, कि ‘‘अमेरिका को सहयोगी देशों की नहीं, ऐसे देशों की जरूरत है, जो सेवकों की तरह उसके आदेशों का पालन करें।‘‘ उन्होंने स्पष्ट किया, कि वाशिंगटन को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उसके तमाम कोशिशों के बाद भी विश्व की व्यापार व्यवस्था बदल रही है और उसका केन्द्र एशिया में स्थानांतरित हो रहा है। जिस पर अमेरिका का नियंत्रण नहीं है। जिस पर अमेरिका अपने नियमों को थोपने की कोशिश कर रहा है।

जिसे चीन, रूस और विश्व समुदाय पूरी सतर्कता के साथ अमेरिका की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में देख रहा है। अमेरिका और कनाडा संस्थान के उपनिदेशक पाॅवेल जोलातार्पोव ने इस बारे में कहा, कि ‘‘संपूर्ण एशिया का विकास इस तरह से हो रहा है, कि अमेरिका चाह कर भी उस पर अपने नियमों को थोप नहीं पा रहा है, और यही उसकी असहमति और नाराजगी है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘अमेरिका चीन के विकास को रोकने में असक्षम है। विश्व व्यापार के नियमों को तय करने के अधिकार में चीन के अधिकार को न मानना उसकी इसी असक्षमता की नाराजगी है। यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, कि बहुध्रुवी विश्व व्यवस्था की स्थापना के साथ ही अमेरिका का आर्थिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व घटता चला जायेगा।‘‘

इसके बाद भी अमेरिका विश्व व्यापार के नियमों को तय करने का अधिकार अपने हाथ में रखना चाहता है, जो संभव नहीं है। इसे व्हाईट हाउस और अमेरिकी कांग्रेस चाह कर भी अपने नियंत्रण में नहीं रख सकते। यह वास्तव में उन वैश्विक वित्तीय ताकतों की पेशकश है, जिनका हित यूरो-अमेरिकी वर्चस्व से जुड़ा हुआ है, जो अमेरिका के माध्यम से विश्व की कमान अपने हाथों में रखना चाहते हैं।

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