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रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की रिपोर्ट

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रूस की सुरक्षा परिषद ने फरवरी में घोषित किये गये संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों के विश्लेषण की बातें की थी।

26 मार्च 2015 को निष्कर्ष रूप में कहा गया, कि ‘यह देश अपने वैश्विक प्रभुत्व को बनाये रखने की नीति पर कायम रहेगा।‘

जिसका सीधा मतलब है, कि अमेरिका बदलते हुए भू-राजनीतिक संतुलन, उभरती हुई अर्थव्यवस्था और बहुध्रुवी विश्व की अवधारणाओं के खिलाफ है, जिसका नेतृत्व रूस, चीन सहित लातिनी अमेरिकी महाद्वीप के समाजवादी देश कर रहे हैं।

लातिनी अमेरिकी देशों ने बहुध्रुवी विश्व की अवधारणाओं को विकसित कर अमेरिका के वैश्वीकरण के विरूद्ध समाजवादी ध्रुवीकरण की सोच को विस्तार दिया है।

चीन ने मुक्त व्यापार और बाजारवाद के जरिये आर्थिक विकास के नये क्षेत्रों की रचना की है। अमेरिका जिसे अपने लिये सबसे बड़ी चुनौती मानता है।

रूस ने कूटनीतिक एवं विश्व के सामरिक संतुलन को बदल दिया है। वह चीन और लातिनी अमेरिका के गैर पूंजीवादी और समाजवादी देशों सहित अफ्रीका और एशिया की शांति एवं सुरक्षा के लिये, अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और राजनीतिक अस्थिरता के विरूद्ध खड़ा हुआ है।

रूस और चीन की संयुक्त आर्थिक एवं सामरिक क्षमता अमेरिकी वैश्वीकरण और सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ न पार की जा सकने वाली चुनौती है। जिसके विरूद्ध अमेरिका आर्थिक हमले और मीडिया वार की शुरूआत कर चुका है। माना यही जा रहा है, कि पतनशील अमेरिकी साम्राज्य निर्णायक संघर्ष की ओर बढ़ चुकी है। वहीं रूस और चीन के आपसी सम्बंधों का स्वरूप वैश्विक रूप से शांति, सुरक्षा और अस्थिरता को सुनिश्चित करता सा लग रहा है। यह कितना स्थायी होगा? इस सवाल का जवाब हम भले न दे सकें, किंतु रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है, कि ज्यादातर मामलों में हमारे अंतर्राजकीय हित एक समान हैं, और यही आज हमारे आपसी रिश्तों का प्रमुख आधार है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और संयुक्त राष्ट्र संघ में अपनी गतिविधियों में सामंजस्य स्थापित करते हैं। और सबसे पहले यह सामंजस्य आज अधिक न्यायसंगत और अधिक लोकतान्त्रिक विश्व-व्यवस्था के निर्माण का एक महत्वपूर्ण तत्व है।

व्लादीमिर पुतिन ने कहा- ‘‘मास्को और पेइचिंग शंघाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर एक दूसरे के सहयोगी हैं और मेरा मानना है, कि इन दोनों संगठनों का भविष्य बेहद अच्छा और गम्भीर है, क्योंकि ये संगठन ऐसे देशों को आपस में जोड़ते हैं, जो समानता और एक-दूसरे के हितों के आदर के आधार पर काम करते हैं।

रूस के सुरक्षा परिषद ने भले ही अमेरिकी नीतियों की समीक्षा अपने राष्ट्रीय हितों के नजरिये से किया है, लेकिन उसका महत्व वैश्विक है। रूसी सुरक्षा परिषद ने कहा है, कि ‘‘अमेरिका विश्व में अपने प्रभुत्व को बनाये रखने की नीति पर कायम रहेगा। वह अपने सामरिक क्षमता और अपनी सेना को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार मानता है। वह अपनी सैन्य श्रेष्ठता को ही विश्व-प्रभुत्व को बनाये रखने का प्रमुख कारक मानता है।‘‘ 1000 से अधिक सैन्य अड्डा होने के बाद भी वह विदेशों में अपनी सैन्य उपस्थिति को बनाये रखने और दुनिया के किसी भी देश में सैन्य हस्तक्षेप की नीति पर चलता रहेगा।

विश्लेषण के अनुसार – ‘‘अमेरिका ने एशिया में अपने आर्थिक हितों को सुरक्षित करने एवं राजनीतिक वर्चस्व को बनाये रखने के लिये सामरिक रणनीति में परिवर्तन की घोषणां की है। एशिया-प्रशांत महासागर क्षेत्र का महत्व उसके लिये बढ़ गया है। जापान, दक्षिण कोरिया, आॅस्ट्रेलिया और फिलिपिंस के साथ आर्थिक एवं सामरिक गठबंधन को सुदृढ़ करने तथा इण्डोनेशिया, वियतनाम और मलेशिया से सहयोग बढ़ाने की योजना बनाई गयी है। इस रणनीति में भारत को सहयोगी देश माना गया है।‘‘

अमेरिकी नीतियां भारत की वरियता से चीन को बड़ी चुनौती देने की है। वह भारत का उपयोग उस चेक पोस्ट के रूप में करना चाहता है, जहां से चीन पर नजर भी रखी जा सके, विवाद भी खड़ा किया जा सके, प्रतिस्पद्र्धा और जरूरत पड़ने पर सैनिक छावनी में बदला जा सके। भारत का महत्व अमेरिका के लिये सहसा ही बढ़ गया है।

यदि भारत अमेरिकी झांसे में आ जाता है तो सिर्फ एशिया ही नहीं वैश्विक स्थिति में भी नयी जटिलतायें पैदा हो जायेंगी। जो भारत के राष्ट्रीय हितों के लिये घातक होगा। ओबामा सरकार खुले रूप में भारत से आर्थिक एवं सामरिक सम्बंधों को बढ़ाने के पक्ष में है। पेण्टागन अमेरिकी हितों की एशिया में सुरक्षा के लिये भारत के बारे में गये साल ही कांग्रेस में रिपोर्ट पेश कर चुका है। इस बीच केन्द्र की मोदी सरकार ने दोनों देशों की निकटता को बढ़ाने और अमेरिका समर्थक यूरोपीय संघ के सदस्य देशों, जापान और आॅस्ट्रेलिया तथा कनाडा से अपने सम्बंधों को बढ़ाने की पहल की है। इसके बाद भी सच यह है, कि चीन से भी वह अपने सम्बंधों को एक मुकाम देना चाहती है। भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कूटनीतिज्ञ बनने की पोज में हैं।

अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सम्बंधी रणनीति के आधार पर कहा जा सकता है, कि रूस की सुरक्षा परिषद की निश्चित धारणां है, कि ‘अमेरिका नई वैश्विक अर्थव्यवस्था कायम करने के लिये प्रयत्नशील है।‘ बराक ओबामा अमेरिकी कांग्रेस से ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप‘ पर हस्ताक्षर का पूर्ण अधिकार चाहते हैं। लेकिन अमेरिका की नयी आर्थिक नीति अब चीन, रूस, लातिनी अमेरिकी देश और अमेरिका के विरूद्ध वैकल्पिक व्यवस्था के पक्षधर एशियायी ओर अफ्रीकी देशों के विरूद्ध है।उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से दुनिया के किसी भी देश में सैन्य हस्तक्षेप करने के अधिकार की मांग की है।

रूस की सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाई पात्रुशेव ने कहा है, कि ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका अपने वर्चस्व की लड़ाई जारी रखेगा।‘‘ जिसका मतलब विश्व की शांति एवं स्थिरता के लिये गंभीर खतरा है। वैश्विक स्थितियां कुछ ऐसी बन चुकी हैं, कि अमेरिका अपने वर्चस्व को घटने और दुनिया की वैकल्पिक व्यवस्था को बनने से रोक नहीं सकता। लेकिन वह ऐसा करने से बाज भी नहीं आयेगा। उसके लिये राजनीतिक अस्थिरता और एक बड़ा युद्ध अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये अनिवार्य हो गया है। दुनियाभर में बढ़ता तनाव, इस बात का प्रमाण है, कि अघोषित लड़ाई की शुरूआत हो चुकी है।

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