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चीन की यात्रा – संतुलन से निवेश की संभावनायें

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मोदी की विदेश यात्रा ‘एक के साथ दो अतिरिक्त‘ के तहत, चीन के साथ मंगोलिया और दक्षिणी कोरिया की पूरी हुई। 20 मई को उनकी वापसी भी हो गई। यात्रा से पूर्व चीन के संदर्भ में चार मुद्दों को बड़ी तरजीह दी गयी थी-

  • व्यापार घाटा
  • पूंजी निवेश
  • पाक अधिकृत कश्मीर से चीन तक गुजरती राहें, और
  • सीमा विवाद

दोनों देशों के बीच की संभावनाओं से ज्यादा इस बात का प्रचार किया गया था, कि चीन भारत का अविश्वसनिय पड़ोसी देश है। वह नेपाल और श्रीलंका जैसे भारत के पड़ोसी -मित्र देशों- के साथ अपने सम्बंधों को विस्तार दे चुका है, और हिन्द महासागर पर अपनी दखल बढ़ाना चाहता है, जहां अमेरिकी वर्चस्व है। और पाकिस्तान को लेकर उसे ‘दुश्मन देश का सहयोगी’ करार दिया गया था। यह भी कहा गया था, कि चीन भारत को अपने वित्तीय जाल में फंसा रहा है। यह खबर भी बांट दी गयी, कि युद्ध की स्थिति में भारतीय सेना के पास बमुश्किल 22 दिन का गोला-बारूद है।

इस बात की पूरी तरह से अनदेखी की गयी, कि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर और एशिया में, भारत और चीन के हित आपस में गुथे हुए हैं।

  • भारत और चीन ब्रिक्स देश और ब्रिक्स बैंक के सहयोगी देश हैं।
  • शंघाई सहयोग संगठन में भारत के शामिल होने का चीन ने समर्थन किया है। जहां रूस के साथ उसकी वरियता है।
  • एशिया की शांति और स्थिरता के लिये दोनों देशों की भूमिका महत्वपूर्ण है। 
  • चीन के एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेण्ट बैंक -एआईआईबी- में भारत संस्थापक सदस्य है, जिसमें दुनिया के 57 देश शामिल हो चुके हैं- अमेरिकी विरोध के बाद भी। जिनमें वो देश भी है, जहां नरेंद्र मोदी अपने ‘मेक इन इण्डिया प्रोग्राम‘ के लिये पूंजी निवेश पाने का ‘रोड़ शो‘ कर चुके हैं।

नरेंद्र मोदी अपने ही ‘मेक इन इण्डिया प्रोग्राम‘ को चुनावी अभियान की तरह चला रहे हैं, जो देश के संसाधन और जन तथा प्राकृतिक सम्पदा की नीलामी की तरह है। और इस नीलामी में शामिल होने के लिये घूम-घूम कर नेवता बांट रहे हैं। भारतीय मीडिया ने उन्हें ‘चाणक्य‘ तक कह दिया।

जिनमें ‘बिस्मार्क‘ तक बनने की योग्यता नहीं है, उसे ‘चाणक्य‘ बनाने की बकवास में हम नहीं पड़ सकते। जरूरत भी नहीं है। यह चैरस को गोल कहने की तरह ही होगा, या पांव के कटे हुए नाखून को पूरा आदमी।

ब-हरहाल, हम भारत और चीन के रिश्तों, पर आयें, जहां से मोदी जी, अपनी पीठ थपथपाते हुए वापस आ चुके हैं। उनकी सेल्फी खुद पर फिदा होने की अजीब सी जुबान है।

भारत की वरियता उसके अपने हितों से जुड़ी हुई है। जबकि चीन के लिये एशिया और विश्व पर चीन के नेतृत्व में साझे का वर्चस्व अहम है, जहां अमेरिकी साम्राज्य का वर्चस्व है। चीन के लिये विश्व व्यापार और अपनी सुरक्षा का मुद्दा है, जिसके खिलाफ अमेरिकी साम्राज्य और उसका बिखरता हुआ कुनबा है। चीन वैकल्पिक विश्व के निर्माण में भारत के सहयोग का पक्षधर है। जिसमें चीन और रूस बराबर के साझेदार हैं।

नरेंद्र मोदी दो खेमों की तनी हुई रस्सी पर एक साथ करतब दिखा रहे हैं। वो वाशिंगटन में होेते हैं, तो ओबामा की जुबा बोलते हैं, यूरोपीय संघ के सदस्य देशों और आॅस्ट्रेलिया में होते हैं, तो उनकी जुबान वहां बदल जाती है। चीन में भी उनकी जुबान बदल गयी। भारत आने के बाद भी उन्होंने एशिया की एकजुटता और वैश्विक स्तर पर भारत और चीन के सहयोग को महत्वपूर्ण करार दिया। जिन मुद्दों के तहत चीन की उनकी यात्रा हुई, उसमें उनकी मोदियाना नौटंकी को छोड़ दें, तो कहा जा सकता है, कि दोनों देशों के बची की समझ बढ़ी है। महत्वपूर्ण करार हुए हैं, और सीमा विवाद के हल की संभावनायें बढ़ी हैं।

भारत और चीन के बीच 10 अरब डाॅलर के 24 समझौते हुए। इन समझौतों से भारत में चीन की महत्वपूर्ण वित्तीय उपस्थिति तय हो जायेगी। महावाणिज्य दूतावास, रेल व्यापार, खनन, खनिज, अंतरिक्ष, विज्ञान, पर्यटन से लेकर साझा विकास एवं दो देशों के विदेश मंत्रालयों के मिल कर काम करने के समझौते हुए हैं।

बीजिंग में हुए इन समझौतों पर दस्तखत करने के बाद मोदी के ‘मेक इन इण्डिया‘ के मशीनी बाघ को थोड़ी सी राहत मिली। और मोदी जी का खयाली घोड़ा घास का मैदान देख कर सरपट दौड़ने लगा। उन्होंने दोनों देशों की आबादी से लेकर चीन की उपलब्धियों का बखान करना शुरू कर दिया। दुनिया के लिये एशिया के नेतृत्व का उल्लेख भी किया। उन्होंने शंघाई में अपने यात्रा के अंतिम दिन अप्रवासी भारतीयों के सामने ताल ठोंकना शुरू कर दिया। जिससे अपनी पीठ थपथपाने की आवाज आ रही थी। बराक ओबामा को अपना दोस्त मानने वाले नरेंद्र मोदी ने चीन के राष्ट्रपति शि-जिन-पिंग को भी अपना दोस्त करार दिया और उसकी ग्रेडिग भी ‘वन-प्लस‘ की कर दी।

लगे हाथ उन्होंने अपनी सरकार का रिपोर्ट पेश करना शुरू करके विवादों को पैदा किया, ताकि मुद्दे की बात धरी की धरी रह जाये। पहले वो ऐसे विवादों से देश की आम जनता को धोखे में डालते थे, इस मर्तबा उन्होंने संघ, भाजपा और अपने सहयोगी राजनीतिक दलों को धोखे में डाल दिया है। जो चीन से रिश्तों को बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।

चीन के इस विरोध का प्रभाव उनके मेक इन इण्डिया और चीन के द्वारा विभिन्न क्षेत्रों सहित ढांचागत निर्माण के निवेश पर न पड़े यह चिंता मोदी की है। मोदी के पीछे खड़ी राष्ट्रीय निजी कम्पनियां -देश के पूंजीपति घराने- आधारभूत ढांचा के निर्माण में चीन के निवेश के पक्ष में हैं। उसका दबाव भी मोदी पर रहा है, कि चीन केे राष्ट्रपति शि-जिन-पिंग की भारत यात्रा के दौरान 20 करोड़ डाॅलर के निवेश को वो सुनिश्चित करें। उस वर्ग ने देश के विपक्ष -खास कर कांग्रेस- के सामने मुद्दे को डाल दिया, जो चीन के शंघाई और मंगोलिया के उलनबटोर और दक्षिण कोरिया के सियोल में मोदी ने दिया, जिसका एक ही अर्थ था, कि ‘‘उन्होंने एक साल के भीतर भारत को सम्मानित बनाया।‘‘

परिणाम हमारे सामने है। कांग्रेस ने मोदी का विरोध किया और मोदी सरकार का वार्षिक रिपोर्ट कार्ड लेकर माोदी की पार्टी -भाजपा- उस हमले का जवाब देने और हमला बोलने में लग गयी।

मोदी ने अपने लिये,

अपनी सरकार के लिये

और देश की सवा सौ करोड़ आबादी के लिये

चीन के राष्ट्रपति का अपने गृहनगर शियान में पीएम मोदी के स्वागत को सबसे बड़ा सम्मान मान, कि चीन के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि प्रोटोकाॅल तोड़ कर किसी विदेशी नेता का स्वागत राजधानी बीजिंग में न करके शियान में किया गया। जहां वास्तव में मुद्दे की बात तय हुई, मगर प्रचार वहां के ऐतिहासिक संग्रहालय -टेराकोटा- में मोदी के होने को मिला। जिनके बीच मोदी जी अपनी तस्वीर उतारने में व्यस्त रहे।

चीन में मोदी की मौजूदगी और दोनों देशों के बीच हुए समझौतों के बारे में ‘न्यूयार्क टाइम्स‘ ने लिखा- ‘‘भारत के पीएम नरेंद्र मोदी की चीन यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब चीन एशिया में अपने वर्चस्व को बढ़ाने के लिये लम्बी छलांगें लगा रहा है। वह निवेश, कारोबार, वित्तीय सम्बंधों के साथ कूटनीतिक सम्बंधों को बढ़ाने की नयी पहल कर चुका है।‘‘ अखबार का मानना है, कि ‘‘चीन के राष्ट्रपति शि-जिन-पिंग चीन के इस उत्तान को सकारात्मक और दोस्ताना रूप देने में लगे हैं, लेकिन चीन पर भरोसा करना मुश्किल है।‘‘

न्यूयाॅर्क टाइम्स का विश्लेषण है, कि ‘‘भारत और चीन एक-दूसरे से अपना हित साधने का खेल खेल रहे हैं।‘‘ गोया, अमेरिका शराफत का ऐसा पुतला है, जो राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक नाकेबंदी और युद्ध की आशंकाओं को बढ़ाने की नीतियों पर नहीं, बल्कि एशिया की शांति एवं स्थिरता के लिये काम कर रहा है। इराक और सीरिया पर जारी हमलों का कोई खास अर्थ नहीं हैं ट्रांस-पैसेफिक पार्टनरशिप और पिवोट टू एशिया सिर्फ उसकी शराफत है, चीन से उसका कुछ भी लेना-देना नहीं। चीन उसके लिये एशिया में और विश्व में चुनौती नहीं। भारत का उपयोग वह अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये, नहीं करना चाहता।

अमेरिकी शराफत उसके साम्राज्यवादी चेहरे की ऐसी पहचान है, जिस पर उसके अपने मित्र देश तक यकीन नहीं करते।

न्यूयाॅर्क टाइन्स लिखता है, कि ‘‘चीन की सबसे बड़ी ताकत वर्तमान में उसका कारोबार चार लाख करोड़ डाॅलर का विदेशी मुद्रा भंडार है। वह अपने नये एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक को माध्यम बना कर ढांचागत निवेश की योजना पर काम कर रहा है। भारत भी चीन के इस मुद्रा भण्डार का उपयोग अपने ढांचागत विकास के लिये करना चाहता है।‘‘

मोदी ने अमेरिका -जापान और उसके मित्र देशों से अपने सम्बंधों को मजबूत करने की नीति को वरियता दी है। उनके लगे हाथ दक्षिण कोरिया की यात्रा का मतलब भी यही है, कि वो अमेरिकी खेमें से अपने सम्बंधों को बनाये रखना चाहते हैं। मंगोलिया शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य देश है।

अखबार का मानना है, कि ‘‘अमेरिका और चीन की प्रतिस्पद्र्धा में यदि भारत को किसी एक खेमे को चुनने की अनिवार्यता आती है, तो मोदी की नीतियां असफल हो जायेंगी।‘‘

व्यापार घाटा के असंतुलन को संतुलित करने, निवेश की संभावनाओं को बढ़ाने और सीमा विवाद को योजनाबद्ध तरीके से हल करने पर दोनों देशों के बीच सैद्धांतिक सहमति बन गयी है, और पहल भी हो चुकी है।

प्रधानमंत्री की चीन यात्रा के बारे में माकपा पोलित ब्यूरो ने दोनों देशों के बीच हुए 24 समझौतों के प्रभाव के बारे में अध्ययन के बाद बयान जारी करने की बात कही है, लेकिन दोनों देशोें के रिश्तों में सुधार को उसने अपना समर्थन दिया है। माकपा के नवनिर्वाचित महासचिव सीताराम येचुरी ने 12 महीने में 18 देशों की यात्रा और विदेश में विपक्षी दलों पर मोदी के हमलों की आलोचना की। उन्होंने मोदी सरकार के आर्थिक नीतियों, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण तथा लोकतांत्रिक इकाईयों की अनदेखी करने की नीतियों की कठोर आलोचना की।

वास्तव में नरेंद्र मोदी के विदेश यात्राओं का एक ही मकसद है ‘मेक इन इण्डिया‘ की नीतियों के तहत बाजारवाददी अर्थव्यवस्था का विस्तार और आधारभूत ढांचा के निर्माण के लिये विदेशी पूंजी निवेश की संभावनाओं को बढ़ाना। चीन की यात्रा, उससे अलग नहीं है। संतुलन से निवेश की संभावनायें तलाशती मोदी सरकार दो खेमों के बीच खड़ी है। आने वाला कल ही तय करेगा, कि स्थितियां किसके पक्ष में हैं, और देश की आम जतना को क्या झेलना है?

वैसे मोदी की चीन यात्रा, दोनों देशों के बीच हुए समझौते और भारत का एशिया के विकास के लिये चीन के साथ दिखाई गयी प्रतिबद्धता उसे मुक्त व्यापार के नये क्षेत्र का निर्माण करने वाली ताकतों के निकट खड़ा कर रहा है, जिसमें रूस की गहरी उपस्थिति है। मोदी की चीन यात्रा से ठीक एक दिन पहले 13 मई को रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भारतीय प्रधानमंत्री मोदी से फोन पर बातें की। उन्होंने दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग बढ़ाने तथा प्रमुख रूप से संयुक्त व्यापार और आर्थिक परियोजनाओं पर चर्चा की।

क्रेमलिन से जारी प्रेस वक्तव्य में कहा गया है, कि रूस और भारत के बीच विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक भागीदारी के विस्तार और संयुक्त व्यापार तथा आर्थिक मुद्दों पर चर्चा की गयी। रूस के प्रमुख अखबार ‘तास‘ ने जारकारी दी कि इस साल जुलाई में ‘उफा‘ में होने वाले ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में नरेंद्र मोदी ने अपनी भागीदारी की पुष्टि की। पुतिन ने महान देश भक्तिपूर्ण युद्ध (द्वितीय विश्वयुद्ध) में विजय की 70वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित समारोहों मे, भारत के प्रतिनिधियों के मास्को में उपस्थिति के लिये आभार व्यक्त किया।‘‘ तय है, कि यह संयोग नहीं है। भारत और चीन के बीच रूस की उपस्थिति कई रूप में अमेरिका से बड़ी है।

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