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हम अपने समय का इतिहास, अपने समय का साहित्य नहीं

SANTA MILAGROSA, Philippines. Floating wooden platform in shallow Mambulao Bay in the Camarines Norte region of the Philippines.Here, a compressor miner sinks below the muddy water to begin another dive for ore that can last two or more hours.Generic Info:For small-scale gold miners, separating gold from rock and sand is primitive, tedious and often dangerous work. Miners, including teenagers and children, are often exposed to mercury, which is used to separate gold particles from crushed rock and sludge. Mercury can be absorbed through the skin, ingested in food or water, or inhaled from vapors, is highly toxic. It can cause a host of physical problems, including nerve and brain damage. Even death.Runoff containing mercury pollutes the ground water and the rivers, ultimately contaminating fish and other food sources for Filipinos.When the gold ore is contained in chunks of rocks, children often are used to break the rocks into smaller pieces. This boy holds a chunk of rock in place with a leather strap while he strikes it with a hammer. Other young boys haul buckets and bags of crushed rock to the ball millsÑhomemade contraptions outfitted with motors, pulleys and large barrels.The rock is tumbled in the barrels Ð sometimes with a mixture of mercury, occasionally with cyanide Ð until it s reduced to a sluice the consistency of runny cement. Processors pour the sluice into large shallow pans and add mercury. As they swirl the slurry, the mercury binds to the gold and sinks to the bottom of the pan. They repeat this process over and over, carefully draining off the sludge, until a film of gold mixed with mercury remains at the bottom of the pan.Miners often pan with mercury directly in the river.

एक भव्य आकृति हमारे सामने आ कर खड़ी हुई, और उसने कहा- ‘‘मैं अपने समय का लेखक हूं।‘‘

‘‘लेखक या इतिहासकार?‘‘

‘‘लेखक! वैसे, इतिहासकार भी लिखता ही है, लेकिन मैं इतिहास की नब्ज टटोल नहीं पाता, इसलिये लेखक हूं। जो देखता हूं, उसे लिखता हूं, और जो लिखता हूं, उसे जीता हूं।‘‘

‘‘अच्छी बात है।‘‘

‘‘लेकिन आज कल मेरी मुश्किलें बढ़ गयी हैं। जो देखता हूं उसे लिख नहीं पाता, जो लिखता हूं, उसे जी नहीं पाता। मैं एक धोखा बन गया हूं, और खुद को धोखा देते-देते ऊब गया हूं।‘‘

उसकी भव्य आकृति एक बौने में तब्दील हो जाती है। छोटी पतली टांगें, उभरा हुआ पेट, फूले हुए चेहरे पर चमकती हुई गोल आंखें। कागज पर लिखे शब्दों का रंग बदलता हुआ। अपने दौर के पन्ने में दर्ज सोसल मीडिया का चर्चित चेहरा, मगर इतिहास के पन्नों में दर्ज होने के लायक नहीं।

लेखक का उभरा हुआ पेट है,

फूला हुआ गोल चेहरा है।

चेहरे पर चमकती हुई गोल आंखें हैं।

पतली टांग और लटकी हुई बांहें हैं।

समय का इतिहास चुपचाप मुंह फेर लेता है।

मैं शब्दों को टटोलता हूं। शब्द बेजान हैं।

मैं लेखक को छूता हूं- सर्द रातों की बेजान ठिठुरन।

मैं लेखक से हाथ मिलाता हूं- वह चर्बी के लोंधे सा पिघल जाता है।

हमारे बीच, इतिहास बनता हुआ आज का अमानवीय समय है।

इतिहास की जो सूरत बनायी गयी है, यही वह सूरत हम इतिहास को दिखायें, तो यकीन जानिये, वह खुद को पहचान नहीं पायेगा।

बताने पर कहेगा- ‘‘नहीं! मैं कभी इतना भयानक, इतना अमानवीय या अकेला नहीं रहा हूं।‘‘

दबाव डालने पर नाराज हो जायेगा कि ‘‘आपने मेरी सूरत बिगाड़ दी है, इस कदर बिगाड दी है, कि उसे सुधारने के लिये मुझे आपकी दुनिया ही बिगाड़नी होगी।‘

उसकी नाराजगी थमती नहीं- और वह ‘जो है‘ उसे कम अक्ल लोगों की बुनावट तक कह जाता है- ‘‘हद् कर दी आप लोगों ने। भला, चंद लोगों के होने न होने से, इतिहास बनता है,?‘‘

और वह अपनी कोफ्त उन लोगों पर निकालने लगता है, जो अपने चोंगे में बैठ कर अपने को इतिहासकार कहते हैं।

उसकी नाराजगी देख कर समझा जा सकता है, कि इतिहास के साथ बड़ी बद्तमीजी हुई है।

और ऐसी बद्तमीजियां थमने के बजाये बढ़ती जा रही हैं। उन लोगों के द्वारा बढ़ती जा रही है, जो मानते हैं, कि हम इतिहास बना रहे हैं, जो मानते हैं, कि हम इतिहासकार हैं।

मैं दिल पर हाथ रख कर कहता हूं- ‘‘मैं इतिहासकार नहीं! इतिहास में मेरी कोई जगह नहीं है।‘‘

मेरे पास ऐसा चोंगा नहीं है, जिसमें बैठ कर मैं इतिहासकार बन सकूं। अपने समय का खोजी या कुछ ऐसा बन सकूं जिसकी नाड़ी देखते ही इतिहास के पन्ने खुल जायें।

नहीं! मैं अपने समय का इतिहास नहीं हूं।

जो इतिहास की बिगड़ी हुई सूरत में अपने होने की संभावनायें तलाश लेते हैं, मैं उनमें भी नहीं हूं। इसलिये इतिहास से मेरी अच्छी बनती है, और इस बनने से, किसी को कोई खास आपत्ति भी नहीं है। जिन्हें आपत्ति हो सकती है, उनकी नजरों में मैं इतना छोटा और गया-गुजरा हूं कि मेरी हरकतें उन्हें चींटी के द्वारा पहाड़ को धकेलने सी लगती है, और वो हंसते हैं।

खुद को बड़ा समझने वालों ने मान लिया है, कि ‘‘वो इतने बड़े हैं, कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।‘‘

लोगों को बेचना-खरीदना उनका शगल है।

वो जिन्हें चाहें उसे बेचते हैं, और जिसे चाहें उसे खरीदते हैं। उन्होंने दुनिया को मतलबी लोगों का बाजार बना दिया है। और दुनिया जैसी है, वैसी ही बनी रहेगी, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा।

सच बताऊं तो ‘उनका कुछ बिगड़ नहीं रहा है‘ इसलिये वो मानते हैं, कि बिगड़ भी नहीं सकता।

वो मानते हैं, कि शब्दों से हथियार नही संभलते। जिनके पीछे धन-दौलत की ताकत है।

बात तो सही है।

धन है, तो शब्द छोटे हैं।

हथियार है, तो शब्द छोटे हैं।

सरकारें हैं, तो शब्द और भी छोटे हैं।

क्योंकि इतिहास की बिगड़़ी हुई सूरत को धन, हथियार और सरकारों ने बनाया है। उन लोगों ने बनाया है, जिनके पास वित्तीय ताकतें हैं, जिनके पास सेनायें हैं, जिनके पास सरकारें हैं, या जिनकी सरकारें हैं।

इतिहास में और बनते हुए इतिहास में सभ्यता को साम्राज्य बनाने की कोशिशें की गयी हैं।

जब भी सभ्यतायें साम्राज्य बनीं आम लोगों की मुश्किलें बढ़ीं। शब्दों के साथ बड़ी ज्यादती हुई, जिनकी जुबान पर वो जीती थीं, जिनके दिलों में रहती थीं, जिनकी सोच को व्यक्त करती थीं, उनके साथ बड़ी ज्यादती हुई। लोगों का कत्ल हुआ, किताबें फूंकी गयीं, स्मारक ध्वस्त हुए, स्मृतियां खुन से तर-ब-तर हुईं। बस्तियां उजड़ीं, लोग बेघर-बार हुए। इतिहास जनशून्य हुआ।

इसके बाद भी यह सच है, कि साम्राज्य बनते और बिगड़ते रहे, मगर सभ्यतायें जीवित रहीं। सभ्यता का विकास हुआ।

‘मानव सभ्यता‘ को ‘साम्राज्य‘ बनाने की गंदी कोशिशें आज भी हो रही हैं। साम्राज्य की सभ्यता मानव सभ्यता को मिटाने की साजिश बन गयी है। इसलिये हर उस चीज को, सोच-समझ और विचार को, मिटाया जा रहा है, जो मानव सभ्यता, मानवीय संवेदना, सामाजिक जनचेतना को बढ़ा सकती है। बचा सकती है। व्यक्ति को भावशून्य, समाज को जनशून्य और प्रकृति के सजीव होने को मिटाया जा रहा है। उन्हें धातु और सामान में बदला जा रहा है।

आप खुद ही सोचिये

विचार यदि सोने की गिन्नियां हों,

संवेदनायें यदि कागज के नोट हों,

आदमी यदि उत्पादन का साधन और सामान हो,

और दुनिया यदि बाजार हो,

तो इतिहास और साहित्य कितना टकसाली होगा?

इसके बाद भी जो मारने से मरते नहीं उनके लिये मोजूदा समाज व्यवस्था में क्या होगा?

आलोकवर्द्धन

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