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म्यांमार में भारत की सैन्य कार्यवाही

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म्यांमार में घुस कर भारतीय सेना ने उग्रवादियों के विरूद्ध सैन्य कार्यवाही की। शायद पहली बार? नहीं। ऐसा पहले भी हुआ है, मगर इतना हल्ला नहीं मचाया गया।

म्यांमार में स्थित भारत विरोधी उग्रवादियों के दो शिविरों को ध्वस्त किया गया और 100 से अधिक लोगों को मार गिराया गया।

यह मणिपुर में डोंगरा रेजीमेण्ट पर किये गये हमले की जवाबी कार्यवाही थी। जिसकी जानकारी समझौतों के तहत म्यांमार की सरकार को दी गयी।

एक सवाल-

क्या भारत की मोदी सरकार, अमेरिका के एक कदम और करीब पहुंच गयी?

हम यह स्पष्ट कर देना चाहेंगे कि यह सवाल नीतिगत है, भारत की सुरक्षा और देश की अखण्डता से समझौते की पेशकश नहीं।

आज साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा अपने हित में ‘उग्र राष्ट्रवाद‘ और ‘दलित राष्ट्रीयता‘ के मुद्दे खड़े किये जा रहे हैं, ताकि उनकी राजनीतिक एवं आार्थिक विसंगतियों के खिलाफ बढ़ती जनचेतना को गलत दिशा दी जा सके।

भारत में बाजारवादी ताकतें सामंती राष्ट्रवाद को अपने सांचे मे ढाल चुकी हैं, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कर रहे हैं। भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी युद्ध और फिलिस्तीनियों के खिलाफ इस्त्राइल का समर्थन किया है। नरेंद्र मोदी, सरकार बनते ही बाजारवाद के लिये राष्ट्रवाद को साधने की नीति पर चल रहे है। उनके लिये राष्ट्रवाद दलित राष्ट्रीयता के मुद्दे से अलग कोई चीज है। जबकि राष्ट्रवाद केे साथ उग्रराष्ट्रवाद और दलित राष्ट्रवाद का मुद्दा जुड़ा हुआ है। भारत में जो नस्ल और धर्म से सम्बद्ध है।

म्यांमार खुद नस्ल और धर्म से जुड़े राष्ट्रवाद से पीडि़त है और वहां की वर्तमान सरकार को अमेरिका का समर्थन हासिल है। जहां पिछले कई सालों से रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ बौद्वों के द्वारा हिंसक वारदातें की जा रही हैं। सदियों पहले -अलग-अलग सदी और अलग-अलग किश्तों में- वर्तमान बांग्लादेश (भारत) से गये मुसलमानों को वहां से भगाया जा रहा है। बुद्धवादियों के हिंसक हमलों में म्यांमार के सरकार की हिस्सेदारी कम नहीं है। सदियों से म्यांमार में बसे इन भारतवंशी मुसलमानों को आज भी वहां की नागरिकता प्राप्त नहीं है।

हजारों की तादाद में -म्यांमार से पलायन के लिये विवश रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी देश -थाईलैण्ड, मलेशिया और फिलिपिन्स के समुद्री सीमा से बाहर अपने नाव और जहाजों पर पड़े हैं। उन्हें अपने देश में शरण देने वाला कोई नहीं है। म्यांमार की सरकार उन्हें लौटने नहीं देगी, और दूसरा कोई देश उन्हें अपने यहां शरणार्थी का दर्जा देने को भी तैयार नहीं है। अपनी ही जमीन से बे-दखल हुए लोगों का यह जत्था समुद्र में भोजन-पानी और छांव से मोहताज है। लातिनी अमेरिकी देशों की पहल पर थाईलैण्ड में कुछ लोगों को शरण मिली, बाकी जुबानी जमा खर्च है। जबकि इस समस्या का समाधान म्यांमार की सरकार को निकालना चाहिये, जो उन्हें नागरिकता और सुरक्षा देना नहीं चाहती है।

भारत को भी बांग्लादेश के साथ मिल कर म्यांमार की सरकार पर दबाव बनाना चाहिये, किंतु मोदी सरकार इस मामले में अनासक्त है, और देश की मीडिया के लिये, यह कोई खबर ही नहीं है, जो म्यांमार में घुस कर की गयी सैन्य कार्यवाही को ‘दृढ़ता का सबूत‘ मान रही है। जोकि देश को अमेरिकी खेमें मे और समस्याओं को वार्ता की मेज से दूर ले जाने की तरह भी है।

यदि सीमांत-पूर्वोत्तर राज्यों की समस्याओ का समाधान करने के लिये सरकार सिर्फ हथियार ले कर निकलेंगी, तब समझा जा सकता है, कि वह कहां पहुंचेगी? सच यह है, कि जो ताकतें देश में उग्र राष्ट्रवाद को हवा दे रही है, वो ही ताकतें अलगाववादी दलित राष्ट्रीयता के मुद्दों को उभारने का काम करती रही है। उसके लिये दोनों ही राजनीतिक अस्थिरता फैलाने का जरिया है। राष्ट्रवाद पूंजीवादी समाज व्यवस्था में ताश की गड्डी है, जिसे फेंट कर वह अपने मतलब के पत्ते निकाल लेता हैं।

जिस समय चीन अपने एशियायी एवं वैश्विक हितों के लिये अपने पड़ोसी देशों से -जिसमें भारत भी शामिल है- अपने सभी विवादों का समाधान व्यापार और वार्ताओ की मेज पर बैठ कर निकालने की नीति पर अमल कर रहा है, उस समय भारत यदि आक्रामक नीतियों पर अपनी निर्भरता बढ़ाता है, तो न सिर्फ उसकी विश्वसनियता पर इसका प्रभाव पड़ेगा, बल्कि चीन की विश्वसनियता को बढ़ाने का काम होगा। जिसके साथ होने से एशियायी देश एवं अब विश्व समुदाय आर्थिक सुरक्षा भी महसूस करने लगे हैं।

भारत के पक्ष में यह तर्क अपर्याप्त है, कि नेपाल, भुट्टान, श्रीलंका और बांग्लादेश आतंकवाद एवं उग्रवाद के विरूद्ध भारत के समर्थक देश हैं। म्यांमार से समझौते हैं।

नेपाल के संदर्भ में यह बात उल्लेखनिय है, कि जिस तत्परता से नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्राकृतिक आपदा में राहत और सहयोग को अंजाम दिया था, उसी तेजी से नेपाल से भारतीय दलों की वापसी भी हुई क्योंकि वाहवाही लूटने की नरेंद्र मोदी की नीतियों ने देश को हल्का बना दिया। म्यांमार के मामले में भी यही हो रहा है। म्यांमार की सरकार इस बात को अस्वीकार कर रही है, कि ‘‘भारतीय सेना ने म्यांमार में घुस कर सैन्य कार्यवाही की।‘‘ सस्ती लोकप्रियता के लिये वह कूटनीतिक भूल कर चुकी है। इस बात से भारतीय सेना भी सहमत नहीं है। देश की सुरक्षा के लिये सेना की सतर्कता और जनहित में अभियानों का समर्थन तो किया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिये खम ठोंकने का खामियाजा भी भुगतना पड़ेगा।

यदि मोदी सरकार अपने पड़ोसी देशों को यह संदेश देती है, कि ‘‘भारत के विरूद्ध सीमा पार से होने वाली आतंकी एवं उग्रवादी गतिविधियों के खिलाफ हमारी नीति घुस कर मारने की है‘‘, तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश की प्रतिक्रिया का अंदाजा लगाया जा सकता है। जहां से आतंकी घुसपैठ हुए हैं, और आज भी हो रहे हैं। जिसे रोकना वहां की सरकारों के बस में भी नहीं है। यदि पाकिस्तान यह कहता है, कि ‘‘हम म्यांमार नहीं‘ तो बाकी  देशों की प्रतिक्रिया इससे अलग नहीं होगी। और चीन से भी देश की सीमायें लगी हैं। और ‘विश्वसनिय सूत्रों‘ के हवाले से सीमांत क्षेत्र के राज्यों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों का चीन से सम्पर्क जोड़ना और ऐसी कार्यवाही को अंजाम देना, संभव नहीं है।

मगर, सस्ती लोकप्रियता मोदी साहब को खास पसंद है।

इसके बाद भी, हम जानते हैं, कि यह उससे आगे की चीज है। देश में उग्रराष्ट्रवाद से राजनीतिक एकाधिकार और बाजारवाद के लिये ‘राष्ट्रीय सोच‘ को राष्ट्रवाद के सांचे में ढ़ालना उनका मकसद है। जिसके लिये सरकार का दबंग दिखना जरूरी है। आम जनता के बीच यह खबर जाना भी जरूरी है, कि सरकार राष्ट्रीय हितों से कोई समझौता नहीं करेगी। और अंततः मोदी साहब यही बतायेंगे, कि राष्ट्रीय हित और आर्थिक विकास के लिये श्रम कानून में संशोधन और भूमि अधिग्रहण विधेयक का पारित होना जरूरी है, और सरकार इस मुद्दे पर झुकेगी नहीं, और जरूरत पड़ा तो ‘आम सहमति‘ के लिये, घुस कर मारेगी। विरोध के हर शिविर को ध्वस्त करेगी। वह जो भी करेगी, वह राष्ट्रीय हित में है।

नरेंद्र मोदी कितने समझदार और कितने बड़े कूटनीतिक हैं? इस बारे में हमारे सोच अलग हो सकती है, मगर उनके पीछे खड़ी ताकतों को कम कर के आंका नहीं जा सकता, उन्होंने मीडिया और राष्ट्रवाद का अपना हंथियार बना लिय है। ‘मेक इन इण्डिया‘ केे लिये जितने राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नीतियों की सीमाओं को तोड़ा जा रहा है, और जिस तरह से तोड़ा जा रहा है, वह सनक नहीं, बल्कि सोची-समझी कार्य नीति है। यह तो हमें मानना ही होगा, कि जिन ताकतों ने भारतीय चुनाव पद्धति को अपना जरिया बना कर राजसत्ता पर काबिज होने में सफलता हासिल की है, उन्हें हथियारों से कोई परहेज नहीं है। वो हथियारों का उपयोग भी करेंगे और हथियारों का उत्पादन भी। मोदी के मेक इन इण्डिया को इस ओर मोड़ा जा रहा है।

पिछले एक साल से उन्हें विदेशी पूंजी निवेश की बड़ी भूख है। अब उनकी भूख देश की सुरक्षा के लिये भी जाग गयी है। हवा है, कि देश की सेना के पास गोला-बारूद ही नहीं है। किंतु, उसका मनोबल काफी ऊंचा है। म्यांमार में की गयी र्कावाही को इसी मनोबल की ऊंचाई के रूप में दिखाया जा रहा है, जो नरेंद्र मोदी की वजह से है। जिन्होंने 4 जून को मणिपुर डोंगरा रेजिमेंट पर हमल के खिलाफ घुस कर मारने के लिये 7 जून तक सेना को कार्यवही की स्वीकृति दी। और स्पेशल फोर्स ने इसे अंजाम दिया। सुरक्षा सचिव डोमाल की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। जिन्हें मोदी जी ने नियुक्त किया है।

भारत के सुरक्षा विश्लेषक यह प्रमाणित करने पर तुले हैं, कि ‘‘इस सैन्य अभियान से न सिर्फ उग्रवादी और आतंकी संगठनों को कड़ा संदेश जायेगा, बल्कि, यह चीन और पाकिस्तान सहित दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों के लिये भी चेतावनी है, कि भारत घुसपैठ और आतंकवाद के खिलाफ सैन्य कार्यवाही करने में सक्षम है।‘‘ वो यह भी प्रमाणित कर रहे हैं, कि ‘‘यह दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का सबूत है।‘‘ जिसकी सूरत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं।

भारत में बाजारवाद और घनघोर राष्ट्रवाद की हवा बह रही है। नरेंद्र मोदी उस ओर बढ़ रहे हैं, जहां अमेरिका है, जर्मनी, जापान और इस्त्राइल है। वो लोग हैं, जिनके लिये समाज राज्य की सम्पत्ति है। जिनका यकीन आम जनता से ज्यादा वित्तीय ताकत और हथियारों पर है।

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