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गोविन्द माथुर की तीन कविताएं

1. डरgovind mathur ji

जबकि कोई दुश्मन नहीं है मेरा
फिर भी डरा हुआ रहता हूँ
डर है कि निकलता ही नहीं

दिखने में तो कोई दुश्मन नहीं लगता
फिर भी पता नहीं
मन ही मन
किसी ने पाल रखी हो दुश्मनी

ये सही है कि
मैंने किसी का हक नहीं मारा
किसी कि ज़मीन-जायदाद नहीं दबाई
किसी को अपशब्द नहीं कहे
फिर भी मुझे शक है
किसी भी दिन सामने आ सकता है दुश्मन

सच और खरी-खरी कहना
हँसी-हँसी में कटाक्ष करना
झूठी प्रशंसा नहीं करना
इतना बहुत है
किसी को दुश्मन बनाने के लिए

सुझाव भी सहजता से नहीं लेते
आलोचना तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते
किसी भी दिन मार सकते है चाक़ू

सोचता हूँ चुप रहूँ
पर कुछ भी नहीं बोलने को भी
अपमान समझते है लोग .

 

2. कविता से कोई नहीं डरता

किसी काम के नहीं होते कवि
बिजली का उड़ जाये फ्यूज तो
फ्यूज बाँधना नहीं आता
नल टपकता हो तो
टपकता रहे रात भर

चाहे कितने ही कला-प्रेमी हों
एक तस्वीर तरीके से नहीं
लगा सकते कमरे में

कुछ नहीं समझते कवि
पेड़ पौधों और फूलों के
विषय में खूब बात करते है
छाँट नहीं सकते
अच्छी तुरई और टिंडे
जब देखो उठा लाते है
गले हुए केले और आम

वे नमक पर लिखते है कविता
दाल में कम हो नमक तो
उन्हें महसूस नहीं होता

रोटी पर लिखते है कविता
रोटी कमाना नहीं आता
वे प्रेम पर लिखते है कविता
प्रेम जताना नहीं आता

कवियों का हो जाए ट्रांसफर
तो घूमते रहते है सचिवालय में
जब तब सुरक्षा-कर्मचारी
बाहर कर देता है
प्रशासनिक अधिकारी
मिलने का समय नहीं देते

कौन पूछता है कवियों को
अच्छे पद पर हो तो बात और है
कविता से कोई नहीं डरता

कविता लिखते है
अपने आसपास के परिवेश पर
प्रकाशित होते है सुदूर पत्रिकाओं में
अपने शहर में भी
उन्हें कोई नहीं जानता
अपने घर में भी उन्हें
कोई नहीं मानता

कवियों को तो होना चाहिए
संत-फ़कीर
कवियों को होना चाहिए
निराला-कबीर ….

 

3. शेष होते हुए

इस तरीके से नही
पहले हमें
सहज होना होगा
किसी तनाव में
टूटने से बेहतर है
धीरे-धीरे
अज्ञात दिशाओं में
गुम हो जाएँ

हमारे सम्बन्ध
कच्ची बर्फ से नही
कि हथेलियों में
उठाते ही पिघल जाएँ
आख़िर हमने

एक-दूसरे की
गर्माहट महसूस की है

इतने दिनों तक
तुमने और मैंने
चौराहे पर खड़े हो कर
अपने अस्तित्व को
बनाए रखा है

ये ठीक है कि
हमें गुम भी
इस ही
चौराहे से होना है

पर इस तरीके से नही
पहले हमें
मासूम होना होगा
उतना ही मासूम
जितना हम
एक दूसरे से
मिलने के पूर्व थे

पहले मैं या तुम
कोई भी
एक आरोप लगाएंगे
न समझ पाने का
तुम्हें या मुझे
और फिर

महसूस करेगें
उपेक्षा
अपनी-अपनी

कितना आसान होगा
हमारा अलग हो जाना
जब हम
किसी उदास शाम को
चौराहे पर मौन खड़े होंगे

और फिर जब
तुम्हारे और मेरे बीच
संवाद टूट जएगा
कभी तुम चौराहे पर
अकेले खड़े होगें
और कभी मैं
फिर धीरे-धीरे
हमें एक दूसरे की
प्रतीक्षा नही होगी

कितना सहज होगा
हमारा अजनबी हो जाना
जब हम सड़कों और गलियों में

एक दूसरे को देख कर
मुस्करा भर देंगे
या हमारा हाथ
एक औपचारिकता में
उठ जाया करेगा

हाँ हमें
इतनी जल्दी भी क्या है
ये सब
सहज ही हो जाएगा
फिर हमें
बीती बातों के नाम पर
यदि याद रहेगा तो
सिर्फ़
एक-दूसरे का नाम

 

परिचय:

जन्म: 04 मई 1945
जन्म स्थान: जयपुर, राजस्थान, भारत

कुछ प्रमुख कृतियाँ: शेष होते हुए (1985), दीवारों के पर कितनी धूप (1991), उदाहरण के लिए आदमी (1998), बची हुई हँसी (2006)
विविध राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर द्वारा शेष होते हुए के लिए वर्ष 1986 में सुमनेश जोशी पुरस्कार। परिमल सम्मान योजना इलाहाबाद के अन्तर्गत वर्ष 1993 में दीवारों के पर कितनी धूप के लिए सोमदत्त सम्मान से सम्मानित.

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. डॉ.रमेश कुमार गोहे

    कवितायेँ बहुत पसंद आई |

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