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चुनाव की देहरी पर चिन्तन

7867898जयपुर चिन्तन-शिविर में कांग्रेस के कपाल पर चिन्ता की गाढ़ी लकीरे उभरी हुर्इ दिखीं। राहुल गांधी के शब्दों में धार कम भावुकता अधिक थी। फिर भी, पार्टी के रवैए और कार्यप्रणाली के बारे में वे फरमा सही रहे थे। ऊपरी कमान के राजनेताओं का अपने ज़मीनी कार्यकताओं से संवाद खत्म हो चुका है। आन्तरिक अनुशासन के स्थान पर धौंस और ढिठार्इ का बोलबाला है। स्थानीय-क्षेत्रीय संगठन में मतभेद, फूट और हिंसक प्रतिस्पर्धा जबर्दस्त है। इसी तरह महत्वकांक्षी युवा पीढ़ी की सक्रियता के बारे में राहुल का संभावित आकलन सच्चार्इ के करीब है। देश की युवा पीढ़ी अपने अधिकार के प्रति पहले की अपेक्षाकृत अधिक आग्रही और बेसब्र है। दरअसल, आधुनिक समय में टेक्नोलाजी जनमानस को आलोडि़तउद्वेलित करने में पूर्णतया सफल सिद्ध हुआ है।

वर्तमान में भारतीय राजनीति उल्टे नक्षत्र में उदीयमान है। उल्टा इन अर्थों में है कि वर्तमान राजनीतिक दल या चुनावमार्गी राजनीतिज्ञ भारत की सामाजिकी एवं सांस्कृतिकी से कटे हुए लोग हैं। इनमें आज़ादी के वास्तविक अहसासों की खोज करना व्यर्थ है। हिन्दुस्तान की विशालतम आबादी जिनके वे राजनीतिक प्रतिनिधि हैं; शासकीय कर्ता-धर्ता हैं; के प्रति रागात्मक अथवा सम्वेदनात्मक जुड़ाव न के बराबर है। अधिसंख्य राजनीतिज्ञों विशेषतया नर्इ पीढ़ी के वंशानुओं (ये सिर्फ मनु के संतान नहीं हैं) के भीतर अंतश्चेतना और स्वप्रेरणा के बिम्ब, प्रतीक, चिन्ह और मिथकीय ज्ञान गायब है, या हैं भी तो उनके होने का कोर्इ विशेष अर्थ नहीं है। पार्टी की अंदरुनी बैठकों, गोषिठयों, सभाओं या कि चिन्तन-शिविरों में प्राय: सकारात्मक राजनीति की जो बातें की जाती हैं; बाहर आते ही यह अभिव्यकित चीख, शोर, घृणा, द्वेष, लांछन, अपमान तथा आरोप-प्रत्यारोप जैसे नकारात्मक संवृतितयों में बदल जाती है। इस मामले में सभी पार्टियाँ एकरस हैं। भारतीय जनता पार्टी की सिथति भी ज्यादा भिन्न नहीं है। इस बार फिर संघ से उसकी ठन गर्इ। लेकिन, राजनाथ सिंह के तीसरी बार पार्टी अध्यक्ष बनाए जाने के पश्चात इस विवाद का तत्काल पटाक्षेप हो गया।

कहना न होगा कि भारत की सबसे शकितमान पार्टी के रूप में कांग्रेस आम-आदमी के साथ होने का दावा करती है। उसका दावा बिल्कुल निर्मूल भी नहीं है। भारतीय राजनीति में वर्तमान समय में आम-आदमी एक मुहावरा की भाँति प्रयुक्त है। कांग्रेस के साथ अच्छी बात यह है कि केन्द्र में उसकी सत्ता-सियासत है। विपक्ष की भूमिका में जो पार्टियाँ हैं उनकी विचारधारा बहुसंख्यक भारतीय जनता को ‘फासिस्ट या कहें ‘कत्लेआमवादी लगती है। नतीजतन, जनता चुनावोत्सव में भागीदार-हिस्सेदार होने और ‘अल्टीमेटली किसी एक पार्टी को चुनने के लिए अभिशप्त है। प्राय: सभी पार्टियाँ शोषित, पीडि़त एवं वंचित वर्ग के शुभेच्छु और हित-चिन्तक होने की बात स्वीकार करती हैं; जबकि उनके भीतर अपना कहा तक निभा सकने की ताकत शेष नहीं है। हाँ, अपने कहे से मुकरने अथवा चकमा देने में ये पार्टियाँ सिद्धहस्त एवं अग्रणी हैं। कांग्रेस द्वारा किया जाने वाला ‘फ्राड पिछले कुछ वर्षों में एक के बाद एक उजागर हुए हैं। किसी सरकारी योजना, कार्यक्रम, आयोजन, व्यापारिक समझौते, आयात-निर्यात, निवेश-विनिवेश आदि में धोखाधड़ी, ठगी एवं जालसाजी तो ‘चलती का नाम गाड़ी है। कांग्रेस ने राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय कारोबारी समूह, कारपोरेट घराने, उधोग, संस्थान या संस्था विशेष को लाभ पहुँचाने का अतिशय उपक्रम किया है। इस गुणधर्म को वह अपना सदाश्रयी उत्तराधिकार मानती है। भ्रष्ट-संस्कृति को सिर्फ कांग्रेस ने ही नहीं कमोबेश सभी राजनीतिक दलों ने अपना लिया है। आत्मसातीकरण की यह प्रवृतित सही नहीं कही जा सकती है; क्योंकि यह अपनी मूल प्रवृतित में भारतीय राजनीतिक मूल्य, विचार, दृषिट, चेतना, नेतृत्व, साहस आदि की कमी तथा ह्रास का धोतक है।

कांग्रेस अभी तक भावनात्मक ‘मंजर पैदा कर आम-ओ-खास सभी को अभिभूत करने का षड़यंत्र करती रही है। लेकिन, अब सिथति दूसरी है। जनता पहले की तरह बेपढ़-निपढ़ नहीं है। उसे जिधर चाहे उधर पशु की माफिक हाँक ले जाना अब कतर्इ संभव नहीं है। आज की पबिलक जागरूक है। साथ ही, अपने हक-हकूक के प्रति सजग, सचेत और प्रतिरोधी चेतना से भरी-पूरी भी। उसे राजनीतिक सांत्वाना, ढाढस, दिलासा, आश्वासन इत्यादि के शाबिदक चकमे या झाँसे मात्र से बरगला पाना संभव नहीं है। यदि राहुल गाँधी सार्वजनिक मंच से विपक्षी पार्टी के घोषणापत्र को फाड़ने का मनोरंजन(साहस नहीं) कर सकते हैं, तो अक्लमंद जनता उनके पदोन्नति सम्बन्धी ख़्ाबर को बिना पढ़े कुड़ेदान के हवाले करने का जज़्बा तो रखती ही है।

भारत की यह जगी हुर्इ जनता है। भारतीय राजनीति में आमूल बदलाव लाने की इच्छुक जनता; जिसके प्रचार-प्रसार के लिए सरकारी धन का दुरुपयोग नहीं होता है। यह जनता इस घड़ी अपनी अगुवार्इ के लिए सही नेतृत्वकर्ता की तलाश में है। समाजसेवी अण्णा हजारे, योग गुरु रामदेव और जनरल वी. के. सिंह से ले कर अरविन्द केजरीवाल की ‘आम आदमी पार्टी तक सभी संभावित और समर्थ नेतृत्व के लिए ‘माक टेस्ट प्रजेन्टेशन दे रहे हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें, तो पिछले कुछ वर्षों में समकालीन सिथतियों ने तीखा मोड़(यू टर्न) लिया है। देश में व्याप्त मुददों, समस्याओं, जटिलताओं, विरोधाभासों, अन्तर्विरोधों इत्यादि में भूचाल उमड़ा है। शांतिचिन्ह प्रवृतित में प्रवीण माने जाने वाली भारतीय जनता एकबारगी ‘रिएक्ट करने लगी है। यह सब अचानक घटित हुआ है, ऐसा नहीं है। आन्तरिक असंतोष और अकुलाहट ने हिन्दुस्तानी चेतना को इस कदर झकझोर दिया है कि सीधे लड़े-भिड़े कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता है। आए दिन जंतर-मंतर, रामलीला मैदान और राष्ट्रपति भवन के समक्ष प्रदर्शन हो रहे हैं। इस केन्द्रीय हलचल से पूरे देश में जनज्वार और जनाक्रोश का माहौल है। विशेषतया युवाओं के अभूतपूर्व शकित प्रदर्शन और रोषपूर्ण प्रतिरोध ने कांग्रेस सहित सभी पार्टियों को पशोपेश में डाल रखा है। फिलहाल इन अप्रत्याशित गतिविधियों से हफनार्इ कांग्रेस चिन्तन की मुद्रा में समाधिस्थ है।

राहुल गाँधी से जनता जब सवाल करती है, तो वह उसे टेलीविजन पर सवाल पूछते हुए देखकर संतोष कर लेते हैं। इस घड़ी वे चिन्तन-शिविर में हकड़ रहे हैं। अफसोस! इस घड़ी पूरा देश उन्हें न तो बोलते हुए देखना-सुनना चाहता है और न ही चिन्तन-शिविर में मंचित ‘इमोशनल डाक्यूड्रामा के बारे में अपनी कोर्इ राय या प्रतिक्रिया ही देना चाहता है। राहुल गाँधी को कांग्रेस की सक्रिय राजनीति को ‘ज्वाइन किए 10 साल से अधिक नहीं हुए हैं। लेकिन वे पुराने कांग्रेसियोंपुरनियों को मात देने में उस्ताद साबित हुए हंै। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के उपाध्यक्ष पद पर सुशोभित राहुल मनोनयन परम्परा के खिलाफ हैं। प्रश्न उठता है कि उनका स्वयं उपाध्यक्ष पद पर काबिज़ हो जाने का कौन-सा तार्किक आधार या पक्ष है।

दरअसल, पिछले कर्इ वर्षों से कांग्रेस उन्हें भावी प्रधानमंत्री के रूप में ‘प्रमोट करती रही है। आगामी लोकसभा चुनाव को देखते हुए वह उनकी दावेदारी को मजबूत करने की फिराककोशिश में है। कांग्रेस के पास जो ‘इंटलेक्चुअल्स विंग है या जो प्रबंधकीय रणनीतिबाज हैं; वे कांग्रेस में राहुल गाँधी के ‘पोजीशन में बढ़ोतरी के बहाने उन्हें नए सिरे से ऊपर उठाना चाहते हैं। अफसोस है, कांग्रेसियों ने सोनिया गाँधी को महाध्यक्ष बनाने की पहलकदमी नहीं कि अन्यथा राहुल गाँधी के अध्यक्ष बनने का रास्ता बिल्कुल साफ हो जाता। वैसे राहुल गाँधी अध्यक्ष हाें या उपाध्यक्ष; कोर्इ विशेष फर्क नहीं पड़ता है। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ओर से आगामी प्रधानमन्त्री के घोषित उम्मीदवार हैं। जगजाहिर रूप से बड़बोलेपन के आदी दीगिवजय सिंह के अतिरिक्त कर्इ सीनियरों ने पहले भी इस ओर इशारा किया है। खुद प्रधानमन्त्री डा. मनमोहन सिंह भी इस सम्बन्ध में कर्इ बार साफ संकेत दे चुके हैं।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में राहुल गाँधी के कद और रुतबे को ले कर कभी किसी को कोर्इ शक-शुबहा नहीं रहा है। प्रतिपक्ष के नेताओं में भी उनकी छवि एक कददावर नेता की है। वे मानते हैं कि कांग्रेस में अगर किसी की सर्वाधिक सुनी जाती है, तो वे राहुल गाँधी हैं। पीएमओ कार्यालय उनकी बात को गंभीरतापूर्वक ‘नोटिस लेता है। नवप्रवेशी कांग्रेसियों के लिए तो राहुल ‘युवराज ही हैं। यह ‘युवराज शब्द कांग्रेस के चतुर-सुजानों द्वारा गढ़ा गया शब्द है। यह शब्द राहुल गाँधी को ‘प्रोजेक्ट करने का परोक्ष हथियार है जो उनके व्यकितत्व की जगह नाम को महिमामणिडत करता है। मीडिया ने इस शब्द को बड़ी सूझ-बूझ के साथ सामान्य प्रयोग में बनाये रखा है। मीडिया अगर साझी न होती, तो राहुल गाँधी की राजनीतिक कैरियर का साँझ कब का हो चुका होता।

दैनिक समाचारपत्र के एक पाठक की यह आशंका-मिश्रित प्रतिक्रिया निमर्ूल नहीं है-‘राहुल गाँधी वही हैं, सिर्फ पद में पदोन्नति हुआ दिख रहा है। दस जनपथ के लाख ढाढस और भरोसा जताने के बावजूद यह प्रश्न भारतीय अवाम के दिलोंदिमाग में कौंधता रहेगा। कांग्रेस द्वारा जयपुर में आयोजित इस चिन्तन-शिविर को राजनीतिक विश्लेषक, रणनीतिकार, विशेषज्ञ और जानकार पणिडत अपनी-अपनी तरह से व्याख्यायित कर रहे हैं। फिलहाल, कांगे्रसी-जनों का सुर एकमेल और एकरंगा है। वे राहुलोदय का नवगीत गा रहे हैं। वैसे इस चिन्तन शिविर का कुल जमा निष्कर्ष-राहुल गाँधी का बढ़ा हुआ ‘पोजिशन है; उनके भाषण में दिखा ‘पाजीटिव एप्रोच है। वैसे राहुल गाँधी के नए बायोडेटा में उम्र, कद, अनुभव, व्यकितत्व और नेतृत्व सम्बन्धी सभी निकष पुराने हैं; लेकिन, इस बार फ्लेवर अवश्य नया है। राहुल गाँधी के बदले बोल में आत्मालोचना समाहित है। राहुल गाँधी के भाषण का असर इतना अधिक रहा है कि सोनिया गाँधी से लेकर मनमोहन सिंह तक को रुलार्इ फूट पड़ी है। भावुकता के इस क्षण में भी राहुल गाँधी नहीं चुके हैं। स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपना रुमाल थमाते हुए उन्हें बचे हुए कार्यकाल में बढि़या और उपयुक्त राजनीति करने की नेक सलाह दी है।

देखना होगा कि अब पार्टी स्तर के सारे निर्णय राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी द्वारा चालित होंगे जिसे स्वागतयोग्य कदम नहीं माना जा सकता है। ‘विटो पावर का एक परिवार की परिधि में संघनित होना राजनीतिक अदूरदर्शिता का परिचायक है। यह परिवारवाद का अंधानुकरण है जिससे कांग्रेस को विजयी मुसकान की अपेक्षा जनाधार में अपक्षय के रूप में भुगतना पड़ सकता है। सोनिया गाँधी के स्तर का एक भी कददावर नेता कांग्रेस में जीवित नहीं बचा है; यह दु:खद सच अंतत: सार्वजनिक हो चुका है। राहुल गाँधी को उपाध्यक्ष जैसे भारी-भरकम जवाबदेही वाले पद को सौंपना उन कांग्रेसी पुरनियों के योग्यता और नेतृत्व-क्षमता पर भी सवाल खड़े करता है जिनके हाथ में जोर और सीने में माददा सिर्फ ताली बजाने भर की ही शेष बची है।

ध्यान देना होगा कि कांग्रेस की ओर आशा भरी निगाहों से देखने वाली जनता सूरदास नहीं है। उनमें या उनके बेटे-बेटियों में भी इतना दमखम है कि वे राजनीतिक मचान पर चढ़कर हुंकार भर सके; स्वयं को सौंपी गर्इ जवाबदेहियों का समुचित निर्वाह कर सके। अत: देश की जनता ‘राजनीतिक युवराजों की ताजपोशी को अपना सर्वस्व मानने को अभिशप्त नहीं है। भारतीय जनता इस सचार्इ से पूर्व परिचित है कि यही राहुल गाँधी तब मौन क्यों रहे जब पूरे देश में दिल्ली गैंगरेप को लेकर कुहराम मचा हुआ था। युवजन सड़क पर थे। और राष्ट्रपति के रायसीना महल के समक्ष शानितपूर्ण प्रदर्शन के दरम्यान उन्हें बुरी तरह पीटा जा रहा था। इससे पहले अण्णा आन्दोलन के समय बरती गर्इ चुप्पी ने भी युवाओं को निराश ही किया था। ये वे प्रश्न हैं जो किसी व्यकित के ज़बान पर आसीन साक्षात सरस्वती की बोलती बन्द कर सकते हैं।

गौरतलब है कि इस चिन्तन-शिविर में राहुल गाँधी ने जो कहा है तथा जिस भाषा, शैली और तेवर में कहा है; कांग्रेस पार्टी को इस खुराक की सख़्त जरूरत है। अन्दरूनी कलह, खींचतान, उठापटक, जोड़तोड़, दाँवपेंच, भार्इ-भतीजावाद, वंशवाद, मनोनयन वगैरह मिलते-जुलते मात्र शब्दगुच्छ नहीं है; इनकी अर्थच्छटाओं का प्रभाव और परिव्यापित कांग्रेस में व्यापक है। अत: यह आवश्यक है कि चिन्तन-शिविर से निकला चिन्तन, विचार और बुद्धि से ऊपर के स्तर का हो। यानी इनका व्यावहारिक और क्रियात्मक सिद्ध होना विशेष महŸव रखता है। इस चिन्तन का निहितार्थ तात्कालिक लाभ, पार्टीगत हित और स्वार्थ मात्र को समर्पित न हो, यह भी सुनिशिचत किया जाना आवश्यक है। ये प्रश्न इसलिए उठ रहे हैं कि इन दिनों कांग्रेस राजनीतिक-प्रबंधकों(इंटेलेक्चुएल डीलरों) की घोड़ी पर बैठकर योजनाएँ और रणनीति बनाने में जुटी है जिनका हश्रअंजाम पिछले चुनावों में आमजनता देख चुकी है। इस बार भी यह चिन्तनशाला ऐसे समय में आयोजित किया गया है जब इसी वर्ष 9 प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने को हैं। साथ ही, आगामी वर्ष लोकसभा चुनाव होना भी तय है।

भारत की ऐतिहासिक राजनीतिक परम्परा द्वारा संस्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को यह देखना होगा कि चिन्तन अपनी मूल प्रकृति में सदैव नवोन्मेषी अथवा इनोवेटिव होता है। स्व का निरपेक्ष मूल्यांकन चिन्तन से ही संभव है। चिन्तन अंत:क्रियाशीलता और अंत:प्रेरणा का धारक है और परिणाम भी। मानव-चेतना इसी चिन्तन से पोषित एवं विकसित होता है। आपसी खटराग, भेदभाव, विषमता, अमर्यादित आचरण, र्इष्र्या इत्यादि का निराकरण अथवा समूल उपचार के लिए चिन्तन सर्वाधिक उपयुक्त साधन है। चिन्तन जब किसी व्यकित-विशेष का जयगान, गुणगान, बखान आदि को ही अपना ध्येय मान लेता है, तो वह अग्रगामी न होकर पश्चगामी हो जाता है। अब यह कांग्रेसीजन के चिन्तन-शैली और विचार-संस्कार पर निर्भर(बेस्ड) है कि वे युगीन यथार्थ, युगीन चेतना, वैशिवक अतिक्रमण, उधोग संस्कृति, ज्वलंत मुददों इत्यादि से किस प्रकार और कैसे जुड़ते हैं या फिर पुराने ‘आइडिया और ‘लीक को आजमाना ही सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प मान लेते हैं।

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