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अमेरिका में चीन का होना

yuan-and-dollarयदि आज हम यह कहें कि संयुक्त राज्य अमेरिका के पास उसका अपना कुछ भी नहीं है, न सोच, न समझ, ना ही उसकी समृद्धि, तो अमेरिका को महान समझने वालों को गहरा झटका लगेगा। उनकी पहली प्रतिक्रिया होगी कि ”यह गलत है। झूठ है।” वो इस सच को न तो समझना चाहेंगे, ना परखना चाहेंगे। वो मानते हैं कि ”अमेरिकी साम्राज्य महान है। सुपर पावर है।” हम भी यही कहते हैं, कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा प्रणाली और वैशिवक वित्तव्यवस्था में उसकी निर्णायक सिथति, उसकी सामरिक क्षमता की तरह ही है, मगर अब वह निरापद नहीं है। वैशिवक मंदी ने उसके सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी है और उन चुनौतियों का सामना करने की उसकी क्षमता लगातार चूकती जा रही है। उसकी परेशानी यह है कि उसकी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नीतियां, जो हैं, उसे उससे भी बड़ी चुनौतियों से घेरती जा रही है। उसकी वित्त व्यवस्था पर चीन का कब्जा होता जा रहा है।

‘अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष’ के मौजूदा रिपोर्ट में यह ठोस अनुमान लगाया गया है कि ”वर्ष 2016 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में बदल जायेगा और वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था को पीछे छोड़ देगा।” क्योंकि उसकी वैशिवक हिस्सेदारी ही नहीं बढ़ रही है, बलिक वह अमेरिका में चीन के लिये, ‘स्पेशल इकोनामी जोन’ -विशेष आर्थिक क्षेत्र- भी विकसित कर रहा है, जिस पर चीन का अपना प्रभुत्व होगा। पिछले कुछ सालों से चीन की सरकार और चीन के बड़े कारपोरेशनों -जिनमें से ज्यादातर सरकारी स्वामित्व वाले कारपोरेशन हैं, और शेष कारपोरेशनों में भी सरकार की हिस्सेदारी है- ने बड़े ही सुनियोजित ढंग से अमेरिका के वित्तीय ढांचे और उसके प्राकृतिक संसाधनों की खरीदी में, चीनी निवेश को बढ़ा दिया है। अमेरिका के घरेलू व्यापार, मकान, कृषियोग्य जमीन, रियलस्टेट बिजनेश और उसके प्राकृतिक संपदा के दोहन के लिये चीन की खरीदी बढ़ गयी है। वह अमेरिका में अपने लिये विशेष आर्थिक क्षेत्रों की रचना करता जा रहा है। चीन की सरकार दुनिया के कर्इ बड़े विकसित, विकासशील देशों में भी यही कर रही है। नाइजेरिया में भी बहुत बड़े जमीन की खरीदी की गयी है।

डा0 जेरोम कोरसी के अनुसार -इस योजना को चीनी सेण्ट्रल बैंक का सहयोग प्राप्त है, जिसके अंतर्गत अमेरिका में चीन ‘विकास क्षेत्र’ (डव्लपमेण्ट जोन) की स्थापना करेगा और अमेरिका चीन को इस बात की स्वीकृति देगा कि वह चीनी स्वामित्व वाले विकास क्षेत्रों को विकसित करने के लिये, अपने देश के नागरिकों को काम पर लगायेगा। इस योजना के तहत 1.17 टि्रलियन डालर का जो कर्ज अमेरिका पर चीन का है, वह कर्ज, कर्ज से ‘इकिवटी’ में बदल जायेगा। जिसके परिणाम स्वरूप, चीन अमेरिकी व्यापार, अमेरिकी इन्फ्रास्ट्रक्चर और अमेरिका के बहुमूल्य जमीन का स्वामी बन जायेगा। और इस योजना के तहत ”किये जाने वाले सभी काम पर अमेरिकी सरकार हानि के विरूद्ध गारण्टी भी देगी।”

माना यही जा रहा है, कि ”चीन ‘मुक्त व्यापार’ का आक्रामक उपयोग अमेरिका के विरूद्ध आर्थिक हथियार के रूप में कर रहा है।” अनुमान है कि वर्ष 2012 में अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा 300 बिलियन डालर से ऊपर पहुंच जायेगा। आज अमेरिकी सरकार लगभग 100 मिलियन डालर प्रतिदिन की दर से चीन को, लिये गये कर्ज पर, ब्याज के रूप में देती है। चीन अमेरिका से जो पैसा कमाता है, वही पैसा वह अमेरिका को कर्ज के रूप में दे देता है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की हालत ऐसी हो गयी है कि वह कर्ज के बिना खड़ा नहीं रह सकती और कर्ज लेने की, कर्ज सहित ब्याज की अदायगी का बोझ, पहले से बड़ा होता जा रहा है। इसके बाद भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था को कर्ज के संकट से उबरने के लिये और बड़े कर्ज की जरूरत है। जो वह चीन से चाह रहा है, क्योंकि मौजूदा वैशिवक मंदी के दौर में भी वर्ष 2012 में चीन का आर्थिक विकासदर 7-8 प्रतिशत रहा है, और पिछले तीन दशक से उसकी अर्थव्यवस्था लगभग 10 प्रतिशत की दर से विकसित होती रही है। इसके विपरीत पिछले 10 सालों में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज 9.3 प्रतिशत की दर से प्रतिवर्ष बढ़ा है और उसकी अर्थव्यवस्था का विकास 1.8 प्रतिशत प्रतिवर्ष रहा है। यही कारण है कि 2007 में अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज, उसके सकल घरेलू उत्पाद का 66.6 प्रतिशत था, मगर वर्ष 2012 में यह बढ़ कर 103 प्रतिशत हो गया है। वर्तमान में, अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर कुल 22.2 टि्रलियन डालर का कर्ज है। जिसका भुगतान कर पाना असंभव की सीमा तक कठिन हो गया है। क्योंकि यह कर्ज लगातार बढ़ रहा है और कर्ज लेने की अनिवार्यतायें पहले से ज्यादा जरूरी होती जा रही हैं।

कल तक, पूंजी निवेश और आर्थिक समझौतों के तहत दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था पर अपना अधिपत्य बढ़ाने का जो काम अमेरिका कर रहा था, आज थोड़े बहुत बदले संदर्भों में उसके साथ अब चीन कर रहा है। जिस तरह औपनिवेशिक देशों ने अपने उपनिवेशों में गुलाम देशों में अपनी स्वतंत्र बसितयां बसार्इं, कारखाने खड़े किये, जमीनों पर कब्जा कर लिया, ठीक उसी तरह चीन अमेरिका में चीनी बसितयां बसा रहा है। वर्ष 2011 में संयुक्त राज्य के कैलिफोर्निया में जितने भी मकान बिके हैं, उनमें से 10 प्रतिशत मकान चीनी मूल के लोगों ने खरीदे हैं। और ऐसा ही अमेरिका के सभी महत्वपूर्ण राज्यों में हो रहा है।

सिनो-मिसिगन प्रापर्टी- एलएलसी (चीनी ग्रूप) ने मिसिगन राज्य के मिलान शहर के करीब 200 एकड़ जमीन की खीरीदी की है। जिस पर ‘चीनी शहर’ बनाने की योजना है। इस योजना के अंर्तगत चीन के प्राकृतिक माहौल, संस्कृति के साथ चीनी लोगों के लिये कालोनियां बसार्इ जा रही हैं। मार्च 2011 में चीनी निवेशकों ने 2.15 मिलियन डालर में फोलीडो-ओहियो के मयामी नदी पर एक रोस्टोरेण्ट काम्पलेक्स खरीदा। कुछ ही दिनों के बाद उन्होंने 3.8 मिलियन डालर में, उसी शहर में मारिना जिले में 69 एकड़ जमीन की खरीदी की गयी, जिस पर रिहायसी और व्यावसायिक उपयोग की निर्माण योजना है, जिसमें 200 मिलियन डालर खर्च किया जाना है। फोलीडो के मेयर मिकी बेल ने कहा है कि ”फोलीडो की जनसंख्या 2,87,000 है और वह यहां का चौथा सबसे बड़ा शहर है। मेरा सपना इस शहर को पर्यटन की दृषिट से अंतर्राष्ट्रीय शहर बनाने का है।”

संयुक्त राज्य अमेरिका के अन्य राज्यों में भी चीन का निवेश तेजी से बढ़ा है। आर्इडाहो स्टेटसमैन के अनुसार- ”चीनी कम्पनी सिनो औधोगिक क्षेत्र के विकास के लिये बो एयरपोर्ट के दक्षिण में 10,000 से 30,000 एकड़ जमीन पर एक ‘टेक्नोलाजी जोन’, रिटेल सेण्टर और घरों के निर्माण में दिलचस्पी ले रहा है।” चीन के अधिकारी इस तरह के टेक्नोलाजी जोन बनाने के लिये अमेरिका के कर्इ राज्यों से बातें कर रहे हैं। उसके अधिकारी ओहियो, मिसिगन और पेनसिलोनिया राज्य से भी चर्चा कर रहे हैं।

चीन और अमेरिका के बीच के चंद महत्वपूर्ण समझौते अभी रूके हुए हैं, किंतु सिथतियां जैसी बन चुकी हैं, चीन की शर्तों को मानना अमेरिकी सरकार की वित्तीय विवशता है। कैलिफोर्निया के (लाग बीच) समुद्री किनारे का महत्वपूर्ण बंदरगाह और बोस्टन के बंदरगाह का स्वामित्व अमेरिका से चीन खरीद चुका है। चीनी ओसिन शिपिंग कम्पनी की नजर अब इस्टकोस्ट और मैकिसको के महत्वपूर्ण खाड़ी के बंदरगाह पर है। चीन पहले से ही पनामा नहर तक जाने और आने के ठिकानों का स्वामित्व खरीद चुका है, जो उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप का प्रमुख जलमार्ग है।

अपनी बुरी आर्थिक सिथति की वजह से, अमेरिकी राज्यों के विधायक चीनी निवेशकों को ढूंढ रहे हैं, ताकि अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचा सकें। वो किसी भी कीमत पर अपनी वित्तव्यवस्था में निवेश चाहते हैं। बैटन रौग एल ए के मेयर किप होलडेन ने ”चीन की सरकार को एक नये टूल-वे-सिस्टम के स्वामित्व एवं उसके संचालन के अधिकार की पेशकश की है, इस शर्त के साथ कि चीन वहां निवेश के लिये पूंजी उपलब्ध कराये।” इसके अलावा भी कैलिफोर्निया, न्यूयार्क और अलास्का राज्यों के कर्इ हार्इवे, ब्रीज के लाखों-लाख डालर के प्रोजेक्ट पर चीनी कम्पनियों का अधिकार पहले से ही हो चुका है।

न्यूयार्क टार्इम्स के हाल के रिपोर्ट के अनुसार चीन के निवेशक अमेरिका में अति सुविधाओं से युक्त अपार्टमेण्ट खरीद रहे हैं। उनकी योजना आवासीय एवं व्यावसायिक प्रोजेक्टस पर पूंजी लगाने की है। चीन की कम्पनियों ने एम्पायर स्टेट बिलिडंग और वल्र्ड ट्रेड सेण्टर के कर्इ प्रमुख ‘लीज’ पर हस्ताक्षर किये हैं।” अखबार लिखता है कि ”सिर्फ जमीन और आधारभूत ढांचे में ही चीन पूंजी निवेश नहीं कर रहा है, बलिक उन्होंने पूरे अमेरिका के महत्वपूर्ण तेल और प्रकृतिक गैस के भण्डार के अधिकार को खरीद लिये हैं।”

इस काम में चीन की दो कम्पनियां प्रमुख रूप से जुड़ी हैं -पहली- चार्इना नेशनल आफसोर आर्इल कारपोरेशन और दूसरी है- सिनोपिक कारपोरेशन।

पहली कम्पनी पूरी तरह से चीन की सरकार की कम्पनी है, और दूसरी कम्पनी में सिनोपिक ग्रूप के पास 75 प्रतिशत का शेयर है। किंतु सिनोपिक वेब सार्इट के अनुसार यह कम्पनी भी पूरी तरह चीन की सरकार की कम्पनी है। मतलब अमेरिका के खनिज तेल एवं प्राकृति गैस के भण्डार पर चीन के किसी निजी कम्पनी का नहीं, बलिक चीन की सरकार का अधिकार होता जा रहा है।

वालस्ट्रीट जनरल ने एक सूची तैयार की है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि चीन की कम्पनियां किस तरह से अमेरिका के तेल एवं प्राकृतिक गैस के भण्डार को अपने नाम से खरीदती जा रही हैं। वो पूरी तरह इसे अपने अधिकार क्षेत्र में लेने की नीतियों के तहत काम कर रही हैं।

कोलोराडो- में चार्इना नेशनल आफसोर आर्इल कारपोरेशन ने चेसेपीक एनर्जी कार्प से उत्तरी कोलोराडो और दक्षिण-पूर्वि व्योमिंग में 80,000 एकड़ में से 13 शेयर 1.27 बिलियन डालर में खरीद लिया है।

लुसियाना- में सिनोपिक ने टस्कालूसा मरीन शेल के 2,65,000 एकड़ में से 13 की खरीदी डिवान एनर्जी से 2.5 बिलियन डालर में की है।

मिसिगन- में सिनोपिक ने डिवान एनर्जी से 3,50,000 एकड़ में से 13 हिस्सेदारी 2.5 बिलियन डालर में की।

ओहियो- में सिनोपिक ने डिवान एनर्जी से 2,35,000 एकड़ के यूटिका सेल में से 13 हिस्सेदारी की खरीदी 2.5 बिलियन डालर में की है।

ओक्लाहोमा- में सिनोपिक ने डिवान एनर्जी से 2,15,000 एकड़ में से 13, 2.5 बिलियन डालर में खरीद चुका है।

टेक्सास- में चार्इना नेशनल आफसोर आयल कारपोरेशन ने ‘इंगल फोर्ड सेल’ के 6,00,000 एकड़ में से 13 हिस्सेदारी 2.16 बिलियन डालर में खरीद लिया है।

व्योमिंग- में सिनोपिक ने डिवान एनर्जी के 3,20,00 एकड़ में से 13 हिस्सा 2.5 बिलियन डालर में खरीदा।

मैकिसको की खाड़ी- में चार्इना नेशनल आफसोर कारपोरेशन ने अलग से स्टेट आयल ए0एस0ए0 के कुछ और निक्सन इंक के 6 डीपवाटर वेल के माइनारटी शेयर हासिल कर लिये हैं।

इस तरह, अमेरिका के कर्इ राज्यों में उपलब्ध प्राकृतिक गैस एवं तेल के विशाल भण्डार के बड़े हिस्से पर चीन की दो कारपोरेशनों का अधिकार हो गया है। और यह प्रक्रिया आज भी जारी है। सारी दुनिया में तेल के लिये युद्ध छेड़ने वाले अमेरिका को अपने ही प्राकृतिक सम्पदा को बेचना पड़ रहा है। उसकी मुक्त बाजारवादी घरेलू नीतियों और नवउदारवादी साम्राज्यवाद की वजह से, उसकी सिथतियां ऐसी हो गयी हैं कि वह चीन की बढ़ती हिस्सेदारी को रोकने के बजाय, उन्हें सहयोग देने के लिये विवश है। चीन की कर्इ कम्पनियां, फर्म एंव कारपोरेशनों ने अमेरिका में हो रहे निलामी में बोलियां लगा कर रखी हैं। एक चीनी फर्म, डालियन वाण्डा ने ए0एम0सी0 थियेटर को खरीदने के लिये 2.6 बिलियन डालर की बोली लगायी है। इसी तरह चीन एयरक्राफ्ट मेनुफेक्चर ने भी 1.8 बिलियन डालर की बोली हाकर बीचक्राफ्ट को खरीदने के लिये लगायी है। दिसम्बर में एक चाइनीज ग्रूप, अमेरिकन इण्टरनेशनल ग्रूप -ए0आर्इ0जी0 के विमानों के लीजिंग यूनिट के 80.1 प्रतिशत हिस्सेदारी को 4.23 बिलियन डालर में खरीदने के लिये तैयार हो गया है। इसी तरह भवन से लेकर पुलों के निर्माण में चीन की कम्पनियां अलास्का, न्यूयार्क, सेनफ्रांसिसको और आकलैण्ड में सभी बड़े निर्माण कार्य पर अधिकार जमाती जा रही हैं।

सारी दुनिया में हो रहे निर्माण कार्यों में चीन की इतनी बड़ी हिस्सेदारी हो गयी है कि चीन दुनिया भर के देशों में जितना सिमेण्ट उपयोग में लाया जाता है, उससे कहीं ज्यादा सिमेंट का उपयोग अकेले करता है। यही नहीं अमेरिका में उपयोग में आने वाले छोटे-मोटे सामानों का निर्माता भी चीन बन गया है।

अमेरिका के ओलमिपक टीम में शामिल खिलाडि़यों के यूनीफार्म का निर्माता चीन था।

85 प्रतिशत कृत्रिम क्रिसमश ट्री चीन से बन कर आये थे।

नये वल्र्ड ट्रेड सेण्टर के लिये सेण्ट्रल टावर में उपयोग में आने वाले शीशों का आयात चीन से किया गया है।

चीनी सामानों ने अमेरिका के खुदरा बाजार पर कब्जा कर लिया है। वालमार्ट के द्वारा बेचे जा रहे लगभग 80 प्रतिशत सामानों का उत्पादक देश चीन है। अमेरिका से हो रहे औधोगिक पलायन का लाभ भी उसे ही मिल रहा है। आज अमेरिका से अपने औधोगिक इकार्इयों को समेटने वाली ज्यादातर बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चीन में अपना उधोग लगा चुकी हैं। पिछले एक दशक में चीन की अर्थव्यवस्था अमेरिका के अनुपात में 7 गुणा ज्यादा बढ़ी है। इकोनामी पालिसी इन्स्टीटयूट के अनुसार- अमेरिका हर साल 5 लाख नौकरियां चीन की वजह से गंवाता है। उसकी बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी की मूल वजह औधोगिक पलायन और अर्थव्यवस्था पर निजी पूंजी का अधिकार है। जिसने उसके घरेलू उधोगों में संकुचन की सिथतियां बना दी है। आज चीन के द्वारा उत्पादित सामान अमेरिकी बाजारों में अमेरिकी उत्पाद से कहीं ज्यादा सस्ते हैं। यही कारण है कि उसकी घरेलू औधोगिक इकार्इयां बंद होती जा रही हैं। और बेरोजगारी लगातार बढ़ती जा रही है। दिसम्बर 2000 से 2010 के बीच संयुक्त राज्य अमेरिका के राज्यों में बेरोजगारी की समस्या अलग-अलग दरों से बढ़ी है। ओहियो में उत्पादन के क्षेत्र में 38 प्रतिशत काम के अवसर में कमी आयी है। उत्तरी कैरोलिना में 42 प्रतिशत, मिशिगन में 48 प्रतिशत की कमियां आयी हैं। 2010 से 2012 के बीच बेरोजगारी की दर विस्फोटक होती जा रही है।

अमेरिका चीन के अनुपात में अब आटो मोबाइल से ले कर कम्प्यूटर टेक्नोलाजी तथा अन्य हार्इ टेक्नोलाजी के क्षेत्र में भी पिछड़ चुका है। 1998 में विश्व बाजार में जो सिथति हार्इटेक निर्यातक देश के रूप में अमेरिका की थी, अब वह चीन की हो गयी है। कोयला, लोहा, सोना से लेकर बीयर उत्पादन में वह काफी आगे है। वह दुनिया का प्रमुख निर्यातक और निवेशक देश बन गया है। अब अमेरिका के बैंकों को भी चीन खरीदेगा। फेडरेल रिजर्व ने इस बात की घोषणा की है कि ”अब वह चीन के बैंकों को, अमेरिका के बैंकों को खरीदने की अनुमति दे देगा।”

सिथतियां बिल्कुल साफ हैं कि अमेरिका में चीन आबाद हो रहा है, और उसकी वित्तीय व्यवस्था पर उसकी पकड़ इतनी मजबूत हो गयी है कि सारी दुनिया में महत्वपूर्ण हो रहे समानांतर वैशिवक व्यवस्था की तरह ही, अमेरिका में भी चीन की समानांतर वित्त व्यवस्था होगी। उसने अपने कर्ज को ‘इकिवटी’ में बदल कर न सिर्फ वैधानिक सिथतियां हासिल कर ली है, बलिक, अमेरिका के मुक्त बाजारवादी वित्तीय हथियार को, अपने लिये वित्तीय हथियार में बदल दिया है। आने वाला कल ही यह प्रमाणित करेगा कि यह वित्तीय साम्राज्यवाद का नया संस्करण है या कुछ और? मगर यह तय है कि दुनिया का वित्तीय संतुलन बदल रहा है।

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