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अपर्णा अनेकवर्णा की पांच कविताएं

1. देश aparna anevarna

वाघा के इस पार खड़ी
ढूंढती रही देश को
‘देश’ बताने वाली रेखा
बस मिटटी मिली वहां
और मिली उस पर उगी दूब
जो दोनों तरफ की मिटटी-दूब का
विस्तार मात्र थी..
एक सी हास्यास्पद कवायद
और नाटकीय नारेबाज़ी के
बीच कितनी जोड़ी आँखें मिलीं
इस पार से उस पार..
उनमें एक सा कौतूहल मिला..
इस बीच एक झुण्ड कव्वों का
इधर से उधर उड़ गया..
उनकी ओर किसी का ध्यान
गया ही नहीं..

 

2.आज कौन सा ‘डे’ है?

माँ को माँ
बाप को पिता
बेटी को उपहार
बूढों को बुज़ुर्ग
जन्मदिन को प्यार
प्रेम, प्रेम है
और रार, तकरार
ये सब दिन की बात कहाँ अब
अब एक दिन ख़ास ये बताता है
कि हमे कौन सा पोस्ट बनाना है..
रिश्तों को कब कैसे कहाँ निभाना है..
गुलाब बाज़ार का हिस्सा है
हीरा ही असल प्रेम का किस्सा है
अब तो शब्द तक और उनके अर्थ भी
बाज़ार में गढ़े जाते हैं
एक भेड़चाल है बस..
हम उसमें. डूबते.. उतराते.. चढ़े भिड़े जाते हैं

 

3.वन

बाघ के देस में
रहते हैं वो लोग
जैसे रहते हैं
पेड़ पल्लव
द्रुमदल लताएँ
वन वल्लरी अपने
सम्बलों से लिपटी
लाड़ से पसरी हुयी
सब अलग होते हुए भी
कोई अलग नहीं..
सब एक ही प्रकृति की
अलग-अलग अभिव्यंजना
बीज रूप में चैतन्य
विराट रूप में सहज.. गौण..
हर पीठ सिहरती है
एक उस आहट के
जो अक्सर पीछे से
घात लगाती है
जिसकी बाघ-गंध
अपनी उपस्थिति
उसके आने से पहले ही
ख़ुद को दर्ज करा देती है
जीप की सुरक्षा और
पहाड़ी की ऊंचाइयों से
जब मैं ‘बाहरी’ महसूस करती
आस-पास थी ताक रही
मुझे दिखी ठीक उसी रूट पर
लकड़ियों का बोझ लिए वो
आदिवासिनी.. जिस रूट से
टी-2 के आने की सूचना थी
हमें देख-अनदेखा किया उसने
सुडौल हाथों ने एक ओर से
थमा था गट्ठर और
दूसरे में था एक हंसिया
‘सभ्यता’ का एकमात्र प्रमाण !
सजग सहज था कितना
उसका यूँ निर्भीक होना.
बाघिन को भूल में देखती
रह गयी उस वनवासिनी को
उसमें जीवित था जंगल
ठीक जैसे वह जंगल में
जीवित थी

 

4.धूमकेतु

धूमकेतु की तरह
जलकर ख़त्म हो जाउंगी
समय की परत छूते ही
कह लूं जो कहना है
जी लूं कितना जीना है
अपनी-अपनी दुनिया से बंधे
हम इतनी दूरी बनाये रखते हैं
दोनों दुनिया में कि उन्हें केंद्र
मानकर जो एक चक्कर लगायें
बस हमारे हाथ छू लेंगे.. शायद..
नज़रें पक्का मिलेंगीं.. पल भर को
कितना सधा है सब.. कितना गणितीय
तरीके से पूर्ण और दोषरहित..
धूरियाँ और दूरियां बनी रहें
तो आकर्षण भी बने रहते हैं
हैं ना…

 

5.सिंगार

जीवन से बिखरे बालों को
समेट कर एक जूड़े में..
काजल से बांध देती है
बग़ावत पर उतारू रुलाई..
एक गहरी सांस ले
बुझा देती है
भितराए सारे सवाल..
बोर हो चुके होठों को
लिपस्टिक से फिर जिंदा करती है..
गुलाबी लहरिया आँचल को
देकर एक ‘परचमिया’ अंदाज़..
अपने अवसाद पर
ज़रा सा परफ्यूम छिड़कती है..
वो एक और दिन फ़तह करने
निकल पड़ी है..

-अपर्णा अनेकवर्णा

 

परिचय :
शिक्षा: MA (अंग्रेजी साहित्य)
विशेष: लगभग 5 वर्षों तक एक प्रोडक्शन असिस्टेंट तथा एक पत्रकार के रूप में कार्यरत रहीं (पर्पल आर्क फिल्म्स तथा डेल्ही मिडडे).
निवास: नयी दिल्ली
सम्प्रति: स्वतंत्र लेखन हिंदी तथा अंग्रेजी में (दो वर्षों से)
इससे पूर्व इनकी कवितायेँ ‘गुलमोहर’, ‘तुहिन’, ‘रेसोंनंस’, ‘सारांश समय का’ काव्य संकलन, ‘कथादेश’ (मई, २०१४) तथा ‘गाथांतर’ (अप्रैल-जून, २०१४), ‘वंचित जनता’ (जनवरी, २०१५), ‘सप्तपर्णी’ (जनवरी-जून, २०१५) तथा ‘सार्थक नव्या’ (२०१४) में प्रकाशित हो चुकी हैं. ‘निकट’ के मई अंक में एक कहानी प्रकाशित हुयी है. ‘गाथांतर’, ‘स्त्रीकाल’, ‘पहली बार’, ‘हमरंग’, ‘कर्मनाशा’, ‘Hindinest.com’ ब्लोग्स पर भी प्रकाशित हुयी हैं इनकी कवितायेँ.
ब्रिटिश काव्य समूह ‘सीज़ द पोएम’ द्वारा प्रकाशित संकलन में अंग्रेजी के क्षणिकाएं प्रकाशाधीन हैं.

प्रस्तुति :-नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. आशीष मिश्र

    सारी कविताएं अच्छी हैं, अंतिम कविता ख़ास अच्छी है !

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