Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / रोजगार विहीन विकास दर

रोजगार विहीन विकास दर

sensex23112010

किसी भी देश की सरकार के दावे जितने अजीब होते हैं, उससे कहीं ज्यादा अजीब होती हैं, सरकार समर्थक मीडिया की सुर्खियां।

जीडीपी- विकास दर की सुर्खियों का जिक्र करने से पहले, यह बताना जरूरी है, कि केंद्र की मोदी सरकार अपने पूर्ववर्ती सरकारों से अलग ही नहीं हैं, काफी आगे है। वह मुनादी करती है, कि उसके ढिंढोरची घूम-घूम कर ढिंढोरा पीटते हैं, और उसकी मीडिया ऐसी-ऐसी खबरें बांचती है, कि अच्छे-भले आदमी के भी होश उड़ जायें। वह हवाओं के साथ बिना पर के उड़ने लगे। यह लगने लगे कि दिन अच्छे हो गये। मोदी जी ने जो चुनावी वायदे किये थे -जिसे उनके सिपहसालार भी शगूफा समझते हैं- वो सफल हो गये। हम कामयाब हैं।

यह कामयाबी एक साल की है, पांच साल में तो उड़ान के लिये आसमान भी छोटा पड़ जायेगा।

बड़ी हसरत है हमारी, कि ऐसा हो।

हमें, ऊंचाईयों से नीचे गिरने का डर नहीं है, क्योंकि उडान खयाली है। बे-पर है।

आम जनता के जीवन से खुशहाली दूर है। और उसे दूर ही रहना है। जिस व्यवस्था में उड़ानें भरी जा रही हैं, चाह कर भी हम वह दूरियां तय नहीं कर सकते। ये दूरियां वो लोग तय करेंगे, जो सरकारें बनाते हैं, और बड़े आराम से उनके बगल में बैठी सरकारें, अपना पर कतरवाती हैं।

देश की सरकार आम जनता के अधिकारों के पर कतर रही हैं, मोदी सरकार अपने साथ आने वाले कल के भी पर कतरवा रही है।

यह खबर है, कि जीडीपी -विकास दर- ने देश की अर्थव्यवस्था मे जोश भर दिया है।

नरेंद्र मोदी जोश में हैं।

अरूण जेटली जोश में हैं।

देश के औद्योगिक जगत में भी जोश है।

मीडिया भी जोशिया गयी है।

सुर्खियां हैं- ‘‘चीन के विकास दर को भारत ने पछाड़ा।‘‘ या ‘‘पछाड दिया।‘‘

पढ कर ऐसा लगा जैसे चीन चारोखाने चित्त पड़ा है, और देश की सरकार रिंग में गुर्राते हुए जीत के चक्कर लगा रही है। हम बाॅक्सिंग का कमाल देख रहे हैं।
आईये हम आंकड़ों का कमाल देखें।

केंद्रिय सांख्यकी विभाग ने 29 मई को वर्ष 2014-15 के विकास दर आंकड़ों को जारी किया। इन आंकड़ांे के आधार पर इसे तिमाही वार बांट कर देखें तो-

पहली तिमाही के दौरान- 6.7 प्रतिशत,

दूसरी तिमाही के दौरान- 8.4 प्रतिशत,

तीसरी तिमाही के दौरान- 6.6 प्रतिशत,

चौथी तिमाही के दौरान- 7.3 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गयी। उल्लेखनिय तथ्य यह है, कि यह वृद्धि वाणिज्य-कारोबार, होटल, परिवहन, दूरसंचार और प्रसारण सेवाओं में हुई वृद्धि की वजह से है। औद्योगिक क्षेत्र का वृद्धि दर 4.8 प्रतिशत है और कृषि उपज के क्षेत्र में 2.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी हैं।

गिरावट वहीं है, जहां भारतीय समाज का बहुसंख्यक वर्ग निवास करता है। जहां किसान हैं, श्रमिक हैं, आदिवासी हैं। और उसकी बद्हाली पहले से है। सीधा सा मतलब है, कि इस विकास दर से समाज का बहुसंख्यक वर्ग दूर है। ऐसा क्यों है? जबकि सामान्य सिद्धांत है, कि ‘‘विकास दर के साथ काम के अवसर में भी वृद्धि होती है।‘‘

यदि विकास दर खम ठोंकने लायक है, तो नौकरियां कहां गायब हैं?

क्या कहेंगे मार्केटिंग मैनेजर देश के वजीर-ए-आजम नरेंद्र मोदी?

क्या जवाब है वजीरे खजाना अरूण जेटली का?

वे लोग क्या कहेंगे जो खुश हैं, इस बात से कि देश में औद्योगिक विकास का माहौल बन रहा है। तमाम निजी कम्पनियां और उद्योग जगत खुश है।

वैसे, उनके खुश होने की वजह है, क्योंकि सरकार उन्हीं की खुशहाली के सपने बुन रही है। उन्हें की खुशहाली को आम लोगों और देश की खुशहाली बता रही है। खेती-किसानी की हालत भले ही खराब है, झूठे सपनों की फसल लहलहा रही है। कुछ लोग हैं, जो सरकार से नाराज हैं, और अपनी नाराजगी को जुबान न दे पाने की विवशता में गरिया रहे हैं, लोगों को सरकार से उम्मीदें भी हैं। वो खुश नहीं हैं, लेकिन दूसरों की खुशी की ठीक-ठीक वजह नहीं जानते।

वो नहीं जानते कि बड़ा पैसा जब छोटे पैसे को अपनी ओर खींचता है, तो श्रम की जगह पूंजी की चलने लगती है। मेहनत का महत्व घट जाता है और पूंजी की मनमानी मुनाफे की तरह बढ़ती चली जाती है।

देश के मौजूदा योजनाकार उत्पादन के क्षेत्र में निवेश की, पूंजी लगाने की बातें करते हैं। उनकी अर्थव्यवस्था की पूरी बुनावट में निजी वित्तीय पूंजी की वरियता है। ढांचागत निवेश से लेकर उत्पादन के क्षेत्र में निवेश का प्रस्ताव लिये, बिना थके प्रधानमंत्री दुुुनिया भर में चकराते फिर रहे हैं। जहां जाते हैं, वहीं गाते है। उनकी झोली में अकूत खनिज सम्पदा, खुला बाजार और सस्ते में बिकने वाले खस्ताहाल लोग हैं। जिन्हें दिखा कर वो अलग-अलग सपने दिखाते हैं-

एक के सपने में, मुनाफा ही मुनाफा है।

दूसरे के सपने में, नौकरी ही नौकरी है।

यही दोनों के सपनों की खुशहाली है।

मगर, खुशहाली जितनी बे-शर्म है, उतनी ही बे-गैरत है।

जिन्हें मुनाफा मिलना है, वह सरकारी छूट और उपहारों के साथ उन्हें मिल रहा है, लेकिन जिनकी खुशहाली नौकरियों से जुड़ी हैं, वहां बड़ी किल्लत है, सरकारी किफायतें हैं, और घर-जमीन से हाथ धोने की सोची-समझी नीतियां हैं। आर्थिक विकास के लिये जिबह होने की सीध है। ब-हरहाल, जिबह होने के लिये भी जगह नहीं है।

श्रम विभाग के सर्वेक्षण के मुताबिक ‘‘2014-15 की तीसरी तिमाही में काम के अवसर में गिरावट आयी।‘‘ रोजगार के अवसर घट गये। और घटने का यह क्रम जारी है। 2014 के अक्टूबर से दिसम्बर के बीच देश के प्रमुख 8 क्षेत्रों में 1.17 लाख नौकरियों का अवसर बना और अप्रैल से जून की तिमाही में 1.82 लाख नौकरियो के अवसर बने किंतु जुलाई से सितम्बर के बीच यह आंकड़ा 1.58 लाख हो गया। 2014-15 की पहली तिमाही में जब विकास दर 6.7 प्रतिशत था, तब 4.57 लाख नौकरियों का जुगाड़ हुआ, पिछले विकास दर के आंकड़ों के हिसाब से 5.40 लाख काम के अवसर बनना चाहिये था। देश में हर साल 1.2 करोड़ काम के अवसर का बनना जरूरी है। लेकिन ऐसा नहीं हो पाता।

रोजगार के मामले में निराशाजनक ऐसी परिस्थितियां तब हैं, जब सरकार विकास दर 7.3 प्रतिशत बता रही है, और प्रधानमंत्री सहित उनके तमाम अर्थशास्त्री यह दावा करते फिर रहे हैं, कि अर्थव्यवस्था में सुधार के आसार अच्छे हैं, काम के अवसर बढ़ेंगे। लेकिन विकास दर और काम के अवसर के बीच कोई तालमेल नहीं है। कह सकते हैं, कि ‘मनमोहन सिंह सरकार‘ का ‘उदारीकरण‘ और ‘नरेंद्र मोदी सरकार‘ का ‘निजीकरण‘ नवउदारवादी वैश्वीकरण के जुड़वा भाई हैं, जहां रोजगार के अवसर सीमित और जीडीपी विकास दर का वास्ता आम जनता के जीवन स्तर में सुधार के विरूद्ध है। मौजूदा विकास रोजगार विहीन विकास है।

मनमोहन सिंह सरकार के पहले कार्यकाल 2004-2009 के बीच देश का सकल घरेलू उत्पाद विकास दर 8 प्रतिशत से ज्यादा था। 9.3 प्रतिशत के विकास दर के उच्चतम स्तर को भी छुआ गया। लेकिन काम के अवसर की स्थितियां पहले से ज्यादा बिगड़ती चली गयीं। योजना आयोग के रिपोर्ट के अनुसार 2005 से 2009 के बीच 14 करोड़ लोगों का पलायन ग्रामीण एवं कृषि क्षेत्रों से हुआ और विनिर्माण के क्षेत्र में 5.3 करोड़ नौकरियों में कमी आयी। इसलिये विकास दर के आंकड़ों से अर्थव्यवस्था में सुधार और काम के अवसर में विस्तार का, मौजूदा बाजारपरक मुनाफे पर आधारित अर्थव्यवस्था में कोई सकारात्मक सम्बंध नहीं है। इसके विपरीत यह कृषि क्षेत्र को तबाह कर सस्ते श्रम का तलबगार है।

यही कारण है, कि उद्योग जगत के चेहरे पर मुस्कान है और प्रधानमंत्री अपने सिपहसालारों सहित खुशियों का इजहार कर रहे हैं। सरकार समर्थक मीडिया चीन को पछाड़ने की बकवास कर रही है। जहां जन-असंतोष लगातार बढ़ रहा है। जहां चीन की शि-जिनपिंग सरकार आर्थिक एवं सामाजिक असमानता को घटाने की कोशिशें कर रही है।

हम चीन के मौजूदा विकास और बाजारपरक अर्थव्यवस्था के पक्ष मे बिल्कुल नहीं हैं। इसके बाद भी, भारतीय अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्रों की क्रमिक हत्या हो रही है, वहीं चीन की अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्रों की महत्वपूर्ण मौजूदगी है। चीन अपने जीडीपी विकास दर की सुस्ती को संभालने की स्थिति में है, उसके द्वारा दुनिया भर में -खास कर तीसरी दुनिया के देशों में- ढांचागत निवेश के जरिये अपनी अर्थव्यवस्था को विस्तार देने की संभवनायें हैं। अफ्रीका और लातिनी अमेरिका में चीन का पूंजी निवेश विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से बड़ा है। जबकि भारतीय अर्थव्यवस्था में ऐसी संभावनाओं का अस्तित्व ही नहीं है। वह किसी भी मूल्य पर पूंजी निवेश की संभवनाओं को तलाशने वाला ऐसा देश है, जो अपने प्राकृतिक सम्पदा और जन श्रमशक्ति को सस्ते में नीलाम कर रहा है। वह उन वैश्विक वित्तीय ताकतों के हाथों में अपने को सौंप रहा है, जिन्होंने अपने लाभ के अलावा, कभी किसी की फिक्र नहीं की।

मनमोहन सिंह ने जिस और देश की अर्थव्यवस्था को धकेल दिया, नरेंद्र मोदी उसी ओर उसे लुढकाते जा रहे हैं। हम एक ऐसे ढलान पर हैं, जहां एक पूरी व्यवस्था लुढक रही है, मगर सरकारें इसे विकास बता रही हैं।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top