Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / जमीन के लिये संघर्ष हल और हथियार से बड़ी है – 2

जमीन के लिये संघर्ष हल और हथियार से बड़ी है – 2

cecead3b-4cb0-4ef4-8c8f-c70b15281b56

सलवा जुडूम – 2

और अब….?

सरकार ग्रामिणों से, किसानों और आदिवासियों से उनकी जमीन विकास के नाम पर, निजी कम्पनियों के लिये, छीनने की लड़ाई लड़ रही है, और योजना बना रही है।

और बस्तर-दंतेवाड़ा के किसान-आदिवासी अपनी जमीन बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं, जन प्रतिरोध खड़ा कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास सरकारों के झूठ और निजी कम्पनियों की सोहबत का दशकों पुराना अनुभव है।

क्षेत्र की जनता इस बात को अच्छी तरह जानती है, कि सरकार जो कहती है, वह नहीं करती।

और निजी कम्पनियों के बारे में सरकार और मीडिया जो कहती है, वह प्रचारित झूठ के अलावा जमीनी हकीकत नहीं होता।

मोदी सरकार ने एमएमडीआर -खनन बिल- लाया है, केन्द्रिय इस्पात मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर उसका हवाला देते हुए कहते हैं, कि ‘‘उसमें ‘डिस्ट्रिक मिनरल फाउण्डेशन’ बना कर इस क्षेत्र के कल्याण के लिये पैसा जमा करने का प्रावधान है। लोगों को यहां जरूर नौकरियां मिलेंगी। उनका भला होगा। क्षेत्र का विकास होगा।‘‘

हमें अच्छी तरह याद है, कि मनमोहन सरकार ने आर्थिक विकास और उदारीकरण की राह में आने वाले अड़चनों को हटाने के लिये निजी कम्पनियों से सहयोग की अपेक्षा के साथ दो याजनायें पेश की थी-

  • सामाजिक विकास के लिये निजी कम्पनियों से आर्थिक सहयोग। ताकि जन समस्याओं के समाधान में उनकी हिस्सेदारी हो, और आपसी विश्वास का माहौल बने।

जिस पर चंद बूंद गिरे थे या फूटी कौड़ी भी नहीं आयी थी।

  • प्रधानमंत्री कार्यालय के अन्तर्गत सरकारी खर्च से आर्थिक विकास के लिये सभी विभागीय कार्यवाहियों को पूरा करके, जमीन अधिग्रहण के साथ प्रोजेक्ट की नीलामी योजना।

जिसके कभी पांव ही नहीं उगे। निजी कम्पनियों का रूख इस बारे में सकारात्मक नहीं था।

अब मोदी सरकार खनन बिल के प्रावधानों के साथ ‘डिस्ट्रिक मिनरल फाउण्डेशन‘ का घोल बना कर आयी है।

उनका आग्रह- क्षेत्र की आम जनता उन पर भरोसा करे। और यदि वह भरोसा नहीं करती है, तो ‘विकास विरोधी‘ होने का तमगा पहने है। और ऐसा वो किसी भी कीमत पर होने नहीं देंगे। देश के आर्थिक विकास को निजीकरण की राह पर लाने के लिये, उनकी सरकार बनायी गयी है।

इसलिये, मोदी जी विकास तो करेंगे ही करेंगे। चाहे आपको अच्छा लगे, या बुरा! चाहे आपकी जमीन जाये, या आपकी जान, वो आपको, देश की सवा सौ करोड़ जनता को विकास विरोधी होने नहीं देंगे। उन पर देश की, सवा सौ करोड़ लोगों की, और उस वर्ग के हितों की जिम्मेदारी है, जिसे चूक बर्दाश्त नहीं। वह पांच साल में कपड़े की तरह सरकार बदलती है, जरूरत पड़ने पर बीच में भी बदल सकती है। यही कारण है, कि मोदी जी का मशीनी बाघ घूम-घूम कर देश से लेकर विदेश तक में दहाड़ता फिर रहा है।

अब बस्तर में, हल और हथियार का हंथौड़ा।

5 मई को ‘विकास संघर्ष समिति’ की घोषणां दंतेवाड़ा में की गयी। उसके नेता छवीन्द्र कर्मा ने कहा- ‘‘समिति का मुख्य उद्देश्य बस्तर से माओवादियों को खत्म करना है।‘‘ यह एक तरह से, 25 मई 2015 से, मोओवादियों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा प्रायोजित मिलिशिया गुट है, जो उस क्षेत्र में आतंक और उत्पात का पर्याय बन गये हैं। यह राज्य सरकार द्वारा संचालित ‘सलवा जुडूम’ की पुर्नवापसी है। जिसकी घोषणा पीएम नरेन्द्र मोदी के राज्य के दौरे (बस्तर-दंतेवाड़ा) से ठीक पहले की गयी। जिसमें 24 हजार करोड़ के मेगा स्टील प्लांट लगाने के दो समझौते किये गये। आशंका इस बात की है, कि विकास संघर्ष समिति भी सलवा जुडूम की तरह ही उन क्षेत्रों में काम करेगी, जो राज्य एवं केन्द्र सरकार के ‘काॅरपोरेट डवलपमेंट माॅडल’ के विरूद्ध है। जो किसी भी कीमत पर अपनी जमीन से बेदखल होना नहीं चाहते। जिन्हें हिंसक तरीके से खदेड़ने की योजना है। जिसे माओवाद के खिलाफ राज्य सरकार समर्थित मिलिशिया -हथियारबद्ध लोगों का गुट- चलायेगी।

इस बात के सैकड़ों प्रमाण हैं, कि सरकार की नीतियों से असहमत लोगों का दमन माओवादियों के नाम से किया जाता रहा है।

सलवा जुडूम के तहत 2005 से 2009 के बीच, बस्तर क्षेत्र से छवीन्द्र कर्मा के पिता महेन्द्र कर्मा और उनके समर्थकों के द्वारा ‘माओवादियों के खिलाफ अभियान‘ चला कर 640 गांवों से 3.5 लाख आदिवासियों को बड़े ही हिंसक तरीके से उनके जमीन से बेदखल किया गया। आदिवासियों को उनकी जमीन, उनके घर-गांव से जानवरों की तरह खदेड़ा गया। ढ़ेरों लोगों को सलवा जुडूम और सरकारी सेना द्वारा चलाये जा रहे यंत्रणा शिविरों में कैद कर के रखा गया। उन्हें भयानक किस्म की शारीरिक एवं मानसिक चायतनायें दी गयीं।

महत्वपूर्ण बात यह है, कि सितम्बर 2009 के बाद से सरकार के द्वारा संचालित ‘आॅपरेशन ग्रीनहंट‘‘ ने ‘सलवा जुडूम‘ की जगह ले ली, और सलवा जुडूम के सदस्यों को ‘स्पेशल पुलिस आॅफिसर‘ की जगह दे दी गयी। जो कि सुरक्षा सेना के द्वारा पूरे क्षेत्र पर अधिकार करने के लिये चलाये जा रहे अभियान में सिक्योरिटी फोर्स के साथ रहते थे। वास्तव में यह अभियान ‘राज्य का आतंक‘ था। यहां तक कि जब 2011 में सुप्रिम कोर्ट ने ‘स्पेशल पुलिस आॅफिसर्स’ को असंवैधानिक करार दे कर उन्हें तत्काल समाप्त करने को कहा, तब सलवा जुडूम के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को न्यायालय की निगरानी से बचाने के लिये ‘‘कोया कमाण्डोस‘ में बदल दिया गया और बाकी के लोगों को राज्य सरकार ने ‘पुलिस पर्सनल‘ के रूप में बहाली दे दी।

जिसका परिणाम यह हुआ कि ‘सिक्योरिटी फोर्स‘ के कैम्पो के करीब बसे गांवों में हथियारबद्ध लोगों का भय और आतंक फैला रहा। जो राज्य सरकार के सहयोग से सुप्रिम कोर्ट के आदेशों एवं निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन था। जिसने देश की न्याय व्यवस्था के प्रति अनास्था और अविश्वास को बढ़ाने का काम किया, जिसमें पहले से ही न्याय पाना आसान काम नहीं था। सुप्रिम कोर्ट के निर्णय को मानने का ढ़ोंग रच कर राज्य सरकार ने जिस तरह उसका उल्लंघन किया, वह अपने आप में एक गंभीर सवाल है।

अब छत्तीसगढ़ -बस्तर- ग्रामिणों एवं आदिवासियों के सामने ‘सलवा जुडूम भाग – 2’ का खतरा पैदा हो गया है, जो सरकार ही नहीं, उस क्षेत्र की आम जनता के लिये निर्णायक संघर्ष की तरह है। सरकार अपने आर्थिक विकास योजनाओं को किसी भी कीमत पर लागू करना चाहेगी, और आदिवासी समुदाय किसी भी कीमत पर अपनी जमीन से बेदखल होना नहीं चाहेगा। और यह बताने की जरूरत नहीं है, कि केन्द्र की मोदी सरकार किन शर्तों के तहत सत्तारूढ़ हुई है। नरेन्द्र मोदी जिस तरह से देश-विदेश में घूम-घूम कर ‘मेक इन इण्डिया‘ के नाम पर निवेश का प्रस्ताव रख रहे हैं, और केन्द्र की सरकार जिस तरह से अर्थव्यवस्था का निजीकरण करते हुए, संवैधानिक संशोधनों के लिये कवायतें कर रही है, उसका सीधा सा अर्थ है कि संघर्ष खूनी होगा। माओवादी उसके लिये दमन का जरिया बन गये हैं। और इस बात की संभावना कम ही है, कि माओवादियों का गुरिल्ला युद्ध जनयुद्ध में बदल पायेगा। मौजूदा राष्ट्रीय परिदृश्य में वर्गगत राजनीतिक जनचेतना का जबर्दस्त अभाव है।

सलवा जुडूम भाग – 2 के खतरे को समझने के लिये इस बात को याद रखने की सख्त जरूरत है, कि 2005 मेें जब सलवा जुडूम की शुरूआत छत्तीसगढ़ में हुई थी, ‘एस्सार‘ और ‘टाटा‘ के साथ समझौते हुए थे। और उसके कुछ दिनों बाद ही सलवा जुडूम की घोषणां की गयी थी, ताकि जंगल की जमीन खदान और अन्य प्रोजेक्ट के लिये निजी कम्पनियों को सौंपा जा सके। आदिवासियों के जल, जंगल और जमीन की लड़ाई में शामिल या उससे जुड़े माओवादियों के विरोध को कुचला जा सके। सरकार के लिये आदिवासियों की मांग माओवादियों की मांग थी। सीधे तौर पर आदिवासियों के संघर्ष को माओवादियों से जोड़ दिया गया और माओवादियों के खिलाफ अभियान की शुरूआत हुई।

सलवा जुडूम – 2 का मतलब भी यही है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में मेगा स्टील प्लांट स्थापित करने के समझौते हो चुके हैं।

इन कम्पनियों के लिये सरकार को जमीन चाहिए।

और जमीन पर ग्रामिणों और आदिवासियों का वैधानिक कब्जा है।

यही विकास योजना है।

इसी विकास योजना को पूरा करने के लिये राज्य सरकार ‘विकास संघर्ष समिति’ को सामने खड़ा कर चुकी हैं जिसे सलवा जुडूम – 2 भी कहा जा रहा है। समिति के छवीन्द्र कर्मा ने कहा है- ‘‘सलवा जुडूम – 2 की भूमिका राज्य सरकार के सहयोग से इस क्षेत्र के विकास कार्य के दायित्व को पूरा करना है।‘‘ उन्होंने सलवा जुडूम और सलवा जुडूम – 2 के बीच के अन्तर के बारे में कहा- ‘‘इसमें जो नयी बात है, वह यह है, कि माओवादियों के विरूद्ध जन चेतना फैलाने के लिये बस्तर के कई हिस्सों में पदयात्रा की जायेगी। यह कार्य हम राज्य सरकार के सहयोग से करेंगे, ताकि विकास कार्य चालू रहे।‘‘

कर्मा ने स्पष्ट किया, कि ‘‘सलवा जुडूम – 2 अभियान शांतिपूर्ण रहेगा। हमारा मकसद बस्तर से माओवादियों को खत्म करना है और यहां विकास को लाना है।‘‘

यह अभियान कितना शांतिपूर्ण रहेगा? अनुमान लगाया जा सकता है। माओवादियों के खिलाफ चलाये जाने वाले इस अभियान के चैतराम अट्टामी, पी. विजय और छवीन्द्र कर्मा योजना प्रमुख हैं। यह बस्तर में उस संघर्ष की शुरूआत है, जिसकी दशा और दिशा दोनों ही तय है। लक्ष्य काॅरपोरेट जगत के लिये भू-अधिग्रहण है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top