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सस्ते श्रम का जरिया

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एक बार फिर,

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को मंत्रिमण्डल ने अपनी स्वीकृति दे दी। यह तीसरी स्वीकृति है। राष्ट्रपति ने भी मंजूरी दी।

अधिनियम लोकसभा से पारित है,

राज्य सभा में अंटकी है,

संयुक्त संसदीय समिति के सामने मुद्दा हैं

मुद्दे की बात यह है, कि मोदी सरकार इसे किसी भी कीमत पर संसद से पारित कराना चाहती है। असंगठित विपक्ष इसे रोकना चाहती है। सरकार और विपक्ष दोनों के लिये ‘किसान‘ बड़ा मुद्दा है। उसका ‘हित‘ बड़ा मुद्दा है। सरकार यदि जमीन छीनने का अधिकार हासिल कर लेती है, तो वह कहेगी- ‘‘यह किसानों के हित में है।‘‘ विपक्ष यदि ऐसा करने से रोक लेती है, तो वह भी यही दावा करेगी। जबकि, किसान पहले से बद्हाल है, और उसकी बद्दहाली अभी घटने को नहीं है।

इसके बाद भी जो हो रहा है, वह पूंजीवादी जनतंत्र का दिखावटी चेहरा है, जिसने लोकतंत्र को राजनीतिक चोचलेबाजी में बदल दिया है। ऐसे संवैधानिक प्रक्रिया में बदल दिया है, जिसका लाभ सत्तारूढ वर्ग के अलावा और किसी को नहीं मिलता। जिसके लिये लोकतंत्र भारी-भरकम हाथी का ऐसा दांत है, जो उजला है। जो सिर्फ इसलिये मूल्यवान है, कि समाज का बहुसंख्यक वर्ग अपने हितों के पक्ष में  खड़ा होने के लिये, उस पर निर्भर रहे, सही अर्थों में अपने पक्ष में खड़ा न हो सके।

भारत में लोकतंत्र को सत्तारूढ़ वर्ग ने अपना हथियार बना लिया है, जबकि उसे देश की आम जनता के हाथों में होना चाहिये।

होना यही है, मगर अभी देरी है।

वास्तविक जनतंत्र भीड़ में कहीं है, मगर कहां है? जिस दिन लोगों को पता चल जायेगा, पाशा ही पलट जायेगा। मगर पाशा पलटेगा कब? कहना मुश्किल है। हम लम्बी प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।

सरकार और वैश्विक वित्तीय ताकतों के लिये, खेतिहर किसान के दिहाड़ी मजदूर में बदल रहे हैं।

देश की आम जनता को इस बात की जानकारी नहीं है, कि केंद्र की मोदी सरकर जो कर रही है, वह अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सरकार से अलग नहीं है, और मनमोहन सिंह की सरकार जो कर रही थी, वह राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जो चाहती हैं, वहीं कर रही थी। मनमोहन सरकार जिन ताकतों की देन थी, मोदी सरकार भी उन्हीं की पैदाईश है।

दोनों में फर्क क्या है?

एक के चेहरे पर शराफत थी, दूसरे के चेहरे पर दबंगई है।

एक के पास राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण की नीतियां थीं, दूसरे के पास निजीकरण राष्ट्रीय नीति है।

बस, खेल खत्म। जो राष्ट्रीय नीति है, वही राष्ट्र के हित में है। जो उसके खिलाफ वह राष्ट्रद्रोही है।

अब देख लें, कि आप कहां हैं?

हम आपके सामने कृषि नीति और व्यापर विशेषज्ञ देविंदर शर्मा का एक वक्तव्य पेश कर रहे हैं, -जो है तो मनमोहन सिंह सरकार के लिये मगर मोदी सरकार तो उन्हीं नीतियों पर, मेक इन इण्डिया का दाना-पानी लेकर सरपट दौड़ रही है।

शर्मा जी ने विकास दर और रोजगार विहीन विकास का आंकड़ा पेश करते हुए बताया कि वर्ष 2005 से 2009 के बीच 14 करोड़ लोगों ने खेती से मुंह मोड़ा। सोचा जा रहा था, कि कृषि क्षेत्र को छोड़ने वाले विनिर्माण क्षेत्र की ओर जायेंगे, मगर विनिर्माण क्षेत्र में 5.3 करोड़ नौकरियों की कमी आयी।

‘‘ऐसे में सवाल उठता है, कि खेती छोड़ने वाले 14 करोड़ और विनिर्माण क्षेत्र का त्याग करने वाले (वास्तव में हटाये गये) 5.3 करोड़ लोग आखिर गये कहां? इसका एक ही जवाब मुमकिन दिखता है, कि ये लोग या तो शहरों में दिहाड़ी मजदूर बन गये या फिर दूसरों के खेतों में काम करने वाले कृषि-श्रमिक बन गये।‘‘

2004-05 के बीच 10 वर्षों में सरकार के द्वारा औद्योगिक विकास के लिये 42 लाख करोड रूपयों की कर-राहत उद्योगपतियों को दी गयी, इस तर्क के साथ कि ‘‘उत्पादन और निर्यात के बढ़ने से काम के अवसर बढ़ेंगे।‘‘ लेकिन, ऐसा हुआ नहीं। 12 करोड़ लोगों को नौकरियां देने के एवज में मात्र 1.5 करोड़ नौकरियां ही सामने आयीं।

कृषि क्षेत्र को तबाह कर औद्योगिक विकास एवं निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था का निर्माण ऐसा जोखिम है, जो ‘विकास को रोजगार विहीन‘ बनाता है। मशीनें मानव श्रम शक्ति को बाजार से निष्काषित करने का काम सिर्फ इसलिये कर सकी कि पूरी व्यवस्था लाभ पर आधारित है। जिस वर्ग से सामाजिक दायित्वों को उठाने की अपेक्षायें सरकारें करती है, उस वर्ग को अपने मुनाफा के अलावा किसी से सरोकार रखने की समझ ही नहीं है। और इस बात को सरकारें भी अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन, आम जनता को धोखे में रखना उनकी आदत है। मनमोहन सिंह सरकार ने जो धोखा आम लोगों को दिया नरेंद्र मोदी सरकार उसे ही और बड़े पैमाने पर दे रही है।

जिस गुजरात माॅडल का प्रचार किया जाता है, उस गुजरात माॅडल का सच भी यही है, कि औद्योगिक विकास ने कृषि विकास की राहों को न सिर्फ रोक कर रखा, बल्कि उसमें गिरावट आयी और औद्योगिक विकास ने काम के अवसर बनाने के बजाये श्रम का मशीनीकरण किया। ऊंची इमारतें, बड़े औद्योगिक संस्थान या इण्डस्ट्रियल पार्क भारत जैसे देश में थोड़ी देर के लिये लोगों में कौंध पैदा जरूर कर देती है, लेकिन उनके जीवन स्तर में गिरावट के अलावा अब तक कोई चमक पैदा नहीं की है।

हाल-फिलहाल में जारी सीआरआईएसआईएल के अध्ययन का सार है, कि ‘‘2007 के बाद 3.7 करोड़ से ज्यादा किसानों ने गांव को छोड़ कर शहरों में पलायन किया था, लेकिन 1.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को कहीं कोई काम नहीं मिला, और उन्हें अपने गांवों में लौटना पड़ा।‘‘

यदि विश्व बैंक के निर्देशानुसार भारत के 40 करोड़ किसानों को कृषि के क्षेत्र से निकाल कर औद्योगिक क्षेत्र की ओर धकेलना है, ताकि औद्योगिक विकास के लिये सस्ते दर में मजदूर मिल सकें, तो मोदी सरकार क्या कर रही है, और के दावे कितने सही हैं? समझा जा सकता है।

यह भी समझा जा सकत है, कि भू-अधिग्रहण कारखानों और खदानों के लिये जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है, इन खदानों और कारखानों में काम करने के लिये मजदूरो की तादाद बढ़ाने के लिये। यह अधिग्रहण के नाम से लोगों को उनकी जमीन, उनके काम और माहौल के साथ उन्हें उनकी पीढि़यों से, बेदखल करना है। उन्हें वहां पहुंचने के लिये विवश करना है, जहां मुनाफे के चक्की में लोगों को पीसा जा रहा है। देश-विदेश के ऐसे ही लोगों को मोदी जी देश की अर्थव्यवस्था सौंप रहे हैं, उत्पादन के साधन का निजीकरण कर रहे हैं। खुला प्रस्ताव है- ‘‘भारत तैयार है।‘‘

क्या हम अपनी जमीन से बेदखल होने के लिये तैयार हैं?

क्या हम खेती-किसानी छोड़ने ने लिये तैयार है?

क्या हम अपने देश-गांवों के उजड़ने को तैयार हैं?

क्या हम अपने पुरखों को छोड़ने, जंगल-पहाड़, नदी-नालों से हाथ धोने को तैयार हैं?

क्या हम शहरों में दिहाड़ी मजदूर बनने को तैयार हैं?

हमने तो, हमेशा यही कहा- ‘‘जल, जंगल और जमीन हमारा है।‘‘ ‘‘हम जान देंगे जमीन नहीं।‘‘

मगर, आप कहते हैं- ‘‘भारत तैयार है।‘‘ हमसे नहीं, उनसे कहते हैं- ‘‘भारत बदलने के लिये तैयार है।‘‘ जिन्होंने हमें गांवों से निकाल कर, अपनी जमीन से बे-दखल कर अपने खदानों, कारखानों, घर-दुकानों, औद्योगिक संस्थानों में खटाने का निर्णय लिया है। जिन्होंने अपने देश और दुनिया को लूटा-सदियों, अब आप उनके लूट को वैधानिक बना रहे हैं, सीधे-सीधे साझेदारी का प्रस्ताव रखा है। संसद से लेकर सड़क तक आप कवायतें कर रहे हैं।

जबर्दश्त प्रचार अभियान चल रहा है।

जिसे देख कर ऐसा लगता है, जैसे परियोजनायें आसमान से टपक रही हैं, और हमारे घरों में खुशियों का रेला घुसने को ही है। देश की मोदी सरकार काम कर रही है, हमें कुछ खास नहीं करना है, बस, मोदी सरकार की बात माननी है,

जल, जंगल और जमीन की दावेदारी छोड़नी है,

अपनी जमीन से बे-दखल होना,

आर्थिक विकास के लिये अपने को सस्ते में बेचना है,

और अपनी सरकार को दूसरों के लिये काम करते हुए देख कर खुश होना है।

आर्थिक महाशक्ति बनना है,

‘फिल-गुड़‘ करना है,

‘उदारीकरण‘ हमारा हो चुका अब अपना ‘निजीकरण‘ करना है,

बस, इतना ही तो मानना है, कि निजीकरण राष्ट्रीय नीति है और अपनी फटेहाली के दम पर हमें राष्ट्र निर्माण करना है। घाटे का सौदा (कृषि) बहुत हो चुका अब मुनाफा कमाना है, मुनाफे का जरिया बनना है।

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