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21वीं सदी के दावेदार – 2

3.-Pic-Russia-China

सोच की जमीन के अन्तर्गत पहली किश्त – 13 अप्रैल, 2015 के आगे-

चीन की क्षमताओं का सही आंकलन करना मुश्किल है।

रूस की क्षमताओं के बारे में भी अंदाजा लगाना आसान नहीं।

और दोनों की संयुक्त आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक क्षमताओं का आंकलन उनकी अलग-अलग क्षमताओं के आंकलन से भी ज्यादा मुश्किल है।

और इन दोनों के साथ लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की सम्बद्धता से -विवादहीन रूप से- जिस आर्थिक, सामरिक एवं कूटनीतिक समिकरण का निर्माण हुआ है, जिसमें तीसरी दुनिया के एशियायी एवं अफ्रीकी देशों की सम्बद्धता है, वह दुनिया का गैर अमेरिकी खेमा है।

और हम कह सकते हैं, कि ये ही 21वीं सदी के गैर अमेरिकी दावेदार हैं। जिनका विकास एवं विस्तार तेजी से हुआ, और कुछ इस तरह से हुआ, कि चुनौतियों के सामने आने के बाद ही अमेरिकी सरकार की समझ में यह बात आयी कि अमेरिकी वैश्वीकरण और ‘मुक्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था‘ में उनके लिये गंभीर चुनौतियां पैदा हो गयी हैं।

  •  रूस और चीन के द्विपक्षीय सम्बंध और वैश्विक स्तर पर संयुक्त कूटनीतिक पहल।
  • आर्थिक सहयोग एवं सामरिक साझेदारी तथा संयुक्त सैन्य अभ्यासों सहित वार्ता के एक ही मेज पर नीतियों का निर्धारण।
  • अमेरिकी मुक्त व्यापार एवं बाजारवाद के विरूद्ध मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना।
  • ब्रिक्स सहयोग संगठन और ब्रिक्स बैंक की स्थापना और उसका विस्तार।
  • अमेरिकी डाॅलर के विरूद्ध चीन के युआन की दावेदारी और वैकल्पिक मुद्रा के रूप में युआन को मिल रही स्वीकृति।
  • चीन का विदेशी मुद्रा भण्डार और अघोषित गोल्ड रिजर्व के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में निर्णायक स्थिति।
  • शंघाई सहयोग संगठन और उसका विस्तार तथा रूस और चीन की निर्णायक उपस्थित।
  • ब्रिक्स बैंक और लातिनी अमेरिकी तथा कैरेबियन देशों के संगठन से मिल कर काम करने की सहमति।
  • ‘चीन और लातिनी अमेरिकी देशों का फोरम‘ और इस महाद्वीप में सबसे बड़ा निवेशक देश का दर्जा।
  • निकारागुआ नहर का निर्माण कार्य, भू-राजनीतिक संतुलन में परिवर्तन।
  • सिल्क रूट का निर्माण- रेल, सड़क और समुद्री मार्ग। अपने लिये सुरक्षित परिवहन का आधार।
  • अफ्रीकी देशों के आर्थिक एवं सामाजिक पुर्ननिर्माण में बढ़ती चीन और रूस की हिस्सेदारी तथा ‘अफ्रीकाॅम’ की वैकल्पिक व्यवस्था।
  • एशियन इन्फ्राॅस्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक -एआईआईबी- का निर्माण एवं उसकी घोषणां। यूरोपीय देशों सहित 57 देशों की सम्बद्धता। विश्व बैंक एवं अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का विकल्प।
  • रूस के द्वारा सामरिक सुरक्षा की दृष्टि से पूर्व सोवियत संघ की ओर वापसी और चीन सहित एशिया, अफ्रीका और लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की सुरक्षा के लिये कूटनीतिक, आर्थिक एवं सामरिक समझौते और संधियां।
  • एक सीमा तक रूस चीन के आर्थिक निवेश और वैकल्पिक व्यवस्स्था में बराबर का ऐसा साझेदार है, जो अमेरिका, यूरोपीय संघ और उनके मित्र देशों की सामरिक क्षमता सहित ‘नाटो‘ के सैन्य अभियानों को बेलगाम होने से रोकने की क्षमता रखता है। वह कूटनीतिक एवं सामरिक संतुलन का आधार है।

ये कुछ ऐसे बिंदू हैं, जिन पर अलग-अलग चर्चायें होती रही हैं। जो अमेरिकी एकाधिकार और 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने की उसकी नीतियों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। जिसका आधार अमेरिकी मनमानी और जोर-जर्बदस्ती के खिलाफ अपीन सुरक्षा के लिये उठाया गया कदम था, जो अब एक वैकल्पिक व्यवस्था और पतनशील अमेरिकी साम्राज्य के लिये गंभीर चुनौतियों में बदल गया है।

लीबिया, सीरिया और वेनेजुएला के संदर्भ में हमने इस बात को बार-बार प्रमाणित किया है, कि लीबिया में कर्नल गद्दाफी का तख्तापलट अमेरिकी साम्राज्य के ताबूत का सबसे बड़ा कील है, जो विश्व समुदाय के लिये ऐसा सबक है, कि अफ्रीकी देश ही नहीं, अमेरिका से असहमत दुनिया भर के देशों में अपनी सुरक्षा की सामूहित सोच और एकजुटता की अनिवार्यता को बढ़ाने का काम किया। जो गैर अमेरिकी पूंजीवादी और समाजवादी देशों के बीच का तालमेल भी है। जिसका जिक्र हम आगे करेंगे।

सीरिया के संदर्भ में, -जिसे अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय संघ के सदस्य देश और उनके सहयोगी अरब देशों ने आतंकी संगठनों और पेशेवर विद्रोहियों के जरिये गृहयुद्ध के आग में झोंक दिया- रूस ने स्पष्ट घोषणां की, कि ‘‘रूस सीरिया में लीबिया को दोहराने की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं देगा।‘‘ आज सीरिया की सुरक्षा का आधार और राष्ट्रपति बशर-अल-असद सरकार का सीरिया में होना, रूस और चीन की साझेदारी और विश्व समुदाय का अमेरिकी सरकार के विरूद्ध होना है। जो चाह कर भी राष्ट्रसंघ-सुरक्षा परिषद से नो फ्लाई जोन या सैन्य हंस्तक्षेप की स्वीकृति हासिल नहीं कर सका, ना ही सीरिया पर -आतंकवादियों के खिलाफ हो रहे हवाई हमले को बशर-अल-असद सरकार को सत्ता से बेदखल करने में बदल सका। वार्ताओं की मेज तक पहुंचना अमेरिकी सरकार और यूरोपीय संघ सहित उनके मित्र देशों की ऐसी विवशता बनी हुई है, जहां वह पहुंचना नहीं चाहते।

वेनेजुएला केे लिये तैयार की गयी अमेरिकी नीति, जिसका मकसद शाॅवेज केे असामयिक निधन के बाद वहां की बोलिवेरियन समाजवादी ‘निकोलस मदुरो सरकार’ का तख्तापलट करना है, लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों मे बराक ओबामा की खुलेआम बेवकूफी ही प्रमाणित हो रही है। जिसने महाद्वीपीय एकजुटता और विकास के जरिये समाजवाद की अवधारणा को ही मजबूत नहीं किया, बल्कि रूस और चीन से वेनेजुएला सहित लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों की नजदीकियों को बढ़ाने का काम भी किया। आर्थिक हमले और राजनीतिक अस्थिरता को फैलाने के लिये वहां के दक्षिण पंथी विपक्ष के हिंसक प्रदर्शनों को वह जमीन तक नहीं मिली जिसकी उन्हें तलब थी। मदुरो सरकार को बेदखल करने की नीतियां नाकाम रहीं। जबकि अमेरिकी सरकार के पास शाॅवेज के तख्तापलट की नाकामी का ऐसा अनुभव भी था, जिसे दोहराने की जरूरत नहीं थी। लेकिन अमेरिकी सरकार अपनी हरकतों से बाज आने वाली चीज नहीं है। वह हो चुके परिवर्तनों और अपनी वैश्विक व्यवस्था की विसंगतियों को समझने में, अब तक नाकाम रही है। उसे यह स्वीकार करने में दिक्कतें आ रही हैं, कि अब लातिनी अमेरिकी देश अमेरिकी साम्राज्यवाद का पिछवाड़ा नहीं है, जहां वह सैनिक सरकारों की फसल उगा सकेे, जिसकी उसे आदत है।

वेनेजुएला विकास के जरिये समाजवाद का ऐसा प्रारूप बन चुका है, जहां जन हिस्सेदारी के जरिये कम्यूनों की स्थापना हो रही है, और सरकार राजभवनों से निकल कर सड़कों पर आ गयी है। समाजवाद, बोलिवेरियन क्रांति और क्यूबा के ‘21वीं सदी का समाजवाद’ ऐसा सच है, जिसे स्वीकार करके ही रूस और चीन मुक्त व्यापार के नये क्षेत्रों की रचना करने में, लातिनी अमेरिकी एवं कैरेबियन देशों को, अपना साझेदार बना सके हैं, जो इन देशों की सुरक्षा की अनिवार्यता भी है। और हमारे लिये गंभीर प्रश्न चिन्ह भी है। यह प्रश्न गंभीर है, कि समाजवाद और बाजारवाद के बीच की साझेदारी का प्रभाव किस पर क्या होगा?

सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के समाजवादी देशों के पतन के बाद पूंजीवादी -साम्राज्यवाद के जिस उत्थान की कल्पना की गयी थी, वह अपने ही वित्तीय पूंजी के जाल में फंस गयी। पूंजी का निजी क्षेत्रों में केंद्रियकरण और बाजार से सरकार की साझेदारी ससे उपजे मुक्त व्यापार और बाजारवादी अर्थव्यवस्था ने नयी विसंगतियों को जन्म दिया। आज की दुनिया इन्हीं विसंगतियों से बनी ऐसी दुनिया है, जहां संघर्ष और लड़ाईयां तो हैं, जिसके बढ़ने की आशंकायें, संभावनाओं से कहीं ज्यादा हैं, मगर समाज व्यवस्था के रूप में विकल्पहीनता भी बनी हुई है। उसकी निर्भरता रूस और चीन पर बनी हुई है।

विकास के जरिये समाजवाद या लातिनी अमेरिकी देशों का ‘21वीं सदी का समाजवाद‘ भले ही जन-भागीदारी और आम जनता पर विश्वास की अवधारणां है, इसके बाद भी सच यह है, कि राज्य के सरकारों की भूमिका सबसे बड़ी है, और साम्राज्यवादी आर्थिक एवं कूटनीतिक हमलों तथा सैन्य हंस्तक्षेप के विरूद्ध उसके पास ताकत की कमी है।

आज लातिनी अमेरिका एवं कैरेबियन देशों के क्यूबा और वेनेजुएला जैसे समाजवादी देशों के पास रूस और चीन की सामरिक एवं आर्थिक सहायता न हो, तो वो यूरो-अमेरिकी साम्रााज्यवादी हमलों से अपनी सुरक्षा और अपनी समाजवादी व्यवस्था को बचाने की स्थिति में नहीं है। यह सच है, कि हिंसक प्रदर्शनों और तेल की गिरी हुई कीमतों के द्वारा साम्राज्यवादी ताकतों ने जो आर्थिक एवं राजीनतिक हमले किये और सामरिक हमले की जैसी तैयारियां की गयीं, यदि चीन वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था के पीछे खड़ा नहीं होता और रूस अपनी सामरिक क्षमता के साथ कूटनीतिक समर्थन नहीं देता, तो अमेरिकी साम्राज्य को मिली नाकामी भी नहीं होती। वेनेजुएला या तो लीबिया बन चुका होता या सीरिया की तरह गृहयुद्ध को झेल रहा होता। महाद्वीपीय एकजुटता और विकास के जरिये समाजवाद दुर्घटनाग्रस्त हो सकता था।

हमारे सामने, 21वीं सदी की दावेदारी में समाजवादी दावेदारी और मुक्त व्यापार के नये ़क्षेत्रों की रचना करने वाली ताकतों की दावेदारी के बीच की समस्या है। जो आज एक दूसरे के साथ है। और साथ होने की वजह से ही 21वीं सदी को अमेरिकी सदी में बदलने की नीतियां नाकाम हो रही हैं, विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था का निर्माण भी हो रहा है, जिसमें बदलते हुए समाजवादी अवधारणां की भूमिका भी बड़ी है। इसके बाद भी सच यह है, कि इस खेमे की कमान रूस और चीन के पास है, जो या तो पूर्व समाजवादी देश हैं, या जहां समाजवाद (माओवाद) की अवधारणायें कमजोर पड़ चुकी हैं और मुक्त बाजारवाद निर्णायक कारक बन चुका है।

हम यह मान कर चल रहे हैं, कि एक बड़े युद्ध के बाद भी, अमेरिकी दावेदारी का अंत तय है।

21वीं सदी की दावेदारी में जनसमर्थक सरकारें और विश्व की आम जनता कहां है? यह अहम् मुद्दा है। जिससे मौजूदा सदी ही नहीं, आने वाली सदियों के -इतिहास के विकास की सही दिशा के स्वरूप का मुद्दा भी जुड़ा है।

जारी-(समापन किस्त आगे)

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