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अनुप्रिया की सात कविताएं

1. अल्हड़ लड़कियाँAnupriya

अल्हड़ लड़कियाँ
बात -बात पर
हँस देती हैं फिक्क से
सड़क पर निकलते हुए
घूरती जाती हैं
सिनेमा के नये पोस्टर
पूरी नींद कभी नहीं सोती
अक्सर पुकार ली जाती हैं
कई आवाज़ों में
अल्हड़ लड़कियाँ

पहनने ओढ़ने के सलीके
कहाँ जानती हैं
शाम के धुँधलके में
बजाती हैं सीटियाँ छत पर टहलते हुए
और बेवजह डाँट खाती हैं भाईयों से
काम -काज में लगी
अक्सर भूल जाती हैं
समय पर खाना
मर्दाना चाल चलती हुई
माँ की फटकार सुनती है
अल्हड़ लड़कियाँ

शरतचन्द्र और तस्लीमा नसरीन को पढ़ते हुए
रात -रात भर
जागती हैं
तुम्हें देखा तो ये जाना सनम सुनते हुए
शरमाती हैं
और
“बाजार ” देखकर आँसुओं से रोती हैं
पहले प्रेम की मुस्कानें
नहीं छिपा पाती हैं
और धर ली जाती हैँ
ऐन मौके पर
अल्हड़ लड़कियाँ

उठती हैं
गिरती हैं
बार -बार प्रेम में पड़ती हैं
नहीं काटती हैं अपनी नसें
ना ही खाती हैं नींद की गोलियाँ
और टूटा हुआ दिल लिए
मूव ऑन कर जाती हैं
अल्हड़ लड़कियाँ.

 

2. देह

तुम
मुझे अपनी बाँहों में लेना चाहते थे
मैं चाहती थी
तुम्हारा साथ
तुम छूना चाहते थे
मेरे होठों को
मैं तुम्हारा हाथ थाम
चलना चाहती थी
उम्र भर के लिए
तुम मेरी आत्मा बन चुके थे
और
तुम्हारे लिए
मैं
केवल एक देह !!

 

3. पैबंद लगे सपने

वह बचाती है
अपने सपने
पैबंद लगे सपने
जो धूल में गिरकर
हो गए हैं मैले
और थोड़े पुराने भी
नमक की थैली के पास ही रखी थी
शायद इसलिए
हो गए हैं
थोड़े सीले -सीले
और चूल्हे की आग से
झुलस भी गए हैं शायद
और धुएँ ने बिगाड़ दी है इसकी रंगत
कुछ दाग जैसा भी दीख पड़ता है तेल का
शायद आचार का हो
पर फिर भी रोज रखती है
अपने सिरहाने
वही सपने
पूरे होने की उम्मीद में
पैबंद लगे सपने ……

 

4. ये मेरे बच्चे हैं साहेब

ये
मेरे बच्चे हैं साहेब
भूख के रंग में रंगे हुए
इनकी बहती नाक से
तुम्हें घिन आएगी
इनके कपड़ों से
आती गंध तुम्हें नहीं सुहाएगी जरा भी
इनकी बातों में
भरी हैं दुनिया भर की गालियाँ
इनके चेहरे पर पसरी है उम्मीद
ढीठ की तरह
ये मेरे बच्चे हैं साहेब।

 

5. कि कोई आने को है.

स्त्रियाँ अक्सर
चूल्हे की राख पर
सबसे छिपकर लिखती हैं
अपनी
अधूरी प्रेम कहानियाँ
खौलते अदहन के बुलबुलों में
पढ़ती हैं
जाने किसका चेहरा
लकड़ियों को सुलगते हुए देखकर
मुस्कुरा उठती हैं
अपनी कामयाबी पर
और धुएँ को सौंप देती हैं
गुप्त भाषाओँ में कोई
पहचाना सा सन्देश
रसोई के भीतर
तेल -मसालों के बीच
रचती हैं दुनिया का सबसे अनोखा
रहस्य
रोटियों में छुपाकर रखती हैं
अपने मौन संवाद
और
अपने आंसुओं को अक्सर
नमक की डिबिया में
बंद कर देती हैं
कि कोई आने को है !!

 

6. माँ की स्मृतियों में

माँ लौट आना चाहती है
उन स्मृतियों में
जहाँ अब तक उनके गीले हाथों के छाप
सूखे नहीं है
जहाँ
अब तक टंगे हुए हैं कपड़े
खुले आँगन में गिरते ओस के नीचे
जहाँ
चूल्हे का धुआँ रह- रह कर
आँखों में काजल की जगह
ले लेता है
जहाँ
कुँए पर रख भूल आयी हैं
पीतल का लोटा
जो अपने संग लायी थी
मायके से
जहाँ
आलू दबा दिए थे दादी ने
जलते घूर में
कि
सोंधा- सोंधा आलू
बड़ा स्वादिष्ट होता है बहुरिया
जहाँ
आने वाले हैं बाबूजी लौटकर
स्कूल से
लेकर
तरकारियों के संग
एक ठोंगा गर्म कचौरियों का भी
कि
माँ अपने बंद – बंद से कमरे से निकल कर
लौट आना चाहती हैं
उन स्मृतियों में …….

 

7. बाजार

डरा हुआ है बाजार
और
डरे हुए हैं लोग
उदास और उतरा हुआ है
चेहरा हर आँगन का
गोसाईं की प्रार्थना करते हुए
थरथरा जाती है पिता की आवाज
कैसे लगेगा पार अब
ढाढस बंधाने को
कम पड़ जाती है माँ की हिम्मत
उम्र से ज्यादा दीखने लगी है
अब बडकी दीदी
इस बार भी नहीं पक्की हुई बात
अगली बार तो रेट भी बढ़ जायेगा
सोचकर मायूस हो गए हैं
उनके सपने
बच्चों की मीठी नींद
अब ब्रांडेड चाकलेटों की मोहताज हैं
आम आदमी की
जेब में लगायी गयी है
कोई खुफिया सेंध
प्रेम में डूबे हुए
नए नए बच्चे
इजाद कर रहे हैं
सस्ती और टिकाऊ
मुस्कुराहटें
चमक धमक से भरे सपनों ने
नाराज होकर
ली है नींद की दवा
और बंद कर लिया है
खुद को किसी अँधेरी गुफा में
इस डरे हुए बाजार में
बहुत सहमे और डरे हुए हैं लोग.

-अनुप्रिया

 

अनुप्रिया हिंदी की युवा कवयित्री हैं साथ ही बढ़िया रेखा -चित्र भी बनाती हैं। इनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में लगातर छप रही हैं। साहित्य अकादमी सहित कई मंचो पर इनका काव्यपाठ हो चूका हैं।

 

परिचय:

शिक्षा- बी ए
जन्म स्थान- सुपौल,बिहार
रूचि-कविता लेखन। पठन-पाठन
प्रकाशन: – कथाक्रम, परिकथा, वागर्थ, कादम्बिनी, संवदिया, युद्ध रत आम आदमी, प्रगतिशील आकल्प, शोध दिशा, विपाशा, श्वेत पत्र, नेशनल दुनिया, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, संस्कार-सुगंध, अक्षर पर्व, हरिगंधा, हाशिये की आवाज़ आदि पत्र – पत्रिकाओं में कवितायेँ निरंतर प्रकाशित.
नंदन, स्नेह, बाल भारती, जनसत्ता, नन्हे सम्राट, जनसंदेह टाइम्स, नेशनल दुनिया, बाल भास्कर, साहित्य अमृत, बाल वाटिका, द्वीप लहरी, बाल बिगुल में बाल कवितायेँ प्रकाशित. संवदिया, विपाशा, ये उदास चेहरे, अंजुरी भर अक्षर, हाशिये की आवाज़ आदि पत्रिकाओं में रेखा चित्र प्रकाशित.

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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2 comments

  1. आशीष मिश्र

    सुंदर कविताएं ! अनुप्रिया जी को हार्दिक बधाई!

  2. बहुत ही सुंदर कवितायें हैं सभी और सच्चाई के बेहद करीब

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