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सोहम सिंह पूनियाँ की दो कविताएं

1. पाँखें और पंजेसोऽहम सिंह

मैं आकाश में उड़ते हुए
पक्षी को नहीं देख रहा था
मैं देख रहा था
आकाश में लहराते हुए पाँखो को
धरती को अपने नीचे खोलकर
और भारहीन होकर
उड़ते हुए पक्षी की पाँखें…
मैं धरती से उठे हुए
पक्षी को नहीं देख रहा था
मैं देख रहा था
धरती पर टिके हुए उसके पंजों को
जो आकाश में उड़ते समय
जा चिपके हैं उसकी छाती से
एकसार…
मैं पक्षी की उमंग में उलझे हुए
आकाश को नहीं देख रहा था
जहाँ से रोज चुग्गा लेकर
वह पाँखें लहराता हुआ
उड़ जाता है आकाश की ओर…
पंजों ने संभाल रखी है
सीने में कहीं धरती
नहीं तो पाँख फूटते ही
दिखने लगता है आकाश
और आँखें उठी रहती हैं
ऊँचाइयों की ओर…

 

2. यादों का संदूक

गुजरे हुए दिनों के
बंद कमरे में रखा
यादों का संदूक
खोलकर देखता हूँ तो
पैरों में फटी हुई बिवाइयाँ
आँखों में फूटे हुए छाले
एक बुझी हुई मुस्कान
माथे पर कुछ शिकनें
फटे-पुराने सपने
और पत्ती-पत्ती बिखरे
कई मौसम…
और भी जाने क्या-क्या?
जिन्हें तह-ब-तह रखकर
मैं भूल गया हूँ – सब मौजूद है।
एक लंबे रास्ते में
सिमटी हुई उम्र
खोलकर देखी मैंने…
खनककर टूटी हुई कितनी सांसें
कितनी उदास भीगी हुई खुश्कियाँ
और तनहा सूखी नमी
और उनमें मुस्कुराते
उधार लिए हुए
जाने कितने चेहरों की कुढन?
जो आजतक नहीं चुके मुझसे…
मचलते हुए
मेरे बचपन की
मासूमियत के लिबास
फटे हुए लिबादे की तरह!
फिर उस बदमाश लड़की की
कदरों में सिमटी
इनायतें – शिकायतें…
गुरुजी की बेंत का दर्द…
पिताजी की फटकार, और
माँ की पुचकार…
और उसी संदूक के
कोने में पड़ा
वह आईना
जिसे मैंने रो-कर तोड़ दिया था।
आज देखता हूँ तो
नजर आते हैं – एक से
कई चेहरे
और अजीब-सी रुलाई आती है
और एक बेदम-सी हँसी भी…
कि मैं वही फटे-पुराने
सपने पहने
आँखें बचा लेता हूँ…
मगर इस पहरावे के
फटाव में
मुझे दिख जाता है
गुजरे हुए दिनों का
बंद कमरा और
खुल जाता है यादों का संदूक
जिसमें मिल जाता है
तह-ब-तह करके रखा
एक उम्र का सामान…
और खासकर वह आईना
जिसे मैंने रो-कर तोड़ दिया था
उस बदमाश लडकी की वजह से !!

-सोहम सिंह पूनियाँ

सम्पर्क :
सोहम सिंह पूनियाँ
गाँव- थिरपाली छोटी ,
जिला- चुरू (राजस्थान)

प्रस्तुति :-नित्यानंद गायेन

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