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शरणार्थियों का संकट – यूरोपीय संघ का दस सूत्रीय कार्यक्रम

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दुनिया भर में शरणार्थियों की तादाद रोज बढ़ रही है, जिसकी वजह तीसरी दुनिया के देशों में फैलायी जा रही राजनीतिक अस्थिरता है, खास कर एशिया और अफ्रीका के देशों में। इन देशों पर साम्राज्यवादी हमले हो रहे हैं, और साम्राज्यवादी हितों से संचालित हथियारबद्ध मिलिशियायी गुट और आतंकी संगठन जमीनी लड़ाई लड़ रहे हैं। जिन्हें अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों का भरपूर सहयोग मिल रहा है। वो यूरोपीय और अमेरिकी हथियारों से लड़ रहे हैं और उन्हें कूटनीतिक एवं आर्थिक सहयोग हासिल है। वो ऐसा हथियार हैं, जिन्हें साम्राज्यवादी ताकतें सैन्य हंस्तक्षेप और लोगों को मारने का जरिया बना रहे है। जिनकी वजह से लोगों का पलायन हो रहा है, लाखों-लाख लोग शरणार्थियों का जीवन जीने और मरने के लिये विवश है। ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें भूख से मरने और समुद्र में डूबने के लिये छोड़ दिया गया है।

‘इंटरनेशनल आॅर्गनाइजेशन आॅन माइग्रेशन‘ के अनुसार- ‘‘2011 से 2014 के बीच यूरोप तक पहुंचने की कोशिशों के दौरान मरने वालों की संख्या में 500 प्रतिशत से ज्यादा, इजाफा हुआ है।‘‘ जिसकी वजह वो ही यूरोपीय देशों की सरकारें हैं, जिन्होंने अमरिकी सरकार के साथ मिल कर इराक, लीबिया और सीरिया में सैन्य कार्यवाहियां की और जिन्होंने अल कायदा, उससे जुड़े आतंकी संगठन, इस्लामिक स्टेट आॅफ इराक एण्ड सीरिया और बोको-हरम के आतंकवादियों को पैदा किया। और अब वो ही यूरोपीय देश शरणार्थियों के संकट को पलायन का संकट बता कर ऐसे लोगों को यूरोप में घुसने से रोक रहे हैं।

19 अप्रैल को भू-मध्य सागर में हुए हादसे के बाद यूरोपीय संघ ने ‘शरणार्थियों के संकट‘ पर एक विशेष सम्मेलन बुलाया। इस बैठक में सदस्य देशों के विदेश एवं आंतरिक सुरक्षा मंत्रियों ने भाग लिया। 20 अप्रैल को हुई इस बैठक में दस बिंदुओं पर आपसी सहमति बनी और एक ‘टेन प्वाईंट प्लान‘ पर समझौता हुआ। जिसका मूल मकसद शरणार्थियों के खिलाफ पुलिस और सैनिक अभियानों को तेज करना और अफ्रीका में एक वृहद सैन्य हंस्तक्षेप के लिये आधार तैयार करना है।

जिसका सीधा सा मतलब उन स्थितियों को और विस्तार देना है, जिसकी वजह से पलायन हो रहा है, और शरणार्थियों की तादाद रोज बढ़ रही है। यह संकट के समाधान के नाम पर, अपने हितों के लिये लोगों की सुनियोजित हत्या है। वो अपने देश में साम्राज्यवादी हमलों और हिंसक मिलिशिया-आतंकवादियों की वजह से रह नहीं सकते और दुनिया के दूसरे देशों में उनके लिये जगह नहीं है, और यदि है, तो उन शरणार्थी शिविरों मे जहां अभाव, गंदगी और यंत्रणायें हैं। यूरोपीय देशों की सरकारें फासिस्ट संगठनों को बढ़ा कर ऐसे अप्रवासियों को मार रही हैं। उनकी नीतियां शरणार्थियों को अपने देश में घुसने से रोकना है।

समझौते की पहली धारा में ही यह सुनिश्चित किया गया है, कि ‘‘भू-मध्य सागर में संयुक्त अभियान को मजबूत किया जायेगा, जिसका नाम ट्राइटन और पाॅजीडान रखा गया है।‘‘ इन अभियानों के लिये पर्याप्त धन और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था की जायेगी। इसी के साथ वो अपने अभियानों का क्षेत्र विस्तार भी करेगा। उन्हें यह अधिकार दिया गया है, कि वो बड़े पैमाने पर हंस्तक्षेप कर सकते हैं।

फ्राॅनटेक एक यूरोपीय सीमा सुरक्षा एजेन्सी है, जो काफी बद्नाम है। जिस पर यूरोपीय संघ के लगभग 12,000 किलोमीटर भू भाग और 45,000 किलोमीटर समुद्री क्षेत्र के अभेदय् सुरक्षा -एयरटाईट सीलिंग- की जिम्मेदारी है। इसी स्थिति को पाने के लिये फ्राॅनटेक के नेतृत्व में ट्राइटन आौर पाॅजीडान को अब रिफ्यूजी और उनके बोटों के खिलाफ युद्धक कार्यवाही करने के लिये विस्तार दिया जा रहा है। ताकि यूरोपीय देशों पर बढ़ते शरणार्थियों के इस दबाव को रोका जा सके। जिसके लिये वो स्वयं जिम्मेदार हैं।

समझौते की दूसरी धारा के तहत यूरोपीय संघ की योजना सुनियोजित तरीकों से शरणार्थियों का घुसपैठ कराने वाले स्मग्लरों और उनके नावों को रोकना और उन्हें नष्ट करना है। इस बिंदू पर कहा गया है, कि अटलांटा आॅपरेशन के सकारात्मक परिणामों से यूरोपीय कमीशन को प्रेरणा लेनी चाहिये।

‘आॅपरेशन अटलांटा‘ यूरोपीय संघ द्वारा ‘हाॅर्न आॅफ अफ्रीका‘ (पूर्वी-पश्चिमी अफ्रीकी देशों) में चलाये गये सैन्य अभियान का नाम है, जिसमें यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के युद्धपोत सोमालिया के बंदरगाह के बाहर तक समुद्री डाकूओं को मार गिराते थे, उन जहाजों को तबाह कर देते थे, और जमीन पर स्थित उनके कैम्पों पर भी हमला करते थे। उन्हें नष्ट कर देते थे।

फ्राॅनटेक के डाॅयरेक्टर फबरीस लिजेरी ने इस बारे में कोई संशय नहीं छोड़ा है, कि यूरोपीय संघ द्वारा ट्राइटन को मजबूत करने का काम समुद्र में आपात बचाव कार्य के लिये नहीं है, बल्कि यह अपनी बाहरी सीमा को सुरक्षित करने के लिये उठाया गया कदम है। लिजेरी ने गाॅर्जियन से कहा- ‘‘यह रिफ्यूजियों के लिये ‘खोज और आपात सहायता‘ अभियान नहीं हो सकता, क्योंकि यह प्रमुखता से मिला हुआ आदेश नहीं है, और मैं समझता हूं कि यह यूरोपीय संघ की भी आदेशात्मक वरियता नहीं है।‘‘

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भी जोर दे कर कहा, कि हाल में हुई दूर्घटना (जिसमें 800 लोग समुद्र डब कर भर गये) के बाद भी रिफ्यूजियों की आपात सहायता करना, यूरोपीय संघ का काम नहीं है।‘‘

उल्लेखनीय बात यह है, कि यूरोपीय संघ के द्वारा स्वीकृत दस सूत्रिय कार्यक्रम में, शरणार्थियों के खिलाफ, अपनी सुरक्षा को मजबूत करने को वरियता दी गयी है, जिसमें अपनी सुरक्षा तो है, लेकिन मानवता या मानवीय संवेदनाओं का कोई निशान नहीं है। हमेशा की तरह यूरोप एशियायी एवं अफ्रीकी लोगों के लिये अमानवीय रहा हैं

समझौते की पांचवी धारा में सभी सदस्य को चेतावनी दी गयी है, कि वो इस बात को निश्चित करें कि अवैध रूप से घुस आये सभी अप्रवासी (वास्वत में शरणार्थी) के अंगुलियों के निशान लिये जायें, ताकि धारा आठ के तहत इन्हें इनके देश जल्दी से जल्दी वापस भेजा जा सके। इस सत्य की पूरी तरह से अनदेखी की गयी है, कि वे लोग किन परिस्थितियों की वजह से अपना देश छोड़ने के लिये विवश हुए हैं? उन पर हो रहे साम्राज्यवादी हमले और राजनीतिक अस्थिरता फैलाने के लिये हो रहे आतंकी हमलों को खारिज कर दिया गया है, जिसके लिये अमेरिका सहित यूरोपीय संघ पूरी तरह जिम्मेदार है।

धारा नौ में ‘वापसी कार्यक्रम‘ की मांग की गयी है, ताकि फ्राॅनटेक के साथ सहयोग कर के उन लोगों को वहां भेजा जा सके, जहां से वो आये हैं। इसके अलावा इस धारा में लीबिया के आस-पास के देशों और नाइजर को इस अभियान में शामिल करने की मांग की गयी है। जिसका स्पश्ट अर्थ है, कि यूरोपीय संघ शरणार्थियों के इस संकट से निपटने के लिये उन देशों की तानाशाही का उपयोग करने की नीति बना चुका है, जो मिस्त्र के अल्-शिशि की तरह अपने देश के नागरिकों का दमन बड़ी निर्ममता से कर रहे हैं।

इस तरह लीबिया में सैन्य र्कावाही को बढ़ाने, उसे आस-पास के देशों में विस्तार देने और सीरिया तथा इराक पर हवाई हमलों को जारी रखते हुए इन देशों में आतंकी एवं हथियारबद्ध मिलिशियाय गुटों के साथ दमन के लिये तानाशाही-सरकारों को भी शामिल किया गया है। यूरोपीय संघ शरणाथीयों के संकट से उबरने के लिये सिर्फ और सिर्फ दमन का सहारा ले रही है।

dt.common.streams.StreamServerब्रुसेल्स में हुए 23 अप्रैल की बैठक के बाद से ही यूरोपीय कमीशन ने कूटनीतिक स्तर पर, लीबिय में यूरोपीय सैन्य हस्तक्षेप की मांग करना शुरू कर दिया है। जब से स्मगलरों के जहाजों एवं नावों की निगरानी करने एवं उन्हें नष्ट करने का निर्णय हुआ है -जोकि अंतर्राष्ट्रीय कानून के विपरीत है- तब से यूरोपीय संघ के विदेश नीति की प्रमुख फेदेरिका मोगेरिनी ने मई के पहले सप्ताह में हुए सुरक्षा परिषद में उत्तरी अफ्रीका में सैन्य हंस्तक्षेप के लिये सहमति बनाने की कोशिशें शुरू कर दी है। वो अमेरिकी विदेश मंत्री जाॅन कैरी से भी मिली। फ्रांस के राष्ट्रपति होलांदे की सक्रियता भी बढ़ गयी है। उन्होंने अर्मेनियायी नरसंहार के सौ वीं साल गिरह पर रूस के राष्ट्रपति व्लाीदिमीर पुतिन से भी चर्चायें की।

जब से रूस और चीन की सरकार क द्वारा राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में ऐसे प्रस्तावों पर ‘विटो‘ की वजह से अनिश्चयता आ गयी है, तब से यूरोपीय संघ कई फ्रंट पर काम करना शुरू कर चुका है। राष्ट्रसंघ के महासचिव बान-कि-मून से आग्रह करना कि ‘यूरोपीय संघ एक विकल्प है‘, ऐसी ही संभावना की तलाश है। इसी तरह से राष्ट्रसंघ ने 2008 में ‘अटलाटा मिशन‘ को ‘वैध‘ बनाया था, जिसके तहत यूरोपीय युद्धपोतों ने हार्न आॅफ अफ्रीका में कार्यवाहियां की थी।

इस सिलसिले में यूरोपीय संघ के विदेश नीति प्रमुख मोगेरिनी इटली के प्रधानमंत्री मातेओ रेन्जि राष्ट्रसंघ माहसचिव बान-कि-मून से 27 अप्रैल को सैन-गस्टो, सिसिली के जल क्षेत्र से बाहर, हैलिकाॅप्टर केरियर में मुलाकात की। उन्होंने हैलिकाॅप्टर केरियर पर ऐसी मुलाकात, सैन्य अभियान की जरूरत को समझाते हुए, अपनी सैन्य क्षमता के प्रदर्शन के साथ किया। किंतु बान-कि-मून अप्रभावी ही रहे। उन्होंने भू-मध्य सागर में शरणार्थियों के साथ हो रहे हादसे को दुखद, दूर्भाग्यपूर्ण और दयनीय करार देते हुए उसे ‘सी आॅफ टीयर्स‘ कहा। उन्होंने तस्करों के जहाजों को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट करने के प्रति अपनी असहमति व्यक्त की। बान-कि-मून ने ला स्ताम्पा न्यूजपेपर से कहा- ‘‘जहाजों को नष्ट करना पूरी तरह उचित या कारगर उपाय नहीं है। भू-मध्य सागर की दुर्घटना का समाधान सैन्य कार्यवाहियों से नहीं निकाला जा सकता।‘‘

शरणार्थी समस्या के समाधान की यूरोपीय संघ की नीतियों को अब तक किसी भी रूप में समर्थन नहीं मिल सका है। यदि राष्ट्रसंघ में भी सहमति नहीं बनी तो माना जा रहा है, कि वह अपनी नीतियों को किसी तीसरे तरीके के साथ लागू करेगा। एक आॅन लाइन मैगजिन इयूआॅब्जर्वर में मोगेरिनी ने कहा- ‘‘यदि राष्ट्रसंघ में हमें समर्थन नहीं मिलता है, तो हमें कोई अन्य उपाय निकालना होगा। इसमें थोड़ा समय लगेगा।‘‘

यूरोपीय संघ लीबिया की सरकार के साथ संयुक्त अभियान चलाने की पेशकश कर रहा है, लेकिन लीबिया में एक-दूसरे की विरोधी दो सरकारें हैं और दर्जनों मिलिशियायी गुट हैं। इसलिये यूरोपीय संघ लीबिया में एक ऐसी सरकर चाहता है, जो उसके सैन्य हस्तक्षेप की नीतियों का समर्थन करे।

लीबिया के त्रिपोली पर काबिज डाॅन सरकार, जिसे यूरोपीय संघ मान्यता नहीं देता है, ने कहा है, कि ‘‘जहाजों को नष्ट करने के लिये किसी भी तरह की सैन्य कार्यवाही को वह स्वीकार नहीं करेगी। इसे लीबिया पर किया गया हमला माना जायेगा।‘‘ यहां तक कि ‘जनरल खलीफा हफ्तार, तबरूक सरकार‘ के आर्मी चीफ -जिसे यूरोपीय संघ ने मान्यता दी है- ने सीएनएन पर अप्रैल के अंत में कहा, कि वो यूरोपीय संघ के सैन्य अभियान के साथ सहयोग नहीं करेंगे। ‘‘यह एक अविवेकपूर्ण निर्णय है।‘‘ उन्होंने यह भी कहा, कि ‘‘इस बारे में हमसे सम्पर्क नहीं किया गया है।‘‘

अपने मूल उद्देश्य को छुपाने के लिये यूरोपीय संघ और उसके प्रमुख सदस्य  देशों  के प्रमुख इस अभियान को अलग-अलग नाम और अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते हैं। इटली के प्रधानमंत्री इसे ‘इण्टरनेशनल पुलिस आॅपरेशन‘ कहते हैं। जिसके तहत लीबिया के बंदरगाह पर युद्धपोतों की तैनाती से ‘‘औपनिवेशिक युद्ध का खतरा‘‘ बढ़ जायेगा।

यूरोपीय संघ के शरणार्थी विरोधी सैन्य अभियान का अंत लीबिया के बंदरगाह पर नहीं होता है। अपने दस सूत्रीय योजना के साथ उन्होंने शपथ लिया है, कि ‘‘वो ट्यूनिसिया, मिस्त्र, सूडान, माली और नाइजर को नियंत्रित करने और उन्हें निर्देशित करने के इस अभियान को बढ़ायेगा।‘‘ योजना के अनुसार- उन देशों में मौजूद यूरोपीय सेना का उपयोग करके ही शरणार्थी समस्या के साथ अन्य नीतियों को इस तरह लागू किया जायेगा कि इन देशों से यूरोप तक पहुंचने वाले शरणार्थियों को उनके देश में ही यूरोपीय सेना रोक लेगी।

अफ्रीका में यूरोपीय संघ शरणार्थी शिविर के निर्माण की योजना बना रहा है। इटली के सरकार ने नाइजर में ऐसे शिविर का निर्माण कार्य भी शुरू कर दिया है। इस तरह यूरोप जाने वाले -पलायन के लिये विवश- लोगों को इन शिविरों में रोकने और उन्हें अपने देश वापस भेजने की योजना है। एक अन्य शिविर 2012 में ट्यूनिसिया  में बनाया गया था, जो मानवाधिकार कांउसिल के सहयोग से संचालित होता है, जहां हजारों शरणार्थी अमानवीय स्थितियों में कैद हैं, उन्हें न तो पर्याप्त खाना मिलता है, ना ही पानी और शौंच की व्यवस्था है। वहां पिछले 18 महीनों से लोगों को रखा गया है।

जर्मन सरकार ने अब तक 195 शरणार्थियों को स्वीकार किया है, बाकी लोगों को यूंही छोड़ दिया गया है। लेकिन यह स्वीकृति जर्मनी में न हो कर वास्तव में वहां के शरणार्थी शिविर में है। यूरोपीय देशों की कोशिश शरणार्थियों को यूरोप में घुसने से रोकने की है।

अप्रैल 2014 से 2015 के बीच समुद्री मार्ग से लगभग -50,000 अफ्रीकी और एशियायी मूल के लोग घुस आये हैं। यह घुसपैठ ज्यादातर इटली के रास्ते हुआ- लगभग 30,000 लोग। लेकिन यूरोपीय संघ के ब्रुसेल्स बैठक में, जिन 5000 लोगों का स्वीकार करने की पूर्व सहमति बनी थी, उसे निरस्त कर दिया गया।

यूरोपीय देशों और अमेरिकी सरकार तथा इन देशों की मीडिया शरणार्थी संकट और भू-मध्य सागर में उनके डूबने की दूर्धटनाओं के लिये तस्करों को जिम्मेदार ठहरा रही है, उनके अनुसार- ‘‘लीबिया से पलायन करने वाले ऐसे लोग हैं, जो लीबिया (तथा अन्य देशों) के संकट से भाग कर अपने लिये ज्यादा लाभ कमाना चाहते हैं।‘‘ वो उन्हें शरणार्थी से ज्यादा अप्रवासी करार दे रहे हैं। वो इस सच्चाई की पूरी तरह अनदेखी कर रहे हैं, कि आज लीबिया और अन्य एशियायी और अफ्रीकी देशों का जो संकट है, उसके लिये यूरोप और अमेरिकी सरकार की नीतियां जिम्मेदार हैं। जिसके तहत उनकी सेना हवाई हमले कर रही है, उन देशों के हथियारबद्ध मिलिशियायी गुटों एवं आतंकवादियों को हथियार से लेकर आर्थिक सहयोग दे रही है। उनके द्वारा फैलाये गये राजनीतिक अस्थिरता का एक ही मकसद है- तख्तापलट।

2011 में अमेरिकी नेतृत्व में -नाटो के हमले और कर्नल गद्दाफी की तख्तापलट और हत्या के बाद लीबिया अमेरिकी लोकतंत्र के राजनीतिक अराजकता का शिकार है, जहां आतंकी संगठन और हथियारबद्ध मिलिशियायी गुटों की बंटी हुई सरकारें हैं। लीबिया मौत के दस्तों वाला देश बन गया है। जहां उप-सहारा क्षेत्र के कामगर और अफ्रीकी मूल के लीबियायीयों को ‘अमेरिकी क्रांतिकारी‘ या तो जिंदा जला रहे हैं, या मौत के घाट उतार रहे हैं। इसके अलावा दसों हजार से ज्यादा लोगों को अवैध रूप से बंदी बन कर उन्हें यातनायें दी जा रही हैं। अपनी जान बचाने के लिये हजारों-हजार लोगों का पलायन हो रहा है। यह पलायन उनकी मर्जी नहीं, अपने को बचाने और जीने की जी तोड़ कोशिशें है। जिनके पीछे साम्राज्यवादी युद्ध और पेशेवर हत्यारों को लगा दिया गया है।

2011 के बाद -लीबिया के पतन के साथ ही अफ्रीकी देशों में यूरोप और अमेरिकी समर्थक आतंकी संगठनों की बाढ़ सी आ गयी है। इस्लामिक स्टेट और बोको-हरम आतंक का पर्याय बन गये हैं।

और अब आम अफ्रीकियों को मारने के इस खेल में यूरोपीय संघ अपने दस सूत्री कार्यक्रम के साथ शरणार्थियों के खिलाफ अपनी कार्यवाहियों के जरिये अफ्रीका में सैन्य विस्तार की योजना बना चुका है।

आने वाले कल में शरणार्थियों का यह संकट या तो बढ़ेगा, या पलायन की दिशा बदलेगी, या इन ताकतों के खिलाफ जन अभियानों की शुरूआत होगी, यह तय है।

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