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चीन की वित्तीय एवं कूटनीतिक सफलता – एआईआईबी

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चीन की योजनायें सतह पर आने के बाद ही सुर्खियां बनती हैं। इस बीच उसने वैश्विक स्तर पर कई महत्वपूर्ण योजनाओं की पहल की है, जिसकी सफलता वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था का निर्माण होगा। यह एकध्रुवी विश्व के विरूद्ध बहुध्रुवी विश्व की ठोस शुरूआत है। जिसका सीधा सा अर्थ अमेरिकी वर्चस्व और अमेरिका के निर्णायक स्थिति का अन्त है।

मार्च 2015 में चीन के प्रमुख समाचार पत्र ‘जेनमिन जिबाओ’ ने लिखा ‘‘चीनी मुद्रा युआन अमेरिकी डाॅलर को चुनौती दे रही है।‘‘

यह टिप्पणी तब सामने आयी, जब चीन के ‘एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेण्ट बैंक‘ (अंतर्राष्ट्रीय एशियाई ढ़ांचागत निवेश बैंक) -एआईआईबी- एक निश्चित मुकाम पर पहुंच गया। और अमेरिका के विरोध के बाद भी 57 देश संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल हो गये। जिनमें यूरोपीय संघ के अमेरिकी समर्थक देश ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस भी शामिल हैं। जिसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाईयों की स्वीकृति औपचारिक रूप से मिल गयी है। जबकि यह उनके वर्चस्व के लिये एक चुनौती है। जिन वैश्विक वित्तीय इकाईयों पर अमेरिका और यूरोपीय देशों का वर्चस्व है।

अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में, डाॅलर के विरूद्ध युआन की सफलता को सुनिश्चित करने के लिये चीन ने ढ़ांचागत निवेश, विकास परियोजनायें और समूहगत आधार पर बैंकों की स्थापना की। जिसकी शुरूआत द्विपक्षीय सम्बंधों और आपसी व्यापार में अपनी मुद्रा के प्रचलन को बढ़ा कर किया गया।

जेनमिन जिबाओ के विश्लेषक ने लिखा- ‘‘अन्तर्राष्ट्रीय एशियायी ढ़ांचागत निवेश बैंक, ब्रिक्स बैंक तथा सिल्क रोड फण्ड जैसी संस्थाओं ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है, कि युआन अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा बन गया है।‘‘ विश्लेषक ने वाशिंगटन के विरोध और उसके माथे पर पड़े सिकन का भी उल्लेख किया है। उसने अंतर्राष्ट्रीय एशियायी ढ़ांचागत निवेश बैंक का विशेष उल्लेख किया है। जिसकी वजह से अमेरिकी सरकार को यह लगने लगा है, कि ‘पानी अब सिर के ऊपर से बह रहा है।‘ चीन के प्रति उसकी नाराजगी बढ़ गयी है। उसने खुले तौर पर इस बैंक का विरोध किया। अपने मित्र देशों को ‘एआईआईबी‘ में शामिल न होने की चेतावनी दी।

लेकिन, यूरोपीय संघ की पांच सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में से चार -जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैण्ड और इटली- ने जब एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेण्ट बैंक में शामिल होने की घोषणां की, अमेरिका के पांव के नीचे से जमीन खिसक गयी।

एक लम्बे अर्से के बाद ऐसा हुआ कि यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने अमेरिकी हितों से ज्यादा अपने राष्ट्रीय हितों को तरजीह दी। जिसकी संभावना अमेरिकी सरकार और बराक ओबामा को भी नहीं थी।

अखबार ‘फाईनेंशियल टाइम्स‘ ने लिखा- ‘‘विश्व पर आर्थिक वर्चस्व को बढ़ाने के लिये वाशिंगटन और बिजिंग के बीच प्रतिद्वन्दिता बढ़ती जा रही है।‘‘ ‘फाईनेंशियल टाइम्स‘ का कहना है, कि ‘‘द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद विश्व पर अमेरिका का आर्थिक प्रभाव स्थापित हो गया, क्योंकि विश्व बैंक और अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्यालय वाशिंगटन में स्थापित किए गये। अब नये बैंक की स्थापना कर के चीन ‘ब्रेटनवुड प्रणाली‘ को चुनौती दे रहा है। इस नये बैंक की स्थापना की वजह से एशिया-प्रशांत क्षेत्र और दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में भी चीन का राजनीतिक प्रभाव बढ़ता चला जायेगा।‘‘

मुक्त व्यापार और अमेरिकी वैश्वीकरण की जिस सोच के तहत 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने की नीतियां बनाई गयी थीं, उसके सामने चीन की रूकावटें आ गयी हैं। जिसे पार कर पाना अमेरिका के लिये आसान नहीं है। चीन ने अपनी वरियता बढ़ा ली है, लेकिन उसकी वरियता में यूरेशिया और तीसरी दुनिया के देशों की वरियता भी है, जिनमें अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप और आर्थिक हमलों की वजह से आर्थिक अनिश्चयता, राजनीतिक अस्थिरता और राष्ट्रीय असुरक्षा की भावनायें घर कर गयी हैं।

चीन ने द्विपक्षीय सम्बंधों के अलावा ब्रिक्स देशों का संगठन, शंघाई सहयोग संगठन और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों के संगठनों को अपनी आर्थिक नीतियों से जोड़ने की समझदारी की। रूस से उसके सम्बंधों की वजह से न सिर्फ उसकी विश्वसनियता को नया आधार मिला, बल्कि अमेरिकी हमलों से सैन्य सुरक्षा भी मिली। रूस और चीन की संयुक्त सामरिक क्षमता अमेरिका की सामरिक क्षमता के लिये बड़ी चुनौती है। जिसे विश्व समुदाय के तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों का समर्थन भी हासिल है। वैसे भी यूरो-अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरूद्ध विश्व जनमत है। अमेेरिका समर्थित देशों की आम जनता भी अमेरिका के खिलाफ है। यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की आम जनता भी अपने वित्तीय संकट की वजह से यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक ओर वैश्विक वित्तीय इकाईयों -विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष- के खिलाफ है। वैसे भी यूरोपीय देश कर्ज के संकट से जूझ रहे हैं। जन प्रतिरोध अपने चरम पर है। वे अपनी राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान चाहते हैं।

aiib_3एशियन इन्फ्रास्ट्राक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक -एआईआईबी- उनके लिये एक अवसर की तरह है।

लंदन के वित्तीय विश्लेषक गिडेयन रहमान ने लिखा- ‘‘चीन का पैसा यूरोपीय लोगों को, चुम्बक की तरह अपनी ओर खींच रहा है।‘‘ वो अपने लिये एशिया के ढ़ांचागत निर्माण में निवेश की नयी संभावनायें देख रहे हैं। उन्होंने एक सीमा तक इस बात को स्वीकार कर लिया है, कि विश्व के वित्तीय संतुलन में एशिया की भूमिका चीन की वजह से बढ़ गयी है।

अमेरिकी सरकार स्वयं इस बात का प्रचार करती रही है, कि ‘‘एशिया का महत्व बढ़ गया है और वह विश्व की वित्तीय व्यवस्था का केन्द्र बन रहा है।‘‘ लेकिन अपने ही प्रचारित सच को स्वीकार करने का मतलब अमेरिकी वर्चस्व का अंत है, जिसे वह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है। उसकी कोशिश उसे अपने नियंत्रण में रखने की है। अमेरिकी सरकार एशिया की अर्थव्यवस्था को अमेरिकी हितों से जोड़ कर रखना चाहती है। जिसे अमेरिकी अर्थव्यवस्था के समानांतर खड़ी चीन की अर्थव्यवस्था ही नहीं, अब यूरोपीयन देश भी स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं।

व्हाईट हउस के उच्च अधिकारी ने नाम न बताने की शर्त के साथ कहा, कि ‘‘वाशिंगटन लन्दन के रवैये से सख्त नाराज है।‘‘ अमेरिकी विश्लेषकों का कहना है, कि ‘‘अंतर्राष्ट्रीय एशियायी ढ़ांचागत निवेश बैंक में शामिल होने का निर्णय ले कर ब्रिटेन यूरोप और अमेरिका के बीच पैदा हुए अंतर्विरोधों के इस दौर में चीन की सहायता कर रहा है। वह ‘बांटो और राज करो‘ की अपनी पुरानी नीति को फिर से लागू कर रहा है।‘‘

जिसका जवाब डेविड कैमरन के प्रवक्ता ने दिया, कि ‘‘चीन के एशियायी बैंक के साथ जुड़ना हमारे राष्ट्रीय हित में है।‘‘ अपने राष्ट्रीय हितों का प्रवक्ता ने स्पष्टीकरण दिया, कि ‘‘एशिया के ढ़ांचागत निर्माणों में ब्रिटिश कम्पनियों को प्राथमिकता तब ही मिल सकती है, जब वह बैंक की स्थापना में हिस्सा लेगा।‘‘ ब्रिटेन इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है, कि चीन के द्वारा स्थापित एआईआईबी की भूमिका एशियायी देशों में ढ़ांचागत निर्माण के लिये महत्वपूर्ण होगी। प्रवक्ता ने कहा- ‘‘जो देश बैंक की स्थापना में हिस्सा नहीं लेंगे, वे घाटे में रहेंगे। उन्हें बैंक के द्वारा ढ़ांचागत निर्माण में निवेश किये गये निर्माणकार्य में शामिल नहीं किया जायेगा।‘‘

एशिया में ढ़ांचागत विकास के लिये अरबों डाॅलर की जरूरत है, जबकि अमेरिकी वर्चस्व वाले विश्व बैंक और एशियायी विकास बैंक बीस से तीस अरब डाॅलर ही हर साल उपलब्ध करा पाते हैं। जो इन ढ़ांचागत परियोजनाओं के लिये अपर्याप्त ही नहीं, जरूरत से ज्यादा कम हैं। इसलिये एशिया के अधिकांश देशों ने एआईआईबी के गठन का स्वागत किया है।

कुछ अमेरिकी विशेषज्ञों का मानना है, कि ‘‘अमेरिका और चीन की प्रतिद्वन्दिता से एआईआईबी को नुक्सान होगा।‘‘ वाशिंगटन स्थित अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थान के निदेशक फ्रेड बेर्गस्टन का कहना है, कि ‘‘इस पहल में बाधा डालने की कोशिश करना अमेरिका की भूल है।‘‘ उन्होंने सवाल खड़ा किया, कि ‘‘क्या अमेरिका ने चीन से यह अपील नहीं की थी, कि वह अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में एक जिम्मेदार खिलाड़ी की भूमिका अदा करे?‘‘

अमेरिका के दूसरे विश्लेषकों का कहना है, कि ‘‘अमेरिका ने चीन को अपने वित्तीय संस्थाओं का निर्माण करने के लिये विवश किया है, क्योंकि उसने ही अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में विकासशील देशों के अधिकारों का विस्तार करने और उन्हें अधिक मत उपलब्ध कराने से इंकार कर दिया था।‘‘ जिसका स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि चीन के द्वारा प्रस्तावित ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक‘ को एशियायी ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय समर्थन प्राप्त हुआ।

अमेरिका के नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्रि जोजेफ स्टीगलीत्स ने अपने लेख ‘प्रोजेक्ट सिण्डीकेट‘ में यह जानकारी दी है, कि ‘‘अमेरिका दुनिया के दूसरे देशों के राजनेताओं पर एआईआईबी में शामिल न होने का गोपनीय दबाव डाल रहा है।‘‘ उन्होंने लिखा, कि ‘‘अमेरिका के द्वारा बनाया जा रहा यह दबाव, ऐसी हरकत है, जो इस बात को दिखाता है, कि अमेरिका को अपनी क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं है। वह डर रहा है, कि इस बैंक के बनने के बाद विश्व अर्थव्यवस्था के लिये, किये जाने वाले वित्तीय निर्णयों पर से उसका नियंत्रण समाप्त हो जायेगा।‘‘

16 अप्रैल 2015 को प्रकाशित इस आलेख में अमेरिकी सरकार और अमेरिका के बारे में जो आशंका व्यक्त की गयी है, वह निराधार नहीं हैं।

15 अप्रैल 2015 को घोषित किये गये बैंक की सूची में 57 देशों की सदस्यता हो चुकी है। इनमें प्रमुख यूरोपीय देशों से लेकर अमेरिकी दबाव में लम्बे समय तक टाल-मटोल करने वाले देश आॅस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया भी शामिल हैं। इन देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों को वरियता दी है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था में शामिल जापान ही एकमात्र ऐसा देश है, जो एशियायी ढ़ांचागत निवेश बैंक में अब तक शामिल नहीं हुआ है।

रूस के सुदूरपूर्व अध्ययन संस्थान के जापान शोध केन्द्र के विशेषज्ञ बलेरी किस्तानफ का कहना है, कि ‘‘इसमें कोई शक नहीं कि जापान भी अन्ततः अमेरिकी दबाव से मुक्त हो, अंततः उसे धत्ता बता कर बैंक के साथ जुड़ने के लिये विवश होगा।‘‘ जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे ने इस बात के संकेत दिये हैं, कि ‘‘जापान भी एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक के साथ होगा, यदि उसका संचालन अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुसार किया जाता है।‘‘

चीन की योजनाओं का सबसे घातक प्रभाव अमेरिका पर पड़ रहा है। एशिया और विश्व पर अपने वर्चस्व को बनाये रखने की उसकी नीतियां एक-एक कर असफल होती जा रही हैं। वह वित्तीय एवं कूटनीतिक पराजय का शिकार हो चुका है। जो स्वाभाविक रूप से चीन और रूस की वित्तीय एवं कूटनीतिक सफलता के साथ विश्व के वैकल्पिक व्यवस्था को सुनिश्चित कर रहा है।

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