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रंजीत वर्मा की तीन कविताएँ

रंजीत वर्मा हमारे समय के एक महत्वपूर्ण कवि हैं | आज जब साहित्य में चारों ओर अन्याय और शोषण के खिलाफ़ एक सन्नाटा सा पसरा हुआ है, ऐसे में कवि रंजीत वर्मा इस ख़ामोशी को लगातर तोड़ने के अथक प्रयास में डटे हुए हैं | “कविता 16 मई के बाद” की शुरुआत इसका प्रमाण है | रंजीत जी की कविताओं में एक बेचैनी तो है ही किन्तु उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है एक विद्रोह का स्वर | इनकी कविताएँ पढ़ते हुए महान विद्रोही कवि काज़ी नज़रुल इस्लाम याद आते हैं मुझे “बलो बीर” |

-नित्यानंद गायेन

1. हो सकता है किसी दिन मुठभेड़ में मार दी जाए कवितारंजीत जी

भारी उथल-पुथल के बीच
जब बीसवीं शताब्दी गुजर रही थी
मेरा जन्म उन्हीं दिनों हुआ

बड़ा हुआ उन्नीसवी शताब्दी की
विचारधारा में सांस लेते हुए
जो बारूदी गंघ से भरी हुई थी

सामंती मांद के चिथड़े उड़ाती
यह बारूदी गंध नक्सलबाड़ी से चलकर
आई थी हमारे समय तक

इक्कीसवीं शताब्दी के इस
चैदहवें साल में जब सब कुछ पीछे छूट चुका है
देश अपने समय के सबसे
खतरनाक कगार पर आ खड़ा हुआ है
निहत्थी कविता इसका मुकाबला नहीं कर सकती

मैंने जब लिखना शुरू किया था
तो सशस्त्र विद्रोह का उफान
सर्वत्र उतार पर था
जबकि उसकी जरूरत उन दिनों सबसे ज्यादा थी

उन्हीं दिनों पुरस्कारों सेे पूरी तरह लैस
गुटबाजियां अपने चरम की ओर बढ़ रही थी
और सभाओं में
नित नई घोषणाएं हो रही थीं
जो अन्ततः विचार के खिलाफ जाती थी
ईमानदार आदमी साहित्य में
कभी इतना कमजोर नहीं हुआ था
जितना उन दिनों वह दिखता था

किसानों ने आत्महत्याएं तो बाद में शुरू की
पहले कवियों ने उन्हें
अपने जनपदों से निकाल बाहर किया
दो हजार चैदह की 16 मई तो अभी आई
लेकिन हिंदुत्ववाद से
बहुत सारे कवियों लेखकों कलाकारों का मन
भूमंडलीकरण के बाद से ही
अंदर-अंदर पसीजने लगा था
यह काम धीरे धीरे उसी तरह होना शुरू हुआ
जिस तरह प्रगतिशीलता की जमीन
उनके अंदर से चुपचाप खिसकने लगी थी
और इस बात का पता उन्हें
उस दिन भी कहां चला
जब वे आगे बढ़कर लपक लेने की सलाह
एक दूसरे को दे रहे थे
वह तो बहुत बाद में चलकर बिल्कुल अभी अभी
अपना प्रधानमंत्री जब घोषणा करते हुए कह उठा
कि उसके खून में पैसा दौड़ता है
तो बात खुलकर सामने आई
लेकिन तब भी बहुत सारे लोग इसे
नफरत लूट और अवसरवादिता से नहीं
बल्कि विकास और सफलता से जोड़कर देखते रहे
और खुश होते रहे
जबकि विकास खुद तब तक खून चूस लेने वाले
किसी मंत्रोच्चारण में बदल चुका था
लेकिन वे उसे कोई पवित्र चीज मानते रहे
और उस पर अंगुली उठाने वालों को
गुनाहगार तक कहने से नहीं हिचके
बावजूद इसके कि अबतक
करोड़ों लोग बेघरबार हो चुके हैं
और आत्महत्याएं इतनी आम हो गई हैं
कि खबरों की दुनिया से उसे बाहर कर दिया गया है
चार लाख की विशाल संख्या को
हतप्रभ करती अब वह पार निकल चुकी है

इस बीच माओेवाद जंगलों में
आग की तरह फैला
और राख बनकर हमारे सपनों पर झड़ने लगा
शहरों में वह आज भी दिख जाता है
हमेशा किसी गुम व्यक्ति का पता पूछता हुआ
और फिर खुद कहीं अदृश्य हो जाता हुआ

मेरी कविता अक्सर उस गुमशुदा व्यक्ति की
तलाश में लग जाती है
और अदृश्य हो जाते व्यक्ति का
पीछा करती मेरे हाथ से छिटक जाती है
वह भूल जाती है कि
अब सब कुछ वैसा ही नहीं रहा
जैसा कि उम्र के पिछले तमाम सालों में
वह रहा था
लेकिन जो कविता संस्थाओं अकादमियों
और विश्वविद्यालयों में पनाह लेने की जगह
आवारगी में पनाह लेती हो
जो कविता फर्जी मुठभेड़ में मार गिराए जाने की
हत्यारी कोशिश का सामना करती
छापामार युद्ध के रास्ते पर निकल पड़ी हो
आपको क्या लगता है
मेरे समझाने से क्या वह लौट जाएगी

हो सकता है कविता का यह दुस्साहस
उसे मंहगा पड़ जाए
और वह सचमुच किसी दिन
किसी फर्जी मुठभेड़ में मार दी जाए

आखिर वह कोई सामान्य राजनेता नहीं बल्कि
अपने खास प्रोजेक्ट में लगा
एक कट्टर प्रचारक है
उसे समाज को दो फाड़ में
देखने की हमेशा से आदत रही है
उसकी असल ताकत घृणा में है
जो वह दूसरों से करता है
और कविता से भी
उस प्रेम तक से उसे नफरत है जो
दीवारों और सरहदों को
एक दूसरे के सपनों में लांघ जाता है

वह रोजाना अपनी कार्रवाई
हिंसा से शुरू करता है
और खत्म भी
किसी न किसी हिंसा पर ही करता है।

 

2. इस तरह कितने दिन बच पाएगा लोकतंत्र

बाहरी सिग्नल पर रोक दी गई ट्रेन
में घण्टों बैठा मैं सुनता रहा था उस दिन
कलकत्ता के मन के विचलित हो जाने की कथा
यह करीब चालीस-बयालिस साल पहले की बात है
जब लोकल ट्रेन या बस का किराया
पांच पैसा बढ़ जाने पर
वह सड़कों पर उमड़ पड़ता था
उठते नारों और लहराती मुठ्ठियों
के बीच थम जाया करती थी तब
शहर की तेज रफ्तार सांसें
’कलकत्ता एक युद्धपोत’ यही कहा था उन दिनों
नवारुण भट्टाचार्य ने अपनी कविता ’इश्तेहार’ में
जिसे मैंने बहुत बाद के दिनों में पढ़ा

कलकत्ता क्यों पटना को ही देख लीजिए
वहां भी अब वह बात कहां रही
वहां तो गांधी मैदान तक में सरकार
ताला लगा देती है
फिर भी कहीं कोई
मशाल उठी हो
ऐसी कोई घटना अभी तक सुनने में नहीं आई
तो क्या यह सच है कि
आज की राजनीति सिर्फ वोट डालने तक जाती है
भूख और अभिव्यक्ति जैसी ठोस चीजों तक
अब उसकी पहुंच नहीं रही
क्यों आज राजनीति सांप्रदायिकता की तनी हुई रस्सी पर
चलने गिरने संभलने के करतब तक
सिमटी हुई है
किन अफवाहों की ताकत काम कर रही है इसके पीछे
किन तिकड़मों की महीन बुनावट
बांधी हुई है राजनीति को अपने महाजाल में

अगर ऐसा ही चलता रहा तो
कितने दिन इस देश में बच पाएगा लोकतंत्र
कैसे लगेगी जनता की पंचायत
कहां इकट्ठे होकर चलेगी बहस
सिर्फ स्वतंत्र कोर्ट-कचहरी और अखबार ही नहीं
आम आदमी का गुस्सा और उस
गुस्से का सड़कों पर इजहार किया जाना
भी बचाता है लोकतंत्र को

गांधी मैदान में ताला लगाना
जुबान पर पाबंदी लगाने की तरह है
फिर कौन पूछेगा किससे कि
महज पांच साल के लिए चुने गए कुछ लोग
आखिर कितना कुछ करने का निर्णय ले सकते हैं
किस हद तक वे उलट-फेर कर सकते हैं
क्या उनके लिए संभव है कि
वे देश का नाम बदल दें
राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह पशु पक्षी बदल दें
राष्ट्रीय गीत या उसकी धुन बदल दें
देश पर अपने नायक थोपना तो दूर की बात

वे कोई आलोड़न से निकलकर
नहीं आए हैं सत्ता में
मुठ्ठी भर लोगों द्वारा चुने गए हैं
और वह भी महज पांच साल के लिए
न कि हमेशा के लिए
पूरा देश नहीं है उनके साथ
न वे पूरे देश के साथ हैं
यह उन्हें भी पता है
और हमें भी

उन्हें जिन दस्तावेजों की धूल भर झाड़नी थी
उन्हीं दस्तावेजों को वे धूल में मिला रहे हैं
गुलामी के दिनों से निकलकर
फैसले लेने वाले दिनों में
जाने की स्मृतियां थी वहां
उसे महज फाइल मत कहिए
देश के निर्माण की प्रथम इबारत थी वह
आजादी के सड़सठ साल बाद जिसे पढ़ना
अपनी ऐतिहासिकता से गुजरने जैसा था
वे उन्हें आग के हवाले करने का
इतना बड़ा फैसला कैसे ले सकते हैं
क्या यह फैसला लेने का
अंतिम अधिकार है उनके पास

वे गांधी की हत्या पर पर्दा नहीं डाल सकते
तो अब मिटा रहे हैं हत्या के सबूत
हत्यारों को सजा मिल जाने
और पूरी दुनिया के इस रहस्य से
वाकिफ हो जाने के बाद भी
वे ऐसा क्यों कर रहे हैं
किस खुदी हुई स्मृति को मिटाना चाह रहे हैं वे
संघ परिवार पर प्रतिबंध लगाए जाने के फैसले थे वहां बंद
जो तब के गृह मंत्री ने लिए थे
गांधी की हत्या के बाद हुई
काबिना मंत्रियों की बैठक में
इस तरह वे क्यों कोशिश कर रहे हैं
गांधी के हत्यारों की शिनाख्त मिटाने की
क्या इसी मिटाई जा रही शिनाख्त की बुनियाद पर
खड़ी कर रहे हैं वे
दुनिया की सबसे ऊंची लौह प्रतिमा
उसी गृह मंत्री की
क्या इस तरह वे इतिहास का झूठ गढ़ रहे हैं
और पहना रहे हैं उसे लोहे का कवच

बाजार दीमक की तरह खोखला कर चुका है
लोकतंत्र की नींव को पूरी दुनिया में
और हमारे देश में भी
अगर सुन सकते हो तो सुनो
यही वक्त है जब
फासीवाद के आने की आहट
सुनाई पड़ती है इतिहास में
बजार की बढ़ती ताकत का वह प्रतीक है
बजार पहले उसके आने की चोर गली तैयार करता है
फिर फासीवाद बाजार के लिए
लूट उन्माद और बर्बरता के सारे जघन्य रास्ते खोलता है

दिल्ली देश की राजधानी है
तो फिर यहां इतने दलाल क्यों रहते हैं
और उनकी बेपनाह बढ़ी हुई ताकत
वे तो यहां इस शहर में
आन्दोलन तक चलाते देखे गए हैं
बल्कि ऐसी खबरें तो अब
देश के कोने-कोने से आने लगी हैं
तो क्या पूरा देश दिल्ली होता जा रहा है
क्या कर रहे हैं ये दलाल पूरे देश में
क्या देश भर में वे इसी तरह ताकतवर हो गए हैं
किसके लोग हैं ये
दिल्ली होने से देश को बचाना
एक बड़ा सवाल है

क्यों बिखरता जा रहा है कलकत्ता इतना
कि दिखता है वह तनी हुई मुठ्ठी से भी
कम संकल्पों से भरा
क्यों सिमटता जा रहा है पटना इतना
कि दिखता है वह मानचित्र में दर्ज नक्शे से भी छोटा
कहां रहा इन शहरों का वह मिजाज
कि सवाल पूछे तो राजनीति की दिशा बदल जाए

इस बुरे वक्त में
हमें अपने दिल के उजाड़ में
जिंदा रखना होगा एक कलकत्ता एक पटना
नहीं तो बच नहीं पाएगी दिल्ली
यह सवाल पहले वाले सवाल सेे जुड़ा जरूर है
लेकिन बड़ा है
जिसका जवाब हो सके तो
हमें यहीं इसी बैठक में ढूंढ लेना चाहिए।

 

3. आप काम क्या करते हैं

1
मेरा क्या है
मैं तो कवि हूं
मैं तो लिखता ही हूं उनके लिए
जिनके पास कुछ नहीं है
न खोने को नींद न पसाने को भात
न कोई राहत देता फैसला
अदालत की मुहर वाला
और न कहने को कोई देश ही अपना
परिवार तक उनका कहां रह पाता है इकट््ठे
तितर-बितर हो जाता है सब
मैं जब भी लिखने बैठता हूं
इन बातों से अलग कुछ सोच नहीं पाता

क्या यह मेरे कवि होने की मजबूरी भर है
और कुछ नहीं
क्या आपकी कोई मजबूरी नहीं
आप काम क्या करते हैं

2
मेरा क्या है
मैं तो किसान हूं
मेहनत और धैर्य पहचान है मेरी
रोपता हूं सींचता हूं
मौसम साथ न दे तब भी
भरोसा नहीं उठता
अंदर से जर्जर होता हुआ भी
देखता हूं उग आई फसल को कई बार
खेतों में खड़े-खड़े सूखते हुए
लेकिन अपनी जमीन बेचने की बात
सोच नहीं पाता

सिर्फ पेशे और मुनाफे से
जोड़कर इसे आप न देखें
तो शायद समझ पाएंगे मेरी बात
यह मुझे अपनी मां
अपनी पहचान
अपना पता-ठिकाना अपनी स्मृति
अपनी जिंदगी के तमाम गीत बेचने जैसा लगता है

क्या यह मेरे किसान होने की मजबूरी भर है
और कुछ नहीं
क्या आपकी कोई मजबूरी नहीं
आप काम क्या करते हैं

3
मेरा क्या है
मैं तो मजदूर हूं
आप जो कहेंगे बनाने वह बना देंगे
लेकिन यह नहीं कहेंगे कि
हम देश बना रहे हैं
जैसा कि आप कहते नहीं अघाते
और चाहते हैं कि हम भी यही कहें
सिर्फ सड़कों पुलों बिल्डिंगों मिलों का बनना
देश का बनना नहीं होता है
यह हमने जाना भटकते हुए शहर-दर-शहर

जिन हजारों गांवों के नामो निशां मिटे
और जिन लाखों लोगों के गांवों के नामों निशां मिटाने
का नक्शा हाथ में लिए
पहलू बदल रहे हैं आप
उन्हें कैसे समझाएंगे कि देश बन रहा है
मुझसे तो यह नहीं हो सकता
मेरे हाथों सब ढहता है
बल्कि कहना चाहिए कि
मैं ही वह हूं जिसका
अब तक की कहानी में सब कुछ ढहता रहा है
मेरे मजदूर होने की कथा भी
यहीं कहीं छिपी पड़ी है
और जो गढ़ा जाता है
वह भी मेरी कहानी का ही एक हिस्सा है
वाकिफ हूं उसकी सच्चाई से भी
मेरी आंखों के सामने सब होता है
मैं चुप नहीं रह सकता
इतने बड़े सच पर मैं पर्दा नहीं डाल सकता

क्या यह मेरे मजदूर होने की मजबूरी भर है
और कुछ नहीं
क्या आपकी कोई मजबूरी नहीं
आप काम क्या करते हैं ?

4.
एक दिन पलट दिए जाएंगे आपके सारे फैसले
बुरे वक्त में हमेशा
काम आती है कविता
बन जाती है वह बचे रहने का
अंतिम हथियार

रखते हैं हम दुश्मनों पर नजर भी
लेकर कविता की ओट

जब कभी थक जाते हैं जिंदगी के इस महायुद्ध में
तो सो जाते हैं निढाल
कविता की किसी भी पंक्ति
या पंक्तियों के बीच सिर रखकर

बुरे वक्त में बीज की तरह छिप जाते हैं
धरती के सीने में
और निकलते हैं
कविता का सीना फाड़कर
रात की गहन निरवता में
जैसे एक युग आए सामने

और जब कभी चढ़ जाते हैं दुश्मनों के हत्थे
छिपा लेते हैं कविता को
दिमाग के सबसे कोमल तंतु के पीछे
हम उन्हें भनक तक नहीं लगने देते
कि हमारे बचे रहने के पीछे
लगी हुई होती है कविता की ताकत

कविता अपने होने का
अंतिम मतलब यहीं पाती है
और अपना घर भी
हम भी यहीं कहीं
कुछ सांसें सहेज पाते हैं अपने फेफड़ों में

देखिए तो सही कि आखिर किस तरह वे
बिना किसी शर्म के
लूट को विकास कह रहे हैं
हत्या को कानूनन किया गया इंसाफ
और घनघोर दमन को चुस्त प्रशासन
और इससे भी ज्यादा खतरनाक
तो वे तब नजर आते हैं
जब वे अपने तमाम झूठ के बाद
इस हत्यारी कोशिश में लग जाते हैं
कि उजाड़ा गया आदमी
अपने बेघरबार हो जाने की
कथा किसी से न कहे
और न इस पर लिखी जाए कहीं कोई कविता
महाशय आपकी निर्ममता चाहे जितनी भी
मूर्खतापूर्ण क्यों न हो
समय की उखड़ती सांस को
अपनी लय में थामे रखने से वह
कविता को रोक नहीं पाएगी

कविता तो बार बार यह पूछेगी ही कि
जंगलों खेतों पहाड़ों में रात दिन उनका
पीछा करते रहने का क्या मतलब है
और आप उनकी कोशिशों को जो वे
आजादी न्याय और हक को बचाने की करते हैं
उसे युद्ध क्यों कहते हैं
कहीं इसलिए तो नहीं कि
आप उन पर युद्ध थोपना चाहते हैं
आप उनकी जिंदा रहने की कोशिश को
अपनी जिंदगी के लिए खतरा क्यों समझते हैं
तमाम कौमों ने
इसी तरह कोशिशें की हैं
कभी आपके पूर्वजों ने भी ऐसी ही कोशिशें की थी
फिर ये कैसे गलत हैं
ये भी तो यही कर रहे हैं
निकाल रहे हैं इतिहास का चक्का
जो फंसा पड़ा है लूट और विकास के दुष्चक्र में
अगर आपकी नीति कहती है
कि यह कोशिश देश के खिलाफ है तो
हमें कहना पड़ेगा कि
यह दुष्चक्र और कुछ नहीं
आपकी लालच है
और इसके पीछे किसी और का नहीं
बल्कि आपका चेहरा छिपा है
अब आप हमें देशद्रोह की किसी धारा में
पकड़ने का कुचक्र न रचें
आप देश नहीं हैं
इसलिए आपके खिलाफ बोलना
देश के खिलाफ बोलना नहीं है

फिर भी आप चाहें तो छह गुणा आठ
की काल-कोठरी में हमें बंद कर सकते हैं
सच वहां भी अंधेरे में टटोलता हुआ
पहुंच जाएगा हम तक
कवि होने या कविता में जीने
की यह नियति है हमारी
सच नहीं रह सकता देर तक कविता से दूर
और कविता भी नहीं चल सकती दो कदम
सच के बिना
कविता सच तक पहुंचने की
अंतिम कोशिश होती है
भूख अन्याय और गुलामी जैसे तमाम मारक सवालों
के जवाब पीढि़यां यहीं तलाशती हैं

अंधेरे के अतल गर्भ ने हमें जन्म दिया है
आपके छह गुणा आठ के
कमरे का अंधेरा हमें लील नहीं पाएगा
बहुत थोड़ा है वह

आप करवट लेते समय के खिलाफ हैं
दब जाएंगे एक दिन उसके पांव तले

आप जो सोच भी नहीं पा रहे हैं
अंत में वह कह देता हूं आपसे
एक दिन आपके सारे फैसले पलट दिए जाएंगे
जब लगेगी विराट जन-अदालत।

-रंजीत वर्मा

 

कवि परिचय :
जन्म : २१ अगस्त १९५६ (पटना)
१९७९ से कविता लेखन की शुरुआत |
कविता के जरिये लोगों से जुड़ने और साथ ही लोगों को कविता तक लाने के प्रयास में १९८५ में कविता यात्रा | हिंदी की संभवतः पहली कविता यात्रा |मध्य बिहार के गाँव –गाँव में घूम –घूमकर कविता –पाठ | फिर एक गाँव से दूसरे गाँव जाते हुए साथियों सहित गिरफ्तार |
कविता 16 मई के बाद के सूत्रधार |

संपादन :
१९७८ में ‘पल्लवी’ नामक पत्रिका निकली |
जन –संस्कृति मंच की पत्रिका ‘नई संस्कृति ‘ का सह –सम्पादन वर्ष -१९८५ से ८७ तक
फिलहाल अनियतकालीन पत्रिका ‘भोर’ के प्रधान संपादक |
समकालीन तीसरी दुनिया के सम्पादन मंडल में सदस्य |

अनुवाद :
1. भोजन पर अधिकार भाग -1 एवं 2
2.दमन बनाम महिला सशक्तिकरण |
कृति: पीछे न छोड़ते निशान ( कविता संग्रह ) 2002 , ‘एक चुप के साथ’ (कविता संग्रह ) 2010 ,
‘लकीर कहीं एक खींचनी होगी आपको’ (कविता संग्रह ) २०१५ ,

संपर्क :
verma.ranjeet@gmail.com

प्रस्तुति : नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. आशीष मिश्र

    मुझे ये अलग -अलग कविताएँ नहीं लगतीं, यह एकाधिक बंदों में लिखी एक कविता है। एक संपूर्ण कविता, जो हमारे मुर्दा समय को विच्छेदित करने में सक्षम है।

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