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जमीन के लिये संघर्ष, हल और हथियारों से बड़ा मुद्दा है

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काॅरपोरेट की मोदी सरकार देश में ऐसा माहौल बनाने में लगी है, कि सरकार की नीतियों से असहमत लोग आर्थिक विकास के विरोधी हैं, वे समाज के सबसे कमजोर बहुसंख्यक वर्ग और श्रमजीवियों के विरोधी हैं।

और, यह आर्थिक विकास क्या है?

उत्पादन के साधन और देश के सार्वजनिक एवं प्राकृतिक सम्पदा तथा लाभ का निजीकरण।

जिसके लिये नरेंद्र मोदी पिछले एक साल से दिन-रात एक किये हुए हैं। वो उन सपनों को बांटने में लगे हैं, जिसके लिये जोखिम तो देश की आम जनता को उठाना है, मगर मुनाफा निजी कम्पनियों एवं काॅरपोरेशनों के लिये पहले से सुरक्षित है। जिन्हें ऐसे जमीन की जरूरत है, जिसके नीचे खनिज सम्पदा दबी है। जिससे हो कर चौड़ी सड़कें और रेल की लाईनों को गुजरना है। जिन्हें विशाल औद्योगिक इकाई, संस्थान और औद्योगिक शहर बसाना है। जिसके नीचे या तो आम लोगों, किसानों और आदिवासियों की जमीन को दबना है, या उसकी खाल उधेड़ी जानी है। गांव और बस्तियों को उजड़ना है। लोगों को बे-दखल होना है। एवज में उन्हें मुआवजा और काम मिलने का आश्वासन है।

ऐसे ही प्रस्तावों के साथ नरेंद्र मोदी बस्तर में अवतरित हुए।

आर्थिक विकास के साथ काम की संभावनायें -स्थानीय एवं आम लोगों के लिये कितनी है? इस बारे में हम बाद में चर्चा कर लेंगे। बस, इतना ही कहना काफी होगा, कि इस चमक की कलई तो उतरनी ही है, वह उतर जायेगी। या कहिये, कि उतर चुकी है, बस आम जनता की समझ में यह बात पक्के तौर पर आनी चाहिये।

ब-हरहाल,

हम बस्तर में चलें

जहां हल भी है, हथियार भी है। जिसे मोदी जी बंदूक कहते हैं। जिसे छोड़ने की अच्छी सलाह भी देते हैं। और किसान-आदिवासियों के कंधे पर हल लाद कर, उससे जमीन भी छीन लेना चाहते हैं।

काहे…?

उन्हें वहां पर अल्ट्रामेगा स्टील प्लांट लगवाना है।

उनका तर्क है- इससे उस क्षेत्र का विकास होगा।

उन्हें सुनने के लिये प्रदेश की भाजपा सरकार बड़ी मुश्किल से हजार-बारह सौ आदिवासियों और ग्रामीणों को जमा कर पायी।

उनकी हरकतों की पल-पल की खबर बांटने वाली मीडिया को सदमा लगा, खबरें गायब हो गयीं।

सुरक्षा के भारी इंतजाम के बीच मोदी जी बोले, उनके बोल सपाट काले चेहरों की भावहीन आंखों से टकरा कर चकनाचूर होते रहे।

जो भी हुआ, वह खास नहीं था। ऐसा तो नहीं ही था, जैसा होने के मोदी जी अभ्यस्त हो गये हैं।

बड़ी कोफ्त हुई होगी उनको।

इस बात का एहसास हुआ या नहीं हुआ, कि सरकार की योजनाओं के लिये आम जनता की सहमति, बस्तर में आसान नहीं है। यह तो मोदी जी ही बता सकते हैं, लेकिन सोशल मीडिया पर जारी दंतेवाडा रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया कि जमीन के लिये संघर्ष हल और हथियारों से कहीं बड़ा है।

सरकार पीछे नहीं हटेगी- उसके पास वैधानिक अधिकार और हंथियारों की कमी नहीं। उसकी वरियता खेती-किसानी नहीं, आर्थिक विकास के लिये प्रकृति और जन श्रम शक्ति का अबाध दोहन है।

स्थानीय ग्रामीण-आदिवासियों के लिये जमीन जीवन का आधार और जीने का जरिया है। वह लड़ेंगे जरूर। यह लड़ाई माओवादियों की नहीं है। वे इस लड़ाई का एक हिस्सा हैं। जिसके हिस्से राज्य और केंद्र की सरकार इस संघर्ष को टांकने में लगी है, ताकि दमन के लिये तर्क मजबूत हो। उन्हें घरेलू आतंकवादी पहले ही करार दिया जा चुका है।

लड़ाई किसी के लिये आसान नहीं होगी।

क्षेत्र की आम जनता सरकारों पर विश्वास नहीं करती। जिसकी सूरत नरेंद्र मोदी है। लोगों का भरोसा सरकारें पहले ही खो चुकी है। उसकी जुबान लोगों के लिये चालबाजी है।

यह हैरत की बात है, कि 24 हजार करोड़ की लागत से जिस प्लांट को लगाने की योजना उस क्षेत्र में है, उसकी जानकारी लोगों को अखबारों से लगती है।

क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है, कि सरकार उस क्षेत्र की आम जनता की सहमति के बिना, उनके जमीन को अपने दखल में लेने का निर्णय ले चुकी है?

क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है, कि सरकार क्षेत्र के विकास, और लोगों की समृद्धि के जो सपने बांट रही है, वह उसके अपनी नजरों में भी एक धोखा है?

सरकार इस बात को अच्छी तरह जानती है, कि उसे जन-प्रतिरोध का सामना करना ही है।

लोगों को उनकी जमीन से बे-दखल करना ही है।

और लोग इस बात को अच्छी तरह जानते हैं, कि यह लड़ाई उनके लिये कितना बड़ा खतरा है? और उनके लिये क्या है?

सवाल यह है, कि सरकारें अपनी और निजी कम्पनियों के साथ मिल कर सबकुछ तय कर ही चुकी हैं, तो प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी दंतेवाडा में क्या करने गये थे?

आम जनता का यकीन जीतना तो उनका मकसद नहीं था।

आम सहमति बनाना भी उनका मकसद नहीं है।

फिर भी वो वहां गये।

संभवतः-

‘अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट‘ जिसे देश की सबसे बड़ी दो कम्पनियां ‘एनएमडीसी‘ और ‘सेल‘ स्थापित कर रही हैं, के बीच के करार का गवाह बनने और उन कारणों को बनाने गये थे, जिनसे भू-अधिग्रहण के लिये होने वाली सख्त कार्यवाहियों को जायज ठहराया जा सके।

इस नजरिये से देखिये तो माओवादियों के द्वारा यात्री बस का अपहरण और वहां से मोदी की रवानगी के बाद लोगों को छोड़ना, माओवादियों से ज्यादा उन लोगों की कारगुजारियां नजर आती हैं, जो मोदी के दंतेवाडा जनसभा को, चाह कर भी सफल नहीं बना सके।

अब सरकार के पास और आयोजकों के पास तर्क और स्पष्टीकरण दोनों ही हैं।

मौजूदा राजनीति में यह सब जायज है। और जिस काॅरपोरेट से सरकार संचालित हो रही है, वह काॅरपोरेट तो दुनिया भर में यही कर रही है। और बस्तर में ऐसा करने की वजह भी उनके पास है। एनएमडीसी और एस्सार कम्पनियां यहां पहले से ही खनन का काम कर रही हैं, और उस क्षेत्र के आदिवासियों के पास इन कम्पनियों का अनुभव ‘शोषण और दमन‘ के अलावा और कुछ नहीं है। टाटा कम्पनी का प्लांट भी इस क्षेत्र में आने को है। किये गये भू सर्वेक्षण के अनुसार बस्तर के किरनदूर और बचेली में 70 करोड़ टन लोहा है। लोहांडीगुडा में पिछले 10 साल से टाटा कम्पनी का प्रोजेक्ट भू-अधिग्रहण न होने की वजह से अब तक शुरू नहीं हो सका है। जो प्रस्तावित अल्ट्रा मेगा स्टील प्लांट से थोड़ी ही दूर पर है।

सरकार यदि एक बार, नये सिरे से भूमि अधिग्रहण की शुरूआत कर लेती है, तो इस शुरूआत को वह निर्णायक बनाने की लड़ाई में बदलने से बाज नहीं आयेगी। जहां भी खनिज सम्पदा है, और निजी कम्पनियों से समझौते हो चके हैं, वहां से गांव और बस्तियां उजड़ जायेगी।

अनुमान है, कि 24 हजार करोड के इस मेगा स्टील प्लांट के लिये डिलमिला और बुरूंगपाल सहित लगभग 30-35 गांवों को खाली कराना होगा। उस क्षेत्र के लोगों और आदिवासियों के लिये मुआवजा और नौकरी के आश्वासन के अलावा सरकार की अन्य कोई योजना नहीं है। और उस क्षेत्र के लोगों के पास पिछले 40 साल का अनुभव कि न तो उसे नौकरी मिलती है, ना ही उसका विकास होता है। आर्थिक समृद्धि के नाम पर उसका वास्ता उन बद्धहालियों से पड़ता है, जहां उसके पांव के नीचे ना जमीन होती है, ना हाथों के पास काम होता है। उनके जीने का ना तो कोई सबूत है, ना ही उनके मरने का कोई आंकड़ा है। वो उस जंगल की तरह हैं, जिन्हें काट कर लकडियों में बदल दिया गया और लकडियां घरों के चैखट-दरवाजे, मेज-कुर्सियां बनीं या जल गयीं? कोई नहीं जानता। हां, यह कड़वी सच्चाई है, कि जंगल वहां नहीं है।

और बस्तर-दंतेवाडा के लोग उसे फिर से जीने, को तैयार नहीं हैं। ‘जान देंगे, जमीन नहीं‘ आदिवासियों का नारा है। वो मानते हैं, कि ‘‘इससे लोगों का विकास नहीं, विनाश होगा।‘‘

इसलिये इस प्लांट के लगाने की अधिकृत घोषणा के साथ ही, जिस समय दंतेवाडा में मोदी की जनसभाा हो रही थी, उससे थोड़ी दूर ही आनन-फानन में 10 गांवों के लोगों ने बैठक की। लोगों में हताशा के साथ गहरी नाराजगी थी। डिलमिली गांव के सरपंच ने कहा- ‘‘हम अपनी जमीन नहीं देंगे।‘‘ उन्होंने गांव वालों को जेल में डालने के बाद ही प्लांट लग सकता है, जैसी बातें भी की। लेकिन सरकारें ऐसी शराफत कम ही दिखाती रही हैं, उनके सामने विकल्पों की कमी नहीं। साजिशों और अधिकारों की भी कमी नहीं। भले ही मोदी जी माओवादियों से हथियार रखने की पेशकश करें, मगर सरकार के पास हथियारों की कमी नहीं और वह काॅरपोरेट जगत के हितों के लिये या कह लें उस क्षेत्र के लोगों के विकास के लिये, हथियार उठाने से परहेज नहीं करेगी।

केंद्रिय इस्पात मंत्री तोमर ने एनडी टीवी से कहा- ‘‘मेगा स्टील प्लांट के लिये जमीन का अधिग्रहण होगा। हम जमीन खरीदेंगे। लेकिन इससे किसानों को कोई हानि नहीं होगी, बल्कि लाभ ही होगा, क्योंकि इस प्लांट के लगने से 10,000 लोगों को काम मिलेगा।‘‘ लेकिन सरकार की किसी भी बात का लोगों को विश्वास नहीं है।

मोदी की यात्रा के 24 घण्टे के भीतर ही विरोध के स्वर मुखर हो गये। लोग यह मानते हैं, कि सरकार हमेशा की तरह उन्हें धोखा दे रही है। खुली सभा में यह कहा जाता है, ‘‘जो घंटी बजाने की नौकरी नहीं दे सकते, वो मशीन चलाने की नौकरी कैसे देंगे।‘‘ लोगों की मांग कृषि को बढ़ावा देने की है। एक आम धारणां है, कि ‘‘हमें प्लांट की जरूरत नहीं, जरूरत ट्यूबवेल की है, हैण्डपम्प और सिंचाई की है।‘‘

उस क्षेत्र की ज्यादातर जमीन कई फसल के लायक उपजाउ है, भले ही मुख्य फसल घान और मक्का है, लेकिन अन्य फसलों के अलावा सब्जियां भी उगाई जाती हैं। यह उल्लेखनिय है, कि सरकार भूमि अधिग्रहण के राह में माओवादियों को सबसे बड़ी बाधा मानती है, और जनप्रतिरोध के दमन का आधार भी यही है, लेकिन यहां -विशेष रूप से जिन गांवों को उजड़ जाना है- माओवादी नहीं हैं।

माओवादियों के हाथों से हथियार सरकार छीन पायेगी या नहीं? यह तो हम नहीं जानते, मगर किसानों के हाथों से वह उनका हल जरूर छीन रही है। और यही वह बात है, जो खुले तौर पर यह कह रही है, कि जमीन के लिये संघर्ष हल और हथियार से बड़ा मुद्दा है।

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