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लातिनी अमेरिकी देशों की ओर, यूरोपीय पलायन

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आर्थिक एवं राजनीतिक संकट झेल रहे यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के लिये लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देश ‘सुरक्षित क्षेत्र‘ के रूप में उभर रहे हैं। जहां अपने देश एवं महाद्वीप की आम जनता की फिक्र करने वाली जन समर्थक सरकारें हैं।

‘इण्टरनेशनल आॅर्गनाइजेशन फाॅर माइग्रेशन‘ के नये अध्ययन से इस बात का खुलासा हुआ है, कि ‘यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से लातिनी अमेरिकी देशों में पलायन अपने सर्वोच्च बिन्दु पर है।‘ यह पलायन की विपरीत दिशा है। पिछले 14 सालों में ऐसा पहली बार हो रहा है, कि काफी संख्या में यूरोपवासी लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों में जा कर बस रहे हैं। जबकि पहले पलायन की दिशा यूरोप और अमेरिका की ओर हुआ करती थी।

साल 2012 में यूरोप से लातिनी अमेरिकी देशों में आ कर बसने वालों की संख्या 1,81,166 थी और लातिनी अमेरिका से यूरोप की ओर पलायन करने वालों की संख्या 1,19,000 थी। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख है, कि 2007 से लातिनी अमेरिका से पलायन करने वालों की संख्या में अचानक 68 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह गिरावट अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि यूरोप में यूरोपवासी और प्रवासियों का जीवन जितना दूभर हुआ, लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों में लोगों के जीवनस्तर में सुधार और संभावनाएं बढ़ी। आर्थिक मंदी के बाद से यूरोप में जो सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक गिरावट दर्ज की गयी, उसी अनुपात में लातिनी अमेरिकी देशों में महाद्वीपीय एवं वैश्विक सोच का विस्तार हुआ। महाद्वीप के समाजवादी देशों -विशेष कर क्यूबा और वेनेजुएला- के द्वारा सामाजिक विकास योजनायें चलाई गयी, उसका प्रभाव उन देशों के अलावा महाद्वीप की आम जनता पर पड़ा। जन विकास योजनाओं की वरियता बढ़ी।

लौरा थाॅम्पसन -जो कि इंटरनेशनल आॅर्गनाइजेशन फाॅर माइग्रेशन की उप महानिदेशक हैं- ने संगठन के वेबसाइट पर कहा- ‘‘पिछले कुछ सालों में लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच के पलायन के प्रवाह में जो बदलाव आया है, स्वाभाविक रूप से वह समाजार्थिक सम्बंधों में आने वाले बदलाव की वजह से है।‘‘ उन्होंने कहा- ‘‘यह बदलाव अपने आप में एक ऐसी ताकत है जो आर्थिक एवं ढ़ांचागत संकट की वजह से पैदा होने वाली परिस्थितियों से तालमेल स्थापित करने की जानकारी देती है।‘‘

2010 से -पिछले 14 सालों में- पहली बार ऐसा हुआ है, कि यूरोपीय संघ से ज्यादा लोगों का पलायन लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों में हुआ। स्पेन से सबसे ज्यादा पलायन हुआ, इसके बाद इटली, पुर्तगाल, फ्रांस और जर्मनी का नम्बर है। आर्थिक मंदी, कर्ज का संकट और इन देशों की सरकारों के द्वारा वेतन से लेकर पेंशन और सरकार के द्वारा स्वास्थ्य-चिकित्सा, शिक्षा एवं जन कल्याण के लिये किये जाने वाले सामाजिक कार्यों में कटौतियों के साथ जनविरोधी बाजारवादी अर्थव्यवस्था को बचाने की नीतियों की वजह से लोगों का पलायन उस ओर हुआ जहां की सरकारें या तो कम जनविरोधी थीं या सामाजिक विकास की समाजवादी कार्यक्रमों से संचालित हो रही थीं।

साल 2013 के आंकड़ों के अनुसार लातिनी अमेरिकी महाद्वीप में कुल 8.5 मिलियन लोग ऐसे हैं, जो दुनिया के अलग-अलग क्षेत्र एवं देशों से आये हैं और वहां बस गये हैं। चिली, पेरू, बोलिविया और इक्वाडोर में ऐसे लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन अर्जेन्टीना, ब्राजील और वेनेजुएला में यह तादाद घटी है।जिसकी सबसे बड़ी वजह सरकारों की नीतियां और प्रतिक्रियावादी दक्षिणपंथी ताकतों की सक्रियता है।

वेनेजुएला में शावेज के असामयिक निधन के बाद से ही अमेरिकी सरकार वहां की दक्षिणपंथी ताकतों के सहयोग से राष्ट्रपति निकोलस मदुरो सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिये, राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बनाने की कोशिश कर रही है। गये साल के हिंसक प्रदर्शनों और आर्थिक हमलों की वजह से मदुरो सरकार की मुश्किलें भी बढ़ी हैं।

‘इण्टरनेशनल आॅर्गनाइजेशन फाॅर माइग्रेशन‘ के अध्ययन में यह पाया गया है, कि ज्यादातर लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों के लोग यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की तुलना में अपने ही महाद्वीप के देशों में रहना पसंद करते हैं। जहां यूरोप से ज्यादा सुरक्षा एवं संभावनायें हैं।

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