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आर्थिक सीमाओं को लांघता यूरोप का वित्तीय संकट

A demonstrator struggles with Spanish National Police riot officers outside the the Spanish parliament in Madridयूरोप का कर्ज संकट आर्थिक सीमाओं को लांघ कर, सामाजिक और राजनीतिक संकट में बदल चुका है। आम जनता अपनी समस्याओं का समाधान चाहती है, मगर सरकारें अपने देश की व्यवस्था को बचाने में लगी हैं, जिन पर यूरोपीय संघ, और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक का दबाव है, विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का दबाव है, जो अपनी चरमराती वैशिवक वित्त व्यवस्था को, किसी भी कीमत पर बचाना चाहती है। उनकी परेशानी यह है कि अमेरिका से शुरू हुए संकट को वो अप्रत्याशित मान रही है, जबकि यह पूर्व निर्धारित है। पूंजीवाद का संकटग्रस्त होना, इतिहास का नियम नियंत्रित सिद्धांत है, क्योंकि, यह एक संक्रमणकालीन व्यवस्था है। जिसका बदलना तय है। वित्तीय पूंजी का राज्य के नियंत्रण से बाहर होना, इस समस्या का मूल है।

वित्तीय गिरावट और बढ़ता जनअसंतोष, यूरोपीय देशों की पहचान बन गयी है। गहरा चुके संकट का क्षेत्र विस्तार भी तेजी से हो रहा है। ग्रीस और पुर्तगाल की समस्या सुलझी नहीं, और स्पेन, इटली, आयरलैण्ड, निदरलैण्ड और साइप्रस जैसे देश भी संकटग्रस्त हो गये। बि्रटेन भी इसी राह पर आगे बढ़ गया। यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी और फ्रांस की हालत भी बिगड़ती जा रही है। ग्रीस और स्पेन की तरह यहां भी जनप्रदर्शनों की संख्या रोज बढ़ती जा रही है। भूख, गरीबी और बेरोजगारी से बचने के लिये सरकारी कटौती, करों का बढ़ता बोझ और बढ़ती हुर्इ महंगार्इ के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग अब, बाजारवादी वित्तव्यवस्था, यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के खिलाफ नारे लगाने लगे हैं। आधी से अधिक आबादी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर आ गयी है। सरकारें और आम जनता एक-दूसरे के विरूद्ध खड़ी हो गयी हैं। लोगों ने स्वीकार कर लिया है कि मौजूदा व्यवस्था और यूरोपीय संघ का बिखरना तय है।

यूरोजोन का कुल कर्ज 2007 में उसके सकल घरेलू उत्पादन -जीडीपी- का 68.4 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़ कर 87.3 प्रतिशत हो गया है। इन 17 देशों के अलावा यूरोपीय संघ के देशों की हालत भी यही है। 2007 से 2012 के बीच के आंकड़ों पर यदि हम गौर करें तो, यह बात बिल्कुल साफ हो जायेगी कि यूरोपीय देशों में, संभलने की संभावनायें लगातार घटती जा रही हैं।
यूरोप की 5 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की हालत गंभीर है।

वर्ष 2007 में जर्मनी का कर्ज उसके जीडीपी का 67.6 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़ कर 80.5 प्रतिशत हो गया है।

वर्ष 2007 में फ्रांस का कर्ज उसके जीडीपी का 63.7 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़ कर 86 प्रतिशत हो गया है।

वर्ष 2007 में इटली का कर्ज उसके जीडीपी का 106.6 प्रतिशत था, जो बढ़ कर 2012 में 120.7 प्रतिशत हो गया है।

वर्ष 2007 में स्पेन का कर्ज, उसके जीडीपी का 39.6 प्रतिशत था, जो 2012 में बढ़ कर 69.3 प्रतिशत हो गया है।

वर्ष 2007 में पुर्तगाल का कर्ज, उसके जीडीपी का 63.9 प्रतिशत था, जो बढ़ कर 2012 में 108 प्रतिशत हो गया है।

यूरोजोन से बाहर किंतु यूरोपीय संघ की बड़ी वित्तव्यवस्था बि्रटेन की सिथति भी अच्छी नहीं है। उस पर 2007 में कर्ज का बोझ उसके जीडीपी का 43.4 प्रतिशत था, जो 2012 में 85 प्रतिशत के आंकड़े को पार कर गया है। आयरलैण्ड 24.8 प्रतिशत से बढ़कर 106.4 प्रतिशत तथा ग्रीस 106.1 प्रतिशत से 170.6 प्रतिशत के आंकडे को छू रहा है।

विकास दर में आयी इन्हीं गिरावटों का परिणाम है कि चीन और जापान के विकास दर में गिरावट आयी है। जापान का कर्ज 2007 में उसके जीडीपी का 172 प्रतिशत था, किंतु 2012 में 211.7 प्रतिशत हो गया है। यूरोपीय मंदी का सीधा प्रभाव दुनिया के देशों पर पड़ रहा है। जो अप्रत्याशित नहीं है। जर्मनी और फ्रांस की वित्त व्यवस्था में दर्ज की गयी गिरावट ने यह प्रमाणित कर दिया है कि यूरोपीय संकट को रोकने के लिये तय की गयी नीतियां एक सिरे से ही गलत थीं। उसने यह भी प्रमाणित कर दिया है कि जन समस्याओं की अनदेखी कर के किसी भी व्यवस्था को बचाया नहीं जा सकता है। यूरोजोन की बेरोजगारी दर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर 11.8 प्रतिशत पहुंच गया है। लगातार पिछले 10 महीनों से फ्रांस और जर्मनी के उत्पादन में भारी गिरावट आयी है। यह गिरावट स्पेन में पिछले 20 महीनों से जारी है। जहां बेरोजगारी दर 26.6 प्रतिशत है। स्पेन में बैंकों के द्वारा घरों को खाली कराने की कार्यवाही से कम से कम 35,00,000 परिवारों को अपने घरों से हाथ धोना पड़ा है। ये वो लोग हैं जिन के सिर पर न तो छत है, ना ही कोर्इ निशिचत काम है। यूरोपीय कमीशन और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा स्पेन के बैंकों पर कर्ज की वसूली का गहरा दबाव है।

ग्रीस की बैंक व्यवस्था में, इस समय 20 प्रतिशत ऐसे घरेलू लोन हैं, जिनकी वसूली नहीं की जा सकती। यहां बेरोजगारी दर 26 प्रतिशत हो गयी है, और युवाओं में यह बेरोजगारी 50 प्रतिशत से ज्यादा है। आयरलैण्ड की कुल आबादी के 22 प्रतिशत लोग बेकार हैं। वर्ष 2009 के अनुपात में, आज ग्रीस में गरीबी की सीमारेखा पर 36 प्रतिशत लोग खड़े हैं। जबकि पहले मात्र 20 प्रतिशत लोग ऐसे थे।

ग्रीस – यूरोपीय कर्जदाताओं और सरकार के विरूद्ध प्रदर्शन एवं हड़ताल

22 जनवरी को ग्रीस के मेट्रो कामगरों ने कोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें पिछले 6 दिनों से चले आ रहे हड़ताल को समाप्त करने का आदेश था। हड़ताली कामगर सरकार के द्वारा की जानेवाली कटौतियों का विरोध कर रहे हैं। उन्होंने काम बंद कर दिया है। मेट्रो परिचालन की वैकलिपक व्यवस्था सरकार के पास नहीं है। ग्रीस की कोर्ट ने ‘एथेन्स वरकर्स यूनियन’ के खिलाफ कार्यवाही का आदेश देते हुए, मजदूरों को जबरन काम पर लगाने के लिये, सरकार को छूट दे दी है। यूनियन की मांग है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के वेतनमान में बदलाव लाने की योजना बंद करे, जो यूरोजोन के कर्जदाताओं को संतुष्ट करने के लिये है। ऐसा होने पर, कामगरों के पास इतना वेतन भी नहीं आयेगा, कि वो दो वक्त की रोटी भी चला सकें।

यूनियन प्रमुख एनटोनिस स्तामातोपोलोस ने कहा है कि ”इन कटौतियों से जो लोग प्रतिमाह 1300 यूरो कमाते हैं, उनका वेतन 700 यूरो हो जायेगा। आज हम जितना कमा रहे हैं, उसमें तो जी नहीं पा रहे हैं, कटौती के बाद हमारा क्या होगा?” उन्होंने सरकार को जनधु्रवीकरण की चेतावनी देते हुए कहा कि ”यदि वे जनध्रुवीकरण चाहते हैं तो अपनी इन कटौतियों को लागू कर सकते हैं।” उन्होंने कामगरों से कहा कि ”हो सकता है कि वो यहां टैंक ले कर आयें और हमें काम पर लौटने के लिये मजबूर करें।” पिछले महीने दिसम्बर 2012 में, यूरोजोन के वित्त मंत्रियों की बैठक में 34.3 बिलियन यूरो के बेलआउट पैकेज में से 9.2 बिलियन यूरो ग्रीस को देने की घोषणा की गयी है। संसद के द्वारा प्रस्तावित कटौती, उसे पाने की शर्त है। 24 जनवरी के, इस हड़ताल की वजह से ग्रीस सरकार को एक आपात बैठक बुलानी पड़ी जिसका प्रमुख मुददा ‘जनधु्रवीकरण’ था। जिसमें तय किया गया कि ”जो भी कामगर काम पर आने से इंकार करेगा, उसे नौकरी से निकाला जा सकता है।” विकासमंत्री ने कहा कि ”सरकार उदासीन नहीं रह सकती है।” उन्होंने सरकार के पक्ष में जनधु्रवीकरण की बात भी की।

ग्रीस की गठबंधन सरकार, प्रदर्शनकारी पबिलक ट्रांसपोर्ट इम्प्लाइज़ को काम पर वापस लाने की राह ढूंढ रही है, मगर, अब तक कोर्इ राह नहीं निकली है। मेट्रो कामगरों ने एथेन्स के पास ‘नेटवक्र्स हेडक्वाटर्स’ में घेराबंदी कर लिया है। कोर्ट के द्वारा हड़ताल को अवैध करार दिया जा चुका है, किंतु हड़तालियों का कहना है कि ”जब तक हमारी जायज मांगें मानी नहीं जाती हैं, तब तक हड़ताल जारी रहेगी।” ग्रीस की सबसे बड़ी यूनियन ‘जनरल कानफीडरेशन आफ ग्रीक्स वरकर्स’ ने भी हड़ताल का समर्थन किया है। सरकार वार्ता के स्थान पर अब दमन की ओर बढ़ रही है। मेट्रो वरकर्स यूनियन के प्रमुख ने कहा है कि ”सिविल मोबलाइजेशन का मतलब तानाशाही है। उन्हें आने दीजिये और हमें उठा कर ले जाने दीजिये।”

24 जनवरी को हजारों लोगों ने सरकार के आर्थिक नीतियों और सुधार के खिलाफ राजधानी एथेन्स में प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि सरकार के सुधारों का घातक प्रभाव सिर्फ आम लोगों को ही सहना पड़ता है, और समाज के सबसे धनी एवं प्रभावशाली लोगों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ता। उन्होंने सरकारी करों में वृद्धि और सामाजिक सुविधाओं में कटौतियों का विरोध किया। इस प्रदर्शन में छात्र, कामगर, अवकाश प्राप्त पेंशनर, बेरोजगार और विकलांगों ने भी भाग लिया।

25 जनवरी को कटौतियों का विरोध कर रहे हड़ताली कामगरों को अपनी जगह से हटाने के लिये पुलिस ‘सब वे ट्रेन डिपो’ में घुस गयी। जिसके विरोध में पुलिस के हमले के बाद, ‘जनरल कान्फीडरेशन आफ ग्रीक वरकर्स यूनियन’ के सैंकडों कार्यकर्ता मेट्रो कामगरों के पक्ष में इकटठा हुए। विरोध अभी भी जारी है, किंतु सरकारी दमन और धमकियों के परिणामस्वरूप ग्यारहवें दिन हड़ताल समाप्त हो गया। 26 जनवरी को हजारों ‘ग्रीक वरकर्स यूनियन’ के सदस्यों ने असंतुष्ट ‘पबिलक ट्रांसपोर्ट वरकर्स’ के प्रति अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिये प्रदर्शन किया। उन्होंने ग्रीस की संसद तक मार्च किया। कामगरों की कटौती का विरोध और सरकार की ‘आपात कानून’ का भी विरोध किया, जिसकी वजह से कामगरों को अपनी हड़ताल रोकनी पड़ी। जिसके अंतर्गत विरोध करने वाले मजदूरों एवं कर्मचारियों को न सिर्फ नौकरी से निकाल दिया जायेगा बलिक, हिरासत में लेकर सजा भी दी जायेगी।

बढ़ते जनअसंतोष और कर्जदाताओं के बढ़ते दबावों को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है, कि ग्रीस यूरोपीय संघ से अलग हो जायेगा।

स्लोवानिया में सरकार विरोधी प्रदर्शन- एक लाख लोग सड़कों पर

यूरोजोन की आर्थिक नीतियों की वजह से उसके सदस्य देशों में भी उसकी विश्वसनियता घटती जा रही है। यही कारण है, कि मंदी की मार सहते हुए स्लोवानिया की सरकार यूरोजोन के सदस्य देशों के कर्जदाताओं से बेलआउट पैकेज लेने के पक्ष में नहीं है। वह अपने खर्च में कटौती और आम स्लोवानियावासियों पर सरकारी टैक्स बढ़ा कर मंदी से उबरने की कोशिश कर रही है। मगर, देश की आम जनता और कामगरों की ऐसी सिथति नहीं है कि वह कटौती और बढ़े हुए टैक्सों को स्वीकार कर सकें।

23 जनवरी को ‘स्लोवानियन स्टेट इम्प्लाइज़’, ल्युब्ल्याना में सरकार के कटौती के विरोध में हड़ताल पर चले गये। ‘कान्फीडरेशन आफ पबिलक सेक्टर ट्रेड यूनियन’ ने दावा किया है कि 1,00,000 लोग इस आम हड़ताल में शामिल हुए, जिसमें टीचर, प्रोफेसर, कस्टम अधिकारी, डाक्टर और नर्स भी शामिल हैं।

स्लोवानिया की गठबंधन सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के वेतन में 5 प्रतिशत की कटौती करना चाहती है। ट्रेड यूनियन अधिकारियों का कहना है कि ”सरकार 2013-2014 में नौकरियों में कटौती न करने का विश्वास दे, तब ही इस पर चर्चा की जा सकती है।” मिनिस्टर आफ जसिटस एण्ड पबिलक एडमिनिस्ट्रेशन का कहना है कि ”यूनियन के साथ बातचीत चल रही है। देश को बचाने के लिये यह कटौती जरूरी है।”

स्लोवानिया में भ्रष्टाचार भी अपने चरम पर है। जिसके खिलाफ 10,000 लोगों ने प्रदर्शन किया। दिसम्बर में प्रदर्शनकारियों ने स्लोवानिया के दूसरे सबसे बड़े शहर मारिबा के मेयर को अपना पद छोड़ने के लिये विवश कर दिया।

यूरोपीय संघ के कर्जदाताओं से कर्ज न लेने के निर्णय पर सरकार कब तक टिकी रहती है, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सिथतियां बिगड़ती जा रही हैं। और कर्ज लेने का मतलब, ग्रीस बनना है।

जर्मनी- यूरोजोन की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का संकट

जर्मनी ने अपने देश का सोना अमेरिका और फ्रांस से अपने देश में लाने का निर्णय लिया है। उसके पास 177.5 बिलियन डालर का सोना है। गोल्ड रिजर्व के मामले में वह दुनिया का दूसरे नम्बर का देश है। 2,700,000 गोल्ड बार (सोने की र्इंटें) उसके पास है। जर्मनी के सेण्ट्रल बैंक -बुनदिस बैंक- ने फ्रांस और अमेरिका से अपने सोने की निकासी की घोषणा की है कि बैंक आफ फ्रांस -पेरिस से वह अपना पूरा 374 टन सोना, अपने देश वापस लायेगा और फेडरल रिजर्व- न्यूयार्क में जमा 1500 टन सोने में से 300 टन सोना तत्काल और शेष को बाद में वापस लायेगा।

शीतयुद्ध के काल में जर्मनी को इस बात की आशंका थी कि सोवियत संघ उस पर हमला कर सकता है। अपने गोल्ड़ रिजर्व को बचाने के लिये उसने दुनिया के कर्इ मजबूत अर्थव्यवस्था वाले देशाें में अपने सोने का भण्डार रख दिया था, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था सुरक्षित रहे। जर्मनी के सेण्ट्रल बैंक का सोचना है कि अब ऐसी आशंकायें नहीं रह गयी हैं कि कोर्इ देश उस पर हमला कर सकता है, इसलिये अपनी अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिये वह अपना सोना, अपने बैंक में रखने का निर्णय लिया है। बैंक ने घोषणा की है कि ”अब वह अपने व्यावसायिक कार्यों के लिये ही अपना थोड़ा सोना बाहर रखेगा।” वर्तमान में उसका 30 प्रतिशत सोना ही उसके अपने बैंक में है।

जर्मनी के पास 3,396 टन सोने का भण्डार है, जिसका न्यूनतम अनुमानित मूल्य 115 बिलियन डालर है। अपना सोना अपने देश से बाहर रखने की नीति की आलोचना जर्मन कोर्ट के द्वारा भी की जाती रही है। बुनदिस बैंक के बोर्ड मेम्बर कार्ल लुडविग थीले ने 16 जनवरी की रिपोर्ट में कहा है कि ”अब राजनीतिक सिथतियां बदल गयी हैंं। पूरब और पशिचम के बीच का संघर्ष भी समाप्त हो गया है।” उन्होंने आगे कहा कि ”अपने देश की अर्थव्यवस्था और अपनी मुद्रा की मजबूती के लिये यह कदम उठाया गया है, ताकि उसकी विश्वसनियता बनी रहे।”

अपने देश में अपने सोने के भण्डार को वापस लाने के जर्मनी के निर्णय के संदर्भ में कार्ल लुडविग के वक्तव्य से यह बात बिल्कुल साफ हो जाती है कि या तो जर्मनी की वित्तीय सिथति में परिवर्तन आ गया है, या फ्रांस और अमेरिका की वित्तीय सुरक्षा को बड़ा खतरा है। और ये दोनों ही बातें मौजूदा अमेरिका और यूरोपीय वित्त व्यवस्था के लिये बड़ा खतरा है। कर्इ अर्थ समीक्षकों का कहना है कि ”दुनिया फिर से सोने के वास्तविक मान की ओर लौट रही है।” रूस, चीन और कर्इ अन्य महत्वपूर्ण वैशिवक शकितयां, अपने सोने के भण्डार को बढ़़ा रही हैं, ताकि अमेरिकी ‘डालर’ और यूरोपीय संघ के ‘यूरो’ से अलग मुद्रा प्रणाली विकसित कर सकें। चीन और रूस ने सोने के अपने घरेलू उत्पादन को बढ़ा दिया है और उसका बड़ा हिस्सा उनके देश की केंद्रीय बैंक ही खरीद लेती है। चीन दुनिया का सबसे बड़ा वह देश है, जो विश्व बाजार से सोने की खरीदी कर रहा है।

आज यूरोपीय संघ और यूरोपीय देशों की जैसी सिथति है, और कर्ज का संकट जिस तरह बढ़ता जा रहा है, उससे यह अनुमान पहले ही लगाया जाता रहा है कि जर्मनी अपनी वित्तव्यवस्था को बचाने के लिये यूरोजोन से अलग हो सकता है। यदि आज ऐसा होता है तो यूरोपीय संघ ही खत्म नहीं हो जायेगा, बलिक यूरो-डालर भी मुंह के बल गिर पड़ेगा। इसलिये, जर्मनी के इस निर्णय को किसी बड़े वित्तीय संकट के, पूर्व की सिथति के रूप में देखा जा रहा है। इस निर्णय का प्रभाव अमेरिका और फ्रांस के ऊपर भी पड़ेगा, जहां क्रमश: 45 और 11 प्रतिशत जर्मनी का स्वर्ण भण्डार है।

यूरोजोन के कुल जीडीपी में जर्मनी की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत है। जो 0.5 प्रतिशत घटी है। 2011 में जर्मनी का विकास दर 3 प्रतिशत था। जो 2012 में घट कर 0.7 प्रतिशत रह गया है। यूरोपीय संघ के संकटग्रस्त देशों की तरह ही जर्मनी और फ्रांस में भी जनप्रदर्शनों की शुरूआत हो गयी है। वैशिवक मंदी और कर्ज का संकट झेल रहे यूरोप के लिये संकट के और गहराने का प्रमाण है। लोग बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी, घटते वेतनमान और मुक्त बाजारवादी वित्तीय व्यवस्था का विरोध कर रहे हैं। जर्मनी में 18 और 24 जनवरी को सार्वजनिक क्षेत्र के मजदूर और एयरपोर्ट कर्मचारियों ने हड़ताल कर दिया है। फ्रांस में भी परिवहन कर्मचारियों की हड़ताल जारी है।

फ्रांस – उदारीकरण का संकट

अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये फ्रांस की होलांदे सरकार ने समाज के सबसे धनी वर्ग के ऊपर सरकारी कर लगाने की नीति की घोषणा की है। जिसकी वजह से वहां पहले से हो रहे औधोगिक पलायन में तेजी आ गयी है। देश के राष्ट्रपति रह चुके सरकोजी भी फ्रांस छोड़ने की बात सोच रहे हैं। फ्रांस का सबसे धनी वर्ग किसी भी कीमत पर न तो अपनी सुविधओं में कटौती चाहता है, ना ही वह अपने ऊपर किसी भी सरकारी कर का वजन उठाने के पक्ष में है। जिस उदारीकरण की नीतियों ने निजी क्षेत्रों को खुली छूट दी और आम जनता के जीवन में भूख से लेकर बेरोजगारी की समस्याओं को जन्म दिया, वही उदारीकरण तीसरी दुनिया के देशों के लिये तो आक्रामक हो रहा है, मगर अपनी घरेलू समस्याओं को सुलझाने की क्षमता खोता जा रहा है।

10 जनवरी को फ्रांस के टैक्सी चालकों ने कर्इ शहरों की सड़कों और राष्ट्रीय राजमार्गों को जाम कर दिया। ये लोग सरकार के द्वारा परिवहन क्षेत्र में किये जा रहे सुधारों का विरोध कर रहे हैं। जिसे ‘नेशनल टैक्सी ड्रार्इवर यूनियन’ -सीयूएनटी- का समर्थन हासिल है। यूनियन के प्रमुख एलिन ग्रीस्ट ने कहा कि ”हमारे लिये यह खेदजनक है कि अपनी समस्याओं के प्रति सरकार का ध्यान खींचने के लिये हमें प्रदर्शन का सहारा लेना पड़ रहा है। जिससे आम जनता को भारी असुविधा की सजा भोगनी पड़ रही है।” 5000 टैक्सी ड्रार्इवरों ने एफिल टावर के पास की सडकों को जाम कर दिया।

फ्रांस के दक्षिण के चालकों ने दक्षिणी तटीय शहर मार्सिल्ल्स को पूर्व में लीयोन से जोड़ने वाले हार्इवे पर 7 किलोमीटर लम्बी टैक्सी की लार्इनों से जाम कर दिया। टैक्सी यूनियन ने कहा है कि ”नया चिकित्सा सम्बंधी सुधार और परिवहन के क्षेत्र में उदारीकरण की नीतियों से उनकी आजीविका और कारोबार दांव पर लग जायेंगे।” उदारीकरण के खिलाफ फ्रांस में भी जनअसंतोष बढ़ता जा रहा है। फ्रांस की अर्थव्यवस्था पर भी यूरोपीय संकट का प्रभाव नजर आने लगा है।

यूरोप का वित्तीय संकट अपनी आर्थिक सीमाओं को लांघता जा रहा है।

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