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शरणार्थियों का संकट

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शरणार्थियों का संकट एशियायी और अफ्रीकी देशों के, यूरो-अमेरिकी लूट की योजना का परिणाम है। जिसे सरकारें हल करने के बजाये और भी बढ़ाने की योजना बना रही हैं। उस पर अमल कर रही हैं। उन्हें यूरोप तक पहुंचने से रोकने की अमानवीय कार्यवाहियां कर रही हैं।

यदि इराक, लीबिया और सीरिया को हम उठा लें तो लाखों-लाख लोगों के विस्थापन और उनके शरणार्थी बनने का नजारा हमारे सामने होगा। जिनके पास अपना देश नहीं है, और जहां वो पहुंच गये हैं, वहां रहने की उन्हें इजाजत नहीं है। वो अपने देश में रह नहीं सकते, ना ही लौट सकते हैं, वहां हवाई हमले हो रहे हैं, और हत्यारों की संगठित सेना उन्हें मारने पर आमादा है, और वो जहां हैं, उनका वहां होना सरकारी जुबान में अवैध है, उन्हें वहां टिकने नहीं दिया जायेगा, और वहां भी उन्हें उग्रराष्ट्रवादी फाॅसिस्ट ताकतें मौत के घाट उतार रही हैं। दोनों ही जगह -जहां वो रहते थे और जहां हैं- वहां सरकारें ही या तो हत्या कर रही हैं, या हत्यारों के साथ हैं।

शरणार्थियों को अपने देश में घुसने से रोकने के लिये उन्हें मरने के लिये छोड़ देने या मार डालने का विकल्प खुला है। और यूरोपीय देश यही कर रहे हैं। इसके बाद भी यदि कोई पश्चिमी देशों तक पहुंच गये हैं, तो उनके लिये शरणार्थी शिविर के नाम पर यातना शिविर है। जहां उन्हें मरना है, या अपने देश वापस भेजने के नाम पर मरने के लिये खदेड़ देना है। इसके बाद भी अपने देश से बे-दखल शरणार्थियों के रूप में मरने वालों की तादाद घट नहीं रही है। लगातार इजाफा हो रहा है।

अमेरिका और पश्चिमी ताकतों ने लीबिया जैसे देश को तबाह ही नहीं किया भू-मध्य सागर को उन्होंने शरणार्थियों के सामूहिक कब्रगाह में बदल दिया है। सैंकड़ों शरणार्थी भू-मध्य सागर में डूब कर गहरे पानी में दफन हो गये हैं। मानवता के खिलाफ जारी इस अपराध में पश्चिमी देश आकंठ डूबे हुए हैं। उन्होंने अपने को दुनिया में जो भी अच्छा है, उसका दुश्मन और जो भी बुरा है, उसका दोस्त ही प्रमाणित किया है। उन्हें खुद पर और अपनी नीतियों पर घिन तक नहीं आती। वे खुद को दुनिया के सबसे घिनौने लोग और सबसे घिनौना देश तक नहीं मानते। उन्हें अपने सभ्य होने का यकीन है।

इस बीच लीबिया और सीरिया और ऐसे ही संकटग्रस्त अफ्रीकी देशों से पलायन करने के लिये विवश सैंकड़ों लोगों को भू-मध्य सागर में डूब मरने के लिये छोड़ देने की खबरों की भरमार हो गयी है। कई खबरें आ रही हैं। पश्चिमी देशों ने पिछले कुछ सालों से, जब से ऐसे शरणार्थियों के खिलाफ भयानक अभियान शुरू किया है, तब से यूरोपीय देशों में उग्र राष्ट्रवादी फासिष्ट ताकतों में नयी जान आ गयी है। वो अपने देश में घुस आये एशियायी-अफ्रीकी शरणार्थियों के खिलाफ हिंसक वारदातें कर रहे हैं। और सरकारों का समर्थन उन्हें हासिल है।

2011 में लीबिया पर हमले से ठीक पहले, राष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद में ‘नो फ्लाई जोन‘ के प्रस्ताव को पारित करने के साथ, उसी के प्रावधानों के तहत आम नागरिकों की सुरक्षा का मुद्दा उठाया गया था, लेकिन आज 4 साल के बाद, जबकि लीबिया राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद से जूझ रहा है, आम लोगों की सामूहिक हत्या हो रही है, लोग अपनी जान बचाने के लिये पलायन करने को विवश हैं। जान जोखिम में डाल कर समुद्री रास्ते से यूरोपीय देशों में पहुंच रहे हैं, या पहंुचने की कोशिश कर रहे हैं, यूरोपीय देशों की सरकारें या तो उन्हें अपने देश से भगा रही हैं, या उन्हें मरने के लिये समुद्र में छोड़ दे रही हैं। ये वे ही देश हैं, जिन्हें लीबिया की आम जनता को कर्नल गद्दाफी की ‘तानाशाही‘ से बचाने की बड़ी फिक्र थी। वो आमादा थे तानाशाही को उखाड़ फेंकने और लोकतंत्र की स्थापना के लिये। आज वे ही देश लीबिया को तबाह करने के बाद, उसे गृहयुद्ध के हवाले कर, आम लीबियायियों के लिये अपनी समुद्री सीमायें बंद कर चुके हैं।

2014 में भू-मध्य सागर में डूब कर मरने वालों की संख्या 3600 थी, जिसमें अब तक 1600 लोगों का इजाफा हो गया है।

रसियन टीवी के एक सवाल- कि ‘‘यूरोपीय संघ के विदेश नीति के प्रमुख फेदेरिका मोगैर्नि ने यूरोपीय देशों में शरणार्थी संकट के लिये लीबिया की वर्तमान स्थिति को जिम्मेदार ठहराया हैं क्या आप इससे सहमत हैं?‘‘ के जवाब में ‘पैन अफ्रीकन न्यूज वाॅयर‘ के संपादक आबायोमी आज़कीवे ने कहा- ‘‘इसके लिये आपको पीछे जा कर यह जानने की जरूरत है, कि लीबिया का संकट क्या है? चार साल पहले पेण्टागन और नाटो ने लीबिया पर युद्ध थोप कर उसे पूरी तरह अस्थिर कर दिया। वहां सत्ता परिवर्तन किया। जिसमें 50 हजार से 1 लाख लोगों की मौत हुई। युद्ध के दौरान 26,000 हवाई हमले किये गये, 10,000 बम गिराये गये और 2 मिलियन लोगों को पलायन करना पड़ा। सत्ता परिवर्तन के बाद स्थितियां और भी बद्तर हुई क्योंकि कर्नल गद्दाफी के तख्तापलट के बाद लीबिया में कोई सरकार नहीं है।‘‘

आज लीबिया में जो भी हो रहा है, उसके लिये अमेरिका की ओबामा सरकार और यूरोपीय संघ के सदस्य देश जिम्मेदार हैं। जिन्होंने एक सुस्थिर और समृद्ध देश को तबाह कर दिया है। कर्नल गद्दाफी का तख्तापलट किया और लीबिया में कर्नल गद्दाफी के साथ अफ्रीकी महाद्वीप के विकास एवं समृद्धि की हत्या कर दी। और इन सब में इटली भी बराबर का साझेदार रहा है। जो आज इटली में घुस आये लीबियायी शरणार्थियों के खिलाफ सबसे ज्यादा हल्ला मचा रहा है।

19 अप्रैल की सुबह इटली के द्वीप लम्पेदूजा से 200 किलोमीटर दूर अप्रवासियों से भरी एक नाव डूब जाने से लगभग 800 लोगों की मौत हो गयी। ‘बेरूत सेंटर फाॅर मिडिलइस्ट स्टडी‘ की कैथरिन शेकडाम ने कहा- ‘‘औरतें, बच्चे और लोग मर रहे हैं, क्योंकि वो अपने देश की बुरी आर्थिक स्थिति और युद्ध का क्षेत्र होने की वजह से वहां से बड़ी बेसब्री से भागना चाहते हैं। मेरे खयाल से यूरोप को इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी, क्योंकि वे इस अस्थिरता के लिये किसी न किसी रूप में जिम्मेदार हैं।‘‘

उन्होंने कहा- ‘‘समस्या के मूल में लीबिया है। जहां कर्नल गद्दाफी ने अफ्रीकी देशों के विकास के लिये आर्थिक सहायता और छूटें दी। (उनके आपसी मत-भेदों का राजनीतिक समाधान किया)। अब वह समर्थन और सहयोग उन देशों के पास नहीं है। कर्नल गद्दाफी के साथ ही वह खत्म हो गया। अब उन देशों की सामाजिक और आर्थिक स्थितियां बद् से बद्त्तर हो चुकी हैं।‘‘ लोगों के पलायन की सबसे बड़ी वजह यही है, ऊपर से लीबिया में दो विरोधी सरकारों और मिलिशियायी गुटों के बीच संघर्ष चल रहा है। लोग वहां से भागने के लिये विवश हो चुके हैं।

12 अप्रैल 2015 को लीबिया से ऐसे ही लोगों को लेकर यूरोप की ओर आती हुई एक बोट (बड़ी नाव) मध्य सागर में डूब गयी। इटली के ‘इंटरनेशनल आॅर्गनाईजेशन फाॅर माइग्रेशन‘ ने ‘एजेन्सी फ्रांस प्रेस‘ को बताया कि ‘‘रिपोर्ट के अनुसार जिस समय नाव डूबी उसमें 550 लोग सवार थे।‘‘ अक्टूबर 2013 में भी इटली के लम्पेदूजा द्वीप के पास ऐसे ही 360 अप्रवासी डूब कर मरे थे।

भू-मध्य सागर में डूब कर मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 10 से 13 अप्रैल के बीच 8500 लोगों को भू-मध्य सागर पार करने की कोशिश करते समय बचाया गया। जिनमें 450 बच्चे हैं। इनमें से ज्यादातर लोगों को हिरासत में ले लिया गया, उन्हें इटैलियन कोस्ट में स्थापित शरणार्थी शिविरों में रखा गया है। उनकी निगरानी हो रही है। वो अमानवीय स्थितियों का सामना कर रहे हैं।

मध्य-पूर्व से शरणार्थियों की आयी हुई इस बाढ़ की सबसे बड़ी वजह अमेरिका, यूरोपीय संघ के सदस्य देश और उनके सहयोगी अरब देशों के द्वारा इस क्षेत्र में चलाये जा रहे सैन्य अभियानों का सीधा परिणाम है।

इराक, लीबिया और सीरिया में सत्ता परिवर्तन के लिये अमेरिकी नेतृत्व में सैन्य अभियानों का समर्थन सभी प्रमुख यूरोपीय देशों ने किया था। और उसमें हिस्सा भी लिया था। पिछले दो दशक से पश्चिमी साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा मध्य-पूर्व एशिया और अफ्रीका के बड़े क्षेत्र को राजनीतिक अस्थिरता और गृहयुद्ध के संघर्ष में ढकेल दिया गया है।

2011 में लीबिया के खिलाफ अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन के हवाई हमलों के बाद 2014 तक, अनुमान है, कि 2 मिलियन लोग लीबिया से पलायन कर चुके हैं। लीबिया की कुल आबादी 6 मिलियन थी।

सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद के खिलाफ चलाये जा रहे अमेरिकी और पश्चिमी देशों के अभियान ने उसे गृहयुद्ध के हवाले कर दिया है। जिसकी वजह से 4 मिलियन लोग सीरिया छोड़ने पर विवश हुए हैं। जिनमें से ज्यादातर लोग तुर्की में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं, और यूरोप तक पहुंचने के लिये जोखिमों से भरी समुद्री यात्रा करने के लिये मजबूर हैं।

अब अमेरिका सउदी अरब और यूरोपीय देशों के सहयोग से अपने युद्ध क्षेत्र का विस्तार यमन तक कर रहा है। जिसका सीधा सा मतलब है, कि शरणार्थियों की नयी खेप की तैयारी हो रही है। इस क्षेत्र में लोगों की बड़ी संख्या में हो रही मौत को देख कर, भू मध्य सागर क्षेत्र को यूरोपीय संघ ने ‘नो गो जोन‘ में बदल दिया है।

mediterranean-migrants4अक्टूबर 2013 की घटना के बाद से इटली ने ‘आवर सी‘ नाम से एक ‘सर्च एण्ड रेसक्यू आॅपरेशन‘ शुरू किया है। जिसका मूल मकसद लोगों को बचाने से ज्यादा ऐसे शरणार्थियों के नावों को इटली तक आने से रोकना है। उन्हें लीबिया और ट्यूनेसिया के कोस्ट के बाहर रोक कर उसे वापस उत्तरी अफ्रीका भेजना था। हांलाकि, एक अनुमान के अनुसार इस अभियान के अंतर्गत लगभग 1,50,000 शरणार्थियों को बचाया गया। नवम्बर 2014 में इस अभियान को रोक दिया गया। अब सीमित संसाधनों से ट्राइटन सर्विलांस मिशन की शुरूआत की गयी है, जिसे यूरोपीय संघ के एक्सटर्नल बाॅडर एजेन्स ‘फन्टेक्स‘ चला रही है। इस मिशन की पहली प्राथमिकता सीमा सुरक्षा है, ना कि शरणार्थियों की खोज और आपात सहायता करना। यह यूरोपीय संघ के अधिकारियों का निर्णय है, कि ‘‘प्रभावशाली आपात सहायता अभियान को समाप्त किया जाये। और लोगों को समुद्र में मरने के लिये छोड़ दिया जाये।‘‘

इसी दौरान यूरोपीय देशों के राजनीतिक दलों ने अपने देश में अप्रवासी-शरणार्थियों के खिलाफ नीतिगत अभियान शुरू कर दिया है, जिसका मकसद ऐसे लोगों को अपने देश में घुसने से रोकना है। स्थानीय जर्मन अधिकारी ने यह सुझाव भी दिया है, कि ‘‘ऐसे शरणार्थियों को पुराने यातना शिविरों में रखा जाये।‘‘

‘स्पीगल‘ ने अपने हालिया रिपोर्ट में रिफ्यूजी कैम्पों की भयावह स्थितियों के बारे में बताया है। उसने इस रिपोर्ट की शुरूआत ही एक ऐसे सीरियायी -रिफ्यूजी कैदी के इस बात से किया है, कि ‘‘सीरिया में आप तुरंत मर जाते हैं, लेकिन यहां आप धीरे-धीरे मरते हैं।‘‘

लगभग 20,000 शरणार्थी इटली पहुंचे हैं, जिनमें से ज्यादातर लोगों को युद्धकालीन कैदियों के शिविरों में रखा गया है।

राष्ट्रसंघ हाई कमिशनर फाॅर रिफ्यूजीस् और अन्य एड् एजेन्सियों के अनुमान के अनुसार -लगभग आधा मिलियन लोग लीबिया के समुद्री सीमा से लगे स्थानों पर पड़ाव डाल कर पड़े हुए हैं। वे सभी बड़ी आतुरता से यूरोप तक जाने वाली नावों में जगह पाने की कोशिश कर रहे हैं। इसके अलावा अमेरिका के द्वारा शुरू किये गये सीरिया में गृहयुद्ध की वजह से सीरिया में 1 मिलियन सीरियायी शरणार्थियों का जीवन जी रहे हैं।

लीबिया और सीरिया के अतिरिक्त अमेरिकी ड्रोन हमले, गृहयुद्ध और भीषण सूखा पड़ने की वजह से ‘हार्न आॅफ अफ्रीका‘ के इरिट्रीया, इथोपिया और सोमालिया जैसे कई देशों के लोगों का पलायन भी जारी है।

पश्चिमी अफ्रीका के देशों से आर्थिक संकट, सूखा, इबोला जैसी बीमारियां आौर साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा हो रहे विध्वंसक कार्यवाहियों की वजह से तथा जारी आतंकी हमलों के कारण भी माली, नाइजर, चाड़, बरकीना फासो, आईवरी कोस्ट, कैमरून और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक से भी लोगों का पलायन हो रहा है। उनके पास यूरोप तक पहुंचने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है।

इस शरणार्थी संकट के लिये मुख्य रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद और ओबामा सरकार जिम्मेदार है। जिसके अंतहीन सैन्य कार्यवाही, ड्रोन हमले, मिसाइलों से आक्रमण, आर्थिक प्रतिबंध और सीआईए के द्वारा सत्ता परिवर्तन के लिये तख्तापलट की कार्य योजना ने द्वितीय विश्वयुद्ध के समय पैदा हुए मानवीय संकट के बराबर का संकट पैदा कर दिया है। एशिया और अफ्रीका में सक्रीय जितने भी नामी-गिरामी खुंख्वार आतंकी संगठन हैं, उनके तार अमेरिका से जुड़े हैं, चाहे वह अल-कायदा हो या इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया या बोको हरम। वो अमेरिकी साम्राज्यवाद के लिये काम कर रहे हैं।

लीबिया, जो कि अफ्रीका का सबसे सभ्य और समृद्ध देश था, जिससे पूरे महाद्वीप की शांति एवं स्थिरता के साथ विकास की संभावनायें आकार पा रही थीं, आज अफ्रीका का सबसे अस्थिर और असुरक्षित देश बन गया है, जहां अमेरिका और पश्मिच समर्थक आतंकवादियों की टीएनसी सरकार बनी और आज वह पूरी तरह से सरकार विहीन देश है, जहां हथियारबद्ध मिलिसियायी गुटों का आपसी संघर्ष चल रहा है। जिसे बराक ओबामा ने तबाह कर दिया। कर्नल गद्दाफी के साथ ही अफ्रीकी महाद्वीप की संभावनायें मर गयी हैं, और सम्मानित हत्यारे बराक ओबामा हैं।

ओबामा की कारगुजारियां सीरिया में भी जारी हैं। जिसका एकमात्र लक्ष्य कर्नल गद्दाफी की तरह ही बशर-अल-असद सरकार का तख्तापलट करना है। जबकि राष्ट्रपति बशर की सरकार देश की लोकप्रिय चुनी हुई सरकार है और सीरिया अपने क्षेत्र का आर्थिक रूप से समृद्ध देश था। अमेरिका, पश्चिमी देश और उनके अरब सहयोगियों ने बशर-अल-असद के खिलाफ सत्ता परिवर्तन के संघर्ष को गृहयुद्ध के मुकाम तक पहुंचा दिया। आतंकियों और पेशेवर विद्रोहियों को आर्थिक सहयोग दिया, हथियारों की आपूर्ति की और विद्रोहियों को आतंकी शिविरों में सीआईए ने प्रशिक्षित किया।

सीरिया के शहरों को तबाह कर दिया गया, विशेष रूप से एलप्पो को। जो सीरिया का सबसे बड़ा आर्थिक शहर था।

आज लगभग आधा सीरिया असद सरकार की पकड़ से बाहर है। और अब अमेरिकी हवाई हमलों के साथ सउदी अरब और तुर्की की सेना उतारने की योजना बनाई जा रही है।

26 मिलियन जनसंख्या वाले इस देश की एक तिहाई आबादी अपने घरों से बे-घरबार हो चुकी है। कई मिलियन लोग पड़ोसी देश लेबनान, तुर्की और जार्डन में विस्थापितों का जीवन जी रहे हैं। जहां से वो यूरोप की ओर पलायन करने के लिये विवश हैं।

इराक में ‘इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया‘ के उदय से भी उस क्षेत्र से लाखों लोगों का पलायन हुआ है। इस्लामिक स्टेट इराक में अमेरिकी हस्तक्षेप और सीरिया में सीआईए की गतिविधियों एवं अभियानों का स्वाभाविक एवं अतिरिक्त उपज है। जो अमेरिकी सैन्य अभियानों का क्षेत्र विस्तार करने में लगा हुआ है।

माली में जो काम फ्रांस कर रहा है, अब यमन में सउदी अरब भी शरणार्थियों की नयी फसल उगाने में लगा है। हवाई हमले जारी हैं।
1990-91 के खाड़ी युद्ध के समय से ही अमेरिका का सत्तारूढ़ वर्ग लगातार युद्ध और नये युद्ध की तैयारी में लगा हुआ है। वह मध्य-पूर्व, मध्य एशिया और उत्तरी अफ्रीका के तेल भण्डार वाले क्षेत्रों पर अपना अधिकार जमाने के लिये हंस्तक्षेप और युद्ध थोपने की नीतियों से संचालित हो रहा है। इन युद्धों ने इस पूरे क्षेत्र की सामाजिक संरचना एवं समाज व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया है। परिणाम स्वरूप मानवीय संकट अपने चरम पर है।

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