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वैश्विक तनाव और एक बड़े युद्ध का खतरा

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बढ़ते हुए वैश्विक तनावों के साथ हम एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं। कह सकते हैं, कि युद्ध की अनिवार्यता बढ़ाई जा रही है, और दुनिया दो खेमों में बंट चुकी है। आर्थिक एवं भू-राजनीतिक संतुलन को अपने पक्ष में बनाये रखने की लड़ाईयां शुरू हो चुकी हैं। जिसके साम्राज्यवादी चेहरे पर नवउदारवादी वैश्वीकरण का मुखौटा लगा है। जिसने ऐसे क्षेत्रीय -वास्तव में राष्ट्रीय- युद्धों की शुरूआत कर दी है, जिनमें विश्वयुद्ध के बीज पड़े हैं।

आज विश्व का कोई भी कोना सुरक्षित नहीं है।

असुरक्षा की यह स्थिति अमेरिकी वर्चस्व की लड़ाई की वजह से है, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं हो सकता कि अमेरिकी साम्राज्य अब अपने बोझ को उठाने की स्थिति में नहीं है। उसकी वैश्विक बुनावट के सामने उसकी अपनी ही संरचनागत चुनौतियां खड़ी हो गयी हैं, जिसे हल कर पाना आसान नहीं है। हालांकि, यह चुनौतियां उसे एशिया (चीन), यूरेशिया (रूस) और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों (समाजवादी) से मिल रही हैं, ऐसा वह मान कर चल रहा है, और उसकी नीति इन चुनौतियों से पार पाने या खत्म करने की है।

युद्ध की अनिवार्यता को अमेरिकी सरकार जिस तेजी से बढ़ा रही है, उसी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया रूस और चीन की कूटनीतिक एवं आर्थिक सतर्कता एवं सक्रियता है, जिसने भू-राजनीतिक संतुलन को बदल दिया है। वैश्विक असुरक्षा के विरूद्ध, सुरक्षा की नयी खोज शुरू हो गयी है। मुक्त व्यापार ने दुनिया को दो खेमों में बांट दिया है। जिसकी वजह से क्षेत्रीय समस्याओं का भी वैश्वीकरण हो जाता है।

रूसी समाचार समिति -रेगनुम के विश्लेषक यूरी बरानचिक का मानना है, कि ‘‘विश्व की महाशक्तियों के बीच के मतभेद और विरोधाभास जब सामने आते हैं, तब क्षेत्रीय युद्ध होते हैं, या 20वीं शताब्दी की तरह विश्व युद्ध होने वाला होता है।‘‘ जिसका एक ही निष्कर्ष निकलता है, कि दुनिया एक बड़े युद्ध के करीब हैं। वो लिखते हैं कि ‘‘आज भी हम उन्हीं स्थितियों का सामना कर रहे हैं। दुनिया की एकमात्र महाशक्ति का वजन और महत्व कम होता जा रहा है। पहले अमेरिका ही दुनिया के खेल के नियम तय करता था, अब रूस और चीन भी यह नियम तय करने लगे हैं। रूस सिर्फ ढ़ाल की भूमिका में है, लेकिन चीन वैश्विक वित्तीय महाशक्ति के रूप में सामने आ रहा है।‘‘

यूरी बरानचिक ने इस बात का उल्लेख किया है, कि ‘‘रूस और चीन अलग-अलग अमेरिका का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं हैं, लेकिन उनकी संयुक्त शक्तियां अमेरिका को पानी पिला सकती हैं।‘‘ उन्होंने कहा, कि ‘‘आम आदमी को फिलहाल इसकी जानकारी नहीं है, लेकिन दुनिया की राजनीति में रूचि रखने वाले लोग इस बात को अच्छी तरह देख रहे हैं, कि किस महाशक्ति का वजन कम हो रहा है, और किसका वजन लगातार बढ़ता जा रहा है।‘‘

चीन के बढ़ते हुए वजन से अमेरिकी सरकार न सिर्फ चिंतित है, बल्कि वह अपने वजन को बढ़ाने और चीन तथा रूस के वजन को घटाने के लिये उनकी आर्थिक एवं सामरिक घेराबंदी भी कर रही है। वह अपन आर्थिक वर्चस्व को बचाने के लिये अपने सामरिक वर्चस्व को झोंकने पर आमादा है। जिसका मतलब क्षेत्रीय युद्ध की संख्या में इजाफा और एक बड़े युद्ध की आशंका को अंजाम देना है। आर्थिक विकास को रोकने के लिये उसे सामरिक दिशा दे रहा है। उसके सामने कुछ भी कर गुजरने की अनिवार्यता है। चाह कर भी वह इससे बच नहीं सकता। सच यह है, कि बचना नहीं चाहता।

यदि अमेरिका अपने वर्चस्व की लड़ाई नहीं लड़़ता है, तो ‘‘पांच-सात साल में ही लोग उसका नाम लेना भूल जायेंगे।‘‘

हमाारे ख़याल से यह कुछ जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी हैं।

अमेरिकी वर्चस्व का अंत जरूरी है, और यह इतिहास का सबक है, कि ऐसा ही होगा, किंतु बाजारवाद के जिन राहों पर चल कर अमेरिका आज जिस मुकाम पर पहुंच गया है, और मुक्त व्यापार के जिन नये क्षेत्रों की रचना की अवधारणां से रूस और चीन संचालित हो रहे हैं, वह भी इतिहास के संक्रमण की एक ऐसी अवस्था है, जो नये अंर्तविरोधों  को, वैश्विक परिस्थितियों में जन्म देगी। इस बात की आशंकाओं से भी हम अपने को मुक्त नहीं कर सकते, कि एक महायुद्ध मानव सभ्यता के अंत का अध्याय भी बन सकता है। आज जो अफरा-तफरी और उथल-पुथल है वह अमेरिकी देन है। और यही अराजकता नयी संभावनाओं के साथ अमेरिकी साम्राज्य को अंत के करीब लाती जा रही है। विश्लेषक का अनुमान है, कि ‘‘अपने प्रभुत्व को जमाने की अमेरिकी अवधारणां अब कमजोर और अपंग होती जा रही है।‘‘

लेकिन, उसकी अपंगता भी उसके सक्षम होने की तरह ही घातक है। वह विश्व को शांति और स्थिरता से, राज्यों की वरियता और जनसमर्थक सरकारों से, दूर करती जा रही है। वह मानवीय मूल्य, वैश्विक जनचेतना को नस्ल, क्षेत्र और आतंकी गतिविधियों से घेर रही है, यही नहीं उसने वैश्विक वित्तयी ताकतों को युद्ध उन्मादी सा बना दिया है। अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये उसने तीसरी दुनिया के देशों पर युद्ध और गृहयुद्ध थोप दिये हैं।

इसी के परिणाम स्वरूप आज हम ऐसी दुनिया देख रहे हैं, जहां कभी यहां,, कभी वहां लड़ाईयां हो रही हैं। इन लड़ाईयों की शुरूआत भी अब जल्दी-जल्दी होने लगी है। यदि ‘अरब क्रांतियों‘ को याद करें तो यह बात साफ-साफ नजर आने लगेगी कि जनअसंतोष और जनप्रदर्शनों को तख्तापलट की कार्यवाही में बदल दिया गया। ‘अरब क्रांतियों‘ के बाद सीरिया में गृहयुद्ध भड़क उठा, फिर हांगकांग में अव्यवस्था फैली, फिर वेनेजुएला में गड़बड़ी हुई, फिर इराक में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादी गिरोह का उदय हुआ, फिर यूक्रेन में खूनी तख्तापलट हुआ, और गृहयुद्ध की शुरूआत हुई। मार्च में ब्राजील में लाखों लोग सड़कों पर उतर आये। ऐसा लग रहा है, कि ब्राजील में प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ की नीतियों का विरोध कर रहे थे, लेकिन बात कुछ और भी थी। डिल्मा रूसेफ को यह समझाया जा रहा था, कि रूस, चीन और भारत के साथ मिल कर गीत गाने की जरूरत नहीं है। फिर इसी सप्ताह चीन के एआईआईबी बैंक में शाामिल होने के जर्मनी के निर्णय से नाराज, अमेरिका के युद्ध समर्थक लाॅबी ने फ्रैंकफर्ट में भारी जनप्रदर्शन कर दिखाया।‘‘

दुनिया को अस्थिर बनाने की कोशिशें लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, दुनिया की अस्थिरता को बढ़ाने वाली अमेरिकी नीतियां असफल होती जा रही हैं। यूक्रेन में उसे कूटनीतिक पराजय का सामना करना पड़ रहा है, रूस पर किया गया वित्तीय हमला भी सफल नहीं हो सका। रूबल की तरह रूस की वापसी हो चुकी है। हांगकाग में सूचना विस्फोट के बाद चीन ने अपनी वित्तीय सक्रियता बढ़ा दी। यूरोपीय संघ के उससे जुड़े सदस्य देश ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी चीन के एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इंवेस्टमेंट बैंक में शामिल हो चुके हैं। ब्रिक्स बैंक अपना काम शुरू करने वाला है। चीनी मुद्रा युआन मुद्रा बाजार में अमेरिकी डाॅलर का विकल्प बनता जा रहा है। इस तरह वित्तीय क्षेत्र में अमेरिकी वर्चस्व के सामने कई सवाल खड़े हो गये हैं।

इसलिये यूरी बरानचिक का मानना है, कि ‘‘निकट भविष्य में अमेरिका कोई ऐसी हरकत जरूर करेगा, जो सभी नियमों और कायदों के खिलाफ होंगी। यह पहले की तरह वैश्विक सूचनात्मक धमाका भी हो सकता है।‘‘ यह ‘मीडिया वार‘ की नयी शुरूआत होगी। जिस तरह सद्दाम हुसैन और कर्नल गद्दाफी के खिलाफ माहौल बनाया गया और इराक तथा लीबिया को ध्वस्त किया गया, उसी तरह उसके निशाने पर लातिनी अमेरिका के समाजवादी देश, रूस और चीन भी हैं।

बराक ओबामा ने अमेरिकी सेना की सक्रियता बढा दी है। वो अपनी सेना को अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में नये किस्म के युद्धाभ्यास के बहाने फैला रहे हैं। यह अमेरिका में तेजी से बढ़ रहे सरकार विरोध को रोकने के लिये भी हो सकता है, और इसकी वजह वह वैश्विक तनाव भी हो सकता है, जो युद्ध को सुनिश्चित करता जा रहा है। या दोनों ही स्थितियां हो सकती हैं। अमेरिका में युद्ध समर्थक और युद्ध विरोधी लाॅबियां बन गयी हैं। अब देखना यह है, कि वैश्विक ताकतें क्या चाहती हैं?

यदि वैश्विक वित्तीय ताकतें हो रहे आर्थिक एवं भू-राजनीतिक परिवर्तन और चीन के उत्सकर्ष के पक्ष में हैं, तो एक महायुद्ध की आशंका घट जाती है, और यदि वो अमेरिकी वर्चस्व को बनाये रखना चाहती हैं, तो एक महायुद्ध सुनिश्चित है।

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