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मनीषा जैन की तीन कविताएं

manisha jain1. सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम

तुम्हारे एक अद्द् चौबारे में
जब जब होती हैं
गंभीर राजनीतिक, सामाजिक गोष्ठियां
उन बेदर्द, बेखौफ संगठनों की
सिरिया या ईरान व ईराक के
उन मानवता के विरोधी संगठनों की
क्या तुम्हारी छाती में कई विषैले फण उगते है
जब किसी बच्चे के हाथ में रोटी नहीं होती
जब वह अनाथ रोता है
रेगिस्तान में अकेला
अनाज सड़ता है धरती की छाती पर
औरते कोसो दूर पानी भरने चली जाती है
सिर पर इच्छाओं की मटकी उठायें
मुंह अंधेरे जब जाती हैं जंगल
डरी सहमी सी बैठती हैं जंगल

तब तो तुम अलगाव वदियों से सुलह कर रहे होते हो
या देश बांटने की मंत्रणा कर रहे होते हो

उन विषैले सांपों की मंत्रणा धाराशायी होती है
उस वक्त जब किसी जंगली आदिवासी के
पानी पीने का बर्तन मिलता है रास्ते में
या किसी बच्चे की छोटी सी चप्पल टंगी मिलती है पेड़ पर
उसे अर्से पहले गायब कर दिया गया था

जब शांति वार्ताएं विफल होती है
तब ही अराजकता का बिगुल बजता है
गरीबों का बहता है लहू
रेड कारपेट बिछाया जाता है
तभी राष्ट्राध्यक्ष पानी पीते हैं
कांच के गिलासों में
जिसे बनाने में धमन भट्टी के मजदूर की
कितनी रातें स्वाहा हुई होगी
और कितनी रातें वह भूखा सोया होगा
कितने दिन वह अपने परिवार से दूर रहा होगा

एक ही झटके में गिर कर टूटता है गिलास
राष्ट्राध्यक्ष की चौखट पर
नाक रगड़ते है बिचौलिऐ
जो इकट्ठा कर लाते हैं बाल मजदूरों को
गायब किए गये बच्चों को लगाते हैं काम पर
कहां पर ठहरता होगा उनका मन
और वे निरीह प्राणी
मां बाप पत्थर के नीचे दबातेे है
अपने सपने, अपने मन
जिनके बालक नापैद हो गए
उन बच्चों की मांए पछाड़ खा कर गिरती हैं
और राष्ट्राध्यक्ष के घर खनकते हैं
जाम पर जाम
रात गहरी होने पर वे सोने चले जाते हैं
मखमली बिस्तर में धंस जाते हैं वे

कल कौन से समझौते साइन करने
कौन से है कपड़े पहनने हैं
और कौन से है सपने खरीदने
इसी लिए तो पैदा हुए हैं वे

बह रहा है समय ज्वालमुखी की नदी सा
पूजा अर्चन सब हो रहे है विफल
ऐसे में स्त्री का क्रदंन
दब कर रह जा है
जैसे चूल्हे की राख में
ईश्वर स्वयं ही बजा रहा है घंटा
उसकी बात को कानों पर से टाल कर
तुम बन जाते हो खुदा
और नाराज हो जाते हो खुदा से
तुम्हारे नाराज होने से कुछ नहीं होता
क्योंकि खुदा है ही नहीं कहीं पर
इस सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम?

 

2. चांद की चीख

एक चीख जी है मैंने
दबा दी है उसे मैने
समाज के बोदे पड़े
कपड़ो के नीचे
घर के आटे के कनस्तर में
बाथरूम में साबुन की बट्टी के नीचे
वह चीख मैंने बंद कर दी है
कपड़ो की अलमारी में
रूपयों की गड्डी के नीचे
घर की दीवारें भी जानती है
मेरी वो चीख
जब दीवारें भी रोई थी साथ मेरे
घर का फर्श भी रोया था साथ मेरे
अब नहीं चीखना चाहती मैं वो चीख फिर से
जो फूलों को भी रूला दे
किताबों को अनाथ बना दे
कल मैने देखा
वो चांद भी चीख रहा था सरे आसमां
अपने काले दागो को सर पर उठा
उसकी रोशनी कुछ मद्विम थी
कल रात चांद भी चीखना चाहता था
शायद मेरी ही तरह।

 

3. तुम मुझे मत पुकारना

देखो!
तुम मुझे मत पुकारना
अगर तुम पुकारोगे मुझे
तो मैं नहीं जा पांउगी
तुम्हें छोड़कर
जैसे चिडि़या जाती है घोंसला छोड़कर
अभी तुम्हारे कपड़े रखने हैं
तहा कर अलमारी में
अभी तुम्हारा खाना बनाना हैं
ओ हो! तुम्हारा तो हाथ भी जल जाता है
सिर्फ चाय तक बनाने में
फिर कल सुबह तुम
अपनी जुराब भी नहीं खोज पाओगे
तुम अपना रूमाल तो भूल ही जाओगे
आॅफिस जाते समय
फिर मैं ही दूंगी तुम्हें
दरवाजे के नजदीक जाकर
अरे रे! फिर टिफिन भी भूल जाओगे तुम
जल्दी जल्दी में
और जूते……
जूते, जो चले गए है
बच्चों के पैरों से
पंलग के बहुत नीचे
तब मैं ही झुक कर निकालूंगी उन्हें
तुम नहीं निकाल पाओगे
अरे! कंघा भी तो नहीं मिलेगा तुम्हें
जो बच्चों नें खेल खेल में कर दिया है इधर उधर
अपना कुछ भी तो व्यवस्थित नहीं कर पाओगे तुम
तुम मुझे मत पुकारना
अगर तुम पुकारोगे मुझे
मैं नहीं जा पांउगी
तुम्हें छोड़कर
क्योंकि अब मुझे भी तो आदत पड़ गई है
ये सब काम करने की
फिर मैं भी तो नहीं रह पांउगी तुम्हारे बिना
इसलिए तुम मुझे मत पुकारना
मैं चुपचाप चली जांउगी यहां से
तुम मुझे मत पुकारना।

-मनीषा जैन

परिचय:

नाम- मनीषा जैन
जन्म- 24 सितंबर, मेरठ
शिक्षा- एम ए हिन्दी साहित्य, यू जी सी नेट
प्रकाशित कृति – एक काव्य संग्रह ‘रोज गूंथती हूं पहाड़’ प्रकाशित।

प्रकाशित साझा काव्य संग्रह –
1-सारांश समय का,
2-कविता अनवरत

देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविता, कहानी, आलेख एवं समीक्षा प्रकाशित।

सम्मान – 
भारतीय साहित्य सृजन संस्थान पटना तथा कथा सागर पत्रिका के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित कथा सागर सम्मान-2013

संप्रति- स्वतंत्र लेखन

संपर्क-
165 ए, वेस्टर्न एवेन्यू
सैनिक फार्म
नई दिल्ली-110080
ई मेल – 22manishajain@gmail.com

प्रस्तुति :-नित्यानंद गायेन

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One comment

  1. मनीषा दी एक बेहतरीन कवियत्री हैं ……
    सारी कवितायेँ लाजबाब !!

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